अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

इस ओर ध्यान दीजिए माननीय

यह जो श्रद्धा होती है ना वह सबकी अपनी-अपनी होती है, जैसे सत्य सबके अपने-अपने होते हैं। अब आप कहेंगे कि सत्य कैसे अलग-अलग हो सकते हैं? जिसे मैंने देखा और जिसे मैंने अनुभूत किया वह मेरा सत्य होता है और जिसे आपने देखा और आपने अनुभूत किया वह आपका सत्य होता है उसी प्रकार […]

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