अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

शरीर की आवश्‍यकताएं और उनका आधुनिक प्रबंधन

Written By: AjitGupta - Feb• 25•13

घटना कुछ माह पुरानी है। मैं रेलमार्ग से उदयपुर से दिल्‍ली जा रही थी। अभी गाडी चलने में पर्याप्‍त समय था और मैं अपनी बर्थ पर आसन जमा चुकी थी। डिब्‍बे में बड़ी चहल-पहल थी, एक दल उदयपुर घूमने आया था और वे अपनी शय्‍याओं का प्रबंध कर रहा था। कुछ उनके पास थी और कुछ को वे प्राप्‍त करने की जुगाड़ में थे। इसलिए वह द्वितीय श्रेणी का वातानुकूलित डिब्‍बा भी भरा-भरा सा था। मैं आकलन करने में लगी थी कि आज की यात्रा में कुछ अध्‍ययन हो सकेगा या नहीं। क्‍योंकि उस यात्री-दल के कई सदस्‍य सामने वाली बर्थ पर बैठे थे और मेरी बर्थ पर भी उनका ढेर सारा सामान था। लग रहा था कि आज शोरगुल के साथ ही यात्रा करनी होगी। चारों तरफ मुझे पुरुष ही दिखायी दे रहे थे और वे भी पर्यटकीय मानसिकता वाले। चिन्‍ता भी हो रही थी कि कहीं ये बोतल वगैरह न खोल लें। लेकिन तभी मेरी चिन्‍ता का आंशिक समाधान हो गया, मेरे सामने एक लेडी आकर बैठी। एक आधुनिक महिला, जिसका परिधान आधुनिक हो अर्थात जीन्‍स और टी-शर्ट, आयु पचास के करीब हो तो आप उसे क्‍या सम्‍बोधित करेंगे? उसे महिला कहेंगे तो तौहीन सी लगेगी और लड़की तो वह है नहीं। इसलिए उनकी शान में लेडी कहना ही उचित लगता है। अक्‍सर ऐसी आधुनिक महिलाएं स्‍वयं के आभा-मण्‍डल से ही घिरी रहती हैं और अक्‍सर वे मोबाइल पर अंग्रेजी भाषा में बात करती रहती हैं। उन्‍हें दूसरे सह-यात्री और कोई साड़ीवाली महिला तो पिछड़ी हुई सी ही लगती हैं। अभी भी गाडी चलने में समय था लेकिन मैंने भी अपनी पुस्‍तक निकाल ली थी। शायद मुझे भी जल्‍दी थी, अपने आपको अभिजात्‍य प्रकट करने की। मुझे लगा कि अब शायद पुस्‍तक पढ़ने का समय मिल जाएगा। कुछ ही देर में उस लेडी के पास एक नवयुवक आकर बैठ गया, वह शायद उसी लड़के से मोबाइल पर बात कर रही थीं। वह अपने साथ खाने-पीने का सामान लेकर आया था, मुझे लगा कि यह उन्‍हें छोड़ने आया होगा। लेकिन जब गाडी चल दी और वह वहीं जमा रहा तो लगा कि यह भी हमारा ही सह-यात्री है। गाडी चलते ही यात्री अपनी-अपनी बर्थ पर जा चुके थे और हमें समझ आने लगा था कि यहाँ कौन-कौन है। तभी मैंने उस यात्री-दल से पूछ लिया कि क्‍या आप रेलवे से हैं? उन्‍होंने कहा की नहीं, हम सीमेण्‍ट के व्‍यावसायी हैं और हमें कम्‍पनी ने घूमने और सीमेण्‍ट फेक्‍टरी देखने के लिए भेजा था। आजकल यह नया दौर चला है कि कम्‍पनियां अपने व्‍यापारियों को देश-विदेश घूमने के लिए भेजती है। इसलिए ही वे सारे द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित में यात्रा कर रहे थे और उनमें से शायद एकाध तो पहली बार ही एसी में बैठा था। सामने जो भद्र महिला बैठी थी और उसके साथ जो नवयुवक बैठा था, उनसे भी मालूम पड़ा कि वे भी स्‍पा केन्‍द्र संचालित करते हैं और आज ही उदयपुर में एक पांच सितारा होटल में अपने केन्‍द्र का उद्धाटन के लिए गए थे। साथ ही यह भी मालूम पड़ा कि उस युवक की बर्थ तृतीय श्रेणी वातानुकूलित में है।

मैं अपने साथ विवेकानन्‍द की जीवनी पर आधारित नरेन्‍द्र कोहली लिखित “तोड़ो कारा तोड़ो” लेकर गयी थी। मैंने अब वह पुस्‍तक पढ़ना प्रारम्‍भ कर दिया था। लेकिन उस दल का एक सदस्‍य कुछ ज्‍यादा ही चंचल था। वह लपककर मेरे पास आया और बोला कि कौन सी पुस्‍तक पढ़ रही हैं। मैंने उसे पुस्‍तक दिखा दी और पूछा कि विवेकानन्‍द को जानते हैं? उसने केवल हाँ भरी और शेष वह कुछ नहीं जानता था। लेकिन वह बात करने का बहाना ढूंढ रहा था। अब उसने अपने घटिया चुटकले सुनाना शुरू किया, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उनपर कैसे हँसू? जैसे ही वह कुछ सुनाता, मेरी दृष्टि सामने वाली महिला पर पड़ती और हम दोनों ही सर पीटते से नजर आते। ऐसे लगने लगा था कि मैं पुस्‍तक के कारण और वह अपनी वेशभूषा के कारण अभिजात्‍य बन गए हैं और हमारा दल अलग हो गया है और उनका अलग। उसकी बातों से बचने के लिए हमने आपस में बातें करना प्रारम्‍भ किया। तब मालूम पड़ा कि वे दोनों ही एक ही कम्‍पनी के अधिकारी हैं और कई दिनों से उदयपुर में थे। महिला उस लड़के की बॉस लग रही थी या सीनियर तो खैर थी ही। हमने भी अपनी बातों से उन्‍हें लपेट लिया और उन्‍हें पाँच सितारा होटल से निकालकर प्रकृति से रूबरू कराते हुए वनांचल के सपने दिखा दिए। वह लेडी बोली कि अगली बार आऊँगी तो निश्‍चय ही वनांचल में जाऊँगी। इस बातचीत के कारण दोनों की आपसी बातों में व्‍यवधान पड़ गया था। इसकारण उन्‍होंने कहा कि मैं जरा इसकी बर्थ तक जाकर आती हूँ। वे चले गए और मुझे लगा कि अब खाना खाकर सो जाना चाहिए। मेरे और सभी के सोने के बहुत देर बाद वे दोनों आए और वापस वहीं जम गए। मुझे लगा कि थोड़ी देर में वह लड़का चले जाएगा लेकिन उनकी बातचीत या यूँ कहूँ कि कानाफूसी की आवाजे देर तक आती रहीं। मुझे नींद नहीं आ पा रही थी, क्‍योंकि मुझे नींद में अंधेरा और शान्ति दोनों ही चाहिए। पर्दा तो खैर उन्‍होंने डाल दिया था लेकिन उनकी खुसरपुसर से नींद नहीं आ रही थी। मैंने सोचा कि उन्‍हें सोने को बोल दूँ, इसलिए मैंने आँखे खोलकर उनकी तरफ देख लिया। वे काफी नजदीकी बनाए हुए थे तो मुझे लगा कि इस समय क्रोंच पक्षी वध जैसा हो जाएगा। मैं दूसरी तरफ मुँह करके सो गयी। मुझे भी नींद आ गयी और वह लड़का भी जा चुका था। सुबह ट्रेन 6-30 पर दिल्‍ली पहुँचती है तो सोचा था कि 6 बजे तक तो आराम से सोने को मिल जी जाएगा। लेकिन अभी 5-30 भी नहीं बजे थे कि फिर फुसफुसाहट प्रारम्‍भ हो गयी। मैंने आँखे खोलकर देखा, अब लगा कि बरसों से बिछुड़े हुओं का गले मिलकर मिलन हो रहा है। मन में जो त्‍वरित प्रतिक्रिया हुई वह यह थी – क्‍यूँ बेटा, मम्‍मी के बिना नींद नहीं आयी क्‍या? लेकिन सुबह-सुबह किसी भी अनावश्‍यक कलह से दिन बिगाड़ने का मन नहीं हुआ। लेकिन मन में हजार प्रश्‍न उग आए। सुबह उठने के बाद उस महिला की आयु और अधिक लगी क्‍योंकि अब मेकअप भी उतर चुका था। दोनों की आयु का विशाल अन्‍तर, ऐसी निकट मित्रता का कारण क्‍या है? क्‍या शारीरिक आवश्‍यकताओं के पूर्ति के‍ लिए ही ऐसे बेमेल समबंध स्‍थापित होने चाहिए? क्‍या उस नवयुवक के जीवन पर प्रभाव अंकित नहीं होगा? या फिर ये सब समय की मांग बन गया है? इसलिए ही क्‍या माता-पिता अपनी नवयुवा संतानों के प्रति शंकालु बनते जा रहे हैं? या फिर आज जो आत्‍महत्‍याओं का सिलसिला दिखायी देता है, उसके पीछे ऐसे ही कारण तो नहीं रहते है? ऐसे कितने ही प्रश्‍न हैं, आइए हम सब विमर्श करें कि क्‍या ऐसा आचरण उचित है या यह ही स्‍वाभाविक है?

You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

24 Comments

  1. s.m.masum says:

    ट्रेन में शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति अनुचित है | किसी से अनैतिक सम्बन्ध बना लेना भी गलत है और ऐसे में यदि उम्र का इतना फर्क हो तो उसका गलत असर कम उम्र वाले पे अधिक पड़ेगा ,यह भी सही है | लेकिन यदि कोई पति पत्नी है और उम्र में इतना फर्क है तो यह उनकी अपनी अपनी पसंद है ||

    • AjitGupta says:

      एस एम मासूम जी, नहीं वे पति-पत्‍नी नहीं थे। साथ कार्य करने वाले लोग थे।

  2. जीवन को हल्के में लेने के अतिरिक्त इसको और क्या कहा जायेगा?

  3. rashmiravija says:

    न तो यह आचरण उचित है और न ही स्वाभाविक पर बहुत चौंकाने वाला भी नहीं है.
    पहले भी शादी-शुदा अधेड़ बॉस और उनकी सेक्रेटरी के किस्से काफी प्रचलित हुए हैं .आज भी होंगे, वह भी अनैतिक ही था/है .
    पर जिस तरह से हर बॉस के रिश्ते अपनी सेक्रेटरी या अधीनस्थ महिला कर्मचारी से नहीं होते होंगे ,वैसे ही हर पचास से ऊपर की कामकाजी महिला का सम्बन्ध किसी नवयुवक से नहीं होगा .

    और इससे आधुनिकता का कुछ भी लेना देना नहीं है. गाँवों में भी देवर भाभी के अनैतिक रिश्ते बहुतायत में होते आये हैं .

    @ क्‍या उस नवयुवक के जीवन पर प्रभाव अंकित नहीं होगा?
    ऐसा कुछ भी नहीं होगा , युवा भी अच्छी तरह जानते हैं कि इस प्रेम (?) की परिणति क्या होगी .

    • AjitGupta says:

      रश्मिजी आप सही कह रही है कि ऐसा हमारे समाज में गांवों में ही नहीं शहरों के परिवारों में भी खूब होता है। लेकिन मेरा किसी आधुनिकता से मतलब नहीं था, आधुनिक प्रबंधन से मतलब था कि यदि लोग अपने कामकाज के कारण निकटता में आ जाते हैं तो क्‍या यह समय की मांग है? मैंने यह नहीं लिखा है कि प्रत्‍येक महिला का ही ऐसा होगा। हम साहित्‍य के माध्‍यम से समाज के आयामों पर विमर्श करते हैं, उसमें सारे पहलुओं पर चर्चा होने से समाज को दिशा मिलती है। यहां सवाल महिला और पुरुष का है ही नहीं कि पुरुष की भी सेकेट्ररी है।
      आज समाज में रोज ही ऐसी घटनाएं देखने को मिलती है कि फला लड़के ने प्रेम के कारण आत्‍महत्‍या कर ली या लडकी ने कर ली। हत्‍या भी खूब हो रही हैं। इसलिए विमर्श है कि ऐसी मानमानसिकता से नवयुवाओं के दिल पर बुरा असर पडने की सम्‍भावना रहती है। आप उसे एकदम से ही नकार रही हैं तो मुझे तो उचित नहीं लगता। लेकिन सभी के अपने अनुभव है, आप शायद ठीक हों।

      • rashmiravija says:

        जब आपने ये पूछा ,
        @ क्‍या उस नवयुवक के जीवन पर प्रभाव अंकित नहीं होगा?
        तो मुझे इसका उत्तर यही लगा कि नवयुवक के जीवन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्यूंकि वह कोई बच्चा या किशोर नहीं है, एक युवक है,अपने भले-बुरे का निर्णय ले सकता है. अपना अच्छा-बुरा समझता है . अगर कोई , उसे exploit भी कर रहा है तो वह जानबूझ कर exploit हो रहा है क्यूंकि उसके एवज में उसे कुछ मिल रहा है. अब अपने फायदे के लिए किये हुए रिश्ते का क्या प्रभाव पड़ना है ?

  4. sanjay says:

    Aaj insaan kii soch -samajh ko kya ho gaya , hum sab jaante hain aise be-mail rishton ka ant, donon pakshon ko sochana hoga

  5. Rachna says:

    किसी भी पब्लिक प्लेस पर पी डी ऐ गैर क़ानूनी हैं आप इसके खिलाफ तुरंत शिकायत दर्ज कर सकती थी .

    @एक आधुनिक महिला, जिसका परिधान आधुनिक हो अर्थात जीन्‍स और टी-शर्ट, आयु पचास के करीब हो तो आप उसे क्‍या सम्‍बोधित करेंगे? उसे महिला कहेंगे तो तौहीन सी लगेगी और लड़की तो वह है नहीं। इसलिए उनकी शान में लेडी कहना ही उचित लगता है। अक्‍सर ऐसी आधुनिक महिलाएं स्‍वयं के आभा-मण्‍डल से ही घिरी रहती हैं और अक्‍सर वे मोबाइल पर अंग्रेजी भाषा में बात करती रहती हैं। उन्‍हें दूसरे सह-यात्री और कोई साड़ीवाली महिला तो पिछड़ी हुई सी ही लगती हैं।

    ना जाने क्यूँ आप के आलेखों मे आधुनिकाओ पर तंज अकसर होता हैं , कुछ पहले की पोस्टो में भी हैं समय अभाव के कारण लिंक नहीं दे पा रही हूँ
    आप उसे महिला नहीं कह सकती क्युकी वो पाश्चात्य परिधान में हैं और उम्र पचास के आस पास हैं
    क्या आप “महिला” शब्द को परिभाषित कर सकेगी
    आप ने मुझे अपनी भांजी की याद दिला दी जब वो महज ३ साल की थी , वो मानती थी की उसकी माँ और नानी औरत हैं और उसकी मौसी लड़की क्युकी मौसी के बच्चे नहीं हैं . यानी औरत वो जिसके बच्चे हो और लड़की वो जिसके बच्चे नहीं हो उम्र का एहसास मेरी भांजी को नहीं था
    आप उसको लेडी कह रही हैं अगर आप ने उसको लेडी कह कर लेडी आप क्यूँ कह रही हैं ये न बताया होता तो बेहतर था क्युकी लेडी का अर्थ The word lady is a civil term of respect for a woman, specifically the female equivalent to, or spouse of, a gentleman or lord, and in many contexts a term for any adult woman. Once confined to usage when specifically addressing women of high social class or status; over the last 300 years, the term has spread to embrace every adult woman.
    होता हैं ये किसी भी तरह व्यंग में नहीं प्रयुक्त होता हैं और ना ही इसको किसी स्त्री का मज़ाक उड़ाने या असम्मान जनक तरीके से उसको संबोधित करने के लिये होता हैं

    आप इंग्लिश भाषा से ना खुश हो सकती , उसके विरोध भी हो सकती हैं , पाश्चत्य सभ्यता के विरोध में जा सकती हैं { वैसे आप विदेश रह कर आ यी हैं ये आप अपनी किसी पोस्ट पर लिख चुकी हैं } लेकिन किसी स्त्री का मज़ाक उड़ाने के लिये भी क्या आप इंग्लिश भाषा के शबदो का उपयोग कर सकती हैं ??

    और पी डी ऐ करते भारतीये परिधान में पति पत्नी भी दिख जाते हैं और कानून उनको सजा भी नहीं दे सकता हैं क्युकी वो पति पत्नी हैं

    दो लोगो का आपसी स्नेह प्रेम शारीरिक जरुरत सब उनकी अपनी हैं हम कौन हैं उस पर ऊँगली उठाने वाले , विदेशो में तो आपने भी देखा होगा कोई इस और देखता भी नहीं हैं , हाँ हमारे यहाँ ये गलत हैं अस्वीकार हैं और उलझन भी पैदा करता हैं , व्यक्तिगत रूप से मुझे हैं सार्वजनिक स्थल पर गलत भी लगता हैं लेकिन मेरी सोच में किसी की उम्र , उम्र का फासला , उसके कपड़े इत्यादि नहीं होते

    साडी पहन कर भी जिस्म की नुमाइश की जा सकती और पेंट शर्ट पहन कर भी जिस्म की नुमाइश नहीं की जा सकती हैं
    कपड़े उम्र के हिसाब से नहीं अपनी पसंद से पहने जाते हैं जो सुरुचि पूर्ण और सुविधाजनक दोनों हो
    कोई ५ ० साल में दादी नानी बन कर भी पाश्चात्य परिधान में रहता हैं , कोई साडी में सुविधा महसूस करता हैं

    • AjitGupta says:

      रचना जी आप प्रतयेक चीज को पता नहीं कहां ले जाती हैं। कुछ बाते मजाक में लिखी जाती है और कुछ रोचकता बढाने के लिए। हर शब्‍द की बाल की खाल निकालने से समस्‍या तो धरी रह जाती है और बात न जाने कहां निकल जाती है। ना ही मैं आधूनिक वेशभूषा के विरोध में हूं और ना ही अंग्रेजी या किसी भी अन्‍य भाषा के। सीधा सादा मेरा एक घटना पर विमर्श करने का मन था। उसमें मैंने अपनी राय बिल्‍कुल नहीं थोपी है, बस सभी से राय ले रही हूं कि क्‍या उचित है और क्‍या नहीं है? इतना प्रतिक्रियावादी होना भी एकपक्षीय होना कहलाता है। पता नहीं आप मुद्दे से बात को भटकाती क्‍यों हैं?

      • Rachna says:

        पता नहीं आप मुद्दे से बात को भटकाती क्‍यों हैं?
        yae blog laekhaen haen ajeet ji jahaan turant pratikriaa kaa pravdhaan haen
        aap kaese kisi aurat ka mazaak banaa saktii haen mae padh kar saktae mae hun
        ghatna par vimarsh hi kiyaa haen aur sabsey pehli laain wahin thee maere kament ki

        is post kaa mudda kyaa haen
        shaarik jarurat , aacharan aur galat jagah aacharan yaa kewal aur kewal uphaas karna dusro kae kapdo aur rehan sehan par
        pratikriyaawaadi to aap bhi hui jinhonae kisi kae aachran par pratikriyaa ki uskae kapdo par pratikriyaa ki , uski umr par pratikriyaa ki

        agar aap sahii haen itni bhayankar pratikriyaa kar kae to meri to mehaj ek aaptti thee wo bhi aap kae likhae shabdo par
        naa kisi vyaktigat shaeli par aur naa hi kisi vyaktigat aachran par

  6. Rachna says:

    comment going in spam

  7. आपके लेबल में आज एक नया शब्द देखा, जो पहले कभी नहीं देखा ‘शारीरिक प्रबंधन’ 🙂 पढ़ कर लगा जैसे किसी कोर्स की बात हो रही है :):)

    खैर, बात करते हैं, आपकी पोस्ट की, बड़ी उम्र की महिला और छोटी उम्र का प्रेमी …यह कोई नई बात नहीं है ..इतिहास में भी ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे …

    सवाल ये है कि क्या ऐसे रिश्ते सही हैं ?? नहीं, बिलकुल भी सही नहीं हैं, गलत ही नहीं बहुत गलत हैं, लेकिन ये सब होता रहा है, हमेशा से। अभी कुछ दिन पहले ही, ‘आज तक’ में एक न्यूज था, किसी बहुत ही छोटे से गाँव का, सास, दामाद के साथ भाग गई, और बेटी ने थाने में रिपोर्ट लिखवा दी। दोनों को पकड़ कर लाया गया लेकिन दोनों ही एक दुसरे से अलग होने को तैयार नहीं थे। सास बिलकुल गाँव की और दामाद भी गाँव का, दोनों की उम्र में फर्क की विशालता मापना कठिन हो गया था पुलिस वालों को 🙂 इस घटना के ज़िक्र से मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है, कि ऐसी बातों का आधुनिकता से कोई लेना देना नहीं है, जैसा रश्मि ने भी कहा है। ये बातें हर कस्बे. शहर, गाँव, महानगर में मिल जायेंगी, और आधुनिकता से कोसों दूर रहने वालों के बीच ज्यादा मिलेगी।अगर ठीक इसके उल्टा होता है, तो हम आँखें उतनी नहीं मिचमिचाते, जैसे मटुक जी का कारनामा …

    जैसा रश्मि ने कहा है, बहुत आम है ओफ़िसेस में सेक्रेटरी और बॉस का ऐसा रिश्ता, ऐसे रिश्ते भी ग़लत माने जाते हैं लेकिन घोर पाप नहीं माने जाते। शायद पुरुष का उम्र में बड़ा होना और स्त्री का उम्र में छोटा होना, हमें अजीब नहीं लगता है। लेकिन गलत तो वो भी होता ही है ..और ऐसे रिश्तों की भरमार तो है ही …

    अब आते हैं, आपने जो देखा और जो बताया उसपर, पढ़ कर यही लगा कि ये रिश्ता सिर्फ़ ‘ध्येय ‘ पर बना रिश्ता है, लड़के को अपनी नौकरी का ध्येय है और महिला को अपने प्रबंधन का ध्येय 🙂 ऐसे रिश्ते भावनाओं पर नहीं बनते, इसलिए उनके टूटने से किसी की कोई ‘भावनात्मक क्षति’ नहीं होती। मंजिल मिलते ही दोनों अपने-अपने रास्ते निकल जाते हैं। इसे आप रिलेशनशिप ऑफ़ कन्विनियन्स कह सकते हैं। हमारे समाज में ऐसे रिश्ते बहुत मिल जायेंगे, जिनको न तो समाज की स्वीकृति मिलती है, न ही प्रतिष्ठा, लेकिन वो हैं, आधुनिकता से बिना किसी सरोकार के ….

    • मुझे ऐसे रिश्ते से कोई परेशानी नहीं है, ये उनका अपना मामला है, अगर वो मुझे पसंद नहीं, तो मैं उनसे दूरी रखूंगी, लेकिन वो अपने जीवन के साथ क्या करते हैं, ये उनकी बात है मेरी नहीं। विदेश में रहती हूँ, ऐसे रिश्ते आम है, न वो मुझे कोई समस्या देते हैं न मुझे उनसे कोई समस्या है। फिर कहती हूँ पहनावे से इस बात का कोई लेना देना नहीं है ..

  8. Dr kiranmalajain says:

    It is very unbelievable,विश्वास ही नहीं हो रहा ऐसा भी होता है क्या ?यही हमारा संस्कार ,संस्कर्ति वाला भारत देश है ?पर एक मिनिट ,क्या इसी वजह से तो लोग यह सब करने को मजबूर नहीं हो रहै है,क्या फ़र्क़ पड़ता है ?यहां कौन पहचानता है ? सी सी कैमरों का डर भी नहीं ।ऐसे आचरणों को स्वाभाविक तो बिलकुल नहीं कह सकते पर ,जब ऐसा होने लगा है तो उसके कारणों व समाधानों के बारे में चर्चा करनी ही पड़ेगी ।आज कल के सामाजिक बदलाव के माहौल में जब लड़कियाँ पढ़ाई व career के चक्कर में over age हो रही है ,शादियाँ या तो हो ही नहीं पा रही है या होगई है तो टूट रही है ,ऐसे में सवाल शारीरिक आवश्यकताओं का आजाता है तो ————-this is one of the solution ,may be wronge?समाज को कुछ बदलना पड़ेगा ,वर्ना —–

  9. ऐसी घटनाएं कोई नई नहीं है ,पहले लोग इतने फ़्री नहीं थे ,ढके-मुँदे रहते थे .अब जीवन को खुल कर जीने में विश्वास करते हैं.और पारिवारिक (पिछले दिनों तक सभी इस श्रेणी में थीं,) महिलाएं भी इसका अपवाद नहीं रहीं.
    अनदेखा कर जाना ही ठीक !

  10. विभिन्न संस्कृतियों और परिवेश में जन्में पले स्त्री व पुरुष , विभिन्न नियम व व्यवहार को अपनाते हैं ! इसमें चौंकाने जैसी कोई बात नहीं ..
    मानवीय व्यवहार के बारे में हमारी जानकारी या तो अपने व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है अथवा पुस्तकों के ज़रिये जो कि बेहद कम है …

  11. जीवन में बेहूदा खुलापन हो या नहीं इसका चयन खुद पर है | यह हमारी जिम्मेदारी भी है …. ऐसी घटनाएँ नयी नहीं है…

  12. rohit says:

    अपने देश को एकदम से आधुनिक समझना बेवकूफी है। वातानूकूलित डिब्बे में पर्दा होने के कारण कुछ हद तक प्राइवेसी मिलती है औऱ लोग इसका फायदा उठा कर इस तरह के संबंध आमतौर पर बनाते देखे जाते हैं। यहां तक कि पती-पत्नी भी। पर अपने देश में सार्वजनिक जगहों पर आचरण का ध्यान रखा जाना चाहिए जो नहीं हो रहा है। आमतौर पर इस तरह के संबंध महज शारीरिक जरुरत के तौर पर ही नहीं बनाए जाते.बल्कि नौकरी में आगे जाने के शार्टकर्ट के तौर पर अजमाए जाते हैं। अगर पुरुष फायदा उठाने की सोचता है तो स्त्री इस्तेमाल होने के लिए आगे आती है। यानी ताली सही मायने में दोनो ही हाथों से बजती है। आदमी हो या औरत…फायदा उठाने का मौका नहीं चूकते। इन लोगो की धारण होती है कि इसमें घट क्या गया। रही बात शर्मोहया की तो ये अब भी है और आगे भी रहेगी। हां नौकरी में इसतरह की बातें बेहद कम देखने को मिलती है।

  13. ’सार्वजनिक स्थान पर दो व्यस्कों द्वारा आपसी सहमति से प्रेम प्रदर्शन अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं’ इस आशय का एक फ़ेसबुक स्टेटस एक मित्र ने लगाया था, मुझे भी लगता है कि यह एक विमर्श की विषयवस्तु है।
    आशा है इस पोस्ट पर भी विमर्श रोचक रहेगा।

  14. ये किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगता … एक तो सार्वजनिक स्थान में ऐसी हरकत नहीं होनी चाहिए … दूसरा ऐसे रिश्तों का क्या मानी …. जो बस स्वार्थ के कारण ही बने हों …

  15. anshumala says:

    अजित जी

    सबसे पहले ये कि जितना आप ने लिखा है उस आधार पर की एक स्त्री पुरुष का रात तक बाते करना और गले लगना आज के आधुनिक समाज में बुरा नहीं माना जाता है और उसका मतलब गलत ही हो ये भी जरुरी नहीं है , दिल्ली में रह रही बुआ के बच्चे बड़े आराम से हम सभी को गले लग लेते है , मेरी माता जी ने जब बुआ की १८ वर्षीय बेटी को मेरे भाई के गले लगते देखा जब भी मिलते थे तो उन्हें बुरा लगा फिर मैंने उन्हें समझाया की जब उनके बच्चे हमारे गले लगते है तो कोई परेशानी नहीं है भाई के लगे तो क्या परेशानी है ये आज के बच्चे है उनके मिलने जुलने का ढंग ये ही है , बनारस में तो स्त्री पुरुष हाथ तक नहीं मिलाते है जबकि दिल्ली मुंबई जैसी जगहों पर हर कोई एक दुसरे से खुल कर हाथ मिलाता है कोई इस तरफ ध्यान भी नहीं देता है , फिर उच्च वर्ग में तो गाल मिलाने और गाल चूमने का भी रिवाज है । सब को हम गलत नजर से नहीं देख सकते है , मित्रता आदि में भी ये सब होता है ।

    फिर भी आप जिस मुद्दे पर बात कर रही है उस बारे में मेरी राय है की प्रेम कैसा भी हो कम से कम उसका प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से एक सीमा तक ही हो तो ठीक उसके बाद वो दूसरो को असहज तो करता है ही है वो नहीं होना चाहिए , दुसरे जैसा रश्मि जी ने कहा की इन रिश्तो में कुछ भी नया नहीं है , अगर मेरी यादास्त ठीक है तो शरतचंद्र के उपन्यास , चरित्रहीन में यही कहानी थी स्त्री आयु में काफी बड़ी थी और उसका प्रेम सम्बन्ध एक बिलकुल युवा लडके के साथ था , तो देखिये ये किस्से तो बहुत ही पुराने समय से चले आ रहे है , जिन लोगो की बात आप कर रही है वहां तो हो सकता है की मामला बस एक दुसरे की जरूरतों को पूरा करने भर का हो किन्तु कही कही तो रिश्ता काफी गहरा भावनात्मक होता है । मुझे तो एक फिल्म भी याद आ रही है जिसमे कम आयु के कमल हासन आधिक आयु की हेमा मालानी से प्यार करने लगते है जिनकी एक युवा बेटी भी होती है , सभी का अपना जीवन और सोच है । ” न उम्र की सीमा हो न जन्मो का हो बंधन ” वाला गाना तो सुना होगा 🙂

  16. morden period with modernity and flexible realation according to their desiere always creats this situation.so let it go and watch it helpless.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *