अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

आग का दरिया है और डूब के जाना है

Written By: AjitGupta - Feb• 20•16

कुछ लोगों का जीवन अपने परिवार तक सीमित होता है, उनके लिये ही सारा खटराग रहता है। लेकिन कुछ लोग अपने मन को भी टटोलते रहते है और वे कभी परिवार से इतर अपने मन की इच्छाओं को भी पूर्ण करना चाहते हैं। इसके लिये वे साहित्यिक, राजनैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक आदि अनेक क्षेत्र हैं जिसमें वे स्वयम् को तलाशते हैं। जीवीकोपार्जन के अतिरिक्त ऐसे लोग इन से सम्बन्धित संस्थाओं में अपनी जगह ढूंढते हैं। समय की उपलब्धता के हिसाब से वे अपना मन बनाते हैं। ऐसी संस्थाओं में कार्य करने के लिये उनमें उत्साह तब और भी बढ़ जाता है जब इन संस्थाओं में कार्यरत व्यक्ति आपको प्रेरित करते हैं। वे पूर्ण मनोयोग के साथ संस्थाओं के साथ जुट जाते हैं। लेकिन रुकिये, बात इतनी सीधी भी नहीं है कि आप घोड़े पर बैठने की चाहत रखे और आपके सामने घोड़ा आ जाए? एक आग का दरिया है और तैरके जाना है।

यदि आप साहित्य प्रेमी हैं तो जान लें कि आप को किन रास्तों से गुजरना है। हम तो अनाड़ी थे और भरोसे पर मात खा गये लेकिन आपको कुछ तत्व बोध करा ही दें। यहाँ केवल मात्र एक विचारधारा वालों का दबदबा है, उनके शरणागत हो जाओ, आपको वह सब कुछ मिलेगा जिसकी कल्पना भी आपने नहीं की होगी। लेकिन यदि आप अपनी दुनिया स्वयम् बनाना चाहते है तो स्वान्तः सुखाय तक ही सीमित हो जाएंगे। यहाँ एक और विचारधारा भी है लेकिन वह आपको कुछ दे नहीं पाती। ना तो उनके पास देने को कुछ है और ना ही वे देने की मानसिकता रखते हैं। एक और कड़ुवा सच भी है कि वे बेचारे खुद ही लेने के लिए आतुर हैं तो अभी देने का भाव तो आया ही नहीं। इसलिये वे अपना समूह और प्रभाव बनाने के स्थान पर व्यक्ति को धकेलते रहते हैं। वे आपकी योग्यता की कद्र नहीं करेंगे अपितु अयोग्यता की चाह रखेंगे। इसलिये इन संस्थाओं में भीड़ तो है लेकिन अयोग्य व्यक्तियों की। इसलिये आप निर्णय कीजिये की आपको क्या करना है?

 

आप कहेंगे कि अकादमियां तो हैं, हम उनके सहारे ही आगे बढ़ लेंगे। लेकिन जनाब यहाँ भी एक विचारधारा का ही कब्जा है। आपको वे धेले भर का सहयोग नहीं लेने देंगे। आपने ले भी लिया तो छिट-पुट तक ही सीमित रह जाएंगे। बस एक ही मार्ग है और वह है जुनून। उसके लिये पूर्णकालिक बनना पड़ेगा।

अब राजनैतिक क्षेत्र की बात कर लें। यहाँ तो सबकुछ खुला है, एकदम पारदर्शी। सामान्य कार्यकर्ता के लिये सीढ़ियां बनी है, यहाँ जो किसी का हाथ पकड़े दूसरों को धक्का मारकर आगे बढ़ने की कला में माहिर है वह आगे बढ़ जाता है, बाकि इधर-उधर गिरकर बिखर जाते हैं। एक अन्य रास्ता भी यहाँ हैं – जो परिवार के लोग हैं या जिनके पास कोई गुरु है, उनके लिये सीधे लिफ्ट की व्यवस्था है। योग्यता की यहाँ कद्र तो है लेकिन योग्यता को भी चरण तो पखारने पड़ते ही हैं। अकेली योग्यता यहाँ ज्यादा देर टिक नहीं पाती।

एक क्षेत्र और है, वह है – सामाजिक क्षेत्र। यहाँ के कार्य लुभाते तो हैं लेकिन यह डगर भी कितनी दुरूह है, जब नजदीक जाएंगे तब पता लगेगा। पद की लिप्सा यहाँ कूट-कूटकर भरी है। ना किसी योग्यता के लिये स्थान है और ना  ही कर्मठता के लिये। केवल आर्थिक दबदबा बना रहता है। स्वयं की संस्था खोल लेने में भी यही स्थिति बनी रहती है। जैसे जैसे संस्था प्रतिष्ठापित होती है, उसका राजनैतिक क्षेत्र में भी प्रभाव बढ़ने लगता है इसकारण संस्थाओं में उठापटक जारी रहती है। आपकी योग्यता के कद्रदान यहाँ भी नहीं होते।

इसलिये मन बनाने से पूर्व अपने आपको टटोल लें। यदि आपमें आत्मसम्मान कूट-कूटकर भरा है तो यहाँ सोच-समझकर पैर रखें। योग्यता आपके काम नहीं आएंगी। बस एकला चलो रे ही काम आएगा और काम आएगा आपका जुनून। धार्मिक, आध्यात्मिक आदि सभी संस्थाओं में तो योग्यता की आवश्यकता ही नहीं है। वे कहते है बौद्धिकता तो हम में ही बहुत है. हमें तो पैसा और राजनैतिक प्रभाव चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि आप अपनी योग्यता के लिये सम्बंधित क्षेत्र ही चुने, दूसरे क्षेत्रों में निराशा ही हाथ लगेगी। ताने सुनने के अवसर उत्पन्न हो जाएंगे, लोग कहेंगे – लौट के बुद्धू घर को आए।

लेकिन रूकिये, निराशा को दूर कीजिये। सोचिये की आप क्यों जाना चाहते थे इन संस्थाओं में? प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहता है, इसलिये ही वह साहित्य, राजनैतिक, सामाजिक आदि क्षेत्र चुनता है। कलम उठाइए, नहीं नहीं की-बोर्ड पर अंगुली रखिये और अपनी अभिव्यक्ति को आकार दीजिये। आपके लिये फेसबुक है, ट्वीटर है. ब्लाग है, अपनी वेबसाइट बनाइये और मन को अभिव्यक्त कर लीजिये। हम भी यही कर रहे हैं आप भी करिये। फिर ना कहना पड़ेगा – आग का दरिया है और डूब के जाना है।

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3 Comments

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ” बड़ी बी की शर्तें – ब्लॉग बुलेटिन ” , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

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