अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है

Written By: AjitGupta - Aug• 06•17

ओह! आज मित्रता दिवस है! मित्र याने मीत, अपने मन का गीत। मन रोज भर जाता है, उसे रीतना ही होता है, लेकिन रीते कैसे? रीतने के लिये कोई मीत तो चाहिये। मन जहाँ अपने आप बिना संकोच रीत जाए वही तो मीत होता है। मन को अभिव्यक्त करने के लिये मीत का साथ चाहिये और जिसे यह साथ मिल जाए वह सबसे धनवान बन जाता है। पता नहीं किसे मीत मिला और किसे नहीं लेकिन मेरा मीत तो मेरी लेखनी बन गयी है। यह फेसबुक यह ब्लाग और यह वेबसाइट मेरे मीत बनकर मेरे साथ हर पल खड़े हैं। यह मुझे नकारते नहीं है, मैं जो चाहे वो लिख सकती हूँ, जैसे चाहे अपने मन की परते खोल सकती हूँ। इससे कुछ भी नहीं छिपा है। मन को अभिव्यक्त होने का मार्ग मिल गया है। इसलिये हमारा सबसे प्यारा मित्र यह सोशल मीडिया बन गया है। ना केवल यह मेरी सुनता है अपितु मुझे सम्भालकर भी रखता है, मेरी बातों को सहेजकर रखता है। इतना तो किसी ने नहीं सुना जितना यह सुन लेता है। इसलिये मित्रता दिवस पर आज इसी परम मित्र को अपनी बाहों में भर लेती हूँ। यह नहीं होता तो मेरा वजूद भी बिखर गया होता, इसी के सहारे मेरा स्वाभिमान जिन्दा है।
लेखक मन को अभिव्यक्त करता है, इसके सहारे समाज के मन को भी अभिव्यक्त कर देता है लेकिन सम्पादक आप पर पहरे बिठा देता है। लोग आपको मंच से धकेल देते हैं। दो ही बाते होती हैं आपके सामने या तो अपनी अभिव्यक्ति बन्द कर दो या फिर अपना स्वाभिमान बेच दो। किसी समूह का हिस्सा बनकर गुलामी का जीवन और दूसरों की इच्छित अभिव्यक्ति आपका नसीब बन जाता है। पुरस्कार भी मिल जाते हैं, प्रसिद्धि भी मिल जाती है लेकिन मन में जो द्वंद्व हैं वे प्रकट नहीं होते, स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। जीवन नकली बन जाता है। आपको कुछ पैर दिखायी देते रहते हैं, जिन्हें पूजना आपकी नियति बन जाती है। लेकिन की-बोर्ड पर जब अंगुली थिरकती है और मॉनीटर पर शब्द दिखायी देने लगते हैं तब सारे की प्रतिबंध दूर हो जाते हैं। अपनी वेबसाइट पर बिना ताले-कुंजी के अपनी सम्पत्ती को रखने का आनन्द ही कुछ और है। मेरे मित्र के घर से भी कुछ लोग सेंध लगा देते हैं लेकिन दूध है तो बिल्ली पीयेगी ही, बस यह सोचकर बिसरा देती हूँ।
लेकिन दुनिया में अपने मन की सुनने वाले और भी हैं। कल एक माँ से बात हो रही थी, मैंने पूछा कि कितने बच्चे हैं? वे बोली कि दो हैं, दोनों ही बेटे हैं। बिटिया नहीं है, इस बात से दुखी थीं। मैंने पूछा कि मन किसके साथ सांझा करती हो? वे बोली कि इसी बात का गम है। बताने लगी कि कल तक बेटी ना होने का गम नहीं था लेकिन अब जब बेटे बड़े हो गये हैं, घर सूना लग रहा है। मन बात करने को तरस रहा है। मन तो हमेशा ही अभिव्यक्त होना चाहता है। बचपन में भी चाहता था लेकिन माँ को इतनी फुर्सत नहीं थी लेकिन बहन थी और शायद ऐसी कोई ही बात होगी जो अभिव्यक्त ना होती हो। वह मित्रता गहरी थी, मन से मन का जुड़ाव था। जहाँ भी छिपाव है वहाँ मित्रता दूर चले जाती है। अब बेटी है, मन को अभिव्यक्त करने के लिये। लेकिन जहाँ बहन नहीं है और बेटी नहीं है, उनसे पूछो कि मन को कहाँ हलका करते हो? शायद वे अभिव्यक्ति के मायने ही भूल गये हैं। सच्ची मित्रता बस यहीं बसी है। आज इस फेसबुक को भी, यहाँ के मित्रों को भी और बहन को भी और प्यारी बिटिया को भी मित्रता दिवस पर अपना सा प्रेम। तुम लड़ भी लोगे तो भी अभिव्यक्त ही हो जाओगे, तुम अपने से रहोगे तो भी अभिव्यक्त हो जाओगे. इसी मन की अभिव्यक्ति को तो मित्रता कहते हैं और तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है।

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