अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

हम चिड़ियाघर की तरह अपने-अपने कक्ष में बैठे हैं

Written By: AjitGupta - Mar• 01•13

मन कभी-कभी विद्रोह सा कर देता है, वह नकार देता है आपके सारे ही मार्ग। आप जिन मार्गों पर प्रतिदिन चल रहे हैं, जिनके बिना जीवन अधूरा सा दिखायी देता है, उनको कभी मन नकार देता है। कहता है कि बस हो गया, अब और नहीं जाना इस मार्ग पर। एक आम बुद्धिजीवी की जिन्‍दगी क्‍या है? सुबह उठेगा और समाचार-पत्र के लिए तड़पेगा। यदि किसी दिन भूलवश या और किसी कारण से समाचार-पत्र नहीं आया तो घर के बाहर लॉन में चक्‍कर ही काटता रहेगा। उसे बिना समाचारों के कुछ भी अच्‍छा नहीं लगेगा। जैसे ही समाचार-पत्र सामने आया, उसकी बांछे खिल जाएंगी। लेकिन उसे पढ़ने के लिए आँखों को समाचार पर केन्द्रित किया कि मन विद्रोह कर उठा। नहीं-नहीं, ये बजट-वजट के समाचार से क्‍या लेना-देना? सरकार का बजट है, आम आदमी का तो उसमें कुछ है नहीं, इसलिए इस समाचार को क्‍यों पढ़ना? मन के दवाब से पेज पलट दिया, दूसरे पेज पर शोक समाचार हैं। मन ने फिर बड़बड़ाना शुरू कर दिया। बीसवीं और पच्‍चीसवीं पुण्‍यतिथि के समाचार? मन शंका से भर गया, हमें कोई प्रथम पुण्‍यतिथि पर भी याद करेगा क्‍या? बस मन को थोड़ी राहत मिली कि आज कोई ऐसा शोक संदेश नहीं है जिसमें शरीक होना हो। अन्‍य पृष्‍ठों पर सामाजिक गतिविधियों के समाचार, खेल समाचार आदि को सरसरी निगाह से देखा और दस मिनट में पूरा समाचार पत्र स्‍वाह। मन बुदबुदाया, सब बेकार है। चलो कम्‍प्‍यूटर ही खोल लो। अपनी मेल वेल देख ली और बढ़ गए गूगल रीडर की ओर। लेकिन यह क्‍या, यहाँ भी मन टिक ही नहीं रहा। कुछ ब्‍लाग तो राजनीति में ही लगे हैं, मन बोला कि छोड़ों इसे। राजनीति तो दिल्‍ली में बैठे लोग कर रहे हैं और हम खाली-पीली में ही हलकान हुए जा रहे हैं। वे कब गठबंधन कर लेंगे और कब तोड़ देंगे लेकिन हम अनावश्‍यक कुस्‍तमकुस्‍ता हो रहे हैं। एकाध ब्‍लाग सेहत को लेकर भी थे, डॉक्‍टरों के सुझावों से वैसे ही परेशान और फिर इनके सुझाव। लेकिन मन ने कहा कि चलो एकबार देख तो लो, क्‍या पता कुछ अपने मन का ही मिल जाए। मन तलाश रहा है कि कुछ ऐसा मिल जाए जिससे तरोताजगी का अनुभव हो। लेकिन इक्‍का दुक्‍का ब्‍लाग को टटोलकर कर्सर ने विण्‍डो ही बन्‍द कर दी। अब लोग कहेंगे कि हमारे ब्‍लाग को पढ़ा ही नहीं। लेकिन इस मन का क्‍या करें, यह तो विद्रोह करे बैठा है।

इसे मैंने बहुत समझाया कि अब ब्‍लाग जगत में भी यह कहने के दिन आ गए कि हमारे जमाने में ऐसा होता था लेकिन अब वो बात कहाँ रही? कैसे-कैसे लिख्‍खाड़ हुआ करते थे? कितने लोग अपनी रेटिंग की थाह में लगे रहते थे। एग्रीगेटर किसे सबसे ऊपर दर्शा रहा है और किसे नहीं, इसी बात की चिन्‍ता सताती रहती थी। अब क्‍या है, चारों तरफ केवल उदासी। सैकड़ों लोगों से संख्‍या घटकर मुठ्ठी भर रह गयी। ऐसा लगने लगा कि महाभोज से निकलकर हम वहीं आलू की सब्‍जी, पूड़ी और बेसन-चक्‍की पर आ गए। पहले गाँवों में शादी-ब्‍याह या मरण-मौत के समय जीमण में क्‍या बनता था? दाल और मालपुआ। बस दो आयटम। मुझे तो अब यहाँ भी डर लगने लगा है कि जहाँ पहले स्‍टाल खत्‍म ही नहीं होते थे अब हम भी केवल दाल और मालपुए पर नहीं सिमट जाएं? कुछ तो वायुयान की तरह हैं, कि बस दिल्‍ली से मुम्‍बई की ही उड़ान है। एक ही रूट पर वायुयान उड़ेगा, इसी तर्ज पर एक ही विषय पर लिखा भी जाएगा और टिप्‍पणी भी उसी विषय की होगी। अब जैसे शिवसेना वाले हैं, वे मराठी मानुष के खिलाफ कोई बात बर्दास्‍त नहीं कर सकते। दुनिया में कहीं भी कुछ बोला जाए, वे तुरन्‍त प्रतिक्रिया करेंगे। ऐसा ही यहाँ भी है, कोई राजनीति में दक्ष है, दुनिया में कितनी ही गम्‍भीर घटनाएं हो जाएं लेकिन बन्‍दा क्‍या मजाल कुछ लिख दे, लेकिन जैसे ही विपक्ष की कोई कमजोर कड़ी उजागर हो जाए, बस समझो उस दिन उनकी पोस्‍ट जरूर आ जाएगी या टिप्‍पणी आ जाएगी। कुछ धार्मिक वातावरण में ही जीते हैं, तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्‍यों है, इसी बात की बहस में माहिर हैं। पुरुषवादी और नारीवादी भी हैं, कहीं से बस नारी का शब्‍द दिखायी देना चाहिए, अर्जुन की आँख की तरह केवल उसी शब्‍द को पकड़कर ऐसी की तैसी नहीं की तो फिर क्‍या किया? कुछ प्रगतिशील दिखने का भ्रम पाले रहते हैं और दूसरों को पुरातनपंथी सिद्ध करने में ही जुटे रहते हैं। कुछ विदेश के गुणगान में लगे रहते हैं और अपने देश की बखिया उघाड़ने में माहिर होते हैं। तो ऐसे ही न जाने कितने खांचों में लोग फिट बैठ गए हैं, अपने खांचे से बाहर निकलना ही नहीं।

इसलिए मन विद्रोह कर देता है कि ये सारे तो चिड़ियाघर के कक्षों में बन्‍द हैं, अब यहाँ जाओंगे तो शेर मिलेगा, वहाँ जाओंगे तो भालू मिलेगा। बस कुछ नया दिखायी नहीं देता, कि बेचारा मन जाए तो कहाँ जाए। अपनी कलम भी डर जाती है कि यदि तुम कुछ भी लिखोंगे तो प्रतिक्रिया भी एक सी ही होगी। शेर अपनी दहाड़ से ही प्रतिक्रिया देगा तो भालू करतब ही दिखाएगा। बिल्‍ली म्‍याऊँ करेगी और चूहा कुतर-कुतर कर देगा। अब फाल्‍गुन लग गया है, होली का रंग भी चढ़ने को मचल रहा है तो मन मुझे यहाँ ले आया। मैंने अपनी अंगंलियों को उनके स्‍वयं के हवाले कर दिया कि आज जी लो तुम अपनी जिन्‍दगी, तुम्‍हें जो टाइप करना है वह कर लो। लिख डालो तुम भी अपने मन की। टिप्‍पणियों से मत डरो, वे तो वैसी ही होंगी जैसी प्रतिदिन होती हैं। ज्‍यादा कुछ हो गया तो कह देंगे कि बुरा न मानो होली है। इसलिए आप इस पोस्‍ट को झेल लीजिए, इसमें मेरा कम योगदान है, जो कुछ भी है वह अंगुलियों की ही कारस्‍तानी हैं, वे की-बोर्ड पर चलती रहीं और मोनीटर उसे दिखाता रहा। चलिए अब विराम।

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23 Comments

  1. पोस्ट झेल ली 🙂
    वी इस मूड में भी बढ़िया लिखती हैं 🙂

  2. वी को ” वैसे आप ” पढ़ा जाये !

  3. ऐसे विचार बहुत लोगों के मन में हैं जो आपकी अँगुलियों ने
    लिखे हैं बिना टिप्पणियों की चिंता किये 🙂 , हर बात से सहमत हूँ……सभी की भागीदारी कुछ ऐसी हो कि बलोग्गिंग को गंभीरता से लिया जाये

  4. sanjay says:

    Jo bhi Ungliyon ne likha Bilkul sahi Likha

  5. sharda arora says:

    सच है ये पिंजरे तो हम अपने लिए खुद ही बनाते हैं …

  6. S.M.Masums says:

    अजित गुप्ता जी ब्लॉगजगत के हाल सभी ब्लॉगर जानते हैं और ऐसे बहुत से ब्लॉगर हैं जो आज भी अच्छा लिख रहे हैं| मैं भी कुछ वर्ष पहले आप जैसे सोंचता था आज मेरे पास बहुत से ब्लॉगर हैं जिनको मैं पढ़ा करता हूँ | आप भी अपनी पसंद के ब्लॉगर चुन लें और फ़िक्र का अंत करें | समाज का भला करने की कोशिश करती रहे | आप की बात से सहमत हूँ लेकिन हम और आप भी उन्ही ब्लॉगर में से एक हाँ |

  7. shikha varshney says:

    बढ़िया लिखा है.. और लिखने वाले लिखेंगे ही बेशक पिंजरे में लिखें.हर कोई अपने कटघरे में खुद ही खडा है.पढने वाले की भी अपनी चोइस है.

  8. वन्दना गुप्ता says:

    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (2-3-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

  9. Sanat says:

    पहली बार आपके ब्लॉग पर आ टपका हूँ. प्रणाम स्वीकारें ! यह पोस्ट भले अँगुलियों की कारस्तानी हो, विद्रोही मन का परिचय तो देती ही है. साधुवाद !

  10. ब्लॉग लेखन में तो जो अपने मन का लिख पाए , वही सर्वोत्तम है .
    अब इस पर कोई कह दे कि जी हमें तो बस वाद विवाद ही पसंद है तो क्या कीजियेगा 🙂

  11. कभी कभी मूड ऐसा भी होता है,

  12. गजब का फलसफा दिया है आपने आदरणीया … सभी अच्छे लगें ऐसा कहाँ सम्भव और बारहों महीने। बुरा न मने तो मेरे पोस्ट ** भेड़िया ** पर एक नज़र डालें शायद आपका मन हल्का हो।

  13. अजित जी,
    “paths are made by walking and walking down beaten paths is for beaten men”

    ये quote मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है…ब्लागिंग करते मुझे साढ़े तीन साल हो गए हैं…हमेशा यही कोशिश रही कि हर पोस्ट पिछली पोस्ट से कुछ अलग रहे..कितना कारगर रहा, कह नहीं सकता..हां, अब ये ज़रूर किया है कि पहले से आवृत्ति बहुत कम कर दी है…फेसबुक का प्रचलन बढ़ने के बाद अच्छा लिखने वाले कई ब्लॉगरगण का रुझान उधर हुआ..लेकिन पिछले दो तीन महीने से ये लोग फिर ब्लॉगिंग की ओर लौटने लगे है…चिट्ठा जगत, ब्लॉगवाणी जैसे एग्रीगेटर फिर वापस आ जाएं तो ब्लॉगिंग का वही उत्साह भी लौट आएगा…

    और आपका हमेशा खरी-खरी कहना, आपके 24 कैरट सोने जैसे खरे व्यक्तित्व का प्रमाण है…

    जय हिंद…

  14. सही कहा आपने सबने अपने अपने खांचे बना रखें है और उसे ही सम्पूर्ण दुनियां समझ बैठे है !!

  15. जब ऊब लगती है तो मैं सोचना शुरू कर देती हूँ कि अच्छा है जो हम पेड़-पौधे नहीं हुए नहीं तो एक जगह खड़े-खड़े सारी उम्र बितानी पड़ती .अब इंसान हैं तो चलते-फिरते हँसते-बोलते हैं न !

  16. हर व्यक्ति अपने अनुभवों और दृष्टा भाव से संचालित होता है .मैं और आप कोई भी इसका अपवाद नहीं है .बेशक ब्लॉग कुछ के लिए एक सनक के कुछ के लिए एक दिखावा ,एक गुमान खुद के ब्लोगर होने का रहा है .

    अच्छे बुरे सब जगह हैं यहाँ भी हैं

  17. प्रवीण पाण्डेय says:

    बहुत ही रोचक तरीक़े से आपने उकसाया है आपने बाहर आने के लिये।

  18. dnaswa says:

    पोस्ट पढ़ भी ली झेलने जैसा कुछ खास नहीं लगा …
    लिखने वाले लिखेंगे … बंद रह कर या आज़ाद हो कर … जरूरी है अपने मन की लिखें … दबाव में या पक्षपात में न लिखें बस …

  19. वाह क्या बात है जी। अच्छी बातें लिखी।
    आप हमारे ब्लॉग के पुराने लेख बांचिये न! जैसे एक का शीर्षक ही है- ऐसे लिखा जाता है ब्लॉग उसके ये अंश देखिये:
    लब्बो-लुआब यह कि अच्छा और धांसू च फ़ांसू लिखने का मोह ब्लागिंग की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। ये साजिश है उन लोगों द्वारा फ़ैलाई हुयी जो ब्लाग का विकास होते देख जलते हैं और बात-बात पर कहते हैं ब्लाग में स्तरीय लेखन नहीं हो रहा है। इस साजिश से बचने के लिये चौकन्ना रहना होगा। जैसा मन में आये वैसा ठेल दीजिये। लेख लिखें तो ठेल दें, कविता लिखें तो पेल दें।

  20. AjitGupta says:

    अनूप जी, सही कह रहे हैं, बस ठेलने से ही काम चलेगा तभी विविधता आएगी।

  21. बहुत सही कहा आपने, अपने अपने ठीये बन गये हैं.

    रामराम.

  22. Kajal Kumar says:

    एग्रीगेटरों के जाने के स्‍थि‍ति में http://www.google.com/reader के बि‍ना वाकई मुश्‍कि‍ल हो सकता था पर इसके रहते कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा. जो ब्‍लॉग मुझे पढ़ने होते थे उन्‍हें मैं इसमें जोड़ता ही चला आया हूं. हां, ये बात ज़रूर है कि अब कम लि‍खा जा रहा है. ये भी कि कई नए ब्‍लॉग एग्रीगेटरों से ही मि‍लते थे.

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