अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

सेल्यूट अमेरिका को

Written By: AjitGupta - Jan• 14•18

अमेरिका में एक दिन बेटा डाक देख रहा था, अचानक उसके माथे पर चिन्ता की लकीरे खिंच गयी, मैंने पूछा कि क्या खबर है? उसने बताया कि सरकारी चिठ्ठी है, अब तो मेरा भी दिल धड़कने लगा कि यहाँ अमेरिका में सरकारी चिठ्ठी का मतलब क्या है? लेकिन जब उसने बताया तो देश क्या होता है और उसके प्रति नागरिकों का कर्तव्य क्या होता है, जानकर खुशी भी हुई। न्यायालय की ओर से पत्र आया था – पुत्रवधु के नाम। उसे जूरी की ड्यूटी देनी होगी। आप लोगों ने अभी हाल ही आयी अक्षय कुमार की फिल्म – रूस्तम देखी होगी या फिर एक बहुत पुरानी फिल्म थी – एक रुका हुआ फैसला, इन दोनों ही फिल्मों में जूरी-प्रथा थी। न्याय जनता की राय के आधार पर होता था, इसके लिये 12 लोगों की कमेटी बनाकर उनके समक्ष केस की पूरी प्रक्रिया चलती थी और फिर उन्हें न्याय देना होता था। लेकिन अब जनता की भागीदारी हटा ली गयी है। लेकिन अमेरिका में अभी भी न्याय जनता की भागीदारी से ही होता है और इसके लिये आम आदमी को अपनी नि:शुल्क सेवाएं देनी होती हैं। सरकार वहाँ के नागरिकों को सेवा के लिये बुलाती है और यह उनका कर्तव्य होता है कि वे सेवा दें। कोई भी सेवा देने से मुकर नहीं सकता। यदि आपने सेवा नहीं दी है तो बड़ा हर्जाना और जेल दोनों होती है। बेटे की चिन्ता की बात यह थी कि अभी पुत्रवधु को प्रसव हुए एक माह ही हुआ था और छोटे बच्चे को इतनी देर और कई दिनों तक नहीं छोड़ा जा सकता था। खैर छूट के प्रावधान देखे और सबसे पहला प्रावधान ही माँ बनना था। पत्र लिख दिया गया और वहाँ से एक साल की छूट मिल गयी। मतलब ड्यूटी तो देनी ही है। आपका कोई भी धंधा हो, उसमें कितना भी नुक्सान होता हो लेकिन यह ड्यूटी आपको देनी ही है, इसके लिये आपको कोई राशि भी नहीं मिलेगी।
अमेरिका ने अपने नागरिकों के लिये कर्तव्य निर्धारित किये हैं लेकिन हमारे देश में शायद ही कोई ऐसा कर्तव्य हो जो नि:शुल्क हो। चुनाव ड्यूटी में भी अलग से भत्ता मिलता है और ड्यूटी भी सरकारी कर्मचारी की लगती है। देश के प्रति नागरिकों के कर्तव्य को जानकर मुझे बेहद खुशी हुई। वहाँ का प्रत्येक व्यक्ति देश के कानून का पालन करना अपना कर्तव्य ही नहीं धर्म समझता है तभी अमेरिका सभ्यता के पायदान में अव्वल है। न्याय व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी न्याय में पारदर्शिता को बढ़ाती है, जैसा की हमने रूस्तम और एक रुका हुआ फैसला में देखा था। काश हमारे देश में भी ऐसा ही कुछ होता! जूरी के लिये किसी भी वयक्ति का चुनाव हो सकता है, इसके लिये शिक्षा का आधार जरूरी नहीं है। बस एक साक्षात्कार होता है, यदि आपको उसमें चुन लिया गया है तब आपको वह ड्यूटी अनिवार्य रूप से देनी ही होगी। कोर्ट की कार्यवाही कितने दिन चलेगी और कितने दिन तक आपको ड्यूटी करनी है, इसमें कोई छूट नहीं है। जूरी प्रथा से यह बात भी सबके समक्ष आती है कि न्याय देना किसी बुद्धीजीवी का अधिकार नहीं है, वह कोई भी आम आदमी हो सकता है। हमारी नैनी ने बताया कि उनके पति जो ड्राइवर है, दो बार ड्यूटी कर चुके हैं। सेल्यूट अमेरिका को।

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