अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

राजा के दरबारियों की वर्दी

Written By: AjitGupta - Dec• 08•12

 

एक युवा किसान था, अपने गाँव में खेती करता था और अपने माता-पिता के साथ प्रसन्‍नतापूर्वक रह रहा था। एक बार गाँव में राजा आए, उनके साथ उनका पूरा लाव-लश्‍कर भी आया। राजा ने अतिशोभनीय वस्‍त्र पहन रखे थे, उनके मंत्रियों की भी शोभा देखने लायक थी। यहाँ तक की उनके चाकर भी वर्दी में थे। बहुत ही सुन्‍दर दृश्‍य था, मन-लुभावन। युवा किसान ने राजा के लाव-लश्‍कर को देखा और मुग्‍ध हो गया। उसे लगा कि यदि मुझे भी ऐसे ही वस्‍त्र पहनने को मिलें तो कितना अच्‍छा हो! अब उसे रात में भी राज-दरबार के ही सपने आने लगे। वह हमेशा खोया-खोया रहने लगा। आखिर एक दिन उसके पिता ने पूछा कि आजकल तुम्‍हारा ध्‍यान कहाँ है? तब वह बोला कि मुझे भी राजा की चाकरी करनी है। मैं भी राजदरबार का दरबारी बनना चाहता हूँ। पिता आश्‍चर्य चाकित थे। उन्‍होंने कहा कि भला हमारे पास किस चीज की कमी है? तू अपनी मर्जी का मालिक है, सुबह उठता है और खेत पर काम करता है। दिन भर पूरे गाँव में घूमता-फिरता है। भगवान की दया से खेती भी अच्‍छी हो जाती है और हमारी सारी ही जरूरते पूरी हो जाती हैं। राजदरबार में जाकर भला तू क्‍यों राजा का चाकर बनना चाहता है? तुझे पता है, राजा का गुस्‍सा कैसा होता है? गुस्‍सा आने पर वह एक मिनट में तेरा सर-कलम करा सकते हैं, तुझे नौकरी से निकाल सकते हैं। अ‍ाखिर तू नौकर क्‍यों बनना चाहता है? बेटे ने कहा कि मुझे भी ऐसे ही वस्‍त्र पहनने हैं। पिताजी चिन्‍ता में पड़ गए, केवल वस्‍त्र पहनने के लिए इसे नौकर बनना है! बेटे ने फिर कहा कि उनका नौकर भी कितने अदब से रहता है, उसका ठसका देखो। एक हम है कि हमेशा दबे हुए रहते हैं। बारिश नहीं आए तो हम केवल बादलों को ही देखते रहते हैं और उस वर्ष खाने के भी लाले पड़ जाते हैं। साहुकार से रूपया उधार लाकर खाने के लिए दाने उपलब्‍ध होते हैं। बरसात हो या जाड़ा, खेत में पानी के बीच रहकर काम करना पड़ता है। रात को जंगली जानवरों का डर भी हमेशा बना रहता है। मैं कभी शहर जाता भी हूँ तो मेरे इन कपड़ों को देखकर दुकानदार भी तमीज से बात नहीं करता है।

पिता को भी लगा कि बेटा जवान है, सुन्‍दर है, यदि यह राजदरबार का दरबारी बन गया तो मेरा नाम भी पूरे गाँव में होगा। फिर अभी मेरी उम्र ही क्‍या है, मैं तो खेती कर ही सकता हूँ। बेटा राजदरबारी बन जाएगा तो मैं भी खेत-खलिहान बेचकर शहर रहने चला जाऊँगा। पहले पुत्र सपने देख रहा था, अब पिता सपने देखने लगा। धीरे-धीरे माँ भी सपने देखने लगी। आखिर एकदिन बेटा शहर के लिए रवाना हो गया। राजमहल के खूब चक्‍कर लगाए, लेकिन उन विशाल दीवारों के पार पहुँचना उस गरीब किसान के बस का नहीं था। एकदिन राजमहल के बगीचे का माली उसे मिल गया, उसने उसके सामने हाथ जोड़े कि मुझे कैसे भी राजमहल में नौकरी दिला दो। माली ने कहा कि तुम्‍हारी योग्‍यता क्‍या है? किसान ने कहा कि मैं तो खेती के सारे ही काम जानता हूँ, इसके अलावा तो कुछ नहीं जानता। माली को लगा कि लड़का काम का है, तो वह उसे अपने साथ बगीचे में ले आया। धीरे-धीरे उसने उसे राजमहलों के तौर-तरीक सिखा दिए। एक बार राजा जब बगीचे में घूम रहे थे तब माली ने उस किसान के बारे में बताया। राजा को अपने साथ एक युवा सुरक्षा-प्रहरी चाहिए था। राजा को वह युवा पसन्‍द आ गया। तत्‍काल ही किसान की राजदरबार में नियुक्ति हो गयी।

किसान के सामने सुरक्षा-प्रहरी की वर्दी थी, वह फूला नहीं समा रहा था। उसने वर्दी को पहना और अनेक बार अपने आपको आईने के सामने खड़ा किया। अपने रूप पर वह स्‍वयं ही रीझा जा रहा था। अब वह राजमहल में राजा के साथ था। चौबीस घण्‍टे राजा की हाजिरी में तैनात। राजा के जागने से पहले वह उठता और राजा के सोने के बाद सोता। ना गाँव जाने की छुट्टी मिलती और ना ही कोई अन्‍य कार्य करने का समय। आखिर दीवाली आयी, युवक ने कहा कि मुझे छुट्टी चाहिए। राजा के माथे पर बल पड़ गए। भला त्‍योहार पर कैसे छुट्टी दी जा सकती है! आखिर वह मन मसोसकर रह गया। जब खूब सर्दी बढ़ी और राजा पूरी तरह राजमहलों में ही रहने लगे तब जाकर कही दो-चार दिन की युवक को छुट्टी मिली।

युवक अपनी वर्दी लेकर गाँव पहुँचा। पिता ने उसका स्‍वागत किया, पूरा गाँव एकत्र हो गया। उसकी वर्दी देखकर लोग अचम्‍भे में पड़ गए। अन्‍य युवाओं का प्रेरणास्रोत बन गया था वह युवक। अब खेत पर काम करना उसे अच्‍छा नहीं लगता, पिता की वेशभूषा उसे अच्‍छी नहीं लगती। आखिर एक-दो दिन में ही वह गाँव से ऊब गया। अब उसे गाय-भैंसों के बाड़े में जाने में गन्‍दगी लगने लगी, नदी पर नहाना गँवारूपन लगने लगा, माँ का सारा दिन चौका-चूल्‍हा करना भी खराब लगने लगा। उसे लग रहा था कि अब मैं विवाह करूंगा और विवाह के बाद मेरी पत्‍नी भी क्‍या ऐसे ही चूल्‍हा-चौका करेगी? क्‍या वह भी नदी पर ही नहाने जाएगी? उसे भी गाय-भैंसो के साथ काम करना पड़ेगा? अब वह अपने परिवार और गाँव वालों से अलग हो गया था, बड़ा आदमी बन गया था। पिता ने पूछा कि बेटा क्‍या कमाते हो? बेटे ने सोचा कि मेरी कमाई पर नजर है। लेकिन यदि कमाई कम बता दी तो शान कम हो जाएगी, इसलिए उसने कहा कि कमाई तो बहुत है लेकिन शहर के खर्चे भी बहुत है। पिता ने फिर पूछा कि रहते कहाँ हो? बेटे ने कहा कि सारा दिन काम पर रहना पड़ता है तो वहीं राजाजी ने एक कोठरी दे रखी है, बस वहीं रहता हूँ और महलों में ही खा लेता हूँ। अरे मेरा बेटा महलों में खाना खा रहा है, यह तो बहुत अच्‍छी बात है। लेकिन फिर माँ ने पूछा कि बेटा, दूध, दही तो वहाँ खूब मिलता होगा? अब बेटा थोड़ा सा मायूस हुआ, माँ शहर में गाँव जैसा दूध, दही कहाँ है? माँ ने कहा कि तेरे पास रहने को एक कोठरी, खाने को दूध-दही नहीं, गाँव आने का समय नहीं, जेब में तेरे पास पैसे नहीं तो तू ऐसी नौकरी क्‍यों कर रहा है? बेटे को समझ नहीं आया, माँ क्‍या कह रही है? बेटे ने कहा कि माँ तुम नहीं समझोगी। यह वर्दी देख रही हो, जब यह वर्दी पहनकर गाँव आया हूँ तो सारे लोग कैसे मुझे भौचक्‍के होकर देख रहे हैं! वर्दी पहनने का सुख क्‍या होता है, तुम क्‍या जानो? तू इस वर्दी के चक्‍कर में मालिक से नौकर बन गया है, माँ ने चिल्‍लाकर कहा, कभी तूने यह भी सोचा है? अब तेरे पास एक मिनट का भी समय नहीं है, पहले तू सारा दिन गाँव में घूमता था, गाता था, नाचता था। त्‍योहार मनाता था, शादियों की रौनक हुआ करता था तू। और अब? लेकिन माता-पिता उसे नहीं समझा सके और वह राजमहल में छुट्टियां समाप्‍त होने से पूर्व ही लौट आया। राजा ने पूछा कि अरे बड़ी जल्‍दी वापस आ गए? युवक ने कहा कि अब गाँव में मन नहीं लगता, वहाँ धरा ही क्‍या है?

युवक का गाँव छूट गया, माता-पिता छूट गए और शहर में ही घर बस गया। पत्‍नी को भी गाँव नहीं भाता और बच्‍चों को भी। अब बच्‍चों को पढ़ाने के लिए विद्यालय में प्रवेश करा दिया। बच्‍चे बड़े हो गये। एक दिन और बड़े शहर से राजदरबार में एक अफसर आया। उसने सूट-बूट पहन रखा था। युवक के बेटे ने उस सूट-बूटधारी अफसर को देखा और सोचने लगा कि मुझे भी ऐसी ही वर्दी चाहिए। अब उसका बेटा नयी वर्दी की तलाश में बड़े शहर जा चुका था। नयी वर्दी की तलाश पीढ़ी दर पीढ़ी चालू रही। कभी अंग्रेजों की वर्दी लुभावनी लगी तो कभी अमेरिका की। गाँव के उस युवक की कहानी कभी समाप्‍त नहीं हुई। ना समाप्‍त हुई गाँव के उस माता-पिता की कहानी। ना समाप्‍त हुई किसान से नौकर बनने की मानसिकता की कहानी। यह कहानी चलती ही जा रही है, बस वर्दियां बदल रही हैं और उनका आकर्षण भी। वर्दी का आकर्षण, राजमहल की कोठरी का आकर्षण, वहां के भोजन का आकर्षण, पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही जा रहा है और चलता ही रहेगा। यह कहानी उस कहानी की तरह कभी समाप्‍त नहीं होगी, एक चिड़िया आयी, एक दाना ले गयी और फुर्र हो गयी, फिर आयी, दूसरा दाना लेगयी और फुर्र हो गयी। फिर आयी, फिर दाना, फिर फुर्र।

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21 Comments

  1. कहानी के माध्यम से आज की मानसिकता को बखूबी कहा है …

  2. अंतहीन तलाश है।

  3. आज के जीवन की यही त्रासदी है..नाते-रिश्ते बिसर गये ,सारी मस्ती ग़ायब और ऊपरी ताम-झाम में उलझा इंसान अपना ही चैन खो बैठा है! ..

  4. arun sharma says:

    सरल शब्दों में बहुत सुन्दर मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति

  5. वन्दना गुप्ता says:

    इसी मानसिकता ने सबको जकडा हुआ है और छूटना चाहकर भी कोई नही छूट पा रहा

  6. Kajal Kumar says:

    सोने के पिंजरे हैं कि‍ उड़ने ही नहीं देते

  7. हकीकत के करीब है कहानी … चकाचौंध में हर कोई अंधा हो जाता है …

  8. काश कि वर्दी का लालच जल्दी खत्म हो जाये

  9. झूठी शान की चकाचौंध में जो फंसा सो फंसा ।वह अपना अस्तित्व और भुला बैठता है ।यह एक सत्य है जो कभी बदलने वाला नहीं ।

  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-12-2012) के चर्चा मंच-१०८८ (आइए कुछ बातें करें!) पर भी होगी!
    सूचनार्थ…!

  11. हम कौन सी और कैसी ज़िन्दगी जी रहे हैं।

  12. असरदार कहानी …

  13. kahani purani kahane ka andaz naya aur nirala . behatari dhang.

  14. देखो देखो सरकारी वर्दी का कमाल ।
    खोकर आजादी भी नही है मलाल।।आपका व्लाग मेरे राष्ट्रधर्म ब्लाग एग्रीगेटर पर शामिल कर लिया गया है कृपया आकर देखे

  15. t s daral says:

    कुछ पाना है तो कुछ खोना भी है।

  16. तो इस सारे झगडे फ़साद और चैन खत्म करने की जड यह किसान का बेटा था? बुरा हो इस लडके का जो इसने ऐसी परंपरा डाल दी कि आज सारे लोग इसके बताये मार्ग पर चलते जारहे हैं, ना इसे कुछ हासिल हुआ ना किसी को होगा. पर इस झूंठी शानोशौकत और अफ़सरगिरी के चक्कर मे हर आदमी जीना भूल चुका है, निरा गुलाम हो गया है, आजादी का मतलब ही खो गया. एक तरह से सब पिंजरे में बंद हो गये. बहुत ही अर्थपूर्ण कहानी लिखी आपने, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  17. (ज़रूरतें ,साहूकार ,कहीं )

    पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं ……..पहले कम्पनी ईस्ट इंडिया ,फिर गांधी सोनिया और अब मालवार्ट वार्ट ही निकलेंगे अब भारत की काया पर .सन्देश परक बढिया कहानी मालिक बनो बनना है तो

    मनमोहन की तरह चर्च की चाकरी मत करो .एक प्रतिक्रया ब्लॉग पोस्ट :

  18. arun says:

    yatharth parak katha sochata hun ki kya har gaaon me koi kisanka beta tha kya jo har log vardi ke chakkar me gaon chod kar aate gaye ……..

  19. शानशौकत के मारे कृत्रिमता का जीवन जी जाते हैं !
    प्रेरक और रोचक !

  20. AjitGupta says:

    इस प्रतीकात्‍मक कहानी को आप सभी ने पसन्‍द किया इसके लिए आभारी हूँ। किसान के रूप में आज युवा इस मानसिकता के दौर से गुजर रहा है। वह आधुनिक वर्दी से भ्रमित होकर कभी किसी मॉल पर तो कभी किसी ढाबे पर नौकरी कर रहा है। कल तक मालिक अधिक और नौकर कम थे आज नौकर बनने की होड़ सी मची है।

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