अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

यह कंकर वाली दाल है

Written By: AjitGupta - May• 02•19

मुझ जैसी महिला के लिये हर रोज सुबह एक नयी मुसीबत लेकर आती है, आप पूछेंगे कि ऐसा क्या है जो रोज आती है! सुबह नाश्ते में क्या बनेगा और दिन में खाने में क्या बनेगा, एक चिन्ता तो वाजिब ही है, क्योंकि इस चिन्ता से हर महिला गुजरती है लेकिन मेरी दूसरी चिन्ता भी साथ-साथ ही चलती है कि लेपटॉप पर क्या पकाया जाए और पाठकों को क्या परोसा जाए? राजनीति पर लिखो तो वह कढ़ी जैसी होती है, कब बासी हो जाए और कब बासी कढ़ी में उफान आ जाए? सामाजिक मुद्दे पर क्या लिखो, लोग कहने लगे हैं कि समाज माय फुट! परिवार तो मैं और मेरा बुढ्ढा में ही सिमट गया है! रोज-रोज ना खिचड़ी बनती है और ना ही मटर-पुलाव बनाया जाता है। कल एक मित्र ने लिख दिया कि मुड़-मुड़कर ना देख, मुड़-मुड़कर। अब हमारी उम्र तो मुड़-मुड़कर देखने की ही है, आगे देखते हैं तो पैरों के नीचे से धरती खिसक जाती है तो पीछे देख लेते हैं और कभी हँस देते हैं और कभी दो बूंद आँसू बहा लेते हैं। आज का सच तो यह है कि वास्तविक दुनिया लगातार हम से कुछ ना कुछ छीन रही है और यह फेसबुकीय दुनिया जिसे देख तो सकते हैं लेकिन छू नहीं सकते हैं, बहुत कुछ दे जाती है। कभी ऐसे लगता है कि हम क्रिकेट खेल रहे हैं, बल्ला हमारे हाथ में है, दुनिया के समाचार रूपी बॉल हमारे पास आती है और हम झट से बैट सम्भाल लेते हैं, कभी बॉल एक रन दे जाती है तो कभी चार और कभी पूरे छ। कभी ऐसा भी होता है कि किसी ने बॉल पकड़ ली और जोर से दे मारी विकेट पर। हम आऊट तो नहीं हुए लेकिन सामने वाले का गुस्सा टिप्पणी के रूप में हमारे विकेट को उड़ाने की हिम्मत कर लेता है। कभी प्यार से ही हमें कैच कर बैठता है तो कभी पास खड़ा विकेटकीपर ही हमारी गिल्लियां उड़ा देता है। कभी कोई ताली बजा देता है तो कभी कोई शाबासी दे देता है। कोई ऐसा भी होता है जो मन ही मन खुंदक खाता रहता है कि इसका खेल एक दिन चौपट जरूर करूंगा। 
तो फेसबुकी या सोशल मीडिया की इस दुनिया में आसान कुछ नहीं है। कब अपने ही दूर हो जाते हैं और कब दूर के लोग नजदीक आ जाते हैं। जानते किसे भी नहीं लेकिन लड़ भी पड़ते हैं और लाड़ भी लड़ा लेते हैं। जिन्हें जानते हैं वे तो दूरी बनाकर ही चलते हैं और बेगाने लोग नजदीक आ जाते हैं। हम से कुछ लोग पूछ लेते हैं कि क्या करते हो? हम क्या बताएं कि हम क्या करते हैं! कह देते हैं कि कुछ-कुछ पकाते हैं। लोग समझ लेते हैं कि महिला हैं तो खाना ही पकाती होगी, उन्हें क्या पता कि ये और क्या पका रही हैं! लेकिन उनका काम भी चल गया और हमारा भी। आज भी जब कुछ पकाने का नहीं था तब भी हमने आपको पकाने का सामान ढूंढ ही लिया है। कहते हैं कि जब पकाने को कुछ ना हो तो पत्थर की भी सब्जी बना दो, बस मसाले भरपूर हों तो स्वाद आ ही जाता है। अरे, अरे, मैंने क्या लिख दिया! पत्थर की सब्जी, नहीं बाबा, पत्थर के लड्डू पर तो मोमता दीदी का अधिकार है, भला मैं पत्थर की कोई चीज कैसे पका सकती हूँ! माफ करना। लेकिन एक आराम तो हो गया हम जैसी गृहणियों को, कंकर अगर निकल आए दाल में तो कह देंगे कि मोमता दीदी की है, हमारी नहीं। यह पोस्ट रास्ते से भटकती जा रही है, कभी दाल आ जाती है हमारी बात में तो कभी कंकर। सुना है कि दाल भी 
आजकल फेसबुकियों का पसंदीदा विषय है। हम तो अब परीक्षा देकर बैठे हैं, परिणाम 23 मई को आएगा तो कुछ सूझ नहीं रहा है, बस खाली बैठकर कुछ भी ठेले जा रहे हैं। आप लोग कतई मत पढ़ना। पढ़ लिया तो कंकर भी आप ढूंढ लेना और दाल का निर्णय भी आप ही कर लेना। राम-राम जी।

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