अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

भेड़िये ने खाल उतार दी है

Written By: AjitGupta - Apr• 04•19

कल कांग्रेस का घोषणा पत्र घोषित हुआ, बहुत आलोचना हो रही है लेकिन मुझे नया कुछ नहीं लग रहा है। कांग्रेस की राजनीति स्पष्ट है, उनके समर्थक भी भलीभांति समझते हैं इसलिये ही दृढ़ता के साथ उनके पीछे खड़े रहते हैं। राजनीति का अर्थ होता है राज करने की नीति। एक राजनीति होती है – जनता को सुखी और सुरक्षित करने की और दूसरी होती है – स्वयं को सुखी और सुरक्षित करने की। पहली राजनीति लोकतांत्रिक होती है तो दूसरी राजाशाही की ओर इंगित करती है। कांग्रेस की राजनीति दूसरे प्रकार की रही है, स्वयं को सुखी और सुरक्षित करने की। लोकतंत्र में यदि आप राजाशाही घुसाना चाहोंगे तब आपको अपने लिये ऐसे लोगों की आवश्यकता हमेशा रहती है जो शक्तिशाली हों। गुण्डे, मवाली, अराजक तत्व आपके चहेते होने ही चाहिये जिससे आप किसी भी क्रान्ति को कुचल सकें। जैसे आपातकाल में किया गया था या फिर सिखों का नरसंहार कर किया गया था। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में चुनाव होते हैं। अन्दर कैसा भी राजाशाही भेड़िया बैठा हो लेकिन लोकतंत्र में खाल तो भेड़ की ही पहननी पड़ती है। 2019 के चुनाव विस्मयकारी हैं, इस बार भेड़िये ने भेड़ की खाल नहीं पहनी, अपितु स्पष्ट ऐलान किया कि हम भेड़िये हैं और हम केवल स्वयं के लिये राज करना चाहते हैं। इससे पूर्व भी वे संकेत दे चुके थे जब देश के प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं देश का चौकीदार हूँ तब काग्रेंस ने कहा था कि ये देश को चौकीदार देना चाहते हैं जबकि हम प्रधानमंत्री देना चाहते हैं। मतलब उनकी राजनीति स्पष्ट थी। 
पूर्व के चुनावों में राहुल गाँधी कभी जनेऊ पहन रहे थे, कभी यज्ञ कर रहे थे लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं किया। बस सीधे केरल गये और वहाँ से उम्मीदवारी की घोषणा कर दी। अपनी पुरानी खाल को उतार फेंका। अपने समर्थकों को स्पष्ट ऐलान कर दिया कि हम राज करने आए हैं और राज करने में तुम्हारा भी हिस्सा होगा। इसलिये यदि तुम देश के टुकड़े करना चाहोगे तो तुम पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होगी, यदि तुम देश के एक वर्ग को लूटना चाहोगे तो हमारी स्वीकृति होगी। वे सारे अधिकार दिये जाएंगे जो कभी लुटेरे शासक अपनी सेना को देते आए थे। जैसे ही कांग्रेस ने घोषणा पत्र जारी किया, अराजक तत्व और जिनकी मानसिकता सामान्य जनता पर राज करने की रहती है, वे सारे ही खुशी का इजहार करने लगे। उन्होंने भी अपने चोगे उतार डाले। चारों तरफ एक ही शोर मचा है कि राजा हम तुम्हारे साथ हैं, तुम्हें हम सुखी और सुरक्षित रखेंगे और तुम हमें रखना। यह गरीब जनता हमारी सेवा के लिये है, इसलिये राज करना आपका पुश्तैनी अधिकार है और साथ देना हमारा। पड़ोसी देशों को भी कहा गया कि आपको भी इच्छित प्रदेश मिल जाएगा बस हमारा साथ दो। इतना कहर मचा दो कि देश का प्रधानमंत्री का ध्यान चुनाव से हटकर देश की सुरक्षा की ओर लग जाए। सारे पहलवान अखाड़े में आ जुटे हैं, अपनी ताकत से जनता को गुलाम बनाने निकल पड़े हैं। ये कल तक भी यही कर रहे थे, बस कल तक इनके चेहरे पर लोकतंत्र का नकाब था लेकिन आज यह स्पष्ट घोषणा के साथ अखाड़े में उतर आए हैं। सारे देश के अराजक तत्व एकत्र हो जाओ। तुम हमें राजा बनाओ हम तुम्हें लूटने का अधिकार देंगे। सारा धन, सारा वैभव राजमहल में सीमित करने की घोषणा है। जिसने भी कल तक अपराध किये थे, वे सभी राजाशाही का हिस्सा होंगे, उनपर कोई कानून नहीं लागू होगा। सभी बुद्धिजीवी, कलाकार आदि को खुला निमंत्रण मिल गया है कि तुम हमारे चारण-भाट और हम तुम्हारें रक्षक बन जाएंगे। बस इस अफरा-तफरी के माहौल में कौन टुकड़ों पर मोहताज होना चाहेगा और कौन सर ऊँचा करके जीवन यापन करना चाहेगा, फैसला जनता को करना है। 

अब भगीरथ की बारी

Written By: AjitGupta - Apr• 03•19

टाटा स्काई और नेटफ्लेक्स ने समानान्तर फिल्में बनाकर अपनी दुनिया खड़ी की है। नेटफ्लेक्स का तो मुझे अनुभव नहीं है लेकिन टाटा स्काई की बॉलीवुड प्रीमियर को काफी दिनों से देख रही हूँ। छोटे बजट की छोटी फिल्में बना रहे हैं और कहानी भी हमारी जिन्दगी के आसपास ही घूमती है। परसो एक फिल्म आ रही थी, दस मिनट की ही देख पायी थी लेकिन शुरुआत में ही ऐसा कुछ था जो मेरे कान खड़े करने को बाध्य कर रहा था। माता-पिता को अपनी बेटी की चिन्ता है और उन्हें शक है कि आधुनिक चलन के कारण उनकी बेटी भी लेस्बियन जीवन तो नहीं जी रही है? बेटी बोलती है कि नहीं मेरा ऐसा कुछ नहीं है, माँ लेस्बियन का अर्थ नहीं समझ पाती है तो बेटी समझाती है कि गंगा को धरती पर लाने वाले भगीरथ थे ना! राजा सगर की दो पत्नियाँ थी और वे जो थी उसी की बात कह रही हूँ। माँ भगीरथ के नाम से ही श्रद्धा से गीत गाने लगती है और बेटी को भी गीत गाने को कहती है लेकिन ना माँ समझ पायी कि बेटी क्या कहना चाहती है और ना ही दर्शक समझ पाए होंगे कि धीरे से फिल्म निर्माता ने हमारे पुराण पर प्रहार कर दिया है। ऐसे प्रहार रोज ही किये जाते हैं, कभी हम समझ पाते हैं और कभी नहीं। लेकिन देखते ही देखते कथाएं नवीन स्वरूप लेने लगती हैं और नयी पीढ़ी को भ्रमित करने का सफल प्रयोग किया जाता है। 
एक तरफ साहित्य हमें सभ्यता और संस्कृति से जोड़ता है वही फिल्मी साहित्य हमें फूहड़ता और असभ्यता से जोड़ने की ओर धकेल रहा है। गालियों का प्रयोग इतना भरपूर हो रहा है कि लगने लगा है कि हम किस दुनिया में आ गये हैं! गालियों का प्रभाव तो हम सोशल मिडिया पर देख ही रहे हैं, किसी एक ने गालियों का प्रयोग लेखन में किया और गाली-प्रिय लोग एकत्र होने लगे। देखते ही देखते गालीबाज लोग प्रसिद्ध होने लगे, उनकी देखादेखी दूसरे लोग भी गाली पर उतर आए। अब तो गालियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, सभ्यता को तो हमने किनारे कर दिया है। नेटफ्लेक्स में भी गालियों की भरमार है और टाटा स्काई पर भी। कथानक हमारी जिन्दगी के हर पहलू को छू रहे हैं लेकिन असभ्य तरीके से, इनमें सौंदर्यबोध कहीं नहीं है। ऐसी फिल्मों पर समाज को दृष्टि रखनी होगी। मैं समझ सकती हूँ कि हमारे पुराणों ने सैकड़ों कहानियाँ दी है, हमारा इतिहास भी गौरव गाथाओं से भरा है और टीवी के भी सैकड़ों चैनल आ गये हैं। कौन सा चैनल कब किस चरित्र का चरित्र हनन कर दे, उन पर लगाम लगाना परिश्रम साध्य काम है। लेकिन यह हमें करना ही होगा। हम पहले भी बहुत कुछ बर्बाद कर चुके हैं, तब तो हम कह देते हैं कि हम गुलाम थे इसलिये ऐसा हुआ लेकिन आज तो स्वतंत्र हैं! हम जागरूक भी हैं तो क्यों नहीं अपने विवेक को जागृत करते हैं और ऐसा कुछ फिल्माया गया है तो उस पर निगाह रहे। मैंने केवल दस मिनट की फिल्म देखी थी, नाम भी कुछ अजीब सा था, दोबारा जरूर देखूंगी और फिर समझ पाऊंगी कि फिल्मकार क्या चाहता है? लेकिन यह तय है कि हमारे सीरियल और फिल्में धीरे से वार कर रही हैं, बहुत ही सोची-विचारी रणनीति के अनुरूप ऐसा हो रहा है। एक सीरियल आ रहा है चन्द्रगुप्त मौर्य – इसमें तो पुरातन इतिहास की धज्जियां उड़ा दी गयी है लेकिन समाज का कोई स्वर नहीं उठता है! हम लोग इस विषय में क्या कर सकते हैं, इस पर विचार आवश्यक है। कल तक राम और कृष्ण इनके निशाने पर थे आज गंगा को माँ और पवित्र नदी मानने के कारण भगीरथ पर प्रहार शुरू हुआ है, अभी केवल कंकर फेंका गया है, धीरे-धीरे हमारे पैरों से जमीन ही खिसका दी जाएगी। सावधान!

अभी तोते आजाद हैं

Written By: AjitGupta - Mar• 30•19

फतेहसागर की पाल पर खड़े होकर आकाश में विचरते पक्षियों का कलरव सुनने का आनन्द अनूठा है, झुण्ड के झुण्ड पक्षी आते हैं और रात्रि विश्राम के स्थान पर चले जाते हैं। कल मैंने ध्यान से देखा, तोते ही तोते थे, हजारों की संख्या में तोते स्वतंत्र होकर उड़ रहे थे। हम तो सुनते आए थे कि तोता स्वतंत्र नहीं है! शायद अभी चुनाव के चलते तोते स्वतंत्र हो गये हैं। खैर गाड़ी उठायी और अपन भी चल दिये घर की ओर। रास्ते में पुलिसियाँ तोतों का झुण्ड, सड़क घेरकर खड़ा था। सघन तलाशी ली जा रही थी। मैंने पूछ लिया कि माजरा क्या है? पता लगा कि चुनाव है। चुनाव है तो तोते स्वतंत्र हैं, अपनी मर्जी और अपनी ताकत दिखा रहे हैं। अब तोतों की मर्जी चलेगी, गाडी की डिक्की खोलो, हुकम आया। कहीं नोटों की गड्डियाँ तो इधर-उधर नहीं हो रही है! मन ही मन विचार आया कि यदि देश में इतने तोते हैं तो यह जाते कहाँ हैं! रोज तो दिखायी नहीं देते, चुनाव के समय कैसे झुण्ड के झुण्ड दिखायी दे रहे हैं! आकाश में भी हजारों दौड़ रहे हैं और धरती पर भी! घर के नजदीक आ गये, वहाँ भी देखा तोतों ने पकड़-धकड़ मचायी हुई है। शायद यही मौका है, पैसा कमाने का। आदमी को स्वतंत्र छोड़ दो, पैसा कमा ही लेगा, पक्षी को भी स्वतंत्र छोड़ दो, पेट भर ही लेगा। 
चुनाव भी क्या अजीब खेल है! भगवान को एक तरफ बिठा दिया जाता है, बस सारे मंत्री और संतरी ही न्याय करते हैं। भगवानों की ऐसी की तैसी करने के लिये चुनाव कारगर सिद्ध होते हैं। कल तक यस सर कहने वाला नौकरशाह, सर को उठाकर कोठरी में बन्द कर देता है, जैसे ही चुनाव खत्म, फिर से यस सर! चुनाव नहीं हुए मानो पतझड़ आ गयी, सारे पत्ते झड़कर ही दम लेंगे, सबको कचरे में जाना ही है। कल तक जो पेड़ पर राज करते थे आज जमीन पर पड़े हुए धूल खा रहे होते हैं। तोते भी पेड़ों से चुन-चुनकर इन पत्तों को नीचे धकेलते रहते हैं। मैंने आकाश में उड़ते तोते से पूछ लिया कि भाई लोगों कल तक कहाँ थे? आज अचानक ही कहाँ से अवतरित हो गए? उन्होंने अपनी गोल-गोल आँखे मटकायी और कहाँ कि बताएं क्या कि कहाँ थे? तुम्हें भी वहीं सीखचों के पीछे धकेल दें? तोबा-तोबा, नहीं पूछना जी। तुम्हारा खेल दो महिने का है फिर तुम्हें पिंजरे में ही रहना है, दिखा दो अपनी ताकत। लेकिन अभी तो आकाश में दौड़ लगाते, अपना वजूद तलाशते तोते आजादी से घूम रहे हैं, अच्छा लग रहा है। 
धरती के भगवान नेतागण भी घूम-घूमकर अपनी प्रजा को घेरे में ले रहे हैं, कहीँ कोई दूसरे पाले में नहीं चले जाएं! देव और असुरों का संग्राम जारी है, बस यही बात समझ नहीं आ रही है कि देव कौन हैं और असुर कौन हैं? चारों तरफ से बाण ही बाण चल रहे हैं। कुछ लोग काम तो असुरों जैसा करते हैं लेकिन चुनाव की इस घड़ी में खुद को देवता बताते हैं। कल तक खुलकर गौ-माता को सरेआम काटकर खा रहे थे, आज तिलक लगाकर मन्दिरों में ढोक लगा रहे हैं! मतलब कि कोई भी असुर दिखना नहीं चाहता है! कभी-कभी लगता है कि चित्तौड़ में लाखों लोगों का कत्ल करने वाला अकबर तिलक लगाकर प्रजा के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा है। हम सब जय-जयकार कर रहे हैं। अकबर महान है का जयघोष कर रहे हैं। कश्मीर में कंकर फेंकने की पवित्र रस्म जारी है और इस कंकर से घायल हुए फौजी को खदेड़ने की मुहिम भी जारी है। हम वहाँ भी जय-जयकार कर रहे हैं। लेकिन देव भी डटे हुए हैं, वे सतयुग की कल्पना को रूप देने में जुटे हैं। बस देखते रहिये कि देव जीतते हैं या असुर। तोतों का राजपाट भी देख लेते हैं, इनकी आकाश में उड़ान भी देख लेते हैं। तोतों का तो यह हाल है कि लोग कहने लगे हैं कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी! लेकिन अभी तो तोते की आजादी आनन्द दे रही है। 

31 रूपये में क्या नहीं आता?

Written By: AjitGupta - Mar• 28•19

हाथ में टीवी का रिमोट होना ही महसूस करा देता है कि घर की सत्ता हमारे हाथ में है। कभी घर की दादी पूजा कर रही होती थी, पूजा की घण्टी बजाते-बजाते भी निर्देश देती थी कि बहू दूध देख लेना, कहीं उफन ना जाए, पोते को कहती कि बेटा जरा मेरा चश्मा पकड़ा जाना, फिर जोर से बेटे को आवाज लगाती कि जाते समय मेरी दवा लाना भूल मत जाना। दादी पूजा घर में है लेकिन पूरे घर का रिमोट उनके हाथ में है, सभी को हर पल चौकन्ना रखती थी। अब दादी वाले घर तो कम होते जा रहे हैं लेकिन मन बहलाने को रिमोट हाथ आ गया है, जैसे ही पतिदेव के हाथ लगता है, बटन दबते ही जाते हैं और जब तक 100-50 चैनल बदल लिये नहीं जाते तब तक समाचार देखना सम्भव नहीं होता। पतिदेव रिमोट से चैनल बदल रहे होते हैं और पत्नी अल्मारी में से साड़ियों को हाथों से सरका रही होती है, यह नहीं, यह भी नहीं! 10-20 को जब तक परे धकेल नहीं देती तब तक साड़ी का चयन नहीं होता। बच्चे खिलौनों में उलझे हैं, सारे ही खिलौने कमरे में फैले हैं, लेकिन मजा नहीं आ रहा और छोटा बच्चा रसोई में जा पहुँचता है, कटोरी-चम्मच को बजाने से जो आवाज आती है, बस वही उसका आनन्द है। ढेर सारी चीजों में से अपनी पसन्द चुनना हमारी आदत है। यदि चुनने का अधिकार नहीं मिला तो लगता है जीवन ही बेकार गया। किसी युवा को यदि 10-20 लड़कियाँ या लड़के देखने को नहीं मिलें हो तो वह कभी ना कभी कह ही देंगे कि जिन्दगी में हमने क्या किया! सब्जी वाले की दुकान जब तक सब्जी से भरी ना हो तो क्या खाक सब्जी खरीदने का आनन्द है!

इन दिनों ट्राई ने यह आनन्द छीन लिया है, कहते हैं कि जो चैनल देखने हो, बस उतने ही रखो और पैसे बचाने के मजे लो। हुआ यूँ कि कुछ बुजुर्गवारों ने कहा कि हम तो केवल दाल-रोटी ही खाते हैं, चपाती भी कम से कम होती जा रही हैं तो भला 56 भोगों वाली पूरी थाली के पैसे क्यों दें! दूसरे ने कहा कि सच कह रहे हो, मैं तो टीवी पर केवल समाचार ही देखता हूँ, तो भला 1000 चैनल के पैसे क्यों दूँ! पहुँच गये ट्राई के दरबार में, मुकदमा दर्ज करा दिया। न्याय तो पैरवी करने वाले के हिसाब से मिलता है, ट्राई ने कहा कि सच है आप पूरे पैसे क्यों देंगे! फरमान जारी हो गया कि जितने चैनल देखते हो, बस उतने का ही पैसा दो। बड़ा अच्छा लगा, सुनने में। अब दो दो-चार चैनल के ही पैसे देंगे। लेकिन यह क्या! जो रिमोट घुमाते थे, उनका तो खेल ही समाप्त हो गया! ऐसे लगने लगा जैसे बोईंग विमान की जगह हेलीकोप्टर में यात्रा कर रहे हों। अभी रिमोट हाथ में लिया ही था कि मन ही मन सोच रहे थे और निर्देश दे रहे थे कि बीबी – दाएं घूम, बीबी बाएं घूम, लेकिन चैलन तो वहीं अटक गया। अब घुमा लो अपनी अंगुलियों पर दुनिया को! सारा मिजाज ही ठण्डा पड़ गया। पति बड़बड़ा रहा है, पत्नी बड़बड़ा रही है, बच्चे भी बड़बड़ा रहे हैं कि हमने भूसें के ढेर में से सुई खोज ली है, ऐसा आनन्द ही समाप्त हो गया। माना कि अपने घर का ही खाना खाना है लेकिन आसपास के घरों में ताक-झांक करके खाने का आनन्द ही कुछ और है। ऐसा लग रहा है कि टीवी पुराने दूरदर्शन का डिब्बा हो गया। समाचार देख लो और कृषिदर्शन देख लो। एचडी चैनल लेते हैं तो एसडी नहीं ले सकते और एसडी भी ले लेते हैं तो बजट तो लिमिट से बाहर हो जाता है। देखना हमें चार ही है लेकिन भरी पूरी दुकान से ही सौदा खरीदेंगे ना! भाई ट्राई वालों हमारे रिमोट चलाने का आनन्द हमसे मत छीनो, हम तो इसी के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। जैसे ही हमारे हाथ में भूले भटके से रिमोट आता था हम कहीं की महारानी बन जाते थे, हमें भी रिजेक्ट करने का और चयन करने का सुख मिल जाता था। लेकिन हाय! घर में ही पुस्तकालय बना रखा था, जब मन करता किताब उठाकर पढ़ लेते थे लेकिन अब कहा जा रहा है कि आप सीमित रूप से ही किताबें रख सकेंगे, कौन सी किताब छाटूं और कौन सी नहीं, समझ ही नहीं आ रहा है। छाँटना भी टेढ़ी खीर है, कोई कह रहा है कि 31 रूपये में क्या नहीं आता है? लेकिन जब 31 रूपये ढूंढते हैं तो कहीं नहीं मिलते। कभी सोनी में अच्छा सीरियल आ जाता है तो कभी जी पर, कभी कौन सी फिल्म किस पर आ जाएगी, कुछ कह नहीं सकते, तो भाई वाट लग गयी है हमारी तो। सबसे बड़ी वाट तो चैनल छांटने में लगी है, किस को छांटे और कैसे छांटे, किसी के पास सरल रास्ता हो तो बता दो नहीं तो हम पैसे भी देते जाएंगे और भूखे ही रह जाएंगे। हमें तो लग रहा है कि भूसे में से सुई ढूंढना जैसा काम हो गया है। सत्ता का सुख भी गया और सुई ढूंढने की मुसीबत सर पड़ी वो अलग।

हे मोदी! साँपों को सुड़क जा

Written By: AjitGupta - Mar• 27•19

घर में यदि छिपकली आ जाए तो हड़कम्प मच जाता है, मानो दुश्मन का सिपाही ही घर में घुस आया हो! कल ऐसा ही हुआ, हड़कम्प तो नहीं मचा क्योंकि बहादुर युवा पीढ़ी घर में नहीं है, बस हम ही पुरातनपंथी लोग रहते हैं। आजकल नूडल्स का बड़ा फैशन है और वह भी उसके खाने के तरीके का। बच्चे लोग एक नूडल लेते हैं और उसे लम्बा करके सीधे ही मुँह से खींचते हैं और सड़ाक से नूडल अन्दर हो जाती है। मोर को तो देखा ही होगा आप सभी ने, हमारे देश का राष्ट्रीय पक्षी भी है, बहुत ही कमसिन और हसीन होता है। लेकिन साँप को नूडल्स की तरह सीधे की सुड़क लेता है। छिपकली भी साँप प्रजाति की ही है और एक ही पूर्वज की वंशज है, तो वह भी मोर से क्या उसके पंख से भी डरकर भाग जाती है। कल यही हुआ, बाथरूम में एक छिपकली आ गयी। मैंने तत्काल बाजार की ओर प्रस्थान किया, मुझे मालूम था कि शहर में सूरजपोल चौराहे पर मोरपंख बिकते है। मोरपंख खरीदे और बाथरूम में लगाया, मैंने देखा कि छिपकली चुपचाप देख रही थी। लेकिन यह क्या! दो मिनट में ही छिपकली गायब! देखा मोरपंख की ताकत। केवल सुन्दरता के लिये ही मोर को राष्ट्रीय पक्षी नहीं घोषित किया था, यह आस्तीन के छिपे साँपों को भी सुड़ुक कर जाता है। छिपकली तो मोरपंख से ही भाग जाती है। 
श्रीकृष्ण ने मोरपंख को धारण किया था, श्रीकृष्ण की शक्ति का तो पता ही है। आजकल लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि मोदी ने साँपों के बिल में गर्म तैल डाल दिया है, साँप निकल-निकलकर भाग रहे हैं। मोरों को चारों तरफ तैनात कर दो, सारे साँप सुड़ुक! लेकिन कल ऐसा हुआ कि मेरे घर में तो छिपकली ही निकली लेकिन देश में मणिधारी साँप निकल आया। अफवाह उड़ी की हमारे पास मणिधारी साँप है, हम कितना भी धन-दौलत उगल सकते हैं। देश में चारों तरफ जनता के मोर तैनात हो चुके थे लेकिन मोरों को कहा गया कि हमारे पास मणिधारी साँप है। अब कल से ही मोर सोच में पड़े हैं कि इस साँप को छोड़ दें या इसे ही सुड़ुक कर जाएं! क्योंकि कोई और जाने या ना जाने, मोर तो जानता ही है कि मणिधारी साँप कुछ नहीं होता। लेकिन जनता तो ऐसे ही सपनों में जीती आयी है तो वह भी मणि के सपनों में खोने लगी है। सोने की मुर्गी हर घर में रोज सोने का अण्डा देगी तो भला किसका ईमान नहीं डोलेगा! 
सात फण फैलाए, बगल में मणि दबाए, साँप का जलवा अब पूरे देश में दिखाया जाएगा, साँप के जहर से मत डरो, यह साँप तो धन-दौलत देने वाला है। यह बहुत ही शुभ साँप है, इसे हर घर में पनाह दो, इसका आह्वान करो, इसे दूध पिलाओ। अब मोरों को भगाने का काम होगा, साँपों को न्यौता जाएगा। बस देखना यह है कि कैसे मोदी इस साँप की मणि का सच जनता के सामने रखते हैं और साँप को विष रहित करते हैं? हर घर में साँप नहीं होंगे लेकिन कहीं उन्हीं के वंश की छिपकली होगी तो कहीं दूसरी प्रजाति होगी। हमने मोरपंख लगा लिये हैं, हम किसी मणि के भ्रम में नहीं है। हमें पता है कि साँप के पास कोई मणि नहीं है, है तो केवल विष है। यदि हम सजग नहीं हुए तो धन-दौलत की जगह विष पीना पड़ेगा। सावधान पार्थ! श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि मैंने ऐसे ही मोरपंख को धारण नहीं किया है! हे मोदी! तू भी मोरपंख का धारण कर और इन साँपों को सुड़क जा।