अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

कुछ नहीं होने का सुख

Written By: AjitGupta - Feb• 09•18

जिन्दगी भर लगे रहे कि कुछ बन जाए, अपना भी नाम हो, सम्मान हो। लेकिन अब पूरी शिद्दत से मन कर रहा है कि हम कुछ नहीं है का सुख भोगें। जितने पंख हमने अपने शरीर पर चिपका या उगा लिये हैं, उन्हें एक-एक कर उखाड़ने और कतरने का मन है। कभी पढ़ाई की, कभी नौकरी की, कभी सामाजिक कार्य किये, कभी लेखन किया और सभी से लेकर न जाने कितने पंख अपने शरीर में लगा लिये। हम यह है और वह हैं, हमारी पहुँच यहाँ तक है और वहाँ तक है! परत दर परत हम पर चढ़ती गयी और हम हमारे वास्तविक स्वरूप से दूर होते गये। हमारे अंदर का प्रेम न जाने कहाँ और कब रीत गया, बस हमें दूसरों से सम्मान मिले यही चाहत बसकर रह गयी। लेकिन अब समझ आने लगा है कि यह सम्मान कल्पना है जैसे हमने स्वर्ग और नरक की कल्पना कर ली है वैसे ही ये सम्मान भी होते हैं, बस एक छलावा और कुछ नहीं। हम खुद से दूर होते चले जाते हैं, हमारे अन्दर कितना कुछ है, खुद को देने के लिये यह भूल जाते हैं और बस दूसरों से पाना ही चाहत बन जाती है। मैं अपने आपको खोद रही हूँ और न जाने कितनी संवेदनाएं अन्दर छिपी हैं उनसे साक्षात्कार हो रहा है। कभी यूरोप में प्रतिदिन स्नान का चलन नहीं था, सर्दी जो थी लेकिन शरीर चाहिये था खुशबूदार तो वहाँ परफ्यूम का चलन बन गया। कितने परफ्यूम आए पेरिस से बनकर और हम सबने उपयोग किये लेकिन किसी ने अपने शरीर की वास्तविक गंध को नहीं जाना, मैं उसी वास्तविक गंध को पाने की कोशिश कर रही हूँ। कभी जेवर से कभी कपड़ों से शरीर को सुसज्जित करते हैं लेकिन शरीर की सुन्दरता कितनी है यह देखने का अवसर ही नहीं मिलता बस जेवर पहनकर आइने के सामने देखते हैं कि जेवर में हमारा शरीर कैसा लग रहा है!
हमारे मन में क्या है, इसे हमने लाख तालों में बन्द कर लिया है, ऊपर इतने आवरण है कि हम जान ही नहीं पा रहे हैं कि हमारे मन में क्या है? तालाब के पानी में इतना कचरा डाल दिया है कि अन्दर का निर्मल जल ऊपर से दिखायी ही नहीं दे रहा है। कभी कचरे को हटाने का मन होता भी है तो मुठ्ठीभर कचरा हटाते हैं और फिर प्रमाद आकर घेर लेता है। जब हमारे अन्दर की आत्मीयता कुन्द होने लगती है तब प्रेम की ज्योति कहीं बुझ जाती है और तब मन में संवेदना जन्म लेती है। यह संवेदना दिखती नहीं है लेकिन जैसे ही परिस्थिति या किसी दृश्य का निर्माण होता है, संवेदना जागृत होती है और आँखों के रास्ते बह निकलती है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग बात-बात में रो देते हैं, हम कहते हैं कि भावुक व्यक्ति है। लेकिन भावुकता के और अन्दर जाइए, कहीं न कहीं रिश्तों में आत्मीयता की कमी और मन के ऊपर आवरणों की भरमार होगी। फिल्म या सीरीयल देखते हुए हमें किस बात पर रोना आता है, पड़ताल कीजिए, हमारा बिछोह वहीं है। जानिये उस दर्द को और उस आत्मीयता को वापस पाने की कोशिश कीजिए, अपार संतुष्टि मिलेगी लेकिन अक्सर यह सम्भव होता नहीं है। क्योंकि आत्मीयता अकेले से नहीं होती यह दोनों पक्षों का मामला है, लेकिन यदि हमें अपने मन का पता लग गया तो कहीं न कहीं रास्ते भी निकल ही आएंगे। एक रास्ता ना मिला तो दूसरा कोई मार्ग जरूर दिखायी देगा। इसलिये मन को जरूर उजला करने का प्रयास करना चाहिये।
हमारा मन किन तत्वों से बना है, हम क्या चाहते हैं, यह कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया बस दुनिया में किसे सम्मान मिलता है, वही बनने का प्रयास करते रहे। अपने मन की चाहत को पीछे धकेल दिया और दुनिया की चाहत को आगे कर लिया। यदि मन की की होती तो आज मन को खोजना नहीं पड़ता, पहले तो मन को दूसरों की चाहत के नीचे दबा दिया और अब उसे खोजने का प्रयास कर रही हूँ। आप भी झांक लें, यदि मौका मिल जाए तो कि क्या बनना हमारे जीवन का सत्य था और हम क्या बन गये हैं। एक खोखला जीवन जी रहे हैं, जिसमें कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, कोई सत्ता के पीछे और कोई सम्मान के पीछे। काम कोई नहीं कर रहा है, बस खुद को काम की आड़ में कुछ पाने का जरिया बना लिया है। यदि कुछ पाने का नजरिया बदल जाएगा तो काम में आनन्द आ जाएगा, हर चीज में नफा-नुक्सान ढूंढने पर काम ही बोझ बन गया है। इसलिये मैं प्रयास कर रही हूँ कि मेरा अस्तित्व ही विलीन हो जाए और मैं अपने मन की थाह पा जाऊँ। बस कुछ नहीं होने का सुख पा जाऊँ। अपनी आत्मीयता वापस पा जाऊँ और अपनी संवेदना को जान पाऊँ।

अकेली विदाई

Written By: AjitGupta - Feb• 05•18

आप सभी को पता है कि मैं अभी अमेरिका जाकर आयी हूँ और कारण भी पता है कि पुत्रवधु को पुत्र हुआ था इसलिये जाना हुआ था। लेकिन जैसे ही अमेरिका की टिकट कटाने की बात कहीं भी चलती है, हर आदमी पूछ लेता है कि जापा कराने जा रहे हो क्या? यदि हवाई यात्रा में जाने वालों और आने वालों से पूछा जाए तो आधे से अधिक का अमेरिका जाने का कारण यही जापा होगा। वहाँ चाहे कितना ही दुख देखना पड़े लेकिन भारतीय माता-पिता जाते अवश्य हैं। क्यों जाते हैं! वे परिवार में नव-आगन्तुक का स्वागत करने और पुत्रवधु को परिवार की अहिमयत बताने जाते हैं। लेकिन कठिनाई यह है कि अमेरिका वाले इस परिवार-भाव को नहीं मानते और कहते हैं कि इस कार्य के लिये अमेरिका क्यों आना? मुझसे भी इमिग्रेशन में पूछा गया कि क्यों आए हो? मैंने कहा कि बेटा है, इसलिये आना हुआ है। फिर दोबारा प्रश्न हुआ कि तो आना क्यों हुआ? मैंने फिर जोर देकर कहा कि बेटा है इसलिये ही आना हुआ। क्योंकि मुझे पता था कि वे इस कार्य के निमित्त आने वाले को पसन्द नहीं करते। वे कहते हैं कि हमारे यहाँ प्रसव की उत्तम सुविधा उपलब्ध है और इसमें किसी की भी सेवाओं की आवश्यकता कहाँ है? वे पति को पूरा दक्ष कर देते हैं। लेकिन अमेरिका में बसे बेटे को भी अपनी इज्जत का सवाल लगता है कि उसके घर से कोई आया और भारत में बैठे परिवारों को भी लगता है कि इस अवसर पर जरूर जाना चाहिये। नहीं तो परिवार का मायने ही क्या हैं? हम चाहे सात समन्दर दूर रहते हों लेकिन खून तो हमारा पुकारता ही है, हम नए परिवारजन को एक परिवार का पाठ पढ़ाने जाते हैं।
4 फरवरी को उदयपुर के एक वृद्धाश्रम के बारे में अखबार में खबर छपी, एक दम्पत्ती ने बताया कि उन्होंने तीन साल से अपनी संतान से बात नहीं की है। अचरज भी हुआ और दुख भी। समाचार-पत्र ने वृद्धाश्रम की खबर तो छाप दी लेकिन जहाँ घर-घर में ऐसे ही वृद्धाश्रम बनते जा रहे हैं, उनकी शायद ही किसी ने खबर ली हो। एक तरफ हवाई जहाज में वृद्धों की भीड़ बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ वृद्धाश्रम में भी लोग अकेले रहने पर मजबूर हो रहे हैं, साथ ही शहर के अनेक घर भी वृद्ध-कुटीर में बदलते जा रहे हैं। परिवार टूट गये हैं, एकतरफा रिश्ता निभाया जा रहा है। एक पीढ़ी नये का स्वागत करने लाख दुख देखकर भी परदेस जाती है लेकिन दूसरी पीढ़ी अन्तिम विदाई के लिये भी आना जरूरी नहीं समझती। पहले और आज भी अधिकांश परिवारों में मृत्यु एक संस्कार माना जाता है और मृत व्यक्ति की आत्मा की शान्ति के लिये पूरा परिवार एकत्र होता है। दूर-दूर से रिश्तेदार आते हैं, एक पीढ़ी अपना सबकुछ देकर विदा होती है तो उसे विदा करने के लिये सब जुटते हैं। 12 दिन साथ रहते हैं और जो पीछे छूट गया है उसे अकेलेपन के अहसास से दूर रखने का प्रयास करते हैं। लेकिन अब कहा जाने लगा है कि जितना जल्दी हो काम खत्म करो और जो आ सके वह ठीक नहीं तो किसी को परेशान मत करो। जाने वाला ऐसे जाता है जैसे उसका कोई नहीं हो, उसने किसी संसार की रचना ही नहीं की हो। तभी तो वृद्धाश्रम में रह रहे एक व्यक्ति ने कहा कि जब अकेले ही रहना है तो विवाह ही क्यों करना और इसलिये मैंने विवाह किया ही नहीं था। वृद्धों की इस व्यथा को कैसे सुलझाया जाए? क्या वाकयी वृद्धाश्रम में जीवन है या फिर केवल मौत का इंतजार। अभी तो लोग नये का स्वागत कर रहे हैं कहीं ऐसा ना हो कि फिर नये का स्वागत भी बन्द हो जाए और सब अकेले हों जाएं!

एकला चलो रे

Written By: AjitGupta - Feb• 04•18

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने हम सबको सिखा दिया कि – एकला चलो रे! हमें भी लगा कि बात तो ठीक है, दुनिया की किच-किच से अच्छा है एकला चलो रे। लेखन ही ऐसा माध्यम हमें समझ आया जिसमें एकला चलो रे, का उद्घोष हम कर सकते थे और फिर रवीन्द्र बाबू तो लेखक के नाते ही कहकर गये थे – एकला चलो रे। हमने मन बना लिया कि अब एकला चलो रे – ही को मंत्र बनाएंगे, लेकिन हम एकला तो एक कदम भी नहीं चल पाए। अपने लिखे को जब तक कोई पढ़े नहीं तब तक लिखने का फायदा क्या है? जैसे ही लोगों को पता लगा कि हम लिखते हैं, लोग हमें खुशी-खुशी अपनी संस्था में स्वागत करने लगे, दो चार बार तो हमें ठीक लगा फिर देखा कि यहाँ तो हमारी पहचान भारतीयता और हिन्दुत्व को ही गरियाया जा रहा है, कुछ लोग गरिया रहे हैं, बाकि चुप है, हम अकेले कुलबुला रहे हैं। हमें रास नहीं आया, समूह में रहना, फिर वही मंत्र अपना लिया एकला चलो रे। तब तक सोशल मीडिया का जन्म हो चुका था और हमने ब्लाग की राह पकड़ी। यहाँ भी तत्काल ही समूह बनने प्रारम्भ हुए और उनका भी वही मिजाज कि हिन्दुत्व को गरियाओ। हमें लगा कि ये तो हमें ही गरिया रहे हैं, हम फिर समूह से छिटक गए। उन दिनों फेसबुक का फैशन भी चल निकला था, हमने यहीं एकला चलो रे को साधने की सोची। लेकिन देखते क्या हैं कि जो लोग बाहर भारतीयता को गरिया रहे थे, वे यहाँ भी थे, लेकिन अन्तर इतना था कि एक दूसरा समूह भी था जो भारतीयता का समर्थन कर रहा था। हमने सोचा चलो लेखन जारी रह सकेंगा, लेकिन यहाँ भी पेच फंस गया। एक वर्ग भारतीयता को गिरयाने के एवज में सत्ता से टुकड़े पा रहा था तो दूसरे वर्ग को यह बात अखर रही थी। अब वे भी भारतीयता वाली सरकारों को धमकाने लगे थे, कि ऐसा करो तो हम तुम्हें माने नहीं तो तुम्हें गरियाएंगे। कुल मिलाकर बात यह थी कि वे भी टुकड़ा मांग रहे थे।
जो वर्ग सालों से खाया-पीया था, उसे समझ आ गया कि इनको हमारे उपयोग में कैसे ले जिससे हमारी सरकारों की दुकानदारी वापस बनी रहे। वे कुछ भी सुरसुरी छोड़ देते और सबसे पहले यह हिन्दुत्ववादी शेर उस सुरसुरी को लपक लेते और एक सुर में हुँआ-हुँआ करने लगते। जब खूब शोर मचा लेते तब समझ आता कि हमने क्या किया! फिर चुप हो जाते। सामने वाले को खेल समझ आ गया और वे जहाँ भी चुनाव होने होते, बस कोई न कोई जाल बिछा देते। हर प्रान्त में नया जाल, लेकिन मंशा एक। पंजाब, दिल्ली से लेकर गुजरात में यह प्रयोग कर लिया गया। अब राजस्थान, मध्य-प्रदेश – छत्तीसगढ़ की बारी है, प्रयोग शुरू हो गया है। ऐसे में हमारा मंत्र एकला चलो रे वापस लौटने की जिद कर रहा है। लेकिन अकेले लेखन कैसे हो? सारी सोशल मीडिया पर तो अपनों के ही खिलाफ फतवा जारी किया हुआ है। कदम-कदम पर छावनी बना दी गयी है, हम उसे ही अपना नेता मानेंगे जो हमें टुकड़े डालेगा। अब टुकड़े तो बड़े नेताओं को मिलेंगे लेकिन बेचारे छोटे कार्यकर्ता समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इनका खेल क्या है? बड़े कब एक हो जाएंगे और सत्ता की मलाई खाएंगे। खैर जिसकी जो इच्छा हो वह करे, लोकतंत्र है, हम तो अपनी अलख जलाते रहेंगे। जिसे भी भारतीयता और हिन्दुत्व याने खुद में स्वाभिमान दिखायी देता है, वह हमारे साथ आए, नहीं तो एकला चलो रे, का मंत्र तो साथ है ही। हम तो सामाजिक प्राणी है और समाज की ही बात करते हैं, इसलिये कभी भारतीयता की भी बात कर लेते हैं, देखते हैं हमारे साथ कौन आता है?

#TED याने टेकनोलोजी, एन्टरटेंटमेंट और डिजाइन

Written By: AjitGupta - Jan• 30•18

कल रिमोट को आगे-पीछे करते एक श्रेष्ठ कार्यक्रम पर आकर तलाश रूक गयी, देखा एक सम्भ्रान्त महिला अपने मन को दर्शकों के सामने अभिव्यक्त कर रही थी, पेशे से चिकित्सक थी और 71 वर्ष की आयु में भी दुनिया भर में अपनी सेवाएं दे रही थी, उनकी अन्तिम पंक्ति थी की मैं कभी रिटायर्ड नहीं होऊंगी। उनका बोलना नयी प्रेरणा दे रहा था लेकिन शायद समय सीमा से वे बंधी थी और जब उनकी बात समाप्त हुई तब सारे ही दर्शक उनके सम्मान में खड़े हो गये। मैंने उनके बारे में पहले कभी नहीं सुना था। इसके बाद आए जावेद अख्तर, उन्होंने शब्दों के रचना संसार की बात की। उन्होंने कहा कि मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक ही अन्तर है और वह है शब्दों की दुनिया। मनुष्य शब्दों के माध्यम से अपनी विगत धरोहर को हम तक पहुंचाता है और हम स्वयं को जान पाते हैं कि हमारी विरासत क्या है। इसी प्रकार कुछ वैज्ञानिक, कुछ समाज शास्त्री कुछ कलाकारों ने अपनी बात कही। मैं अभिभूत थी, दिल में तीव्रता से उतरने वाला कार्यक्रम था। अभी गूगल सर्च में जाकर पता किया कि क्या है कार्यक्रम का उद्देश्य।
TED याने टेकनोलोजी, एन्टरटेंटमेंट और डिजाइन। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों का प्लेटफार्म। रविवार को शाम 7 बजे स्टार प्लस पर आता है। कल शाहरूख खान होस्ट कर रहे थे। हो सके तो इसे अवश्य देखें। कार्यक्रम में जितने भी लोगों ने अपनी बात रखी उनमें से अधिकतर गुमनाम थे, वे दुनिया को ऐसा कुछ दे रहे हैं जो आज के पहले हमने कभी जाना नहीं। कितनी अजीब बात है कि हम फिल्मी कलाकारों को, खिलाड़ियों को जानते हैं लेकिन जो लोग हमारे जीवन को विज्ञान से आत्मसात कराते हैं उनके बारे में नहीं जानते, जो कला के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त होना सिखाते हैं, उनको हम नहीं जानते और जो नयी दुनिया बना देते हैं हम उन्हें नहीं जानते। दुनिया में इन क्षेत्रों में कितना कार्य हो रहा है, हम इन सबसे अनजान है बस खेल के मैदान पर कब मैच हार गये और कब जीत गये उसी का गम और खुशी मनाते रहते हैं या कौन सी फिल्म में किसने क्या रोल किया है, उसी पर सारा ध्यान केन्द्रित रखते हैं लेकिन दुनिया में कितना कुछ हो रहा है उसपर चर्चा भी नहीं करते। यदि हम बड़े कामों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे तब फिल्म और खेल हमारे लिये चिन्ता का विषय नहीं होंगे और ना ही किसी ने क्या कह दिया और मीडिया किस पर हल्ला मचा रहा है यह हमारे लिये मायने नहीं रखेगा।
जब हम एक साधारण व्यक्ति की उड़ान देखते हैं और साधारण तरीके से उसने समाज को क्या दे डाला है तब हम प्रेरित होते हैं कि हम भी कुछ कर सकते हैं, लेकिन आज जो मीडिया द्वारा रचित विवाद हैं उसमें हम भी केवल विवाद करने वाले बनकर रह गये हैं। रचना का संसार हमसे पीछे छूट गया है और हम सब खरपतवार सरीखे बन गये हैं, जिसकी जरूरत किसे भी नहीं है। हम यहाँ शब्दों को गढ़ने वाले लोग हैं, शब्दों का विशाल संसार हमारे पास होना चाहिये जिससे हम अपनी बात कह सकें साथ में दृष्टि भी होनी चाहिये कि हमें दुनिया को क्या नया देना है। दुनिया में जो है उसी को हमने परोस दिया तो वह सृजन नहीं है, वह तो नकल है। इसलिये शब्दों के भण्डार का भी विस्तार करे और अपनी दृष्टि का भी। कोशिश करें कि जो हम देख रहे हैं, वह नया हो, उसकी अभिव्यक्ति भी नयी हो, तब हमारे लेखन का भी औचित्य होगा नहीं तो नकल की राह पर हम चल पड़ेंगे। आप आगामी रविवार को कार्यक्रम देखें, हो सकता है आपको भी प्रेरित कर जाए। मेरा तो दिल से आभार।

यही अन्तर है पूरब और पश्चिम का

Written By: AjitGupta - Jan• 27•18

कभी-कभी ऐसा भी होता है जब आपके पास कहने को या लिखने को कुछ होता है लेकिन आप लिख ही नहीं पाते हैं! बस यही सोचकर रह जाते हैं कि पहले नकारात्मक पक्ष लिखा जाए या पहले सकारात्मक पक्ष, और इसी उधेड़बुन में गाड़ी छूट जाती है। खैर आज सोच ही लिया की अब और नहीं। कभी आप सभी ने अपने बचपन को टटोला है और यदि यह टटोलना भी अपनो के बीच हो तो आनन्द दोगुना हो जाता है। हमारी पीढ़ी का बचपन भी क्या था! आज जो साधन दिखते हैं, उसमें से एक भी तब नहीं था, इसलिये समय सभी के पास था। साधनों की चकाचौंध में खोए हुए हैं आज हम और उसमें डूबते जा रहे हैं, अब किसी की जरूरत नहीं! बतियाने की भी जरूरत नहीं और किसी की सहायता की भी जरूरत नहीं। मैं मेरे एक आत्मीय परिवार के साथ याद कर रही थी कि कैसे हम सब एक दूसरे के काम आते थे, एक घर में फोन हुआ करता था और सारे ही मौहल्ले को आवाज देकर फोन आया है, बुलाया जाता था। सारे ही मौहल्ले को दो कारों की सोवाएं प्राप्त थी। सारी ही अच्छी बातें हम कर रहे थे, लेकिन उन अच्छी बातों में भी जो बात निकलकर आयी वह मेरे लिये लिखने का कारण बन गयी। एक युवा ने कहा कि यदि हम आज करोड़ों रूपया भी खर्च कर दें तो वैसा जीवन लौटाकर नहीं ला सकते। उस पुराने जीवन की लिये ललक, जहाँ समृद्धि नहीं थी, माता-पिता का कठोर अनुशासन था, उस ललक को देखकर दिल में ठण्डक सी पड़ गयी। लेकिन तभी कई दूसरे युवक सामने आ खड़े हुए। अन्तर दिखने लगा एक पीढ़ी का, नजरिये का।
अमेरिका जब भी जाना हुआ, युवाओं से सामना होता रहा। मन तरस जाता था यह सुनने के लिये कि हमें वो जमाना याद आता है। लेकिन जब एक दिन एक युवा से सुना- अब भारत जाने का मन नहीं करता, मैं तो माता-पिता से कहता हूँ कि जब मिलने का मन हो तब आप ही चले आना। यह शब्द तीर की तरह चुभ गए और अभी तक मन में रिस रहे हैं। फिर सुनायी दिया कि भारत में अव्यवस्थाएं बहुत हैं इसलिये जाने का मन ही नहीं करता। कैसा है यह मन! जो अपने अतीत से पीछा छुड़ाना चाहता है! हमें तो अतीत को सहलाने में ही स्वर्ग सा आनन्द आता है। जहाँ समृद्धि नहीं थी, फिर भी उसमें हम खुद को खोज रहे हैं, जहाँ अनुशासन की दीवार इतनी सशक्त थी कि प्रेम कहीं खो जाता था, उसमें भी हम प्रेम खोजकर आनन्दित हो लेते हैं और विदेश के मोह में फंसी पीढ़ी जो समृद्धि के दौर में पैदा हुई है, उसके लिये बचपन का परिसर महत्व ही नहीं रखता! हम पड़ोस के किए सहयोग को याद करके उनका अहसान मान रहे थे और विदेश में बसी पीढ़ी अपनों का भी अहसान नहीं मानती। वह कहती है कि देखो मैंने कितनी उन्नति की है, मैं कहाँ और तुम कहाँ। मुझे बचपन का सबकुछ याद है, यहाँ के युवाओं को याद है, वे सभी कुछ तो गिना रहे थे लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं। मन तो कभी थपेड़े मारता ही होगा, वे तब क्या कहते होंगे मन को! जब मैं परिवार के बीच बैठकर पुराने बीते हुए कल में जी लेती हूँ तब लगता है कि यह समय यहीं थम जाए और जब पुराने को बिसराने की होड़ लगी होती है तब लगता है कि समय दौड़ जाए और मैं वहीं पुराने समय में चली जाऊं। एक कहता है कि करोड़ो रूपये में भी वह माहौल नहीं मिल सकता और अब सुन रही हूँ कि उस माहौल में जिया नहीं जाता। बस यही अन्तर है पूरब और पश्चिम का। सारी चकाचौंध के बीच अपनापन कहीं नहीं है, सभी साधनों को भोग रहे हैं, बस मशीन बन गये हैं। एक मशीन से उतरते हैं और दूसरी की ओर दौड़ पड़ते हैं। दौड़ रहे हैं, हाँफ रहे हैं लेकिन सुकून नहीं तलाश पा रहे। हम यहाँ ठहरे हुए हैं लेकिन कभी अतीत में खो जाते हैं तो कभी अपनों में खो जाते हैं और अतीत व अपनों के इस जीवन से मकरंद निकाल लाते हैं। हम खुश हैं कि हमारे पास हमारा अतीत है, अतीत के उस परिसर को हम छू सकते हैं, देख सकते हैं और पल दो पल उसके साथ होने का सुख बंटोर सकते हैं। बस तुम्हारे पास सुख के साधन हैं लेकिन खुशी के वे पल नहीं हैं। सुखी तो हर कोई हो सकता है लेकिन खुश कितने हो पाते हैं! हमारे पास खुश रहने और हँसने का कारण है और इस हँसी-खुशी को हम आपस में मिलकर दोहराते रहते हैं। हम समृद्धि से अधिक अपनों का साथ चाहते हैं और उनके योगदान को अपनी थाती मानते हैं। काश आज फिर मिल जाए, वही माहौल!