अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

जी-हुजूरियें आखिरी दाँव ढूंढ रहे हैं

बात 90 के दशक की है, हमारे कॉलेज में जब परीक्षाएं होती थी तब परीक्षा केन्द्रों पर सारे ही अध्यापकों की ड्यूटी लगती थी, लेकिन मेरी कभी नहीं। मैं सोचती थी शायद महिला होने के कारण मुक्ति मिल जाती होगी लेकिन फिर बाद में महिला होने के कारण ही लगने लगी, क्योंकि परीक्षा तो बालिकाएं […]

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