अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

रूमाल ढूंढना सीख लो

Written By: AjitGupta - Dec• 22•18

न जाने कितनी फिल्मों में, सीरियल्स में, पड़ोस की ताकाझांकी में और अपने घर में तो रोज ही सुन रही हूँ, सुबह का राग! पतियों को रूमाल नहीं मिलता, चश्मा नहीं मिलता, घड़ी नहीं मिलती, बनियान भी नहीं मिलता, बस आँखों को भी इधर-उधर घुमाया तक नहीं कि आवाज लगा दी कि मेरा रूमाल कहाँ है, मोजा कहा है? 50 के दशक में पैदा हुए न जाने कितने पुरुषों की यही कहानी है। पत्नी हाथ में चमचा लिये रसोई में बनते नाश्ते को हिला रही है और उधर पति घर को हिलाने लगता है। पत्नी दौड़कर जाती है और सामने रखे रूमाल को हाथ पर धर देती है, सामने ही रखा है, दिखता नहीं है! जिस पुरुष ने सूरज से लेकर धऱती के गर्भ के अनगिनत रहस्य खोज लिये, दूसरी तरफ उसी के भाई से अपना रूमाल भी नहीं खोजा जा रहा। ऐसे पुरुष की सारी खोज बन्द हो गयी और दीमाग में जंग लग गयी। पहले उसने कामचोरी की फिर दीमाग ने कामचोरी शुरू कर दी। पहले रूमाल भूला अब वह खुद को भी भूलने लगा। कभी कहते थे कि पेड़ के सहारे बेल चलती है लेकिन अब बेल पेड़ को खड़े रहने में सहायता कर रही है।

सुबह-सुबह चुगली नहीं खा रही, आप बीती सुना रही हूँ। घोड़ा भी जब तक लौट-पोट नहीं कर लेता, उसमें दौड़ने का माद्दा पैदा नहीं होता, पेट की आंतों को जब तक गतिशील नहीं कर लेंगे अपने अन्दर के मलबे को नीचे धकेलती नहीं। लेकिन पति नामक प्राणी लगा पड़ा है अपने दीमाग को कुंद करने में। पत्नी को नाच नचाने के चक्कर में अपने दीमाग को नचाना भूलता जा रहा है और बुढ़ापा आते-आते दीमाग रूठकर बैठ जाता है, जाओ मुझे कुछ याद नहीं। पहले पत्नी का गुप्त खजाना आसानी से ढूंढ लिया जाता था लेकिन अब दीमाग पर जोर मारने पर भी खुद का खजाना भूल बैठे हैं! न जाने कितनी बार पत्नी के पर्स की तलाशी ली गयी होगी कि कहीं इसमें कोई प्रेम पत्र तो नहीं है लेकिन अब अपना पर्स ही नहीं मिलता! मैं अक्सर कहती हूँ कि खोयी चीज केवल आँखों से नहीं ढूंढी जाती उसके लिये दीमाग को काम लेना होता है और दीमाग का काम लेने की लिये उसे रोज रियाज कराया जाता है। कभी पहेलियां बूझते हैं तो कभी-कभी हाथ में गेम पकड़ा दिया जाता है कि इसे तोड़ों फिर जोड़ो। सारे दिन की अपनी रामायण को हम कभी भाई-बहनों को सुनाते हैं तो कभी दोस्तों-सखियों को। महिलाएं रोज नये-नये पकवान बनाती हैं और पुराने में नया छौंक लगाती हैं। पुरुष कभी अपनी बाइक के कलपुर्जे के साथ खिलवाड़ करता है तो कभी रेडियो को ही खोलकर बैठ जाता है। बस एक ही धुन रहती है कि दीमाग चलना चाहिये।

शिक्षा के कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिनमें केवल रटना ही होता है, बस सारी गड़बड़ यहीं होती है, जो भी रटकर पास होते हैं, वे दीमाग को कुंद करने लगते हैं। लेकिन जहाँ दीमाग को समझ-समझकर समझाते हैं, वे दीमाग की धार लगाते रहते हैं। बाते करना, गप्प ठोकना, अपनी अभिव्यक्ति को लेखन के माध्यम से उजागर करना ये सारे ही प्रकार दीमाग की रियाज के लिये हैं, लेकिन जो लोग मौन धारण करने को ही पुरुषोचित बात मान लेते हैं वे अपने दीमाग के साथ छल करने लगते हैं और फिर दीमाग उनसे रूठ जाता है, अब बैठे रहो शान्ति से। मेरी एक मित्र थी, जीवन का उल्लास भरा था उसके अन्दर, सारा दिन बतियाना लेकिन पति महाराज मौनी बाबा। मैं समझ नहीं पाती थी कि कैसा है इनका जीवन लेकिन अब समझने लगी हूँ कि घर-घर में ऐसे स्वनाम धन्य पुरुषों की श्रृंखला खड़ी है। वे मौन रहकर ही खुद को बड़ा मान रहे हैं, रूमाल नहीं ढूंढ पाने को पति मान रहे हैं, उन्हें यह पता नहीं कि यही आदत उन्हें लाचार बना देगी। वे खुद को भी भूल जाएंगे। इसलिये खुद को याद रखना है तो बतियाओ, दीमाग को सतत खोज में लगाकर रखो। दीमाग के सारे न्यूरोन्स को सोने मत दो, बस घाणी के बैल की तरह जोत दो। बुढ़ापा आराम से कटेगा नहीं तो पूछते रह जाएंगे कि कौन आया है! मैंने तुम्हें पहचाना नहीं! चाय पीने के बाद भी पूछते रहेंगे कि मैंने चाय पी ली क्या! सावधान हो जाओ, दीमाग को भी सावधान कर दो और जीवन को जीने योग्य बना लो। जीवन दूसरों पर हुकुमत करने का नाम नहीं है, जीवन खुद पर हुकुमत करने का नाम है। इसलिये एक बार नहीं, बार-बार कहती हूँ कि खुद को साध लो, सारी दुनिया सध जाएगी। दीमाग को गतिशील रखो और खुद का रूमाल ही नहीं पत्नी का रूमाल भी ढूंढना सीख लो।

You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

4 Comments

  1. रवि says:

    आपकी खीझ वाजिब है. परंतु ऐसा प्रकृति ने बनाया है.

    कभी समय मिले तो एलन और बारबरा पीज़ की किताब – व्हाई मैन लाई एंड वीमैन क्राई पढ़िएगा. स्त्री और पुरुष बने ही मंगल और शुक्र ग्रह के लिए 🙂

    मैं अपनी बात कहूं तो सामने रखा मसाले का डब्बा नहीं दिखता. दरअसल मैं मसाला लिखा हुआ डब्बा ढूंढने लगता हूँ. रखा हुआ मसाला या डिब्बा नहीं. सुनने के लिए दिमाग तैयार ही नहीं रहता 4-5 मिनट बाद भटक जाता है, और 10 मिनट बाद तो लगता है, ईश्वर, इन्हें मौन करने का क्या लेगा?

    सार यह कि पुरुष जाति की इस तरह की अनेकानेक डिफ़ेक्ट ईश्वरीय है. उसे कोसिए. पुरुष-जाति को नहीं.

    🙂

    • AjitGupta says:

      सारी पुरुष जाति का दोष नहीं है, यदि मैं ऐसा लिखती तो कहा जाता कि हमने ही सारी दुनिया के अविष्कार किये हैं, फिर हम पर यह आरोप क्यों? लेकिन खुद को केवल पुरुष मानकर जो दोष पैदा कर लिये गये हैं, वे उनके लिये ही घातक सिद्ध हो रहे हैं।

  2. शुरू में तो वे लोग सोचते हैं क्यों कोशिश करें ,पत्नी है न -चिल्ला दो ,दे जायेगी .फिर आदत बन जाती है और उसके बाद दिमाग के पेंच ढीले.

    • AjitGupta says:

      सच यही है और इसी कारण होने वाले एल्जाइमर को नजर अंदाज करना घातक है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *