अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

भारत की नाक तेरी जय हो

Written By: AjitGupta - Apr• 27•19

भारत की नाक और दादी की नाक का संघर्ष होते-होते रह गया! नाक को नापने जितना भी समय नहीं दिया गया! हमने तो अरमान पाल रखे थे कि दो नाकों का महायुद्ध होगा और भारत की नाक भारी पड़ेगी या फिर दादी की नाक! लेकिन हाय री किस्मत ऐसा कुछ नहीं हुआ! दिल के अरमां आँसुओं में बह गये! कल वाराणसी में भारत की नाक का दम-खम देखा जा सकता था, बस उसी को देखकर दादी की नाक कहीं पल्लू में छिप गयी। नाक को बचाना लाजिमी हो गया, नाक है तो सबकुछ है नाक नहीं तो कुछ नहीं। आज बचा लो, कल फिर काम आ जाएगी। लेकिन यदि आज ही कट गयी तो कल क्या रहेगी! नाक बड़ी चीज होती है, वाराणसी में तो गंगा किनारे खड़े होकर नापने का काम किया गया। गंगा में नाव में बैठकर नाक नापने का अग्रिम काम किया गया। कहा गया कि मेरी नाक खानदानी है, रईस है, यह माँ पर नहीं जाकर सीधे दादी पर चले गयी है। हनुमानजी की पूछ की तरह दादी की नाक ने लम्बा होना शुरू किया लेकिन वह एकाध फुट पर ही अटक गयी। एक कोने में दुबक कर देखने लगी कि मेरी नाक भला कहाँ अटक गयी है? देखती क्या है कि भारत की नाक श्रीकृष्ण के मुख की तरह विशाल रूप ले रही है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समा जाए इतना विस्तार ले रही है। पूरी काशी की नाक इसी नाक में विलीन हो गयी है। दादी की नाक धीरे से खिसक ली। बोली कि नहीं जाऊंगी अखाड़े में! कुछ लोगों ने धकेलने की कोशिश भी की लेकिन वह तो अड़ गयी, बोली की ज्यादा परेशान करोगे तो अय्यर की तरह गायब हो जाऊँगी लेकिन अखाड़े में तो नहीं उतरूंगी। 
अखाड़े में उतरने में एक और कठिनाई आ गयी। अखाड़े के नियमानुसार अपनी कद-काठी का हिसाब भी देने पड़ता है, जिससे बराबर की लड़ाई हो। नाक बोल उठी कि हम परदे वाले खानदान से हैं, भला अपनी नाप कैसे दे सकते हैं! हमारी माँ विदेश गयी थीं, हमने अभी तक नहीं बताया कि क्यों गयी थी, कहाँ गयी थी और कहाँ रही थी! मेरे पति व्यापार करते हैं, कल तो तुम पूछ लोगों की कितना कमाते हैं, भला यह कोई बात हुई। हम परदे वाले खानदान से हैं और तुम हमें बेपर्दा करना चाहते हो! नहीं हम नहीं लड़ेंगे। अखाड़ेवालों का भारी नुकसान हो रहा है, वे बोले कि ऐसा करते हैं कि एक बकरी बांध देते हैं, उसे देखकर शेर जरूर आएगा, शिकार करने। आनन-फानन में एक बकरी ढूंढ ली गयी और बाँध दिया अखाड़े के पास। चारो ओर मुनादी घुमा दी कि होशियार, सावधान, जैसे ही बकरी का शिकार करने शेर आए इशारा कर देना हम पर्दे की ओट से शेर का शिकार कर लेंगे और फिर हमारी नाक जीत जाएगी। लेकिन दादी की नाक तो इस पर भी तैयार नहीं हुई। बेचारी बकरी पेड़ से बंध गयी है, मिमिया रही है लेकिन उसके सामने एक पुली चारा डालने वाला भी कोई नहीं है। शेर तो पता नहीं कब आएगा बस डर है कि बकरी पहले ही भूख से दम ना तोड़ दे। दादी की नाक तो पतली गली से निकल गयी लेकिन बेचारी बकरी मिमिया रही है, बचा लो, बचा लो। दादी की नाक भाग रही है, उसे रोकने को लोग भाग रहे हैं, काशी खाली हो रही है, भारत की नाक विस्तार ले रही है। सारी दुनिया कह रही है, देखो भारत की नाक को देखो। इसी नाक से जाना जाएगा भारत। जय हो तेरी भारत की नाक, तेरी जय हो- जय हो।

राजनीति से भी बाहर आ जाओ ना

Written By: AjitGupta - Apr• 26•19

टीवी रूम में रिमोट के लिये हर घर में उठापटक मची रहती है, घर के मर्द के पास रिमोट ना हो तो मानो मर्दानगी ही रुक्सत हो गयी हो, ऐसे में घर की स्त्री भी किसी ना किसी बहाने आँख दिखाकर रिमोट पर कब्जा करती दिख ही जाती है, बच्चे तो रिमोट पर अपना हक ही जमा बैठते हैं और नहीं मिले तो ऐसा कोहराम मचा देते हैं कि फिर कैसा टीवी और कैसे चैनल? लेकिन कल मैं हतप्रभ रह गयी, इतनी हतप्रभ हुई की ईवीएम मशीन तक जा पहुँची। सोचने लगी कि जब रिमोट किसी ओर से संचालित होता है तो ईवीएम भी हो सकती है! हुआ यूँ कि मेरा टाट स्काई का रिमोट ढंग से काम नहीं कर रहा था, इंस्टाल करने वाले बन्दे ने टीवी और सेटअप बॉक्स के रिमोट को पेयर बना दिया था और हम एक ही रिमोट से काम चला रहे थे। लेकिन अचानक ही यह गठबन्धन टूट गया। कहाँ तो चुनावी मौसम में गठबन्धन हो रहे हैं लेकिन मेरे रिमोट का टूट गया। कई महिनों से टीवी का रिमोट अल्मारी में बन्द पड़ा ऑक्सीजन की तलाश में था तो उसे नसीब हो गयी। लेकिन केवल ऑन-ऑफ का मसला नहीं था, सेटअप बाक्स का रिमोट तो ठुमक-ठुमक कर चलने लगा, शत्रुघ्न सिन्हा की तरह हर पल नाराज रहने लगा, कभी चैनल ना बदले जाएं और कभी वोल्यूम बन्द हो जाए। गूगल के सारे प्रयोग भी फैल हो गये। आखिर मौहल्ले में स्थित टाट स्काई के डीलर से सहायता की अपील की। उसने दोनों रिमोट को पास बुलाया, बातचीत कराने की कोशिश की लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी, लगा कि दिल्ली में केजरीवाल और कांग्रेस का मेल-मिलाप नहीं हो सकता। डीलर ने हाथ झटक लिये। अब सोचा कि टाटा स्काई हेल्प का सहारा लिया जाए। हेल्प का फोन लग गया और बन्दे से बात होने लगी।
बन्दा बोल रहा था कि मैं चेक करके बताता हूँ, अरे रिमोट तो मेरे हाथ में है, भला तू कैसे चेक कर सकेगा! खैर दीमाग को शान्त किया और वह बोलता गया और मैं सुनती गयी। उसने भी दोनों रिमोट का मेल-मिलाप कराने का अथक प्रयास किया, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। अब बोला की मैंने आपकी शिकायत नोट कर ली है और शीघ्र ही आपको एक फोन आएगा और समस्या सुलझ जाएगी। मेसेज भी आ गया कि शिकायत बुक हो गयी है। लेकिन बुद्धीजीवी चुपचाप नहीं बैठ सकता, उसे लगता है कि मैं क्यों नहीं ठीक कर सकता! इस बार मैंने यू-ट्यूब खोली और एक वीडियो मिल गया, कैसे पेयर बनाये। दिखाया जा रहा था कि दोनों रिमोट को आमने-सामने बिठाएं फिर यह बटन दबाये और फिर यह। लो अब बन गया पेयर। सप्तपदी की रस्म पूरी हुई लेकिन मेरे रिमोट को यह आर्यसमाजी विवाह पसन्द नहीं आया और उसने फिर नकार दिया। मैं भी हार-थककर चुप हो गयी। कुछ देर में ही फिर एक मेसेज आया कि आपकी समस्या निवारण के लिये शीघ्र ही आपसे फोन पर वार्ता की जाएगी। एकाध घण्टा बीत गया, हमारे यहाँ भी रिमोट को हाथ में पकड़कर अधिकार रखने की आदत नेपथ्य में चले गयी थी। पतिदेव को तो समझ ही नहीं आ रहा था कि किस रिमोट से टीवी चलेगा और किस से बन्द होगा तो हमेशा मर्दानगी दिखाने का मौका नहीं चूकने वाले आज रिमोट से दूर ही थे। लेकिन कुल मिलाकर दो-तीन घण्टे बाद आदत से लाचार मैंने जब रिमोट का मुआयना किया तो वह चल उठा, मैं भी उछलकर बैठ गयी कि अरे यह चल गया! मैंने सोचा कि मेरे प्रयोग से ही चला होगा लेकिन तभी फोन के मेसेज पर निगाह पड़ी, उसमें मेसेज था कि आपकी समस्या का निवारण कर दिया गया है। लो कर लो बात रिमोट मेरा, लेकिन संचालित हो रहा है टाटा स्काई को दफ्तर से! हम घर में बिना बात ही झगड़ते हैं कि रिमोट मेरे पास या तेरे पास, लेकिन यह मरा तो किसी और के पास है। न जाने कितना कुछ है दुनिया में जिनके लिये हम हर पल लड़ते हैं लेकिन हमारे हाथ खाली हैं, डोर तो न जाने किसके पास है! हम रंगमंच की कठपुतली हैं जी, डोर तो विधाता के पास ही है। आपने भी न जाने क्या सोचकर यहाँ तक पढ़ लिया क्योंकि मेरे लेखन की डोर भी आपके पास ही है, आप पढ़ेंगे तो ही मैं लिख सकूंगी नहीं तो क्या रखा है इस लेखन में। और हाँ, वोट जरूर डालना।

तेरा अब न्याय होगा

Written By: AjitGupta - Apr• 21•19

कोई किसी महिला से पूछे कि तेरा नाम क्या है? तेरा उपनाम क्या है? तेरा देश क्या है? तो महिला सोचने का समय लेगी। क्यों लेगी! इसलिये लेगी कि विवाह के बाद उसका कहीं नाम बदल जाता है, उपनाम तो बदल ही जाती है और कभी देश भी बदल जाता है। इसलिये वह सोचती है कि कौन सा नाम बताऊँ, कौन सा उपनाम बताऊँ और कौन सा देश बताऊँ! लेकिन कल अचानक ही एक पुरुष की बेबसी देखी, अरे पुरुष होकर भी ऐसी बेबसी से गुजर रहा है! मन को थोड़ा सुकून भी मिला कि चलो, पुरुषों के पास भी ऐसी बेबसी आ जाती है, हम तो सोचते थे कि मासिक धर्म की तरह यह समस्या केवल हमारी ही है। सम्भ्रान्त राजपुरुष के सामने यह प्रश्न सुरसा के मुँह की तरह विकराल रूप लेने लगा, बता तेरा नाम क्या है? बता तेरा उपनाम क्या है? बता तेरा देश क्या है? पुरुष ने सीना चौड़ा नहीं किया अपितु सिकुड़ लिया, मिमियां कर बोला की दो दिन दो, सोचकर बताता हूँ। अबे इसमें सोचना क्या है, तेरी शादी नहीं हुई जो कह दे कि घर जमाई हूँ और नाम-उपनाम-देश सब बदल गया है! ना तो किसी के गोद गया है जैसे तेरे दादा ने गोद का उपनाम ले लिया था! फिर समस्या क्या है?

समस्या भारी है, कौन देश का तू है, तेरा नाम भी उसी देश का है, तेरी शिक्षा भी उसी देश की है लेकिन तू राजनीति धमाचौकड़ी इस देश में कर रहा है! महिने में दस दिन इस देश में और बीस दिन अपने देश में रहता है लेकिन तेरा सुरक्षा कवच इतना मजबूत है कि कोई तुझ से प्रश्न नहीं पूछता! जैसे ही तुझसे किसी ने कुछ पूछा तेरे पालतू सारे कुत्ते एक साथ भौंकने लगते हैं और उस शोर में प्रश्न दब जाता है। तू ने आजतक कई चुनाव भी लड़ लिये, अपनी शिक्षा का दस्तावेज भी दिखाया ही होगा लेकिन किसी ने नहीं पूछा कि भारत में तेरा नाम और दस्तावेजों में तेरे नाम में अन्तर क्यों हैं? हमारे बच्चे भी विदेश पढ़े हैं लेकिन उनका एक ही नाम है, फिर क्या वे दूसरे नाम से यहाँ चुनाव लड़ सकते हैं। दोहरी नागरिकता से जब वोट तक नहीं डाल सकते तो तू तो चुनाव लड़ भी रहा है और प्रधानमंत्री तक के सपने देख रहा है। फिर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि इस देश का प्रधानमंत्री चोर है। अपनी चोरी छिपाने को तू देवता को चोर कह रहा है! जैसे एक लम्पट पति अपनी सती-सावित्री पत्नी को कुल्टा कहता है वैसा ही आचरण तेरा है। तेरे पास भौंकने वाले कुत्ते हैं तो तू कुछ भी करेगा! नहीं, अब ऐसे नहीं चलेगा। देश को बताना ही होगा कि तेरा नाम क्या है? तेरी असलियत क्या है? यदि इस बार भी तू बच निकला तो समझ ले कि गेंद प्रकृति के पास जाएगी और फिर प्रकृति का न्याय होगा। क्योंकि शाश्वत प्रकृति ही है, ना संस्कृति शाश्वत है और ना ही विकृति शाश्वत है। किसी भी झंझावात में सबकुछ विनष्ट हो जाएगा बस मूल स्वरूप में प्रकृति ही शेष रहेगी। बहुरूपिये का जीवन ज्यादा दिन नहीं टिकता, फिर तूने तो ऐसे व्यक्ति पर कीचड़ उछाला है जो पूजनीय  है। साध्वी का उदाहरण भी देख ले, किरकिरे की कैसी किरकिरी हो रही है। दिग्गी की भी और तेरी भी ऐसी मिट्टी पलीद होगी की तू ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। जब कोई किसी एक व्यक्ति पर कीचड़ उछालता है तो प्रकृति थोड़ा रुष्ट होती है लेकिन जब कोई किसी कौम को ही बदनाम करने की ठान लेता है तब जलजला आने लगता है, अब जलजले का समय शुरू हो गया है। इस जलजले में तेरा न्याय भी होगा और दिग्गी समेत तेरे सारे भौंकने वालों का न्याय होगा। आखिर समय कब तक तेरा साथ देगा। तू ने पाप ही इतने कर डाले हैं कि अब न्याय होकर रहेगा। तू न्याय का ठेकेदार बनना चाहता है ना, अब देख ना तेरा न्याय क्या होगा!

अब न्याय होगा?

Written By: AjitGupta - Apr• 18•19

किसी ने न्याय को देखा है क्या? विकास को भी तो नहीं देखा था ना! प्रजा के किसी अदने से बंदे ने राजा को ललकार दिया, तत्काल सर कलम कर दिया गया, राजा ने कहा कि हो गया न्याय! न्याय का निर्धारण राजा की पसन्द से होता है। जो राजा के हित में हो बस वही न्याय है। 1975 याद है ना, शायद नौजवानों को खबर नहीं लेकिन हम जैसे लोगों के तो दिलों में बसा है, भला उस न्याय को कैसे भूल सकते हैं! न्यायाधीश ने न्याय किया कि तात्कालीन प्रधानमंत्री ने चुनाव गलत तरीकों से जीता है लेकिन प्रधानमंत्री तो खुद को राजा मानती थी तो आपातकाल लगाकर, सारे विपक्ष को जैलों में ठूसकर, मीडिया की बोलती बन्द कर के न्याय हुआ। तब भी कहा गया कि अब न्याय हुआ। 1984 भी याद होगा! पेड़ के गिरने से धरती हिल जाती है और राजा की मृत्यु से निरपराध कौम का सरेआम कत्लेआम भी न्याय ही कहलाया था, तब भी कहा गया था कि अब न्याय हुआ। न्याय के कितने ही किस्से हैं जब एक वंश ने अपने हित में न्याय किया। लेकिन न्याय करते-करते प्रजा को समझ आने लगा कि यह न्याय एकतरफा है। जैसे ही प्रजा की समझ बढ़ी, वंश का शासन नेपथ्य में चले गया। अब फिर चुनाव आया है और नारा दिया है – अब न्याय होगा! मुझे एक-एक कर सारे ही न्याय याद आने लगे हैं। सीताराम केसरी के प्रति भी न्याय याद आ रहा है, मेनका गाँधी के प्रति भी न्याय याद आ रहा है, लाल बहादुर शास्त्री के प्रति भी न्याय याद आ रहा है। सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, नरसिंह राव, सुभाष चन्द्र बोस, सावरकर न जाने कितने नाम है वे सारे ही न्याय याद आ रहे हैं।

खुली चेतावनी दी गयी है, अब न्याय होगा! खुली चेतावनी दी जा रही है कि एक सम्प्रदाय एकत्र हो जाए और बहुसंख्यक समाज को न्याय दें सकें। पाकिस्तान से हाथ मिलाया जा रहा है, चीन के भी फेरे लगाये जा रहे हैं, बस इसी न्याय के लिये। आतंकवाद को पनाह दी जा रही है, मासूम प्रजा को न्याय देने के लिये। कभी चायवाला तो कभी दलित तो कभी महिला को निशाना बनाया जा रहा है कि सत्ता पर इनकी जुर्रत कैसे हुई बैठने की, अब न्याय होगा। खुले आम कहा गया कि देश को सेवक नहीं शासक चाहिये क्योंकि शासक ही तो न्याय कर सकता है। सैना को भी औकात बतायी जा रही है कि हम जैसे शासकों के साथ रहो, जो हम चाहते हैं उसी  पक्ष में खड़े रहो, हम ही तय करेंगे कि देश की सीमा क्या हो! हमने ही पहले देश की सीमा तय की थी, हमने ही पाकिस्तान बनाया था, हम चाहेंगे कि कश्मीर भी अलग देश बने इसलिये सैना को हमारे ही पक्ष में खड़ा रहना है, अब सैना का न्याय भी हम करेंगे।

अब न्याय होगा! प्रजा को समझ लेना है कि कैसा न्याय होगा! लोकतंत्र के खोल में राजाशाही का खेल होगा। राजवंश पूर्णतया सुरक्षित रह सके, इसके लिये न्याय होगा। राजवंश एक ही समय में ब्राहण बने या मुस्लिम बने या फिर ईसाई, किसी को प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं होगा, यदि कोई पूछेगा तो फिर न्याय होगा। जनता को हर पल अनुभव कराया जाएगा कि वह गुलाम प्रजा है, उसे चौबीस घण्टे बिजली और पानी की जरूरत नहीं है, उसे गुलाम प्रजा की तरह रहना सीखना ही होगा, नहीं तो न्याय होगा। सबके लिये विकास की बात करने वालों के प्रति न्याय होगा। हमारे वंश के चिरागों को ही प्रथम परिवार मानना होगा, नहीं तो न्याय होगा। हम शासक हैं यह बात सम्पूर्ण जनता को माननी ही होगी, नहीं तो न्याय होगा। राजा के दरबारी खुश हैं कि अब हमें भी लूट का माल मिलेगा, झूठन मिलेगी, गाड़ी में ना सही, गाडी के पीछे लटकने का अवसर मिलेगा, तो दरबारी खुश हैं। वे भी चिल्ला रहे हैं कि अब न्याय होगा। सब खुश हो रहे हैं, नाच रहे हैं कि अब न्याय होगा! हम राजस्थान में बैठकर घण्टों जाती बिजली को देखकर समझ गये हैं कि अब न्याय हो रहा है। हमें समझ आने लगा है कि प्रजा क्या होती है और राजा क्या होता है। हम भी अब न्याय होगा के मंत्र को दोहराने लगे हैं और खुद को गुलाम बनाने की ओर मुड़ने लगे हैं। चुनाव के नतीजे बताएंगे कि अब न्याय होगा या फिर जनता सबल बनकर राजा को सेवक धर्म का स्मरण कराती रहेगी!

इस बार वोट पकौड़ों के नाम

Written By: AjitGupta - Apr• 05•19

कहावत है कि दिल्ली दिलवालों की है, जब दिलवालों की ही है तो चटपटी होना लाजमी है। चटपटी कहते ही चाट याद आती है और चाट के नाम से ही मुँह में पानी आता है। मुँह में पानी आता है मतलब आपकी स्वाद ग्रन्थियाँ सक्रिय हो रही हैं। स्वाद ग्रन्थियाँ सक्रिय होती है तो जो भी खाया जाता है उसका पाचन आसान हो जाता है। अब इतिहास देखते हैं – दिल्ली साठ बार उजड़ी और इतनी बार ही बसी। कल एपिक चैनल देखते हुए बताया गया कि जब शाहजहाँ ने वापस दिल्ली को बसाया तो एक मंत्री ने उन्हें कहा कि आपने दिल्ली को बसा तो दिया है लेकिन यमुना का पानी तो पेट के लिये बहुत भारी है। अब! कोई उपाय शेष नहीं था, दिल्ली तो बस चुकी थी, लोगों के पेट भी खराब होने लगे थे। तब अनुभवी लोगों ने कहा कि यमुना के पानी से बचाव का एक तरीका है, हमारे खाने में चटपटे मसालों का समावेश होना चाहिये साथ में ढेर सारा घी। बस फिर क्या था, खट्टी-मीठी चटनियाँ बनने लगी, सब्जियाँ घी में बनने लगी। धीरे-धीरे चाट का स्वाद दिल्लीवालों की जुबान पर चढ़ने लगा। पुरानी दिल्ली चाटवालों से भर गयी, खोमचेवाले आबाद हो गये। यहाँ तक की पराँठेवाली गली तक बन गयी। आलू के पकौड़े, गोभी के पकौड़े, प्याज के पकौड़े, पनीर के पकौड़े, बस पकौड़े ही पकौड़े! हर खोमचेवाला कहता कि मेरी चाट नायाब है, बात सच भी थी क्योंकि सभी की चाट में कुछ ना कुछ अलग था। गली-गली में खोमचें वाले बिछ गये, जहाँ देखो वहाँ ठेले सज गये।
शाहजहाँ के दरबार में यमुनाजी के पानी को लेकर जो चिन्ता थी वह दूर हो गयी थी। लोगों को चाट का स्वाद इतना भा गया था कि अब बिना चाट के गुजारा ना हो। आज की दुनिया में जहाँ पानी के शुद्धिकरण के कई उपाय हैं लेकिन चाट को अपने जीवन के हटाने का कोई उपाय शेष नहीं है। दिल्ली जाइए, आप कितना भी कह दें कि सुबह नाश्ते में पकौड़े नहीं चाहिये लेकिन पकौड़े तो बनेगें ही और आप खाएंगे ही। लेकिन एक दिन अचानक ही एक बात हवा में तैरने लगी कि पकौड़े बनाना तो काम-धंधे की श्रेणी में ही नहीं आता। दिल्ली का वजूद तो पकौड़े के कारण ही है, यहाँ न जाने कितने परिवार इसी धंधे में करोड़पति हो गये, अब कहा गया कि यह तो धंधा ही नहीं है। तो धंधा क्या होता है सिरफिरे भाइयों? राजा द्वारा बांटी गयी मुफ्त की खैरात पर पलने का नाम धंधा है जो अभी तुम्हारे आका ने घोषित किया है कि मेरा राज आएगा तो सभी को खैरात मिलेगी। अरे छोड़िये राजनीति की बात, कहाँ चाट का मजा आ रहा था और कहाँ पकौड़े याद आ गये और पकौड़े याद आते ही लोगों की जहर बुझी बातो याद आ गयी। बस जुबान का स्वाद ही खराब हो गया। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, एक रेस्ट्रा में गये, स्टार्टर देखे, लेकिन कोई भी पसन्द का नहीं था। पूछा कि पकौड़े टाइप कुछ है क्या? मासूम सा मुँह बनाकर मना कर दिया, मुझे लगा कि यह कमबख्त भी पकौड़े को लेकर दुश्मनी निकालने वालों में से दिखता है! अब भारत में तो पकौड़े ही चलते हैं, भाँत-भाँत के पकौड़े, हर मौसम में खिला लो, पसीने बहते जाएंगे लेकिन पकौड़े के लिये कोई मना नहीं करेगा। भारी पानी की ऐसी की तैसी, पकौड़े के साथ खट्टी-मीठी चटनी तो पेट सही ही सही। 
अब राजनीति करने वालों देख लो तुम्हारे आका कितने ज्ञानवान हैं! जिस दिल्ली की बुनियाद ही चाट-पकौड़े पर पड़ी हो, वहाँ यह कहना कि पकौड़े बनाना भी कोई धंधा होता है, है ना बेवकूफी की पराकाष्ठा! लेकिन चुनाव आ गये हैं, ऐसे अक्ल के पैदल लोगों को जवाब देने का समय आ गया है। पकौड़े खाइए, पकौड़े को धंधा बनाइए और जो पकौड़ों की खिल्ली उड़ाए उसे लात मारिये। समझ गये ना। दिल्ली दिलवालों की ही है, दिलजलों की नहीं है। यमुनाजी का पानी पीना है तो पकौड़े खाना ही होगा। इस बार वोट पकौड़ों के नाम।