अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

बतंगड़ या समाधान

Written By: AjitGupta - Sep• 01•17

हम अपने-अपने सांचों में कैद हैं, हमारी सोच भी एक सांचे में बन्द है, उस सांचे को हम तोड़कर बाहर ही नहीं आना चाहते। कितना ही नुकसान हो जाए लेकिन हमारी सोच में परिवर्तन नहीं होता, कभी हमें पता भी होता है कि हम गलत तर्क के साथ खड़े हैं तब भी हम वहीं खड़े होते हैं और उसके लिये भी कोई तर्क ढूंढ लेते हैं। भीष्म अपनी प्रतीज्ञा के साथ खड़े थे, सारा वंश नष्ट हो गया लेकिन वे परिवर्तित नहीं हुए, कर्ण भी अपनी मित्रता के साथ खड़े थे, सब कुछ नष्ट हो गया लेकिन वे परिवर्तित नहीं हुए। हम लेखक लोग जब कुछ लिखते हैं तो हम अपना बिम्ब बनाते हैं और उसी के अनुसार अपनी बात कहते हैं लेकिन यह आवश्यक नहीं कि पाठक उस बिम्ब को समझ ले, बस वह और कुछ समझ लेता है। दोनों ही हैरान हैं कि क्या लिखा गया और क्या पढ़ा गया! ऐसे ही हर व्यक्ति की अपनी मानसिकता है, उसने स्वयं को अपने दायरे तक सामित कर लिया है। अधिकांश व्यक्ति भेड़चाल के होते हैं, जो चलन में आ गया, बस वे भी वहीं चल देते हैं और इसके विपरीत यदि कोई दूसरी बात कह दें तो उसे कदापि नहीं मानेंगे।
कल जोधपुर मेडीकल कॉलेज के समाचार आ रहे थे, एक पत्रकार समझ ही नहीं पा रही थी कि भला कोई भी डॉक्टर असभ्य भाषा का प्रयोग कैसे कर सकता है? उस जैसे करोड़ो लोग इसी सत्य के साथ जीते हैं कि डॉक्टर जैसे पेशे वाले लोग बड़े ही सलीके वाले होते हैं। वे ऑपरेशन थियेटर में, जहाँ मरीज का पेट चिरा हुआ हो, कैसे आपस में गाली-गलोज करते हुए लड़ सकते हैं? करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि एक संन्यासी कैसे व्यभिचार कर सकता है! करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि जो भी मिडिया दिखा रहा है, भला वह झूठ कैसे हो सकता है! करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि भला न्यायपालिका कैसे व्यक्ति का जाति और धर्म देखकर न्याय कर सकता है! इसलिये जब समाज में कोई घटना घटती है तब सभी लोग अपने-अपने तर्क गढ़ लेते हैं और हम जैसे लोग जो समग्रता में विचार करते हैं, जब किसी घटना पर दूसरी तरह से विचार कर लेते हैं तब बतंगड़ बन जाता है। कोई यह नहीं कहता कि यह भी एक विचार है, इस पक्ष पर भी विचार करना चाहिये लेकिन सभी अपनी बात पर अडिग रहते हैं और केवल एक पक्ष को सत्य बनाने में तुल जाते हैं।
हम अपनी बात पर अड़िग रहते हैं लेकिन समस्या का समाधान नहीं ढूंढते। मुझे हमेशा ही समाधान ढूंढना पसन्द है इसलिये दूसरे मार्ग की भी बात करती हूँ। लेकिन जैसे ही दूसरी बात की और जलजला आ जाता है। आज यदि हम समाधान के लिये जुट जाएं तो देश अधिक सुन्दर होगा। जोधपुर में हुए काण्ड में मीडिया अपनी मानसिकता दिखा रहा था जब कि सत्य और कुछ था। परिणाम क्या होगा, किसी पर कोई आरोप सिद्ध नहीं होंगे। जितने भी इस देश में बाबा हैं, हम उन पर भी अपने-अपने तरीके से अरोप मढ़ते हैं। समग्रता में विचार नहीं करते कि इस परिस्थिति में समाधान कैसे निकालें। बस एकबारगी तो हो-हल्ला खूब हो जाता है लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकलता है। हमें समाधान की ओर बढ़ना चाहिये ना कि अपनी मानसिकता को साथ खड़े रहना चाहिये। कम से कम मीडिया, बुद्धिजीवि, कानून आदि को समग्रता के साथ ही रहना चाहिये, जिसमें देश हित हो वही कार्य करना चाहिये।

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