अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है

Written By: AjitGupta - Aug• 15•17

आधा-आधा जीवन जीते हैं हम, आधे-आधे विकसित होते हैं हम और आधे-आधे व्यक्तित्व को लेकर जिन्दगी गुजारते हैं हम। खिलौने का एक हिस्सा एक घर में बनता है और दूसरा हिस्सा दूसरे घर में। दोनों को जोड़ते हैं, तो ही पूरा खिलौना बनता है। यदि दोनों हिस्सों में कोई भी त्रुटी रह जाए तो जुड़ना असम्भव हो जाता है। हम भी खिलौना बना दिये गए हैं, हमने भी अपनी संतान को खिलौने जैसे संस्कारित किया है। एक हिस्सा किसी घर में तो दूसरा हिस्सा किसी घर में संस्कारित होता है। शरीर सम्पूर्ण मिला है लेकिन हमने कार्य विभाजन करके उसे आधा ही विकसित होने दिया है। एक को शक्तिशाली तो दूसरे को कोमल, एक को अर्थतंत्र में प्रवीण तो दूसरे को गृहविज्ञान में निपुण बनाने में हम सभी जुट गये हैं। हम इसी सभ्यता को लेकर अभी तक संस्कारित हुए हैं। इसीकारण एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इन दो खिलौनों को जोड़ने के लिये एक सी परवरिश चाहिये, दोनों को एक दूसरे के पूरक के रूप में ही संस्कारित होने की जरूरत है। सारी बात का मूल यह है कि हम युगल रूप में संस्कारित होते हैं, हमारा जीवन एकाकी रूप में संस्कारित नहीं है। इसके विपरीत यदि अमेरिका, यूरोप आदि देशों का जीवन एकाकी रूप में संस्कारित होता है, वहाँ युगल रूप से संतान को संस्कारित करने का रिवाज नहीं है।
एक दादी माँ थीं, उनसे एक कहावत सुनी थी। जब कोई बेटा रोता था तो वे कहती थीं कि – बेटा तू क्यों रो रहा है? आने वाली आएगी, तेरे लिए रोटी पकाती जाएगी और रोती जाएगी। ऐसे ही जब बेटी रोती थी तो कहती थीं – बेटी तू क्यों रो रही है? आने वाला आएगा, कमाता जाएगा और रोता जाएगा। याने रोना दोनों को है। हँसने के लिये दोनों को एक दूसरे का साथ चाहिए। आज परिवार का मूल झगड़ा भी यही है, हम एक दूसरे पर निर्भर हो गये हैं। हमारी खुशी दूसरे पर है, आपकी पत्नी का यदि आपकी माँ से झगड़ा होता है तो आप उसका समाधान नहीं दे पाते क्योंकि आपके व्यक्तित्व में परिवार के समाधान का संस्कार ही नहीं है। पुरुष महिलाओं के झगड़े में क्यों पड़े, बस पुरुष को यही सिखाया गया है। वह घर की समस्या में उलझना भी चाहता है और समाधान भी उसके पास नहीं है। जो बाहरी दुनिया में सफल है, कलेक्टर है याने पूरे जिले का रखवाला है वह अपने घर को समाधान नहीं दे पाता और आत्महत्या कर लेता है। उधर महिला को जीवन से जूझने के लिये सबकुछ सिखाया जा रहा है, वह सक्षम होती जा रही है, स्वयं को पूर्ण विकसित करती जा रही है। अब वह कार्यविभाजन के सिद्धान्त को मानने के लिये तैयार नहीं है। वह पति पर निर्भर होने के बावजूद भी कार्य विभाजन के सिद्धान्त को पूरी तरह से नहीं मानती है और इस सिद्धान्त को तो कतई नहीं मानती कि सम्पूर्ण परिवार का बोझ उस पर हो। और यदि वह भी कामकाजी है तो फिर इस सिद्धान्त को मानना उसकी कतई मजबूरी नहीं है।
भारतीय समाज इसी उहापोह में जीवन जी रहा है, वह आज भी समझ नहीं पा रहा है कि हमें हमारी संतान को पूर्ण रूप से संस्कारित करना होगा, तेरा काम और मेरा काम करके दिये गये संस्कार किसी युग में चल गये लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आज के युग में भी चल जाएंगे। ना लड़की को निर्भर रहने के संस्कार दीजिये और ना लड़के को। दोनों का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से विकसित कीजिये। आज के समय की यही आवश्यकता है। मुझे अपनी बुआ के घर की बात हमेशा अच्छी लगती थी, जब भी वहाँ जाती थी, बुआ को भी और भाभी को भी बराबर काम करते देखती थी। बुआ सभी के कपड़े धोती थी, यह नहीं की बहु के कपड़ अलग निकाल दें। मैंने उनके बीच में हमेशा प्रेम देखा। परिवार को चलाना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है, सभी को सारे काम के लिये तैयार कीजिये। जब लड़के घर में रोटी बनाते दिखायी देंगे तब कोई झगड़ा सर नहीं उठा पाएगा। फिर किसी कलेक्टर को आत्महत्या नहीं करनी पड़ेगी। युग बदलता है तो सभ्यता में भी परिवर्तन होता है। हम कहाँ से कहाँ पहुंच गये लेकिन परिवार में वहीं अटके हैं। परिवार में भी आगे बढ़िये, एक दूसरे पर निर्भर मत बनिए। यह निर्भरता ही आपको तोड़ रही है, कभी आशा साहनी मर रही है तो कभी सिंघानिया बेघर हो रहा है और कभी कलेक्टर आत्महत्या कर रहा है। अपनी परम्पराओं से चिपके नहीं, इन्हें बदलते रहें। रूकी हुई जिन्दगी सड़ने लगती हैं, जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है।

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