अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

बेगम जान

Written By: AjitGupta - Jul• 12•18

एक पुरानी फिल्म जो शायद दो साल पहले अपनी कहानी पर्दे पर कह रही थी, उसकी चर्चा भला मैं आज क्यों करना चाहती हूँ, यही सोच रहे हैं ना आप! बेगम जान जो नाम से ही मुस्लिम पृष्ठभूमि की दिखायी देती है, साथ में एक कोठे की कहानी बयान करती है। कल टीवी पर आ रही थी तो आखिरी आधा घण्टे की फिल्म देखी, बस उसी आधा घण्टे की बात करूंगी, शेष फिल्म में क्या था, मुझे नहीं मालूम। बेगम जान का कोठा है, कई लड़कियाँ वहाँ रहती हैं लेकिन हुकुम मिलता है कि कोठा खाली कर दो। बेगम जान बन्दूक लेकर खड़ी हो जाती है और सामने थी गुण्डों की फौज। लड़कियों के हाथ में बन्दूक है, युद्ध हो रहा है लेकिन मुठ्ठी भर लड़कियां भला कहाँ ठहरती, कुछ मर जाती हैं और कुछ बच जाती हैं। गुण्डों का सरदार हवेली में आग लगा देता है और अपने हुक्मरानों से कहता है कि कोठा बर्बाद हो गया लेकिन मेरे लौण्डों को ईनाम के रूप में कुछ समय चाहिये जिससे यह कोठा कुछ देर के लिये आबाद हो सके। जलती हवेली का दृश्य है – बेगम जान सहित बची लड़कियां हँसते-हँसते हवेली का दरवाजा बन्द कर लेती हैं, अन्दर एक बुजुर्ग महिला सबको कहानी सुनाती है कि एक समय चित्तौड़ के किले पर खिलजी ने डेरा डाला था, जब सारे रास्ते बन्द हो गये तब राजपूज रानियों नें अपनी आबरू बचाने को 12 हजार की संख्या में जौहर किया था याने जलती आग में कूद गयी थी। हवेली जल रही है, कहानी कहने वाली का और सुनने वालियों का तन अग्नि में भस्म हो जाता है। बाहर खड़े गुण्डे और हुक्मरान सदमें में आ जाते हैं।
पद्मावती फिल्म पर बहुत विवाद किया गया, कुछ महिलाओं तक ने कहा कि जौहर गलत परम्परा है, बहुत खिल्ली उड़ायी गयी। कोई कह रहा था, युद्ध करके मरो और किसी का अर्थ था कि गुलाम बन जाओ लेकिन जीओ। बेगम जान कोठे की कहानी है वह भी मुस्लिम। आबरू को नीलाम करना ही उनका काम है लेकिन वे भी जानती हैं कि स्वतंत्रता का मतलब क्या होता है? जब भेड़िये शरीर को नोचते हैं, उसका अर्थ क्या होता है? मरते समय मुस्लिम महिला का आग में जलना, धर्म विरोधी होता है लेकिन उस समय उन क्षत्राणियों ने रानी पद्मावती को याद कर जौहर किया।
मैं उन तथाकथित लेखिकाओं से पूछना चाहती हूँ कि बेगम जान के जौहर के लिये कुछ लिखना चाहेंगी या आपकी कलम हिन्दुस्थान की तहजीब का मखौल उड़ाने के लिये ही स्याही भरती है। जिन परम्पराओं का सदियों से सभी ने सम्मान किया, उन परम्पराओं का केवल इसलिये मखौल उड़ाया गया क्योंकि आपका लेखन मखौल उड़ाने के लिये ही पैदा हुआ है और जो समाज हित में ना लिखकर केवल विद्रूपता के लिये ही लिखता है वह लेखक नहीं होता अपितु विनाशक होता है। मेरे पाठक मुझे क्षमा करेंगे जो बीती बात को यहाँ स्थान दिया। लेकिन यह रोजमर्रा की कहानी है कि हम हमारी परम्पराओं के विरोध में अपनी घृणित लेखनी लेकर खड़े हो जाते हैं। ना राम के आदर्श की लाज रखते हैं और ना कृष्ण के योगेश्वर स्वरूप की। एक बार पुन: क्षमा सहित।

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