अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

आखिर प्रेम का गान जीत ही गया

Written By: AjitGupta - Jul• 26•19

एक फालतू पोस्ट के  बाद इसे भी पढ़ ही लें।

लोहे के पेड़ हरे होंगे

तू गान प्रेम का गाता चल

यह कविता दिनकर जी की है, मैंने जब  पहली बार पढ़ी थी तब मन को छू गयी थी, मैं  अक्सर इन दो लाइनों को गुनगुना लेती थी। लेकिन धीरे-धीरे सबकुछ बदलने लगा और लगा कि नहीं लोहे के पेड़ कभी हरे नहीं होंगे, यह बस कवि की कल्पना ही है। आज बरसों बाद अचानक ही यह पंक्तियां मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। कहने लगी कि कवि को ललकार रही हो! देखो तुम्हारे लोहे के पेड़ की ओर देखो! उस समय मैं अंधे कूप में डूब रही थी, मुझे दिख रहा था इस अंधकार में अपना भविष्य। तभी लोहे के पेड़ से हरी पत्तियां फूट निकली, देखते ही देखते तना हरा हो गया। असम्भव सम्भव बनकर सामने खड़ा था, मैं अन्धे कूप से डर नहीं रही थी अपितु मैंने मजबूती से हरे होते लोहे के पेड़ को थाम लिया था। अब अंधेरे में अकेले होने का संत्रास नहीं था, बस खुशी थी कि मेरा प्रेम जीत गया है, मेरा लोहे का पेड़ हरा हो गया है। कवि की कल्पना ने पंख ले लिये हैं और प्रेम के गान की आखिर जीत हो गयी है। अब गम नहीं, अब शिकायत भी नहीं, बस अब तो अंधेरे में भी जीवन को ढूंढ ही लूंगी।

आप समझ नहीं पा रहे होंगे कि क्या घटित हो रहा है मेरे जीवन में! लेकिन आज अपनी कहने का मन हो आया है। कैसे लोहे के पेड़ को हरे होंगे, कल्पना साकार हो उठी है! कहानी तो बहुत बड़ी है लेकिन एक अंश भर छूने का मन है, अमेरिका में बसे पोते का मन हुआ कि अब बड़ा हो रहा हूँ तो भारत आकर दादी और नानी के पास रहकर देखता हूँ। एक सप्ताह मेरे पास रहा, मैंने उसे मुक्त छोड़ दिया। उपदेश देने की कोई जिद नहीं और ना ही अपना सा बनाने का कोई आग्रह। वह खुश रहा और वापस लौट गया। माता-पिता ने देखा कि बेटा अचानक खुश रहना सीख गया है! मतलब हमारे लालन-पालन में कुछ अन्तर है। इधर मेरा जीवन अंधे कुए की ओर बढ़ने लगा, मैंने देखा की मेरे आंगन में लोहे का पेड़ खड़ा है, सारे प्रेम गीतों के बाद भी कोई उम्मीद नहीं है हरी पत्तियों की। बस सारे संघर्ष मेरे अपने है।

बेटे से बात होती है, वह कहता है कि हम गलत थे, मैं समझ गया हूँ कि खुशियाँ कैसे आती हैं। अपने  बेटे के चेहरे पर खुशियाँ देख रहा हूँ और अपने जीवन में बदलाव लाने का प्रयास कर रहा हूँ। तब मैंने कहा कि तुम्हारी नयी पीढ़ी ने सारे रिश्तों के सामने पैसे की दीवार खड़ी कर दी, रिश्तों को नहीं देखा बस देखा तो पैसे को, इसके लिये इतना और इसके लिये इतना। तुमने माँ से कहा कि तुम बहुत दृढ़ हो, सारे काम तुम्हारे, हमारा कुछ नहीं। घर के सभी ने कहा कि सारे काम तुम्हारे। मेरे ऊपर बोझ लदता चला गया और तुम सब मुक्त होते चले गये। लेकिन मैंने कभी हँसना नहीं छोड़ा, मैंने कभी अपना दर्द किसी पर लादना नहीं चाहा, बस प्रेम देने में कसर नहीं छोड़ी। इस विश्वास पर जीती रही कि लोहे का पेड़ शायद हरा हो जाए! विश्वास टूट गया लेकिन फिर भी जिद रही कि अपना स्वभाव तो नहीं छोड़ना। और एक दिन जब मैं अंधे कुएं में गिर रही थी, मैंने लोहे के पेड़ को थामने की कोशिश की अचानक ही देखा कि लोहे के पेड़ पर हरी पत्तियां उगने लगी हैं। मेरा परिश्रम बेकार नहीं गया है, अब मैं जी उठूंगी, अकेले ही सारे संघर्ष कर लूंगी क्योंकि एक सम्बल मेरे साथ आकर खड़ा हो गया है। मैं पैसे को हराना चाहती थी, लेकिन हरा नहीं पाती थी। मैं रिश्तों को जीत दिलाना चाहती थी लेकिन दिला नहीं पाती थी। हर हार के बाद भी जीतने का क्रम जारी रखती थी, मन में एक ही धुन थी कि गान तो प्रेम का ही गाना है, पैसे का गान नहीं। जिस दिन मेरे लिये काली रात थी, जिस दिन मैंने देखा कि मैं हार रही हूँ, लेकिन नहीं प्रेम कभी हारता नहीं और पैसा कभी जीतता नहीं। जैसे ही प्रेम जीता, पैसा गौण हो गया। पैसे के गौण होते ही सब कुछ प्रेममय हो गया। व्यक्ति अक्सर कहता है कि मैं क्या करूँ, कैसे करूँ? असल में वह पैसे का हिसाब लगा रहा होता है कि ऐसा करूंगा तो इतना खर्च होगा और वैसा करूंगा तो इतना! फिर वह अपने आपसे भागता है, खुशियों से भागने लगता है। इसी भागमभाग में दुनिया अकेली होती जा रही है, हम हिसाब-किताब करते रह जाते हैं और खुशियाँ ना जाने किस कोने में दुबक जाती हैं। पैसे कमाने के लिये हम  दौड़ लगा रहे हैं, अपनी मजबूरी बता रहे हैं लेकिन यही पैसा एक दिन हमारे लिये मिट्टी के ढेर से ज्यादा कीमती नहीं रह जाता है। सारे वैभव के बीच हम सुख को तलाशते रहते हैं। क्योंकि खुशियों की आदत ही खो जाती है। हरा भरा पेड़ कब लोहे का पेड़ बन जाता है, पता नहीं चलता। लेकिन मैं खुश हूँ कि मेरे लोहे के पेड़ पर हरी पत्तियां आने लगी हैं। आखिर प्रेम का गान जीत ही गया।

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