अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

ये असली बुद्धीजीवी

Written By: AjitGupta - Jul• 27•19

इस देश में सदा से ही बुद्धीजीवियों का बोलबाला रहा है, इस पर कुछ लोगों का कब्जा रहता है। हमने भी कभी नहीं सोचा कि हम बुद्धीजीवी हैं लेकिन कुछ संस्थाओं ने यहाँ अपनी नाक घुसड़ने की सोची और करने लगे गोष्ठियाँ। प्रबुद्ध सम्मेलन, बौद्धिक सम्मेलन आदि आदि। जब उसमें बुलावा आता तो हम भी खुशी के मारे उछल जाते लेकिन बाद में देखा कि हम कितने ही विद्वता की बात कर लें लेकिन एक खास वर्ग हमें बुद्धीजीवी मानने को तैयार ही नहीं है। बस उन्हीं का पठ्ठा होना चाहिये। हमने भी मान लिया कि छोड़ों इस आभिजात्य वर्ग को और घर पर ही अपनी बुद्धी का डंका बजाते रहो।

लेकिन कौन हैं ये बुद्धीजीवी और क्या आचरण हैं इसकी पड़ताल तो होनी ही चाहिये। एक बार की बात है, हमें न्यूयार्क जाने का अवसर मिल गया। अवसर भी मिला वह भी ढेर सारे बुद्धीजीवियों के साथ। हम अछूत से एक तरफ बैठे रहे और इनके करतब देखते रहे। एयर इण्डिया की फ्लाइट में हम बैठे थे। हमारी सीट के कुछ ही आगे एक सोफा लगा था और वहाँ इन प्रबुद्ध लोगों का जमावड़ा था। पास ही एयर होस्टेज का केबिन भी था। खैर शराब वितरण का समय हुआ और पूरी बोतल लपक ली गयी। अब शुरू हुआ शेर-शायरी का दौर, कोई 70 का तो कोई 80 का लेकिन चुश्की लेने में कोई कम नहीं। उछल-उछलकर शेर पढ़े गये, दाद दी गयी और जैसे संसद में आजम खान ने वातावरण दूषित किया वैसे ही यहाँ भी होने लगा।

अब एयर होस्टेज बाहर निकली, एयर इण्डिया में तो अनुभवी ही होती हैं सभी! साड़ी भी पहने थी। किस्मत से मैंने भी साड़ी पहन ली थी। जब वही उम्रदराज एयर होस्टेज मेरे पास शराब सेवन के लिये पूछने आयी थी तो मैंने मना कर दिया था। बोल रही थी कि ले लो, थोड़ी तो ले लो। लेकिन यह करतब देखकर उसे लगा कि मैं ही सबसे ज्यादा संजीदा हूँ। एक तो साड़ी, फिर शराब नहीं। वह मेरे पास आयी और बोली कि क्या ये लोग आपके साथ हैं? मैं सोच में पड़ गयी कि क्या उत्तर दूं? वे सारे बुद्धीजीवी थे तो भला मैं उनकी साथी तो हो ही नहीं सकती थी, लेकिन सारे  ही भारत सरकार के प्रतिनिधि थे तो साथ भी थे। मैंने कहा कि आप ऐसा करें कि वे जो थोड़ी दूर बैठे हैं, वे विदेश विभाग के सेकेट्ररी हैं तो उनसे कहिये, वे आपकी समस्या को सुलझा सकेंगे।

मैंने उसे सुझाव देकर आँख बन्द कर ली। कुछ देर बाद आँख खोली तो देखा कि हमारे सचिव महोदय सर झुकाकर खड़े हैं और कुछ बोल नहीं पा रहे हैं। मुझे तब इनका दबदबा समझ आया। आखिर केप्टेन बाहर निकला, डाँट लगाई और सारे पर्दे गिराकर अंधेरा कर दिया। कहा कि चुपचाप सो जाओ। ऐसे लोग बुद्धीजीवी की गिनती में आ सकते हैं, हम तो कभी सपने में  भी इस जाजम पर नहीं बैठ सकते हैं!

भारत सरकार में हो या राज्य सरकारों में, इनका ही दबदबा है। विदेश यात्राओं में इनके शराब के अतिरिक्त बिल, सरकारें चुकाती आयी हैं और ये सरकारों की पैरवी करते आये हैं। इस सरकार में माहौल बदलने लगा है, इनका दबदबा कम होने लगा है तो ये बगावत पर उतर आये हैं। कभी पुरस्कार वापस करके भीड़ एकत्र करते हैं तो कभी पत्र लिखकर। इन बुद्धीजीवियों की मान्यता पक्की है और हम जैसे टटपूंजियों को कोई मान्यता देता नहीं। इनका पद संवैधानिक है, सरकारों को इनकी हर बात माननी ही है। देश में ऐसे दूसरा वर्ग पैदा ही नहीं होता जो दूसरों को भी मान्यता प्रदान कर दे और इनकी लाइन के बराबर बिठा दे। फिल्म उद्योग में दो चार  लोग पैदा हुए हैं, वे टक्कर लेने लगे हैं। लेकिन साहित्य जगत में बस वे ही वे हैं। दो वर्गों में देश बंटता जा रहा है – एक अभिजात्य वर्ग है तो दूसरा अछूत वर्ग। लड़ाई यहीं से शुरू होती है, अभिजात्य वर्ग कहता है कि केवल हम हैं और अछूत वर्ग कहता है कि हम भी हैं। मोदीजी तक अछूत वर्ग में आते हैं। अभिजात्य वर्ग कहता है कि हम तुम्हें प्रधानमंत्री मानते ही नहीं। मोदीजी लगे हैं सारे ही अछूतों का उद्धार करने लेकिन संघर्ष तगड़ा है। अब तो देखना है कि मोदीजी इस अभिजात्य वर्ग पर प्रहार कर पाएंगे या नहीं। मोदीजी हर व्यक्ति को बुद्धीजीवी बनने और मानने की छूट दे पाएंगे या नहीं। राजतंत्र से लोकतंत्र की स्थापना कर पाएंगे या नहीं। मोदीजी ने इन लोगों की उपेक्षा तो कर दी है लेकिन वास्तविक बुद्धिजीवियों को सहयोग नहीं किया है। जब तक अपनी लाइन को बड़ा नहीं करेंगे तब तक ये ही शेर बने रहेंगे और रोज शोर मचाते रहेंगे।

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