अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

देगची खदबदा रही है, फूटने का इंतजार भर

Written By: AjitGupta - May• 05•19

सेकुलर बिरादरी और मुस्लिम बुद्धिजीवी दोनों ही होच-पोच होने लगे हैं। अन्दर ही अन्दर देगची में ऐसा कुछ पक रहा है जिससे इनकी नींद उड़ी हुई है। महिलाएं आजाद होने की ओर कदम बढ़ाने लगी हैं। कभी तीन तलाक सुर्खियों में आता है तो कभी बुर्का! पुरुषों का अधिपत्य पर पत्थर फेंकना ही बाकी रह गया है बाकि तो उनके खिलाफ बगावत का बिगुल बज ही उठा है। आप कहेंगे कि मैं क्या बिना सिर-पैर की हाँक रही हूँ! लेकिन यह सच है कि महिलाएं संकेत देने लगी हैं। सऊदी अरब जैसे मुल्क में महिलाओं को आजाद किया जा रहा है तो भारत जैसे सेकुलर और हिन्दू बहुसंख्यक देश में तो देगची में से खदबदाने की आवाज आ ही जाएगी! हिन्दू दुनिया में सर्वाधिक स्वतंत्र धर्म है, यहाँ महिलाओं के ऊपर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। क्या कहा कि आप नहीं मानते! यदि प्रतिबन्ध होता तो बॉलीवुड से लेकर राजनैतिक और धार्मिक लोगों के परिवार की युवतियाँ इतनी आसानी से मुस्लिम सम्प्रदाय में निकाह नहीं कर सकती थीं। हर शिक्षित और समृद्ध युवक का निकाह हिन्दू युवती के साथ हुआ है और हो रहा है। ऐसे में मुस्लिम युवती भी बेचैनी महसूस कर रही है, वह भी आजाद होना चाहती है। लेकिन जैसे ही कोई तस्लीमा नसरीन आजादी की ओर बढ़ती हैं, उसपर परम्पराओं की बेड़ी पहनाने का काम ये प्रगतिशील बुद्धिजीवी करने लगते हैं। बॉलीवुड में मुस्लिम भरे पड़े हैं लेकिन जावेद अख्तर सरीखी मानसिकता ही सबकी है। वे सारे ही हिन्दू युवतियों से निकाह करते हैं और मुस्लिम युवतियों को मौलानाओं के रहम पर छोड़ देते हैं। 
लेकिन जैसे ही मोदी ने कहा कि मैं किसी भी महिला के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा। सभी को देश में समान आजादी होगी, बस फिर क्या था, महिलाओं को आशा की किरण दिखायी देने लगी और इन धर्म के आकाओं को अपना वजूद खतरे में पड़ता दिखायी दिया। बस रोज ही कोई ना कोई मुद्दा उछाल दिया जाता है कि हम मुस्लिम सम्प्रदाय की परम्पराओं पर आँच नहीं आने देंगे, फिर चाहे वे परम्पराएं दुनिया में कहीं भी अपना अस्तित्व नहीं बचा पायी हों! जब सारी दुनिया बुरके को प्रतिबंधित करना चाहती है, तब ऐसे में सर्वाधिक प्रगतिशील माने जाने वाले जावेद अख्तर कहते हैं कि बुरका और घूंघट दोनों ही बराबर हैं! अपने सम्प्रदाय की महिला की आजादी की बात इतने बड़े प्रगतिशील को भी नहीं भायी! यदि बुरके की आड़ में आतंकवादी अपना खेल खेल रहे हैं तो समय की मांग को देखते हुए उस पर प्रतिबंध से महिला को भी आजादी मिल जाएगी और आतंक पर भी चोट लगेगी। अब ये प्रगतिशील बुद्धिजीवी महिला को आजादी नहीं देना चाहते या आतंक को चोट नहीं देना चाहते! उन्हें इस बात का उत्तर तो देना ही होगा। तीन तलाक का मुद्दा भी ऐसे ही लोगों ने लटकाया हुआ है। जावेद अख्तर जैसी शख्सियत अपने सम्प्रदाय की वकालात तो करते हैं लेकिन महिलाओं को इंसाफ दिलाना तो दूर उनकी आजादी पर खुलेआम चोट करते हैं। ऐसे लोग डरे हुए लोग हैं, चार विवाह की सौगात जो मिली है इनको! कहीं कुछ पुरुषों का छिन ना जाए, इस बात से दहशत में हैं। 
महिला समझ रही है, बगावत के लिये निकल भी पड़ी है। बस अभी देगची खदबदा रही है, पता नहीं लग रहा है कि देग में क्या पक रहा है? लेकिन बहुत जल्दी पकेगा भी और देगची को फोड़कर बाहर आएगा भी। अन्दर की बात ये लोग सब जानते हैं, इसलिये डरे हुए हैं। दबाकर रखो, मुँह सिल दो, महिला की जुर्रत नहीं होनी चाहिये कि वह जुबान खोल दे। कट्टर मौलाना ही नहीं आजाद ख्याल जावेद को भी बोलना ही पड़ेगा तभी पुरुषों की हैवानियत बच सकेगी। ये लोग महिला पर इस धरती पर तो अत्याचार कर ही रहे हैं और उस धरती पर भी 72 हूरों का ही ख्वाब दिखा रहे हैं! मतलब औरत पर अत्याचार उनकी मानसिकता में पुख्ता जम गया है। जावेद अख्तर हो या फिर कोई और, सब अपने लिये गुलाम रखने की आजादी के लिये मुस्तैद दिखायी दे रहे हैं। लेकिन जितना शोर ये मचाएंगे उतनी ही देगची पर पक रही महिलाओं की आजादी, फूटकर बाहर आएगी। ये जावेद अख्तर के रूप में सम्पूर्ण सम्प्रदाय के आकाओं का डर बाहर निकलकर आ रहा है। बस देखना यह है कि देगची फूटती कब है? जिस दिन देगची फूटेगी, उस दिन जावेद अख्तर जैसे लोग सबसे पहले लहुलुहान होंगे। बस इंतजार करिये। 

रौल विंसी इमेज खत्म करने के अखाड़े में

Written By: AjitGupta - May• 04•19

कौन कहता है कि राहुल गाँधी उर्फ रौल विंसी कमअक्ल हैं? हो भी सकता है कि कमअक्ल हों लेकिन इस गुड्डे में चाबी भरने वाला जरूर अक्लवान है। मतलब यह है कि दोनों में से एक तो चतुर है ही। अब रौल विंसी कह रहे हैं कि मोदी की ताकत उनकी इमेज है, मैं इसे खत्म कर दूंगा! व्यक्ति में क्या रखा है, व्यक्ति तो हम भी है लेकिन हमारी इमेज क्या है? नक्कारखाने में तूती के समान! लेकिन मोदी की इमेज क्या है, सारे विश्व को प्रकाशित करने वाले सूर्य के समान। अब यदि रौल विंसी सूर्य के सामने बादल बनकर खड़े हो जाएं तो क्या सूर्य की इमेज खत्म हो जाएगी? कभी नहीं होगी। लेकिन उनकी सोच ठीक है, वे समझ चुके हैं कि उनकी इमेज बहुत बड़ी है और इसे कम करने के लिये झूठ दर झूठ बोलना ही होगा। वे लगातार झूठ बोल रहे हैं, अपने हर भाषण में निम्न स्तर का झूठ बोल रहे हैं, कभी ना कभी तो पत्थर पर लकीर पड़ेगी ही ना! इस चक्कर में उनकी खुद की इमेज दो कौड़ी की हो गयी है लेकिन बन्दे को चिन्ता नहीं। क्योंकि वह जानता है कि उसकी इमेज तो दौ कौड़ी की ही है तो अब और क्या कम होगी! लेकिन यदि मैंने मोदी की इमेज को दो-चार प्रतिशत भी कम कर दिया तो वाद-विवाद का विषय तो रहेगा ही और मेरे चेले-चामटों को तो भौंकने का मकसद बना ही रहेगा। 
भारत में रामायण और महाभारत ऐसे ग्रन्थ हैं जिनका सानी आजतक कोई नहीं है। लेकिन इनके पात्र राम और कृष्ण साक्षात महापुरुष थे तो इनकी छवि दुनिया में सूर्य जैसी ही थी। अब उस दौर में भी रौल विंसी पैदा हो गये और उनने कहा कि राम और कृष्ण की इतनी बड़ी इमेज होना घातक है, कोई दूसरा धर्म इनके आगे पनपेगा ही नहीं तो इमेज को कम करो। रामायण में सीता की अग्नि परीक्षा और वनवास जोड़ दिया और महाभारत में कृष्ण की रासलीला जोड़ दी। बस हो गया वाद-विवाद का सिलसिला शुरू। व्यक्ति सबसे पहले इमेज पर ही वार करता है। घर में देख लीजिए, कोई अच्छा व्यक्ति है तो सुनने में आ जाएगा कि क्या खाक अच्छा है, उसने ऐसा किया और वैसा किया! कोई बन्दा अच्छा रहना ही नहीं चाहिए। समाज में ऐसे निन्दक लाखों मिल जाएंगे जो बस केवल निन्दा ही करते हैं। जो किसी की इमेज खराब करने निकल पड़ा है, समझो वह शिशुपाल के अतिरिक्त कुछ नहीं है। उसने खुद सिद्ध कर दिया है कि मोदीजी का व्यक्तित्व इतना बड़ा है कि उस पर प्रायोजित प्रहार करने की जरूरत है। कुछ लोग कहते हैं कि नेहरू-गाँधी वंश की इमेज को भी खत्म करने का प्रयास निरन्तर किया गया और परिणाम स्वरूप आज कांग्रेस दूसरों की उड़ती पतंग पर केवल लंगर डाल रही है! 
नेहरू-गाँधी खानदान की इमेज और मोदी की इमेज में अन्तर क्या है? जबरन कब्जाई गयी इमेज और स्वत: बनी इमेज में जो अन्तर होता है बस वही अन्तर दोनों की इमेज में है। नेहरू की अचानक ही लोटरी निकल आती है और वह भारत का चक्रवर्ती सम्राट घोषित हो जाता है, तब नेहरू के संघर्ष की कोई इमेज नहीं थी, बस अंग्रेजों और गाँधी के कारण देश की बागडोर मिल गयी थी। तब प्रारम्भ हुआ था नेहरू के द्वारा सुभाष की इमेज खत्म करने का खेल, सरदार पटेल की इमेज खत्म करने का खेल। देश के सारे ही क्रांतिकारियों की इमेज खत्म करने का खेल। इतिहास में जब भी कमजोर राजा शासन पर बैठा है तब यही खेल शुरू हुआ है। नेहरू ने यह खेल खेला, फिर अचानक ही लाल बहादुर शास्त्री पिक्चर में आ गये। उनकी इमेज बड़ी दिखने लगी। इन्दिरा जी ने फिर इमेज धोने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। मोरारजी देसाई की इमेज बड़ी दिखने लगी तो उनकी खराब करने का खेल खेला गया। यह क्रम लगातार चलता रहा। बीच-बीच में शासक आते गये और नरसिंहाराव जैसे मौनी शासक ने भी अपनी थोड़ी बहुत इमेज बना ली तो उसे भी सोनिया गाँधी ने मिटाने के लिये रबर अपने हाथ में ले लिया। देश में चारों तरफ एक ही नाम सुनाई पड़ता है नेहरू-गाँधी खानदान। 
लेकिन कब तक बौना शासक गद्दी पर बैठकर राज करता रहेगा, कभी ना कभी तो सुदृढ़ शासक आएगा ही। बस इस बार मोदी का नम्बर था। मोदी ने सारे ही रिकोर्ड तोड़ दिये। उनकी इमेज देश से निकलकर विश्व में छा गयी, सारी दुनिया उन्हें मानने लगी। यह चुनाव एकतरफा लगने लगा तो भला अमरबेल सा फलता फूलता गाँधी परिवार कैसे अपनी चाल से विलग हो जाता। उनके पास एक ही चाल है कि दूसरे की इमेज खराब करो, बस तुम्हारा काम चलता रहेगा। रौल विंसी उतर आए अखाड़े में, रोज नये झूठ के साथ। एक टोली बना ली गयी कि मैं एक झूठ उछालूंगा और तुम सारे ही जोर लगाकर हयस्या बोलना। रोज-रोज पत्थर पर रस्सा घिसोगे तो निशान पड़ेगा ही। बस जुट गये हैं रौल विंसी। लेकिन वे यह भूल गये हैं कि इमेज खऱाब करते-करते कब उनका असली चेहरा देश के सामने आ गया! वे कल तक राहुल गाँधी बनकर देश को भ्रमित कर रहे थे लेकिन अचानक ही उनके चेहरे से नकाब उतर गया और वे रौल विंसी के असली रूप में प्रकट हो गये! मोदी की इमेज तो सूर्य जैसी है लेकिन तुम्हारे पूरे खानदान की इमेज तो छद्म आवरण में लिपटी है, कभी दुनिया के एकमात्र नेहरू तुम बन जाते हो और कभी गाँधी बन जाते हो। बहुरूपिया भी संन्यासी की इमेज खत्म करने को चला है! तुम्हारा खेल तो अच्छा है लेकिन मोदी की इमेज तुम्हारे जैसी उधार की नहीं है जो खत्म हो जाए। तुम जितना पत्थर फेंकोगे आगला उन पत्थरों की सीढ़ी बनाता हुआ ऊपर चढ़ता ही जाऐगा। तुम अपना खेल जारी रखो और मोदी आकाश छूने का प्रयोग जारी रखेंगे। तुम्हारे नाम का नकाब तो उतर ही चुका है देखना कहीं नागरिकता का नकाब भी नहीं उतर जाए?

यह कंकर वाली दाल है

Written By: AjitGupta - May• 02•19

मुझ जैसी महिला के लिये हर रोज सुबह एक नयी मुसीबत लेकर आती है, आप पूछेंगे कि ऐसा क्या है जो रोज आती है! सुबह नाश्ते में क्या बनेगा और दिन में खाने में क्या बनेगा, एक चिन्ता तो वाजिब ही है, क्योंकि इस चिन्ता से हर महिला गुजरती है लेकिन मेरी दूसरी चिन्ता भी साथ-साथ ही चलती है कि लेपटॉप पर क्या पकाया जाए और पाठकों को क्या परोसा जाए? राजनीति पर लिखो तो वह कढ़ी जैसी होती है, कब बासी हो जाए और कब बासी कढ़ी में उफान आ जाए? सामाजिक मुद्दे पर क्या लिखो, लोग कहने लगे हैं कि समाज माय फुट! परिवार तो मैं और मेरा बुढ्ढा में ही सिमट गया है! रोज-रोज ना खिचड़ी बनती है और ना ही मटर-पुलाव बनाया जाता है। कल एक मित्र ने लिख दिया कि मुड़-मुड़कर ना देख, मुड़-मुड़कर। अब हमारी उम्र तो मुड़-मुड़कर देखने की ही है, आगे देखते हैं तो पैरों के नीचे से धरती खिसक जाती है तो पीछे देख लेते हैं और कभी हँस देते हैं और कभी दो बूंद आँसू बहा लेते हैं। आज का सच तो यह है कि वास्तविक दुनिया लगातार हम से कुछ ना कुछ छीन रही है और यह फेसबुकीय दुनिया जिसे देख तो सकते हैं लेकिन छू नहीं सकते हैं, बहुत कुछ दे जाती है। कभी ऐसे लगता है कि हम क्रिकेट खेल रहे हैं, बल्ला हमारे हाथ में है, दुनिया के समाचार रूपी बॉल हमारे पास आती है और हम झट से बैट सम्भाल लेते हैं, कभी बॉल एक रन दे जाती है तो कभी चार और कभी पूरे छ। कभी ऐसा भी होता है कि किसी ने बॉल पकड़ ली और जोर से दे मारी विकेट पर। हम आऊट तो नहीं हुए लेकिन सामने वाले का गुस्सा टिप्पणी के रूप में हमारे विकेट को उड़ाने की हिम्मत कर लेता है। कभी प्यार से ही हमें कैच कर बैठता है तो कभी पास खड़ा विकेटकीपर ही हमारी गिल्लियां उड़ा देता है। कभी कोई ताली बजा देता है तो कभी कोई शाबासी दे देता है। कोई ऐसा भी होता है जो मन ही मन खुंदक खाता रहता है कि इसका खेल एक दिन चौपट जरूर करूंगा। 
तो फेसबुकी या सोशल मीडिया की इस दुनिया में आसान कुछ नहीं है। कब अपने ही दूर हो जाते हैं और कब दूर के लोग नजदीक आ जाते हैं। जानते किसे भी नहीं लेकिन लड़ भी पड़ते हैं और लाड़ भी लड़ा लेते हैं। जिन्हें जानते हैं वे तो दूरी बनाकर ही चलते हैं और बेगाने लोग नजदीक आ जाते हैं। हम से कुछ लोग पूछ लेते हैं कि क्या करते हो? हम क्या बताएं कि हम क्या करते हैं! कह देते हैं कि कुछ-कुछ पकाते हैं। लोग समझ लेते हैं कि महिला हैं तो खाना ही पकाती होगी, उन्हें क्या पता कि ये और क्या पका रही हैं! लेकिन उनका काम भी चल गया और हमारा भी। आज भी जब कुछ पकाने का नहीं था तब भी हमने आपको पकाने का सामान ढूंढ ही लिया है। कहते हैं कि जब पकाने को कुछ ना हो तो पत्थर की भी सब्जी बना दो, बस मसाले भरपूर हों तो स्वाद आ ही जाता है। अरे, अरे, मैंने क्या लिख दिया! पत्थर की सब्जी, नहीं बाबा, पत्थर के लड्डू पर तो मोमता दीदी का अधिकार है, भला मैं पत्थर की कोई चीज कैसे पका सकती हूँ! माफ करना। लेकिन एक आराम तो हो गया हम जैसी गृहणियों को, कंकर अगर निकल आए दाल में तो कह देंगे कि मोमता दीदी की है, हमारी नहीं। यह पोस्ट रास्ते से भटकती जा रही है, कभी दाल आ जाती है हमारी बात में तो कभी कंकर। सुना है कि दाल भी 
आजकल फेसबुकियों का पसंदीदा विषय है। हम तो अब परीक्षा देकर बैठे हैं, परिणाम 23 मई को आएगा तो कुछ सूझ नहीं रहा है, बस खाली बैठकर कुछ भी ठेले जा रहे हैं। आप लोग कतई मत पढ़ना। पढ़ लिया तो कंकर भी आप ढूंढ लेना और दाल का निर्णय भी आप ही कर लेना। राम-राम जी।

मेरी अंगुली की स्याही ही मेरा लोकतंत्र है

Written By: AjitGupta - Apr• 29•19

एक जमाना था जब अंगुली पर स्याही का निशान लगने पर मिटाने की जल्दी रहती थी लेकिन एक जमाना यह भी है कि अंगुली मचल रही है, चुनावी स्याही का निशान लगाने को! कल उदयपुर में वोट पड़ेंगे, तब जाकर कहीं अंगुली पर स्याही का पवित्र निशान लगेगा। देश में लोकतंत्र है, इसी बात का तो सबूत है यह निशान! सदियों से मानवता लोकतंत्र के लिये तड़पी है, कभी राजाशाही तो कभी तानाशाही और कभी गुलामी! अब जाकर कहीं लोकतंत्र आया है। विवाहित महिलाओं के पास सिंदूर होता है, बताने को की हम विवाहित हैं और अंगुली की स्याही बताती है कि हम ना केवल स्वतंत्र है अपितु हमारे देश में लोकतंत्र हैं। हमारे पास भी वे सारे ही अधिकार हैं जो कभी एक राजा के पास हुआ करते थे। जब भगवान के मन्दिर जाते हैं तो माथे पर कुमकुम जरुर लगाते हैं, बाहर निकलकर हमारा कुमकुम ही इतराकर बता देता है कि हम मन्दिर गये थे। बस ऐसी ही चुनाव की स्याही है, जो हमारे हाथ में लगती है और इतराती है। कभी मन्दिर जाने का अधिकार छीनकर देख लो, मन कैसे छटपटाता है? राजा रवि वर्मा बहुत बड़े चित्रकार हुए, उन्होंने अपने चित्रों की छपाई करा दी। देवी-देवता के चित्र अब बाजार में मिलने लगे थे। करोड़ों ऐसे लोग थे जिन्हें मन्दिर में प्रवेश नहीं मिला था। उन लोगों ने पहली बार चित्र के माध्यम से भगवान को देखा और अपने घर में लगाकर पूजा की। लोग भाव विह्वल हो रहे थे, अपने जीवन को धन्य मान रहे थे। ऐसे ही जब पहली बार लोगों को राजा की जगह अपना नेता चुनने का अवसर मिला तो लोग भाव विह्वल हो गये थे। वे अपनी अंगुली पर लगी स्याही को देख रहे थे, उसे चूम रहे थे और लोगों को दिखा रहे थे कि देखो हमारे पास भी अब अधिकार है।
जरा सोचिये, यदि मन्दिर प्रवेश का अधिकार सभी को होता तो क्या राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को लोग खरीदते? क्या उन पेंटिंग को अपने घर में लगाकर पूजते? नहीं कभी नहीं करते। सभी को अधिकार मिलते ही अधिकार की चाहत ही समाप्त हो जाती है। जैसे लोकतंत्र मिला और सभी को वोट का अधिकार मिला तो चाहत ही समाप्त हो गयी। कुछ लोग बेपरवाह हो गये, जैसे मन्दिर में नहीं जाना फैशन बन गया है वैसे ही वोट नहीं डालना भी फैशन बन गया है। मन्दिर से दूर हो गये, भगवान से दूर हो गये, हमारी स्लेट कोरी होती गयी और फिर किसी ने कहा कि यहाँ चादर चढ़ा दो तो चादर चढ़ा दी। हमें पता ही नहीं कि हम कहाँ चादर चढ़ा आए। किसी ने कहा कि इस चर्च में जाकर आ जाओ, हम जा आए। हमें पता ही नहीं हम वहाँ क्यों गये थे! बस हमारी स्लेट खाली थी तो हम चले गये और फिर सेकुलर बनकर अपनों का ही कत्ल करने लगे। श्रीलंका का ताजा उदाहरण है हमारे सामने। ऐसे ही वोट डालने में हुआ। वोट नहीं डालना फैशन बन गया, बड़ी ठसक से कहते हैं कि हम वोट नहीं डालते! हम मन्दिर नहीं जाते – हम वोट नहीं डालते। तुम चादर तो चढ़ा आते हो, फिर मन्दिर क्यों नहीं? ठीक है हम वोट डालने जाएंगे लेकिन नोटा दबाकर आएंगे। हमें तुम्हारे लोगों पर विश्वास ही नहीं है, हम तुम्हारी किसी व्यवस्था पर विश्वास ही नहीं रखते। 
मुगल काल में मन्दिर तोड़ने और एक-एक मूर्ति को विध्वंस करने में कितना समय लगा था? कितना विरोध हुआ था? जब भगवान को मानते ही नहीं और मन्दिर जाते ही नहीं तो तोड़ने दो, हमारा क्या जाता है? ऐसे ही जब तानाशाही या राजशाही पुन: लोकतंत्र पर शिकंजा कस लेगी तब कहेंगे कि हमें क्या? कोई नृप हो, हमें का हानि! स्वतंत्रता और परतंत्रता का जिन्हें अन्तर नहीं पता वे वोट देने का मखौल उड़ाते हैं, नोटा दबाने की बात करते हैं। कैसा भी नेता है, तुम्हारे देश का और लोकतंत्र का प्रहरी है, लेकिन यदि लोकतंत्र ही नहीं रहेगा तो चाहे ईस्ट इण्डिया कम्पनी वापस आए या फिर मुगल साम्राज्य? लेकिन कुछ लोगों को अपनी अंगुली पर स्याही का निशान फबता नहीं है, लोकतंत्र का निशान उन्हें जँचता नहीं है। ये शायद गुलाम वंश के लोग हैं, जो हमेशा गुलामी में रहने को ही सुख कहते हैं। लेकिन हमारे लिये तो यह स्याही अमूल्य स्याही है, इसे लगाकर कुमकुम के तिलक जैसा अनुभव करेंगे। स्याही को भगवान को भी दिखाएंगे और कहेंगे कि हे भगवान! हमें और हमारी पीढ़ियों को कभी भी इस स्याही से वंचित मत करना। स्याही ही लोकतंत्र का प्रतीक है। मेरी अंगुली पर लगी स्याही मेरा अभिमान है, मेरा स्वाभिमान है, मेरी स्वतंत्रता है और मेरा लोकतंत्र है। जो भी इस स्याही की इज्जत नहीं करता वह हमारे स्वाभिमान का हन्ता है, हमारे लोकतंत्र का नाशक है। प्रभु इनको सद्बुद्धि देना और हमारी रक्षा करना।

सौगात किस-किस ने भेजी!

Written By: AjitGupta - Apr• 28•19

मैं चोरी-छिपे तुझे सौगात भेजूँ और तू है कि सबको ढोल बजाकर बता दे कि दीदी ने सौगात भेजी है! तू देख, अब मैं तुझे कंकर वाले लड्डू भेजूंगी। 
दीदी नाराज क्यों होती हो? कोई भी सौगात भेजे तो उसे बताने पर तो उसका सम्मान ही बढ़ता है ना! कहीं ऐसा तो नहीं है कि एक तरफ तुम मंचों से गाली देती हो और अन्दर ही अन्दर रिश्ता बनाकर भी रखना चाहती हो! मोदीजी भी गजब करते हैं, क्या जरूरत थी पोल खोलने की! हँसते-हँसते इतनी बड़ी पोल खोल दी। हम तो समझते थे कि मोमता दीदी केवल गाली ही भेजती हैं, हमें क्या पता था कि चुपके-चुपके मिष्ठी दही भी भेजती हैं। गाली गिरोह का सरगना ही सौगात भेज रहा है तो फिर बाकि क्या करते होंगे जी! मोदीजी के घर की तलाशी लेनी चाहिये, उनकी सौगातों पर भी निगाह रखनी चाहिये। राहुलवा क्या भेजता है, जरा यह भी बता ही देते, लगे हाथ! वो कंजरवाल भी कुछ भेजता है या वह शुद्ध फोकटवा ही है! देखो मोदीजी छिपाना मत, लालू ने तो जरूर ही कुछ भेजा होगा, वह बेचारा तो जैल में पड़ा है। अखिलेश क्या भेज सकता है? आम के टोकरे भेज रहा होगा, सुना है उत्तर प्रदेश में आम खूब होता है। शरद पँवार तो एलफेंजो भेजते ही होंगे। मोदीजी एक बात बताओ कि जब आपके दुश्मन इतनी सौगातें भेजते हैं तो मित्र कितनी भेजते होंगे! 
आपके पीएमओ में तो बहार छायी रहती होगी, तभी सारे अधिकारी खुश हैं, कोई बात नहीं 18 घण्टे काम करना पड़ता है तो क्या, कभी रसोगुल्ला तो कभी आम और कभी लीची मिलती ही रहती है। आप तो खिचड़ी खाकर काम चला लेते हैं लेकिन आपका स्टाफ तो मोमता दीदी के रसगुल्ले खा रहा है! लेकिन क्या सच में दीदी अब कंकर के लड्डू बनाकर भेजेगी? चुनाव परिणाम आने के बाद बता ही देना कि क्या सच में कंकर के लड्डू आए या गणपति के मोदक आए? राहुलवा शिकायत कर रहा था कि मोदीजी मुद्दे को भटका रहे हैं। यह क्या बात हुई जो मुद्दे को सौगात पर ले आए? हमारी दादी और हमारे नाना के पास भी बहुत सौगातें आती थी। मेरे पास क्या आता है? यही पूछ रहे हैं ना आप? यही तो मैं कह रहा हूँ कि मोदीजी मुद्दे को भटका रहे हैं। मुझे चिढ़ा रहे हैं कि मेरा कुर्ता फटा हुआ होने के बाद भी मोमता जी ने मुझे कुर्ता नहीं भेजा और आपका मंहगा सूट होने के बाद भी आपको कुर्ता सौगात में मिला! मैं कैसे मुश्किल से दिन निकाल रहा हूँ, यह उन्हें पता नहीं है। भारत में एक बार चार हजार रूपये बैंक से निकाले थे, अब बैंक में रूपये भी नहीं है और कुर्ता भी फटा हआ है, मुझे भाग-भागकर लंदन जाना पड़ता है, पैसों का जुगाड़ करने। इतना कड़की होने के बाद भी कोई सौगात नहीं भेजता। कंजरीवाल का तो रो-रोकर बुरा हाल है कि मुझे तो सौगात के रूप में थप्पड़ ही मिलते हैं, मुझे तो बर्बाद ही कर डाला इस मोदी ने! युवा ब्रिगेड़ के तीसरे रत्न अखिलेश तो अपने पिताजी से ही सौगात नहीं पा रहे, बुआ के आसरे रह रहे हैं और बुआ को तो सारा जगत जानता है कि वहाँ चढ़ावा चढ़ता ही है, प्रसाद तक नहीं बँटता। 
चारों तरफ अफरा-तफरी मची है, कौन-कौन सौगात भेज रहा है, जरा पता लगाओ। वह इमरान पाकिस्तान में बैठकर कोई खेल तो नहीं खेल रहा है। साला यहाँ कौम के नाम पर उकसा रहा है और अन्दर ही अन्दर डर के मारे सौगात भेज रहा हो! सऊदी अरब वाले तो मन्दिर ही बनवा के दे रहे हैं, सौगात में! चीन ने अरूणाचल से हाथ खेंच लिये, कश्मीर से भी हरे झण्डे उतार लिये। यह हो क्या रहा है? सही कह रहा है राहुलवा कि चुनाव मुद्दों से भटक गया है! यह भी कोई चुनाव है! जब सारे ही प्रतिद्वंद्वी सौगात भेज रहे हैं, तो फिर कैसा चुनाव! राहुलवा ने अपनी बहन से कहा कि हट जा पगली तू भी मैदान से। हमने दस साल तक खेत के बेजूबान बिजुका को खड़ा रखकर पीएमओ चलाया है तो काशी में भी एक बिजुका खड़ा कर देंगे। लेकिन तू अपनी नाक बचा। बहना बोली की भाई मैं तो पतली गली से सरक लूंगी लेकिन तू अमेठी से कैसे सरकेगा? वहाँ तो शेरनी ताक में बैठी है। थोड़ी सौगात तू भी भेज दे ना! कुछ राहत तो मिले। वायनाड़ से भी पता नहीं क्या होगा? वहाँ भी कौन-कौन और क्या-क्या सौगात भेज रहे होंगे। चल माँ के पास चलते हैं। राहुलवा चीखकर बोला कि क्या होगा माँ के पास जाने से! वह तो कहेगी ही ना कि मैं तो पहले ही कह रही थी कि सत्ता जहर है, तू सौगात समझ बैठा! न हो तो चल नानी के घर ही चलते हैं। रूक जा, कुछ दिन बाद तो जाना ही है। देश में जब न्याय बँट रहा होगा तब चलेंगे।