अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

मित्र मिला हो तो बताना

Written By: AjitGupta - Aug• 06•18

दुनिया में सबसे ज्यादा अजमाया जाने वाला नुस्खा है – मित्रता। एलोपेथी, आयुर्वेद, होम्योपेथी, झाड़-फूंक आदि-आदि के इतर एक नुस्खा जरूर आजमाया जाता है वह है विश्वास का नुस्खा। हर आदमी कहता है कि सारे ही इलाज कराए लेकिन मुझे तो इस नुस्खे पर विश्वास है। तुम भी आजमाकर देख लो। ना मंहगी दवा का चक्कर, ना कडुवी दवा का चक्कर, ना लम्बी दवा का चक्कर, बस छोटा सा नुस्खा और गम्भीर से गम्भीर बीमारी भी चुटकी बजाते ही ठीक। ऐसी ही होती है मित्रता! सारे रिश्तों पर भारी! माता-पिता बेकार, भाई-बहन बेकार, सारे रिश्ते बेकार बस मित्र है विश्वास पात्र! वातावरण में ऑक्सीजन की तरह घुली हुई है मित्रता की दलील। बचपन की याद आ गयी, एक सहेली पास आती है और कहती है कि – तू मेरी सबसे अच्छी सहेली है! मैं उसकी तरफ देखती हूँ और सोचती हूँ कि मुझ पर यह कृपा क्यों! जल्दी ही उसे और कोई मिल गया और मैं किस कोने में गयी, ना उसे पता और ना मुझे पता! फिर कुछ बड़े हुए फिर किसी ने कह दिया कि तुम मेरी सबसे अच्छी सहेली हो। फिर वही अन्त! और कुछ बड़े हुए किसी ने कहा – आप मेरी सबसे अच्छी सहेली हैं। सम्बोधन बदलते रहे लेकिन कहानी एक सी रही। कोई मित्र स्थायी नहीं हुआ। जब मुझसे काम पड़ा मित्रता की कसमें खा ली गयीं और जब काम खत्म तो मित्रता और मित्र दोनों की रफूचक्कर। जब मेरी समझ पुख्ता हो गयी तब मैं कहने लगी कि भाई रहने दो, तुमसे यह नहीं हो पाएगा। मेरे पास देने को कुछ नहीं है, बस मैं विश्वास दे सकती हूँ, तुम्हारी खुशी में खुश हो सकती हूँ और तुम्हारे दुख में दुखी, इसके अतिरिक्त मेरे पास कुछ नहीं है देने को। लेकिन लोग कहते कि नहीं हमें आपका साथ अच्छा लगता है इसलिये आपसे मित्रता चाहते हैं। मैं कहती रही कि यह चौंचले कुछ दिन के हैं फिर वही ढाक के तीन पात। यही होता, उनकी आशाएं धीरे-धीरे जागृत होती, मैं किसी के काम आती और काम जैसे ही होता मित्र और मित्रता दोनों नदारद! लोगों को मिलते होंगे सच्चे मित्र, मुझे तो कोई खास अनुभव नहीं आया।
इसके परे रिश्तों की कहानी ज्यादा मजबूती से खड़ी दिखायी दी। रिश्तों के पन्ने फड़फड़ाते जरूर हैं लेकिन ये अपनी जिल्द फाड़कर दूर नहीं हो पाते, कभी जिल्द फट भी जाती है लेकिन अधिकांश किताब हाथ में रह ही जाती है। जीवन में कुछ भी अघटित होता है, ये रिश्ते ही हैं जो रिश्तों की मजबूरी से चले आते हैं, उन्हें आना ही पड़ता है। मित्रता तो ठेंगा दिखा दे तो आप कुछ नहीं कर सकते लेकिन रिश्ते ठेंगा दिखा दें तो अनेक हाथ आ जाते हैं जो उन्हें आड़े हाथ ले लेते हैं। हमने मित्रता की आँच को इतनी हवा दी कि वह धू-धू कर जल उठी, उसने आसपास के सारे ही रिश्तों को लीलना शुरू किया, हमने भी ला-लाकर अपने रिश्ते इस आग में फेंकना शुरू किये और बस देखते ही देखते केवल मित्रता की आग हमारे सम्बन्धों की रोटी सेंकने को शेष रह गयी, शेष आग बुझती चले गयी। कुछ दिनों बाद देखा तो हमारे चारों तरफ आग ही आग थी लेकिन मित्र कहीं नहीं थे। रिश्तों को तो स्वाह कर ही दिया था, मित्र तो आहुति चाहते थे, आहुति पड़ना बन्द तो मित्र भी पानी डालकर चले गये। लेकिन मित्रता में एक फायदा जरूर है, जब चाहो तब तक रिश्ता है, एक ने भी नहीं चाहा तो तू तेरे रास्ते और मैं मेरे रास्ते। रिश्तों में यह नहीं हो सकता, कितने भी रास्ते अलग बना लें, कहीं ना कहीं एक दूसरे से टकरा ही जाएंगे! रिश्तों की तो बात ही अलग है लेकिन जिन मित्रता को हम रिश्तों का नाम दे देते हैं वे भी हमारा साथ निभाते हैं और जिनको केवल मित्र कहकर छोड़ देते हैं वे कबूतर के घौंसले ही सिद्ध होते हैं।
कल मित्र-दिवस आकर निकल गया, बाजार में तेजी आ गयी। हर कोई अपने मित्र को उपहार देना चाहता था, इसलिये बाजार में थेंक्स गिविंग की तरह रौनक थी। सोशल मीडिया के कारण कंजूस लोगों का भी काम बन गया था, फूलों का गुलदस्ता सभी तरफ घूम रहा था। कहीं भी विश्वास दिखायी नहीं दिया, कहीं प्रेम दिखायी नहीं दिया, कहीं अनकही बातें सुनायी नहीं दीं! कहीं राजनैतिक मखौल दिखायी दिया, कहीं धार्मिक उदाहरण खोज लिये गये और कहीं सोशल मिडिया की दोस्ती ही दिखायी दी। मेरा मन बहुत करता है कि कोई ऐसा हो जिसके साथ घण्टों मन की बात की जा सके, मिलते भी रहे हैं ऐसे मित्र लेकिन वे समय के साथ बिसरा दिये गये। कहीं समय ने उन्हें पीछे धकेल दिया तो कहीं आर्थिक सम्पन्नता और विपन्नता ने तो कहीं बदलते विचारों ने। मित्रता वही शेष रही जो दूर बैठी थी, नजदीक आने पर तो तू मुझे क्या दे सकता है और क्या नहीं दे पाया, इसका हिसाब ही मन ही मन लगाया जाता है। इसलिये मैं मित्रता की कमसें नहीं खाती, ना ही मित्रता को रिश्तों से ऊपर रखती हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ मित्रता के मायने। इसकी उम्र बहुत छोटी होती है। लम्बी उम्र यदि मिल जाती है तो वह दूरियाँ लिये होती हैं। इसलिये बार-बार कहती हूँ कि मित्रता को इतना महान मत बनाओ कि रिश्ते ही दूर चले जाएं। मित्र होते हैं लेकिन उनको बाजार के हवाले मत करो, जिन रिश्तों को भी हमने बाजार के हवाले किया है उनमें ठहराव अधिक दिन नहीं रह पाया है। मित्रता दिवस भी मनाओ लेकिन अपने अन्दर के सच्चे मित्र को खोजकर। आज ऐसी पोस्ट लिखकर सभी मित्रों को नाराज कर दिया, लेकिन मुझे बताएं जरूर कि किसी को ऐसा मित्र मिला क्या जो हर कटु परिस्थिति में उसके साथ खड़ा था। हम सभी को ऐसे लोगों का अभिनन्दन तो करना ही चाहिये।

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