अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

माँ का अभाव – टीस जीवन भर की

Written By: AjitGupta - Jul• 06•16

माँ का प्रेम जिन्हें स्वाभाविक रूप से मिलता है उन्हें समझ ही नहीं आता कि इस अनमोल देन को कैसे सहेज कर रखें। अक्सर संतानें माँ के प्रेम का मौल समझ ही नहीं पाती लेकिन जिन किसी को माँ का प्रेम नहीं मिलता उनसे पूछो कि वे इस प्रेम के अभाव को कैसे अनुभूत करते हैं। उनके जीवन की सबसे बड़ी टीस होती है, माँ के प्रेम का अभाव। एक समृद्ध – शालीन, 80 वर्षीय व्यक्तित्व के साथ बात करते हुए इस टीस का अनुभव हुआ। वे अपने गुरु के बारे में बता रहे थे कि कैसे मुझ जैसे वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति को भी श्रद्धा हो गयी। मैं जब उनसे पहली बार मिला तब उनने मेरे सर पर हाथ रखा, लगा जैसे माँ का ही हाथ हो, क्योंकि मैंने कभी माँ का प्रेम जाना ही नहीं था, अपितु विपरीतता जरूर जानी थी।
एक 80 वर्षीय व्यक्ति के मन में भी माँ के प्रेम का अभाव देखकर मन अन्दर तक हिल गया। जिन्दगी के सारे ही सुख जिसने एकत्र किये हों लेकिन आज भी वह व्यक्ति प्रेम के अभाव में जी रहा है! उसका जीवन शायद कभी पूर्ण हुआ ही नहीं! एक अभाव की टीस न जाने कहाँ-कहाँ परिलक्षित हुई होगी! जीवन में कितना न्याय और कितना अन्याय स्वत: ही हो गया होगा! उसकी तलाश कभी पूर्ण हुई ही नहीं होगी! उसने पत्नी में भी माँ को ही ढूंढा होगा और पुत्री में भी! इस प्रेम के अभाव का कोई विकल्प नहीं। यह ऐसा ही है जैसे बिना रस का जीवन। शायद माँ का प्रेम भोजन में चुटकी भर नमक जैसा ही होता है, यदि नमक है तो स्वाद है लेकिन नमक नहीं है तो स्वाद नहीं है।
लेकिन जिनको भी यह चुटकी भर नमक सहजता से प्राप्त है वे इसके अभाव के बारे में जरा नहीं सोचते, बल्कि उन्हें यह बोझ लगने लगता है। वे नमक और पत्नी रूपी शक्कर में अन्तर ही नहीं कर पाते। बस शक्कर को पाकर नमक के वजूद को भूल ही जाते हैं। उन्हें नमक का अभाव कभी जीवन में नहीं हुआ तो वे इस टीस को समझ ही नहीं सकते। काश इस टीस को हर कोई अनुभूत कर सके, इस प्रेम को ईश्वरीय देन मानकर हमेशा सहेजकर रख सके। लेकिन ऐसा होता नहीं, जिसे मिला है उसे कद्र नहीं और जिसे नहीं मिला वह टीस लेकर सब्र करता है। काश हम भी किसी के सर पर हाथ रखने के योग्य होते, क्या पता अनजाने में ही किसी को सूत भर सुख दे पाते।

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