अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

चूहा भाग – बिल्ली आयी

Written By: AjitGupta - Mar• 27•19

खबरे आ रही हैं कि लोग भाग रहे हैं, जहाँ सींग समाए वहीं भाग रहे हैं। उत्तर से दक्षिण तक की दौड़ लगाने की योजना है, बस छिपने की जगह मिल जाए। चूहे के पीछे बिल्ली पड़ी है, बिल्ली झपट्टा मारने को तैयार है। चूहे के गाँव में पहले कभी बिल्ली नहीं आयी, चूहा निर्भीक होकर घूम रहा था, अचानक कि एक बिल्ली ने म्याऊँ-म्याऊँ का राग अलाप दिया, चूहे को लगा कि बिल में दुबकना ही ठीक है। लेकिन चूहा हमेशा दूसरे के खेत में ही कुतर-कुतर करता है, खुद का उसके पास कुछ नहीं है तो खेत ढूंढने के लिये दौड़ लगा रहा है। सुना है सुदूर दक्षिण में उसकी बिरादरी वालों की भरमार है तो अनाज मिलता रहेगा और वहाँ आसानी से फुदकता भी रहेगा। वहाँ भी पैर नहीं जमे तो समुद्र किनारे से भागना भी आसान रहेगा। लोग पूछने लगे हैं कि चौकीदार चोर है तो तू क्यों भाग रहा है! चौकीदार और चोर की बात छोड़ो, अभी तो बिल्ली पीछे दौड़ रही है, चूहा भागते-भागते हाँफ रहा है। 
चौकीदार खम्ब गाड़कर खड़ा हो गया है, काशी में खम्ब गड़ा है, किसी की हिम्मत नहीं की चौकीदार की लाठी के पास भी पहुँच जाए। चोरों की टोली से कहा कि जाओ चौकीदार से मुकाबला करो, उसे भ्रमित करो और घुस जाओ घर के अन्दर। लेकिन सारे ही चोर पीछे हट गये कि अंगद का पैर उखाड़ने की हमारी औकात नहीं, किसी को खाँसी आ गयी और किसी को हाँसी आ गयी। सभी की माया दाँव पर लगी है तो ममता भी किनारे बैठ गयी है। चोरों का खानदानी कुनबा भी मारा-मारा फिर रहा है। कोई गंगाजी में डुबकी लगा रहा है तो कोई छिप-छिपकर हनुमान चालीसा पढ़ रहा है। जमानती चोर को डर है कि जमानत ही रद्द ना हो जाए। चारों तरफ शोर है, भागो – भागो – भागो। अरब सागर तक भागो। 
एक चोर बोल रहा है कि यह चौकादार नहीं कोई तांत्रिक है, जादू-टोना कर दिया है सभी पर। कृष्ण बांसुरी बजा रहे हैं और उनके पीछे सारे चूहे सम्मोहित से जा रहे हैं और अपने आप समुद्र में गिर रहे हैं। कैसा अद्भुत दृश्य है! प्रमुख चौकीदार ने हर चौकी पर चौकीदार तैनात कर दिये हैं, फिर चाहे सीमा की चौकी हो या फिर थाणे की चौकी। चारों ओर चौकीदार ही चौकीदार दिख रहे हैं, चोर को घुसने की कहीं जगह नहीं मिल रही! चोरों की रानी ने नाव की सवारी कर ली कि गंगा मैया के सहारे से घर में घुस जाऊंगी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली अब खुद चोरों का सरदार समुद्र किनारे से घुसपैठ करने की सोच रहा है। लोग बता रहे हैं कि वहाँ उसकी बिरादरी वालों का हुजूम है, जैसे-तैसे उसे घर में घुसा ही देंगे। कोई बात नहीं, घर में आने से क्या होगा, बिल्ली को वहाँ पर भी रहेगी! बहुत चोर-चोर खेल लिया तूने, अब खुद ही भागा-भागा फिर रहा है। अब सभी ताली बजा रहे हैं, कह रहे हैं कि भाग – भाग – भाग, देख तेरे पीछे बिल्ली आ रही है। अब देखना है कि कल तक चोर-सिपाही का खेल खेला जा रहा था लेकिन अब चूहे और बिल्ली का खेल बन गया है। बिल्ली ने चूहे को भगा दिया है, वह उसके बिल के पास आसन डालकर बैठ गयी है। गाँव वालो भी बिल्ली को दूध-मलाई खिला रहे हैं, कह रहे हैं कि इस चूहे ने हमारी फसल बर्बाद की है। सारे खेतों को खोद डाला है, सारा ही गाँव उजाड़ सा पड़ा है। देखते हैं कि इस चूहे-बिल्ली की लड़ाई में किस की जीत होती है, बस देखते रहिये इस भागमभाग का नतीजा क्या होगा! 

मोदी ने वास्तव में बर्बाद कर दिया

Written By: AjitGupta - Mar• 23•19

दिल बार-बार रस्सी तोड़कर भागने की कोशिश कर रहा है, कभी कहता है कि यह लिख और कभी कहता है कि वह लिख! चारों तरफ विषय बिखरे पड़े हैं लेकिन सारी मशक्कत बेकार सी लग रही है। ऐसा लग रहा है जैसे किसी भरे पेट वाले के सामने भोजन परोसने का प्रयास किया जा रहा हो। राजनीति में लोग आकंठ डूबे हैं, चारों तरफ से एक ही आवाज आ रही है कि हमें “सबका साथ – सबका विकास” ही करना है। लेकिन दूसरी तरफ से एक आवाज और आ रही है कि हम तुम्हारे माई-बाप रहे हैं, हमें फिर से देश का माई-बाप बनाओ। लोग तराजू के पलड़े में झूल रहे हैं, माई-बाप के टुकड़ों पर पलें या सबका साथ-सबका विकास के साथ आत्मनिर्भर बने? एक मन करता है कि अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काज, दास मलूका कह गये, सबके दाता राम, इस बात पर चलकर माई-बाप के टुकड़ों पर पलने में क्या बुराई है! इस कहावत में राम की जगह अल्लाह लगाने को भी तैयार हैं, लेकिन मन के एक कोने से दबी सी आवाज आती है कि नहीं, मुझे स्वाभिमान के साथ जीना है। मन तभी चिंघाड़ता है कि नहीं होगी मुझ से ईमानदारी! मैं जन्म-जन्मान्तर से आकण्ठ बेईमानी में डूबा रहा हूँ, अब कौन भला मुझे ईमानदारी की रोटी की सीख दे रहा है! क्यों हिन्दुस्थान, पाकिस्तान किया जा रहा है? भला बेईमान को किसने रोका है, यह तो हर युग में फला-फूला है। क्या औरंगजेब के काल में हम बेईमान मर गये थे? मरते और टूटते तो पत्थर के भगवान है, औरंगजेब ने सारे ही भगवानों को नेस्तनाबूद कर दिया था लेकिन  हम जैसे बेईमानों और चाटुकारों को तो खूब इज्जत बख्शी थी। आप नहीं मान रहे हैं मेरी बात! क्या कह रहे हैं? आपको प्रमाण चाहिये! अभी देखा नहीं कि पाकिस्तान ने कैसे सिद्धू, अय्यर, राहुल जैसे चाटुकारों के लिये पलक-पाँवड़े बिछाये थे जबकि अपने जन्म के साथ ही उसका एक ही मंसूबा रहा है कि हिन्दुस्थान को मटियामेट करना है और अखण्ड पाकिस्तान का निर्माण करना है। भई वह पाकिस्तान ही बनाएगा ना! हमें क्या! हम तो जन्मजात बेईमान और चाटुकार लोग हैं, हमें तो वहाँ भी कठिनाई नहीं होगी, सच पूछो तो हमें यहाँ घुटन हो रही है। ईमानदारी से जीना हमें रास नहीं आ रहा है और सबसे खराब बात तो यह है कि गरीब आदमी भी हमारे सामने छाती चौड़ा करके खड़ा हो जाए यह तो हम देख ही नहीं सकते। सब कुछ बर्बाद कर दिया है मोदी ने। घोड़ों और गधों को बराबर करने का प्रयास किया जा रहा है। अब यदि सभी अपने  पैरों पर खड़े हो गये तो हमारी सेवा कौन करेगा?

सभी के बैंक अकाउण्ट खुलवा दिये, साहूकारों पर कितना जुर्म है! हम सदियों से भरपूर ब्याज लेकर इन्हें लूटते आये थे। हर गाँव में साहूकार यह सेवा देता रहा है, हमें ही जनता माई-बाप मानती रही है और आज कहा जा रहा है कि तुम अपने माई-बाप खुद ही हो! सबको एक कार्ड थमा दिया है, एक नाचीज की भी पहचान हो गयी, कल तक केवल हमारी ही पहचान थी! सबकुछ बर्बाद कर दिया मोदी ने। इतनी चमचमाती सड़कें भला कोई बनाता है क्या? हर गाँव वाले ने मोटर सायकिल ले ली! गरीबी हटाओ का नारा केवल दिया जाता है, वास्तव में कोई हटाता है क्या! सब कुछ बर्बाद कर दिया मोदी ने। क्या-क्या लिखूँ, कैसे लिखूं! कल तक मंहगाई का रोना रोकर जीतते आए थे, आलू-प्याज की कद्र ही नहीं रही! पेट्रोल भी बेभाव मारा गया! टमाटर का रोना पाकिस्तान को भेज दिया! पाकिस्तान के नाम से याद आया, अब हमारे सैनिक भी घुस जाते हैं और मार आते हैं, कबड्डी-कबड्डी का खेल रोज ही खेल आते हैं और जब वे कबड्डी बोलने की सोचते भी हैं तो सीमा रेखा पर ही दबोच लेते हैं। हम जनता को अब पाकिस्तान के नाम से भी डरा नहीं पा रहे हैं, हमने कई नेता पाकिस्तान में ही तैनात कर दिये, न जाने कितने पत्रकार उनकी भाषा बोलते-बोलते थक गये हैं लेकिन मोदी ने ऐसा बर्बाद किया है कि अब पाकिस्तान का नाम लेने से भी डर लगने लगा है। हमने न जाने कितने रिश्ते पक्के कर रखे थे, कितनी बेटियों के दामाद ढूंढ रखे थे लेकिन अब वहाँ कंगाली छायी है तो क्या करेंगे रिश्ता कर के! मोदी ने वास्तव में बर्बाद कर दिया।

देश का बागवां सशक्त है

Written By: AjitGupta - Mar• 22•19

सखी! चुनाव ऋतु आ गयी। अपने-अपने दरवाजे बन्द कर लो। आँधियां चलने वाली है, गुबार उड़ने वाले हैं। कहीं-कहीं रेत के भँवर बन जाएंगे, यदि इस भँवरजाल में फंस गये तो कठिनाई में फँस जाओंगे। पेड़ों से सूखे पत्ते अपने आप ही झड़ने लगेंगे। जिधर देखों उधर ही पेड़ पत्रविहीन हो जाएंगे। सड़के सूखे पत्तों से अटी रहेगी, चारों तरफ सांय-सांय की आवाजें आने लगेगी। पुष्प कहीं दिखायी नहीं देंगे, बस कांटों का ही साम्राज्य स्थापित होगा। इस ऋतु को देश में पतझड़ भी कहते हैं, लेकिन चुनाव की घोषणा के साथ ही देश में पतझड़ रूपी यह चुनाव-ऋतु सर्वत्र छाने लगती है। पेड़ रूपी राजनैतिक दल सारे ही पत्ते रूपी वस्त्र त्याग देते हैं, निर्वस्त्र हो जाते हैं। जिसने धारण कर रखे होते हैं, उनके भी दूसरे दल खींच लेते हैं। तू-तू, मैं-मैं का शोर हवाओं की सांय-सांय से भी तेज होने लगता है। आंधियों के वेग के कारण हवा किस ओर से बह रही है, भान ही नहीं होता। रेत के टीले उड़कर इधर से उधर चले जाते हैं, रातों-रात धरती का भूगोल बदल जाता है। लेकिन इस चुनाव ऋतु में मनुष्य घबराता नहीं है, उसे पता है कि पतझड़ के बाद ही नवीन कोपलें फूंटेंगी, बस वह उन्हीं का इंतजार करता है।
अपने-अपने पेड़ों पर सभी की दृष्टि टिकी होती है, सभी चाहते हैं कि हमारे पेड़ पर ज्यादा से ज्यादा पत्ते आएं और नवीन फूल खिलें। लेकिन आजकल का चलन विदेशी पेड़ लगाने का भी हो गया है, कुछ लोग बिना सुगन्ध के विदेशी फूल लगाने लगे हैं, उनकी पैरवी भी खूब करते हैं, उन्हें वे सुन्दर लगते हैं। अपने गुलाब को उखाड़कर विदेशी गुलाब लगाने का चलन हो गया है। लेकिन इस बार लोग सतर्क हो गये हैं। फूल लगेगा तो देशी ही लगेगा, लोग कहने लगे हैं। लेकिन देश में एक नहीं अनेक समस्याएं हैं। कोई कह रहा है कि गुलाब नहीं चमेली लगाओ, कोई कह रहा है कि मोगरा लगाओ, कोई रातरानी तो कोई सदाबहार के पक्ष में है। देश में जितनी गलियाँ हैं उतने ही फूल हैं। इस ऋतु में हर आदमी के पास अपना फूल है, कोई विदेशी फूल लिये खड़ा है तो कोई देशी। हम तो देख रहे हैं कि अपने आंगन में एक तुलसी की पौध ही लगा दें, बारह मास काम आएगा। पतझड़ में इसके पत्ते भी झड़ गये थे, हमने बीज बचाकर रख लिये थे, बस गमले में डाला और उगने लगे हैं अंकुर। 
सखी! पतझड़ में अपना ध्यान रखना। किसी भँवरजाल में मत फंसना। यह पतझड़ बस कुछ दिन ही रहने वाली है, फिर तो चारों तरफ सारे ही रंग बिखरे होंगे। सखी! तुम यही भी पता नहीं कर पाओगी कि किस पेड़ पर कौन सा फल लगेगा, लोग कह देंगे कि मेरे पेड़ पर आम लगेगा, लेकिन तुम पूरी जानकारी रखना, इसके बाद ही विश्वास करना। मेरे घर के बाहर शहतूत का पेड़ है लेकिन उसमें बोगनवेलिया की बेल चढ़ जाती है, दूर से पता ही नहीं चलता कि पेड़ शहतूत का है। यहाँ बहुत सी बेलें अमरबेल बनकर चढ़ी दिखायी देंगी, उनसे भी सावधान रहना। चुन-चुनकर अपने बगीचे में सुगन्धित फूल ही लगाना। हमारे देश में खऱपतवार भी बहुत उग आयी है, इस ऋतु में लगे हाथ उन्हें भी उखाड़ बाहर करना। मैं तो निश्चिंत हूँ, मुझे पता है कि अभी देश का बागवां सशक्त है। उनका पेड़ बरगद का पेड़ बन चुका है, जहाँ बारहों मास हरियाली रहती है, फल लगते हैं और सारे ही पक्षी शरण पाते हैं। इसलिये मेरे घर के दरवाजे खुले हैं, मैं चैन की बंसी बजा रही हूँ, मुझे पता है कि कितना ही गुबार उठे लेकिन मेरा बागवां सब कुछ सम्भाल लेगा। मैं तो अभी से चिड़ियाओं की चहचहाट सुन रही हूँ, फूलों की अंगड़ाई देख रही हूँ और वातावरण में सर्वत्र फैल रही सुगन्ध को अपने अन्दर समेट रही हूँ। सखी! तुम भी निश्चिंत रहो, बस अपना कर्तव्य पूर्ण करते रहो। ये आंधियां तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी।

महिला होना चाहती हूँ

Written By: AjitGupta - Mar• 08•19

हमारे पिता बड़े गर्व से कहते थे कि मेरी बेटियाँ नहीं हैं, बेटे ही हैं। हमारा लालन-पालन बेटों की ही तरह हुआ, ना हाथ में मेहँदी लगाने की छूट, ना घर के आंगन में रंगोली बनाने की छूट, ना सिलाई और ना ही कढ़ाई, बस केवल पढ़ाई। हम सारा दिन लड़कों की तरह खेलते-कूदते, क्रिकेट से लेकर कंचे तक खेलते और पढ़ाई करते। रसोई में घुसने का आग्रह भी नहीं था, बस खाना बनाना आना चाहिये, इतना भर ही था। मुझ से कहते कि तर्क में प्रवीण बनो, हम बन गये लेकिन हमारे अन्दर जो महिला बैठी थी उसका दम निकल गया। पिताजी ने नाम भी रख दिया था “अजित” लेकिन साथ में एक पुछल्ला भी जोड़ दिया था – दुलारी। मेरे बड़े भाई मुझे रोज उकसाते कि केवल अजित ही ठीक लगता है और एक दिन स्कूल बदलते समय मैंने पुछल्ला अपने नाम से हटा ही दिया। अपने अन्दर की महिला को दूर कर, मेरे कार्य पुरुषों से होने लगे। अपने निर्णय खुद लेना, स्वतंत्र होकर रहना अच्छा लगने लगा। लेकिन जिस महिला को पिताजी ने दूर किया था और हमने जिसे अंगीकार किया था, वही महिला रोज हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती। जीवन संघर्षमय हो गया। हम पुरुषों के बीच धड़ल्ले से घुस जाते लेकिन थोड़ी देर में ही आभास होने लगता कि हम कुछ और हैं! लेकिन हम हार नहीं मानते। विवाह हुआ और गम्भीर समस्या में फंस गये, पत्नी रूप में महिला ने चुनौती दे डाली कि अब दूर करो मुझको। सबकुछ कर डाला, सारी जिम्मेदारी निभा डाली लेकिन महिला बनकर, सर झुकाकर नहीं रहना, सारी अच्छाइयों पर पानी फेर देता। महिला को क्या करना होता है, समझ ही नहीं आता रहा। कैसे साधारण पुरुष को महान माना जाता है, यह समझ ही नहीं आया। जिन्दगी का बहुत बड़ा पड़ाव पार कर लिया, सामाजिक क्षेत्र हो या साहित्य क्षेत्र, सभी में पिताजी के अनुरूप खुद को सिद्ध भी कर डाला लेकिन एक दिन एक जज ने फरमान सुना डाला, महिला को महिला की तरह, पुरुष की अनुगामिनी बनकर ही रहना होगा। तब समझ आया कि हमने क्या खो दिया था। जिस मरीचिका के पीछे पिताजी ने भगा दिया था और अपना स्वरूप भी भूल बैठे थे वह तो केवल मरीचिका ही है। तब खोजना शुरू हुआ खुद को, महिला के सुख को।

मैंने महिला पर नजर डालनी शुरू की, उसे उन्मुक्त होकर हँसते देखा, उसे निडर होकर सजते देखा, उसे बिना छिपे रोते देखा, फिर खुद पर नजर डाली। मैं ना हँस पा रही थी ना सज पा रही थी और ना ही रो पा रही थी। मैंने अपने अन्दर की महिला को आवाज दी, उसे बाहर निकालने का प्रयास किया, वह डरी हुई थी, सहमी हुई थी, झिझकी हुई थी। मैंने कहा कि डर मत, सहम मत, झिझक मत, खुलकर हँस, खुलकर सज और खुलकर रो। लेकिन महिला हारती रही, मैं प्रतिपल प्रयास करती हूँ, महिला को पाने का इंतजाम करती हूँ लेकिन फिर हार जाती हूँ। क्यों हार जाती हूँ? क्योंकि दोहरी जिन्दगी हमें हरा देती है, हम महिला होने का सुख और उसकी सुख पाने की जद्दोजेहद से खुद को जोड़ ही नहीं पाते। लेकिन आज महिला दिवस पर सच में मैं महिला होना चाहती हूँ। अपने को कमजोर बताकर रोना चाहती हूँ, अपने वैभव के लालच को बताकर साड़ी-जेवर में सिमटना चाहती हूँ, मैं कुछ नहीं हूँ कहकर केवल जीना चाहती हूँ। सच में, मैं महिला होने का सुख पाना चाहती हूँ। अपने पिताजी की इच्छा से परे केवल महिला होना चाहती हूँ। अपने चारों ओर फैल गये पुरुषों के साम्राज्य को धकेलना चाहती हूँ, महिलाओं के रनिवास में पैर रखना चाहती हूँ। मैं नासमझ बनना चाहती हूँ, जिससे कोई भी पुरुष आहत ना हो पाए। मुझे नहीं चाहिये निर्णय का अधिकार, बस जीने और रोने के अधिकार से ही खुश रहना चाहती हूँ। मैं बस महिला बनना चाहती हूँ।

घर वापसी

Written By: AjitGupta - Mar• 07•19

कहावत है कि गंगा में बहुत पानी बह गया। हमारा मन भी कितने भटकाव के बाद लेखन के पानी का आचमन करने के लिये प्रकट हो ही गया। न जाने कितना कुछ गुजर गया! कुम्भ का महामिलन हो गया और सरहद पर महागदर हो गया। राजनैतिक उठापटक भी खूब हुआ और सामाजिक चिंतन भी नया रूप लेने लगा। कई लोग सोचते होंगे कि आखिर हम कहाँ गायब थे, क्या नीरो की तरह हम भी कहीं बांसुरी बजा रहे थे? या इस दुनिया की भीड़ में हमारा नाम कहीं खो गया था! लेकिन ना हम बांसुरी बजा रहे थे और ना ही अपने नाम को खोने दे रहे थे, बस मन को साध रहे थे। मन बड़ा विचित्र है, खुशी मिले तो वहीं रम जाता है और दुख मिले तो वहीं गोते खाने लगता है, जब समाज का ऐसा कोई रूप जो मन को झिंझोड़ कर रख देता है तो मन कुछ टूटता ही है और कभी ऐसा भी होता है कि मन अंधेरे में डूब जाना चाहता है। देश से लेकर अपने मन तक की उथल-पुथल को महसूस करती रही हूँ मैं। सब कुछ विभ्रम पैदा करने वाला है, सत्य को सात तालों के बीच छिपाने का जतन हो रहा है। जो सत्य है उसे भ्रम बताया जा रहा है और जो मृग-मरीचिका है उसके पीछे भागने को मजबूर किया जा रहा है। लोग धर्म के नाम पर अपने शरीर में बम बांधकर खुशा-खुशी मर रहे हैं कि उन्हें ऐसे किसी लोक में सारे काल्पनिक सुख मिलेंगे जो कभी किसी ने नहीं देखे! चारों तरफ मार-काट मची है, जितना मारोंगे उतना ही कल्पना-लोक के सपने दिखाये जा रहे हैं और लोग वास्तविकता से आँख मूंदकर मरने को तैयार बैठे हैं।

नासमझी हर मोर्चें पर झण्डे गाड़े बैठी है, मेरी सत्ता – मेरी सत्ता करते हुए लोग घर-परिवार से लेकर देश-दुनिया तक तबाह करने पर तुले हैं। पहले लोग आराधना करते थे, श्रेष्ठ आचरण करते थे कि श्रेष्ठ पुत्र हो और वह परिवार और राज्य पर श्रेष्ठ शासन करे लेकिन अब श्रेष्ठ को हटाने की मुहिम छिड़ी है। सुख के लिये पुरूषार्थ के स्थान पर दुख को न्यौता जा रहा है। सूर्य निकलता है और पृथ्वी के सारे रोग हर लेता है, रोग हरता है साथ ही शक्ति प्रदान करता है लेकिन अब लोग सूर्य की चाहत नहीं रखते, वे अंधेरे की कामना कर रहे हैं। खुद को शक्तिशाली बनाने के स्थान पर दूसरे की शक्ति के पक्षधर बन रहे हैं। हमने मान लिया है कि हम कमजोर हैं और हम किसी के अधीन रहने से ही सुखी हो सकते हैं। जैसे स्त्री खुद को कमजोर मान बैठी है और पुरुष के अधीन रहने में ही सुरक्षित महसूस करती है ऐसे ही कुछ लोग देश और समाज को पराधीन करने में ही सुख मान रहे हैं। आततायियों को खुला निमंत्रण दिया जा रहा है, उनका समर्थन हो रहा है, अपने रक्षकों के विरोध में लामबन्द होने का प्रयास किया जा रहा है। यही तो है सुख के स्थान पर दुख के लिये पुरुषार्थ करना।

अपने मन को टटोलने का प्रयास कर रही हूँ, कुछ सार्थक लिखना हो जाए, बस यही प्रयास है। बहुत दिनों बाद की-बोर्ड पर खट-खट की है, रफ्तार आगे ही बन पाएगी। शुरूआत के लिये इतना ही। लग रहा है जैसे घर वापसी हो रही है, अपने लोगों से मिल रही हूँ, अपने मन को परत दर परत खोल रही हूँ। जहाँ अपना मन खुल सके, वही तो अपने लोग और अपना घर होता है। मैं ही खुद का अपने घर में स्वागत कर लेती हूँ, पता नहीं कितने लोग भूल गये होंगे और कितने याद कर रहे होंगे। लेकिन अब क्रम जारी रहने का प्रयास रहेगा।