अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

कितना गोपनीय जीवन बना लेते हैं कुछ लोग

Written By: AjitGupta - Sep• 18•16

अभी-अभी एक sms आया – 13 दिन शेष हैं, अपनी छिपी सम्पत्ती उजागर करने के लिये। अपनी जेब पर निगाह गयी, कहीं कुछ छिपा है क्या? यहाँ तो जिसे सम्पत्ती कहें ऐसा भी कुछ नहीं है लेकिन खुद को धनवान तो हमेशा से ही माना है। एक खजाना है जो मन के किसी कोने में दुबका बैठा है, जैसे ही कोई अपना सा मन लेकर आता है, वह खजाना बांध तोड़ता सा बाहर निकल आता है। ना कोई पैसे का लेन-देन होता है और ना ही किसी दौलत का, लेकिन खुद का भी और दूजे का भी मन तृप्त सा हो जाता है। कभी अनायास ही आँखे छलक जाती हैं, शायद वहाँ छिपा अपनापन किसी अपने के देखकर छलक पड़ता है। दिल भी तो कभी उछाले मारने लगता है जब किसी अपने के आने की सूचना मिलती है। कभी-कभी दिमाग भी सांय-सांय करने लगता है, जैसे इसमें ऐसा कुछ छिपा है जो किसी बेगैरत को देखकर अपने हिस्से का गुस्सा निकाल देना चाहता है। जीभ में भी न जाने कितने शस्त्र छिपे हैं जो कभी अपनों पर तो कभी गैरों पर चल ही जाती है। पेट तो न जाने कितने खजानों का मालिक कहलाता ही है, न जाने कितने रहस्य इसमें भरे होते हैं!
सोच रही हूँ कि धन के खजाने का तो लोग हिसाब दें देंगे लेकिन मन के खजाने का हिसाब शायद ही कोई लगा पाया हो। यदि इस खजाने की भी कोई तारीख मुकर्रर कर दी जाती तो हम लोग क्या करते? धन तो लोग इस धरती पर ही छोड़कर चले जाते हैं लेकिन मन का खजाना तो अपने साथ ही लेकर लोग चले जाते हैं। न किसी को कुछ देना और ना ही किसी से कुछ लेना, कितना गोपनीय जीवन बना लेते हैं कुछ लोग! बस दुसरे के दुख में रो लेते हैं और दूसरे के सुख में हँस लेते हैं। लेकिन अपने खजाने को कभी उजागर नहीं करते। मुनादी घुमा दो एक बार कि अपने मन का खजाना भी उजागर करो, देखो यह दुनिया कितनी अपनी सी लगने लगेगी। न जाने कितने आत्मीय क्षण हमने छिपा लिये होंगे और उनके स्थान पर द्वेष फूट पड़े होंगे। युद्ध की विभीषिका भी तो ऐसे ही जन्मी होगी! जब मैंने तुम्हें अपना बनाना चाहा होगा और तुमने मेरे अनबोले शब्दों का अर्थ परायेपन में ढूंढा होगा। मेरी आँखें तुम्हें खोज रही होंगी और तुम उनका सूनापन नाप रहे होंगे, ऐसे ही तो संघर्ष का जन्म हुआ होगा! मेरा दिल तुम्हारी नजदीकियाँ तलाश रहा होगा और तुम उसकी खामोशी में परायापन देख रहे होंगे, ऐसे ही तो दिल टूटने के किस्से हुए होंगे!
उजागर कर दो, दिल की हर बात, अपनों से। न जाने कब शाम हो जाए। जब जाएंगे तो निश्चिन्तता रहेगी कि हम सब कुछ उजागर करके गये। ना प्रेम छिपाया और ना ही दुश्मनी छिपायी, बस किसी धन को या रिश्ते को काला कहने की नौबत नहीं आने दी। जो है, सामने हैं, मन भी खुश और सब भी खुश।

You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

2 Comments

  1. Babita says:

    सही कहा आपने | मन की गाठे खोलने हम खुश हो सकते है लेकिन अगर नहीं खोलेगे तो अंदर ही अंदर कुड़ते रहेगे |
    -khayalrakhe.com

  2. AjitGupta says:

    आभार बबीता जी।

Leave a Reply