अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

सेवा करने वाला सम्माननीय

Written By: AjitGupta - Apr• 23•16

जो आपको आकाश में उड़ने के लिये पंख देता है, आपके भूख और प्यास की चिंता करता है, जो आपके साज-सज्जा की चिंता करता है, जो आपको जीवन में निश्चिंतता देता है, ऐसा व्यक्ति आपका जीवन साथी ही होता है। जो आपके लिये समर्पण भाव रखता है उसके लिये कई बार आपके मन में दास-भाव का उदय हो जाता है। इससे मेरा जीवन संचालित होता है, यह मेरे आनन्द का साथी है। इसे खोने के डर मात्र से असुरक्षा का भाव उदय होने लगता है। यही असुरक्षा भाव, समर्पित व्यक्तित्व के लिये कठिनाई का कारण बन जाता है। अपनी असुरक्षा को छिपाने के लिये शासन का भाव उदय होता है और इसी शासन भाव के कारण अपने ही प्रियजन के साथ दास की तरह व्यवहार करने लगते हैं। जिसके हाथ में भी आर्थिक जगत की चाबी है, बस वही स्वयं को शासक और दूसरे को दास मान बैठता है।
कल एक फिल्म देखी – की और का। पति कौन और पत्नी कौन, इसी प्रश्न को हल करने का प्रयास था। यदि लड़की पति हो और लड़का पत्नी तो क्या हो? लड़के में समर्पित भाव हो और लड़की खुले आकाश में उड़ने का भाव रखती हो तब क्या हो? तब यही असुरक्षा का भाव लड़की में उत्पन्न हो जाएगा और वह भी लड़के को अपना दास मानने लगेगी। दास यदि शौहरत प्राप्त कर ले तो असहनीय हो जाता है क्योंकि यहाँ भी असुरक्षा का भाव ही आगे आ जाता है। इसलिये समर्पण भाव रखना दुखदायी प्रतीत होता है। गृहस्थी में कार्य विभाजन का महत्व है, यह परम्परा सदियों से संचालित है लेकिन इस परम्परा के कारण घर को संचालित करने वाले पर अन्याय होने लगा और आर्थिक संसार वाला शासक बन बैठा। इसलिये गृहस्थी के दो पहिये – पति और पत्नी जब एक होते थे तभी गृहस्थी की गाड़ी चलती थी। लेकिन अब नवीन प्रयोग होने लगे हैं और लड़का-लड़की एक-एक ईकाई बनकर आमने सामने खड़े हैं। दोनों ही स्वयं में परिपूर्ण। केवल अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये साथ।
फिल्म में पुरुषत्व को भी आवाज देने का प्रयास किया गया है। पुरूष कहता है कि मेरी माँ को निकम्मेपन के बोल सुनने पड़ते थे तो मैं माँ बनने का प्रयास करता हूँ लेकिन गृहस्थी सम्भालते ही उसे भी निकम्मेपने के बोल सुनने पड़ जाते हैं। अर्थात् जो आपको उड़ने के लिये पंख देता है, आपको सारे कार्यों से मुक्त रखता है, वह निकम्मा। इसलिये एक-दूसरे के कार्य के प्रति आदर का भाव ही गृहस्थी का आधार होना चाहिये। सेवा करने वाला, कमाने वाले से किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं होना चाहिये। इसलिये भक्त को भगवान से बड़ा मानते हैं। आप भी घर में जो आपकी सेवा कर रहा हो उसे सम्मान के भाव से देखें ना कि हेय भाव से। और सम्मान का अर्थ ही होता है अपने बराबर मान देना।

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