अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

सुन रहा है ना तू?

Written By: AjitGupta - Mar• 12•20

रथ के पहिये थम गये हैं। मुनादी फिरा दी गयी है कि जो जहाँ हैं वही रुक जाएं। एक भयंकर जीव मानवता को निगलने निकल पड़ा है, उसके रास्ते में जो कोई आएगा, उसका काल बन जाएगा! सारे रास्ते सुनसान हो चले हैं। जिसे जीवन का जितना मोह है, वे सारे लोग घरों में दुबक चुके हैं, जो जीवन को खेल समझते हैं वे अभी भी वृन्दावन में होली खेल रहे हैं।

विचार आया है मन में! यह वायरस अकेले मनुष्य पर ही आक्रमण क्यों करता है? लाखों पशु हैं, पक्षी हैं लेकिन सभी तो बिना वीजा और पासपोर्ट के स्वतंत्र घूम रहे हैं। ना साइबेरिया से आने वाले पक्षी रुके हैं और ना ही पड़ोस के पशु रुके हैं! मनुष्य के अलावा कहीं कोई भय व्याप्त नहीं है। अकेला मनुष्य ही क्यों इन सूक्ष्मजीवियों के गुस्से का शिकार होता है?

मनुष्य कभी भी किसी भी प्राणी को हाथ में पकड़ लेता है और अट्टहास करता है – तुझे निगल जाऊँगा….. हा हा हा। निरीह प्राणी कुछ नहीं बोल पाता लेकिन उसका आक्रोश जन्म लेता है, छोटे से सूक्ष्मजीवी के रूप में! मनुष्य ने किसी भी प्राणी को नहीं छोड़ा, सभी के साथ दुर्व्यहार किया, सूक्ष्मजीवी बढ़ते गये और मनुष्य का जीवन संकट में घिरता गया। हर घर के भोजन की टेबल पर सज गये हैं जीव! आक्रोश बढ़ता चले गया और सूक्ष्मजीवी पनपते गये! आज एक तरफ मनुष्य खड़ा है और दूसरी तरफ सारे ही प्राणी। मानो संग्राम छिड़ गया हो! मनुष्य के पास न जाने कितने हथियार हैं लेकिन सूक्ष्मजीवियों के पास केवल स्वयं की ताकत है।

सुबह हुई हैं, मुंडेर पर बैठकर चिड़िया गान गा रही है, कोयल भी कुहकने को तैयार है, गाय रम्भा रही है लेकिन मनुष्य खामोश बैठा घर में कैद है। केवल चारों तरफ से सायं-सायं की आवाजें आ रही हैं। मानो हर शहर कुलधरा गाँव जैसे सन्नाटे में तब्दील होना चाहता है। मनुष्य ने कहीं युद्ध छेड़ रखा है, वह कह रहा है कि मेरे रंग में रंग जाओ नहीं तो बंदूक से भून डालूंगा और दूसरी तरफ सूक्ष्मजीवी आ खड़ा हुआ है। बंदूकें भी बैरक में लौट गयी हैं, मानवता को अपने ही रंग में रंगने वाले भी दुबक गये हैं बस सूक्ष्मजीवी घूम रहा है, निर्द्वन्द्व! चेतावनी दे रहे हैं कोरोना जैसे हजारों सूक्ष्मजीवी, मनुष्य होश में आ जा, हिंसा छोड़ दे, नहीं तो तू सबसे पहले काल का ग्रास बनेगा। कोई नहीं बच पाएगा! अट्टहास बदल गया है, सूक्ष्मजीवी का अट्टहास सुनायी नहीं पड़ता लेकिन जब मनुष्य का रुदन सुनाई देने लगे तब समझ लेना की कोई जीव अट्टहास कर रहा है। रथ के पहिये थम रहे हैं लेकिन सूक्षमजीवी दौड़ रहा है, भयंकर गर्जना के साथ दौड़ लगा रहा है। मनुष्य अभी भी सम्भल जा। कहीं ऐसा ना हो कि डायनोसार की तरह तू भी कल की बात हो जाए? सुन रहा है ना तू?

चुप रहो sss तुम महिला हो!

Written By: AjitGupta - Mar• 10•20

महिला दिवस पर एक बात लिखना चाह रही हूँ कि आखिर एक महिला को क्या चाहिए? महिला लड़ना भी चाहती है, हारना भी चाहती है, जीतना भी चाहती है लेकिन बस यह नहीं सुनना चाहती कि चुप रहो – तुम महिला हो! हर आदमी बस एक ही बात से सारे तर्क समाप्त कर देता है कि तुम महिला हो! मैंने एक पुस्तक लिखी – अपने पिता पर। मेरे सामने एक प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया गया कि पुस्तक क्यों लिखी गयी? मुझे भी लगा कि यह प्रश्न मुझे भी स्वयं से पूछना ही चाहिये कि आखिर क्यों लिखी गयी पुस्तक? मेरी पुस्तक में एक बात और थी कि मेरी माँ कहती है कि मेरे श्रीराम चले गये? जबकि मेरे पिता परशुराम की प्रतिकृति अधिक थे लेकिन मेरी माँ ने उन्हें विदाई देते समय कहा कि मेरे श्रीराम चले गये! महिला दिवस पर इन बातों की चर्चा करना चाहती हूँ। क्यों एक परशुराम जैसा व्यक्ति पत्नी के मन में श्रीराम की छवि लेकर बैठा है और क्यों एक पुत्री ऐसे पिता पर पुस्तक लिख देती है! मेरा जन्म आजादी के बाद हुआ, महिला शिक्षा का असर सीमित था, हमारे परिवार जैसे साधारण परिवार महिलाओं के लिये उच्च शिक्षा की कल्पना तक नहीं करते थे। यदि शिक्षा भी मिल गयी तो भी उनमें पुरुषोचित स्वाभिमान भरना नहीं जानते थे। मेरे पिता ने घोषणा की कि मैं संतानों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाऊंगा। वे बेटा और बेटी में भेद नहीं कर सके और कहते कि मेरे सारे बेटे ही हैं। उन्होंने हमारे अन्दर स्वाभिमान कूट-कूटकर भर दिया। बस यही बात किसी भी बेटी को प्रभावित करती है। पिता फिर चाहे  परशुराम हो या फिर श्रीराम, लेकिन यदि वह अपनी बेटी में स्वाभिमान भरता है तब बेटी  हमेशा ऋणि रहती है। बेटों को इस ऋण का पता नहीं होता, क्योंकि वे इस परिस्थिति से कभी गुजरे ही नहीं! वे कभी दूसरे दर्जे के नागरिक रहे ही नहीं! उन्हें पता ही नहीं कि जब कोई धारा के विपरीत कार्य करता है, किसी में स्वाभिमान भरता है तब उसकी जगह क्या होती है? कोई भी व्यक्ति जब परिवार में महिला को सम्मान देता है तब उसका कृतित्व कितना बड़ा बन जाता है!

हमारे परिवार में पिता ने महिला को उसके अधिकार दिये। माँ से झगड़ा भी किया, घर में भूचाल भी लाया गया लेकिन माँ को दोयम दर्जा नहीं दिया गया। अपनी पुत्रवधुओं को कभी भी घूंघट में नहीं रहने दिया। उन्होंने हर महिला को वे सारे ही अधिकार दिये जो एक पुरुष को प्राप्त थे। हाँ वे झगड़ा करते थे लेकिन हमें  भी झगड़े का अधिकार देते थे! उन्होंने कभी नहीं कहा कि चुप रहो, तुम महिला हो! यही बात सब से अनोखी है। आज बात-बात पर सुनने को मिलता है कि चुप रहो तुम महिला हो! मैंने कई संगठनों में काम किया लेकिन सुनने को मिल ही जाता था कि चुप रहो तुम महिला हो! इसलिये महिला दिवस  पर मेरा एक ही प्रश्न है कि क्या अभी तक हम इसी वाक्य पर अटके हैं या हम आगे बढ़ चुके हैं? मेरे पिता ने  कभी यह वाक्य नहीं कहा, इसलिये मैंने उन पर पुस्तक लिखी, आज मैंने फिर मोदी को देखा जो महिला को कभी नहीं कहते कि चुप रहो, तुम महिला हो। आज यदि कोई भी पुरुष कितना भी बड़ा बन जाए लेकिन यदि वह महिला से कहे कि चुप रहो – तुम महिला हो, तब मुझे उस पर कोई सम्मान नहीं होता। मुझे जब-जब भी ऐसा सुनने और समझने को मिला, मैंने तत्काल वहाँ से पलायन कर लिया। आप हम से झगड़िये, हमें हराने की कोशिश भी कीजिए लेकिन हारने के डर से यह मत बोलिये कि चुप रहिये – क्योंकि तुम महिला हो! मैंने बचपन में ये शब्द नहीं सुने थे, मेरे पिता ने मुझे स्वाभिमान सिखाया था। उन्होंने सिखाया था कि सब बराबर हैं। यदि किसी के पास ज्ञान है तो वह ज्ञान महिला और पुरुष में विभाजित नहीं किया जा सकता है और ना ही भाषा में। ज्ञान किसी भाषा से भी बंधा नहीं होता कि यह भाषा नहीं आती तो आपका ज्ञान, ज्ञान नहीं है। इसलिये आज महिला दिवस पर मैं अपने पिता को नमन करती हूँ जिन्होंने मुझे स्वाभिमान सिखाया। महिला को कभी मत कहिये कि “चुप रहो – क्योंकि तुम महिला हो”।

मेरे पिता इसलिये ही मेरी नजर में महान थे और मेरी माँ की नजर में इसीलिये राम थे कि उन्होंने पत्नी को कभी नहीं कहा कि चुप रहो – तुम महिला हो। मेरे लिये मोदी भी इसीलिये महान है कि वे कभी नहीं कहते कि चुप रहो क्योंकि तुम महिला हो। महिला दिवस पर मेरे लिये हर वह व्यक्ति महान है जो कभी नहीं कहता कि चुप रहो, तुम महिला हो।

अटकलें ही शेष हैं

Written By: AjitGupta - Mar• 04•20

हमें आखिर इतनी जल्दी क्या है? दूध को समय दीजिये तभी दही जमेगा। जल्दबाजी में या बार-बार अंगुली करने से दही नहीं जमने वाला! लेकिन हमें हथेली पर सरसों बोने की आदत पड़ गयी है। समय देना तो हम भूल ही गये हैं! हमें आखिर जल्दी किस बात की है? नहीं हमें जल्दी भी नहीं है, बस हम फालतू टाइप के लोग हैं। समय बिताने के लिये गॉसिप करते हैं हम। मोदीजी के कहा कि मैं एक दिन के लिये रविवार को सोशल मीडिया एकाउंट छोड़ूगा तो अटकलों का बाजार गर्म हो गया। जितनी सनसनी फैला सकते थे, जितने कयास लगा सकते थे, सारे ही कयास और सनसनी फैलाकर देख ली। फिर आया मोदी जी का जवाब कि एक दिन महिलाओं के नाम रहेगा उनका सोशल मीडिया! अब! चारों तरफ निराशा! लोग कह रहे हैं कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया!

घर के चूल्हे पर दूध चढ़ा है, सड़क पर बारात निकल रही है, बस कृष्ण की बांसुरी सुनकर जैसे गोपियाँ सुध-बुध खो जाती थी वैसे ही रसोई से निकलकर गृहिणी दौड़ पड़ी बारात देखने और दूध उबल-उबल कर नीचे गिरता रहा, पतीला जलता रहा लेकिन होश किसे! दुनिया में कितनी खबरे हैं, कितना कुछ हो रहा है, उधर कोरोना वायरस ही कहर मचा रहा है लेकिन मीडिया को और सोशल मीडिया को मोदीजी की खबर की अटकलें लगानी है! आज मोदी नाम सबसे बड़ी खबर की दुकान हो गया है! खिलाड़ी छूट गये, अभिनेता छूट गये सारे ही सेलेब्रिटी छूट गये बस मोदी की खबर होनी चाहिये। मोदी की खबर से शेयर बाजार उछलने लगता है या टूटने लगता है। हमारे पास मुद्दे ही नहीं है, बस अटकलें ही शेष हैं। ऐसा होता तो कैसा होता और ऐसा नहीं होता तो कैसा होता? सारा देश फालतू हुआ बैठा है, बस एक मोदी के सहारे सारे ही बैठे हैं। दिल्ली में बिल्ली ने खूनी पंजे गड़ा दिये हैं लेकिन हम अटकलें-अटकलें खेल रहे हैं। कोई भी संगठन समाज को बचाने के लिये आगे नहीं आ रहा है, किसी ने भी रक्षा दल नहीं बनाया है। हम सदियों से अटकलों के सहारे जी रहे हैं, कभी गुलाम बन जाते हैं, लुट जाते हैं फिर कोई मोदी जैसा आ जाता है, वापस स्वतंत्र हो जाते हैं और फिर अटकलों में जीने लगते हैं। शायद हमारी जिन्दगी ही अटकलों की मोहताज  हो गयी है। जितनी जल्दी हम अटकलों से जूझते हैं उतनी ही जल्दी यदि हम समस्या से जूझने लगे तो हम सुरक्षित हो सकेंगे। लेकिन हम नहीं कर सकेंगे! अटकलों में हम माहिर है लेकिन समस्या का सामना करने में हम बहुत पीछे हैं। समाज को एकजुट कर लो नहीं तो अटकलें लगाने के लायक भी नहीं रहोगे!

कोने की धूप

Written By: AjitGupta - Feb• 25•20

कल तक जिन आँखों में उदासी थी, आक्रोश भी उन्हीं आँखों से फूट पड़ता था, झुंझलाकर पति-पत्नी दोनों ही कह उठते थे कि नहीं अब बेटे से आस नहीं रखनी, वह पराया हो गया है! लेकिन कल उन आँखों में मुझे चमक दिखायी दे गयी। पति-पत्नी दोनों झील किनारे टहल रहे थे, पत्नी अलग टहल रही थी और पति अलग। पति ने पत्नी के पास आकर कहा कि चलो घर चलते हैं। बेटे का फोन आया है, कहीं बाहर गया था, रात आठ बजे तक बहु और पोते को लेकर लौटेगा। मैंने उससे कह दिया कि घर पर ही भोजन करना, रास्ते का खाना ठीक नहीं होता। बच्चे के लिये दलिया-खिचड़ी बन जाएगी। फिर पत्नी की ओर देखकर बोले की तुम ऐसा करना कि दलिया ही बना लेना उसमें गाजर मटर भी डाल देना, पोते को अच्छा लगेगा। आज उन्हे जाने की जल्दी थी, शीघ्रता से ही ड्राइवर को आदेश दे दिया कि गाड़ी निकालो। मैं उनकी आँखों की चमक को देख रही थी, कल तक ये ही आँखे उदास थी लेकिन आज ममता टपक रही थी। एक ही बेटा है, कल भी वही था और आज भी वही है!
सर्दियों की जाती धूप में हम एक कोने में सिमटी धूप को तलाशते हैं और गर्मी में किसी पेड़ के नीचे मुठ्ठी भर छाँव को। बस एक कोने में धूप मिल जाए और किसी छज्जे के नीचे छाँव मिल जाए तो जीवन में आस बँधी रहती है। सारे दिन की सर्दी की गलन या धूप की तपन से मुक्ति मिल जाती है और यह क्षणिक मुक्ति का सुख सारे दिन की और कभी-कभी ढेर सारे दिनों की पूंजी बन जाती है। माता-पिता शिकायत कर रहे हैं कि बेटा-बहु साथ नहीं रहते, हमें धमकाते भी हैं, बुढ़ापे में जीवन दूभर लग रहा है, क्या करें? निराश दम्पत्ती अपने बीते दिनों की परछाई ढूंढ रहे हैं, सुख के क्षणों को ओने-कोने में तलाश रहे हैं। बेटा-बहु ने साथ रहने से साफ इंकार कर दिया है, सारे ही सम्बन्धों को धता बता दी है। लेकिन एक सम्बन्ध शायद अभी टिमटिमा रहा है! माँ-बाप की रसोई में आज ऐसा कुछ बना है, जिसे बेटा कभी बड़े चाव से खाता था, तो फोन पर अंगुलियाँ मचल ही जाती हैं। बेटा कहता है कि ठीक है, मैं आ रहा हूँ। पत्नी को समझाता है कि माँ ने भोजन बनाया है, बुला रही है। देखो तुम्हें आज भोजन की किट-किट नहीं करनी होगी। पत्नी तैयार हो जाती है और चल देते हैं दोनों। माँ-बाप की ममता निहाल हो जाती है और संतान को भोजन मिल जाता है, बस यही सम्बन्ध टिमटिमाता रहता है। माँ उस बाती में तैल डालती रहती है और दीपक टिमटिमाने लगता है।
यह ममता भी एक तरफा होती है, केवल माता-पिता के दिल को ही घर बनाती है। संतान तो केवल उस झरने में नहाती ही है। झरना तो बहता ही रहता है, नहाने वाली संतान को उस झरने की कब परवाह होती है। यह ममता हमें हर माँ-बाप की आँखों में दिखायी दे जाती है और बेपरवाही की झलक संतानों में। जब संतान बिल्कुल ही मुँह फेर ले तब मुठ्ठी भर छाँव को तलाशने में ही माँ-बाप लगे रहते हैं। जब वह मुठ्ठी भर छाँव माता-पिता की आँखों में दिखायी देती है, तब एक नयी आशा जन्म लेती है और इसी आशा के सहारे रोज ही माता-पिता कभी किसी कोने धूप तलाश लेते हैं और कभी छाँव पा जाते हैं।

जन्मतारीख का गड़बड़झाला!

Written By: AjitGupta - Sep• 29•19

हमारा जमाना भी क्या जमाना था! बचपन में पाँच साल तक घर में ही धमाचौकड़ी करो और फिर कहीं स्कूल की बात माता-पिता को याद आती थी। स्कूल भी सरकारी होते थे और बस घर में कोई भी जाकर प्रवेश करा देता था। हमारे साथ भी यही हुआ और हमारी उम्र के सभी लोगों के साथ कमोबेश यही हुआ है। पिताजी ने एक भाई को कह दिया कि इसका भी स्कूल में नाम लिखा दो, भाई की अंगुली पकड़कर हम चल दिये स्कूल। हेडमास्टर/मास्टरनी ने कहा कि फार्म भरो। फार्म में पूछा गया कि जन्मतारीख क्या है? अब भाई को कहाँ याद की जन्मतारीख क्या है! पहले की तरह हैपी बर्थडे का रिवाज तो था नहीं बस माँ ने बताया कि फला तिथि पर हुई थी। भाई को जो याद आया वह लिखा दिया गया। तारीख भी और वर्ष भी। आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा! हमारी पढ़ाई शुरू हो गयी, एक जन्म तारीख हमारी भी लिख दी गयी, कागजों पर। लेकिन जब दसवीं कक्षा में पहुँचे तब पता लगा कि हम दसवीं की परीक्षा नहीं दे सकते क्योंकि उम्र कम है। पिताजी पढ़ाई के प्रति जागरूक थे तो आनन-फानन में नए कागजात मय जन्मपत्री बनाई गयी और अब हमारी जन्म तारीख बदल गयी।

माँ कहती कि तुम्हारा जन्म देव उठनी ग्यारस को हुआ है और स्कूल कहता कि सितम्बर में हुआ है। जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे थे, जन्मदिन मनाने की प्रथा भी बड़ी हो रही थी। हमें लगता कि हम तो माँ ने जो बताया है उसे ही जन्मदिन मानेंगे लेकिन स्कूल में जो दर्ज था लोग उसी दिन बधाई दे देते। इतना ही नहीं तिथि तो अपनी गति से आती और अंग्रेजी कलेण्डर से आगे-पीछे हो जाती, अब तिथि और तारीख में भी झगड़ा होने लगा! हमने फिर पंचांग को सहारा लिया और असली तारीख ढूंढ ही डाली। वास्तविक जन्मपत्री भी मिल गयी तो तारीख पक्की हो गयी।

लेकिन कठिनाई यह है कि सरकारी कागजों में जन्म तारीख कुछ और है और हमारे मन में कुछ और! सरकारी कागजों की तारीख याद रहती भी नहीं, लेकिन कभी-कभी अचानक से कोई कह देता है कि जन्मदिन की बधाई! तो हम बगलें झांकने लगते हैं कि आज? आपके साथ भी होता ही होगा। कल ऐसा ही हुआ, चुनाव आयोग का बीएलओ आया, उसने कहा कि मतदाता सूची आनलाइन हो रही है तो आप बदलाव कराने हो वे करा सकती हैं, जन्म तारीख की जब बात आयी तो ध्यान आया कि यहाँ तो सरकारी ही लिखवानी है। मैंने बताया कि 30 सितम्बर तो वह युवा एकदम से बोल उठा कि अभी से जन्मदिन की बधाई दे देता हूँ। मैं चौंकी, लेकिन मुझे ध्यान आ गया और उसकी बधाई स्वीकार की।

ऐसी ही एक  बार अमेरिका के इमिग्रेशन ऑफिसर के सामने हुआ। उसने आने का कारण पूछा, मैंने कहा कि बेटे से मिलने आयी हूँ। फिर वह बोला कि ओह आपका जन्मदिन सेलीब्रेट होने वाला है, मैं एक बार तो चौंकी लेकिन दूसरे क्षण ही मुझे ध्यान आ गया और उसकी हाँ में हाँ मिलाकर आ गयी। यदि मुझे तारीख का पता नहीं होता तो शायद वह मुझे वापस भेज देता कि कागजों में गड़बड़ है।

लेकिन ठाट भी हैं कि मैं जब चाहे बधाई स्वीकार कर लेती हूँ, ज्यादा सोचने का नहीं। कौन से जन्मदिन पर तीर मारने हैं! ना तो हम अनोखे लाल हैं जो हमने धरती पर आकर किसी पर अहसान किया है और ना ही हमारे जाने से धरती खाली हो जाएगी! लेकिन जन्मदिन मनाते समय एहसास जन्म लेता है कि चलो एक दिन ही सही, कोई हमें विशेष होने का अवसर तो देता है। नहीं तो हमारे आने की सूचना थाली बजाकर भी नहीं दी गयी थी और ना ही किन्नर आए थे नाचने। लेकिन माँ बहुत खुश थी, पिताजी भी खुश थे। हम उन्हीं की खुशी लेकर बड़े होते रहे और अब अपने जमाने की रीत के कारण दो-तीन जन्मदिन मना लेते हैं। सोच लेते हैं कि क्या कुछ अच्छा कर पाए या यूँ ही बोझ बढ़ाते रहे। अभी बधाई मत देना, अभी जन्मदिन दूर है।