अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

भारत की नाक तेरी जय हो

Written By: AjitGupta - Apr• 27•19

भारत की नाक और दादी की नाक का संघर्ष होते-होते रह गया! नाक को नापने जितना भी समय नहीं दिया गया! हमने तो अरमान पाल रखे थे कि दो नाकों का महायुद्ध होगा और भारत की नाक भारी पड़ेगी या फिर दादी की नाक! लेकिन हाय री किस्मत ऐसा कुछ नहीं हुआ! दिल के अरमां आँसुओं में बह गये! कल वाराणसी में भारत की नाक का दम-खम देखा जा सकता था, बस उसी को देखकर दादी की नाक कहीं पल्लू में छिप गयी। नाक को बचाना लाजिमी हो गया, नाक है तो सबकुछ है नाक नहीं तो कुछ नहीं। आज बचा लो, कल फिर काम आ जाएगी। लेकिन यदि आज ही कट गयी तो कल क्या रहेगी! नाक बड़ी चीज होती है, वाराणसी में तो गंगा किनारे खड़े होकर नापने का काम किया गया। गंगा में नाव में बैठकर नाक नापने का अग्रिम काम किया गया। कहा गया कि मेरी नाक खानदानी है, रईस है, यह माँ पर नहीं जाकर सीधे दादी पर चले गयी है। हनुमानजी की पूछ की तरह दादी की नाक ने लम्बा होना शुरू किया लेकिन वह एकाध फुट पर ही अटक गयी। एक कोने में दुबक कर देखने लगी कि मेरी नाक भला कहाँ अटक गयी है? देखती क्या है कि भारत की नाक श्रीकृष्ण के मुख की तरह विशाल रूप ले रही है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समा जाए इतना विस्तार ले रही है। पूरी काशी की नाक इसी नाक में विलीन हो गयी है। दादी की नाक धीरे से खिसक ली। बोली कि नहीं जाऊंगी अखाड़े में! कुछ लोगों ने धकेलने की कोशिश भी की लेकिन वह तो अड़ गयी, बोली की ज्यादा परेशान करोगे तो अय्यर की तरह गायब हो जाऊँगी लेकिन अखाड़े में तो नहीं उतरूंगी। 
अखाड़े में उतरने में एक और कठिनाई आ गयी। अखाड़े के नियमानुसार अपनी कद-काठी का हिसाब भी देने पड़ता है, जिससे बराबर की लड़ाई हो। नाक बोल उठी कि हम परदे वाले खानदान से हैं, भला अपनी नाप कैसे दे सकते हैं! हमारी माँ विदेश गयी थीं, हमने अभी तक नहीं बताया कि क्यों गयी थी, कहाँ गयी थी और कहाँ रही थी! मेरे पति व्यापार करते हैं, कल तो तुम पूछ लोगों की कितना कमाते हैं, भला यह कोई बात हुई। हम परदे वाले खानदान से हैं और तुम हमें बेपर्दा करना चाहते हो! नहीं हम नहीं लड़ेंगे। अखाड़ेवालों का भारी नुकसान हो रहा है, वे बोले कि ऐसा करते हैं कि एक बकरी बांध देते हैं, उसे देखकर शेर जरूर आएगा, शिकार करने। आनन-फानन में एक बकरी ढूंढ ली गयी और बाँध दिया अखाड़े के पास। चारो ओर मुनादी घुमा दी कि होशियार, सावधान, जैसे ही बकरी का शिकार करने शेर आए इशारा कर देना हम पर्दे की ओट से शेर का शिकार कर लेंगे और फिर हमारी नाक जीत जाएगी। लेकिन दादी की नाक तो इस पर भी तैयार नहीं हुई। बेचारी बकरी पेड़ से बंध गयी है, मिमिया रही है लेकिन उसके सामने एक पुली चारा डालने वाला भी कोई नहीं है। शेर तो पता नहीं कब आएगा बस डर है कि बकरी पहले ही भूख से दम ना तोड़ दे। दादी की नाक तो पतली गली से निकल गयी लेकिन बेचारी बकरी मिमिया रही है, बचा लो, बचा लो। दादी की नाक भाग रही है, उसे रोकने को लोग भाग रहे हैं, काशी खाली हो रही है, भारत की नाक विस्तार ले रही है। सारी दुनिया कह रही है, देखो भारत की नाक को देखो। इसी नाक से जाना जाएगा भारत। जय हो तेरी भारत की नाक, तेरी जय हो- जय हो।

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