अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

शेर की किरकिरी

Written By: AjitGupta - May• 02•18

शेर और शेर के बच्चों से परेशान होकर मैंने सच्चे शेर की तलाश में नेशनल ज्योग्राफी चैनल पर दस्तक दे दी। खोलते ही जो दृश्य था वह बता दूं – एक संकरा सा रास्ता था, सड़क बनी थी, कार खड़ी थी और वहाँ काँपते पैरों से एक भैंस का बच्चा घूम रहा था। एंकर बोल रहा था कि इस बच्चे को देखकर लग रहा है कि यह डरा हुआ है, लेकिन डर किसका है यह समझ नहीं आ रहा है! तभी कार के पीछे से शेर निकला, अब दोनों आमने-सामने थे। शेर ने पोजीशन ली और घात लगाने के लिये तैयार हो गया। लग रहा था कि आसान शिकार हाथ लगा है लेकिन तभी एक बड़ी सी भैंस दौड़ती हुई आयी और उसने शेर पर आक्रमण कर दिया। शेर कुछ समझ ही नहीं पाया, बस दुम दबाकर भाग गया। सबसे बड़े शिकारी का हाल देखकर हँसी आ गयी, लोग तो इसकी कसमें खाते हैं और यह है कि भैस के सामने ही दुम दबाकर भाग गया। रूकिये अभी, मुझे बहुत कुछ देखना बाकी था और आपको बताना अभी शेष है। इसके तत्काल बाद दूसरा दृश्य दिखाया गया, एक सेई ( सेई जानते हैं ना. तीखे कांटों वाली) लगभग 8-10 शेरों से घिरी थी। लेकिन सेई के सारे बाल शूल की तरह खड़े थे, शेरों की हिम्मत नहीं हो रही थी उसे चबाने की। कई मिनट तक पहलवानों की तरह अखाड़े में घुमाई हुई लेकिन हारकर शेर चले गये। यह क्या छोटी सी – पिद्दी सी सेई से भी हार गए! एक शेर हारता तो समझ भी आता लेकिन यहाँ तो झुण्ड था, लेकिन फिर सबसे बड़ा शिकारी हार गया था। एंकर को अभी और दिखाना था – तीसरा दृश्य – एक जिराफ जो गर्भवती है, अपने बच्चे के साथ घूम रही है उसके बच्चे पर शेर ने आक्रमण कर दिया। बस फिर क्या था, जिराफ के पास ना तो लम्बे दांत और ना ही लम्बे नाखून लेकिन अपनी लम्बी टांगों से ही शेर को दबोच लिया। अब शेर नीचे था और जिराफ उसे पैरों से दबाकर वार कर रही थी।
पहले भी कई बार शेरों को चित्त होते देखा है लेकिन इसबार तो चित्त होने की ही घटनाएं थी, मैं शेर बने कुनबे की अठखेलियों से बाहर निकलना चाह रही थी और टीवी का दामन थामा था लेकिन यहाँ तो शेर की किरकिरी हुई पड़ी थी। सारे ही मुहावरे झूठे हो गये थे, बहुत सुना है – शेर अकेले ही शिकार करता है, झुण्ड में तो गीदड़ करते हैं, लेकिन यहाँ तो छोटी सी सेई के सामने शेरों का झुण्ड था और खिसियाकर जाते हुए दिख रहे थे। भैंस माँ के सामने शेर को भागते देखा और जिराफ ने तो दम ही निकाल दिया। इसलिये शेर की कसमें मत खाओ, कसमें खानी है तो माँ की खाओ। कहो कि हम भारत माता की संतान हैं और जब तक हमारी माँ का आँचल सलामत है, कोई हमारी तरफ आँख नहीं उठा सकता। शेर दा पुत्तर बनने से ज्यादा अच्छा है माँ का पुत्तर बनना।
वैसे भी मुझे समझ नहीं आता की लोग खुद को शेर क्यों बताते हैं? शेर तो सबसे हिंसक जानवर होता है, सबसे बड़ा शिकारी। क्यों लोग अपनी तुलना शिकारी के साथ करते हैं? अब आक्रान्ताओं का जमाना तो रहा नहीं कि कहें की हम सबसे बड़े शूरवीर हैं और तुम्हें गाजर-मूली की तरह काट खाएंगे। शेर की उपमा तो विनाश की ओर धकेलती है, संदेश देती है कि हम शिकारी हैं और तुम हमारा शिकार हो। शेर तो और कुछ करता नहीं, बस शिकार करता है। वैसे अभी तक ये लोग जनता का शिकार ही कर रहे थे, इसलिये अपने लोगों को याद दिलाया गया है कि तुम शेर के बच्चे हो, टूट पड़ो जनता पर। तुम्हारा काम शिकार करना है और तुम्हीं एकमात्र इस जंगल के राजा हो। यह लोकतंत्र क्या होता है? शेर किसी लोकतंत्र को नहीं मानता। ललकार मिली है लोगों को, सोते से उठकर जागो और अपना स्वरूप पहचानो, तुम कल भी शिकारी थे और आज भी शिकारी हो। याद करो हमने ही 84 में एक कौम को सबक सिखाया था, हमने ही देश का बंटवारा करवाया था और जब ये छोटे-मोटे प्राणी सर उठाने लगे थे तब हमने ही आपातकाल लगाकर इनको सींखचों के अन्दर डाल दिया था। शेरों जाग जाओ, शिकार का समय हो गया है, बस टूट पड़ो। लेकिन कठिनाई यह हो गयी है कि अब भारत माता तनकर खड़ी हो गयी है और उसने अपने पुत्तरों की रक्षा का वचन दिया है, वह माँ बनकर शेरों के सामने खड़ी हो गयी है। कहीं ऐसा ना हो कि जैसे भैंस के सामने शेर भागा था और जैसे जिराफ ने शेर को पैरों तले रौंद डाला था, वैसा ही हाल इन शेरों का ना हो जाए! खैर भगवान रक्षा करे।

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