अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

शेर की किरकिरी

Written By: AjitGupta - May• 02•18

शेर और शेर के बच्चों से परेशान होकर मैंने सच्चे शेर की तलाश में नेशनल ज्योग्राफी चैनल पर दस्तक दे दी। खोलते ही जो दृश्य था वह बता दूं – एक संकरा सा रास्ता था, सड़क बनी थी, कार खड़ी थी और वहाँ काँपते पैरों से एक भैंस का बच्चा घूम रहा था। एंकर बोल रहा था कि इस बच्चे को देखकर लग रहा है कि यह डरा हुआ है, लेकिन डर किसका है यह समझ नहीं आ रहा है! तभी कार के पीछे से शेर निकला, अब दोनों आमने-सामने थे। शेर ने पोजीशन ली और घात लगाने के लिये तैयार हो गया। लग रहा था कि आसान शिकार हाथ लगा है लेकिन तभी एक बड़ी सी भैंस दौड़ती हुई आयी और उसने शेर पर आक्रमण कर दिया। शेर कुछ समझ ही नहीं पाया, बस दुम दबाकर भाग गया। सबसे बड़े शिकारी का हाल देखकर हँसी आ गयी, लोग तो इसकी कसमें खाते हैं और यह है कि भैस के सामने ही दुम दबाकर भाग गया। रूकिये अभी, मुझे बहुत कुछ देखना बाकी था और आपको बताना अभी शेष है। इसके तत्काल बाद दूसरा दृश्य दिखाया गया, एक सेई ( सेई जानते हैं ना. तीखे कांटों वाली) लगभग 8-10 शेरों से घिरी थी। लेकिन सेई के सारे बाल शूल की तरह खड़े थे, शेरों की हिम्मत नहीं हो रही थी उसे चबाने की। कई मिनट तक पहलवानों की तरह अखाड़े में घुमाई हुई लेकिन हारकर शेर चले गये। यह क्या छोटी सी – पिद्दी सी सेई से भी हार गए! एक शेर हारता तो समझ भी आता लेकिन यहाँ तो झुण्ड था, लेकिन फिर सबसे बड़ा शिकारी हार गया था। एंकर को अभी और दिखाना था – तीसरा दृश्य – एक जिराफ जो गर्भवती है, अपने बच्चे के साथ घूम रही है उसके बच्चे पर शेर ने आक्रमण कर दिया। बस फिर क्या था, जिराफ के पास ना तो लम्बे दांत और ना ही लम्बे नाखून लेकिन अपनी लम्बी टांगों से ही शेर को दबोच लिया। अब शेर नीचे था और जिराफ उसे पैरों से दबाकर वार कर रही थी।
पहले भी कई बार शेरों को चित्त होते देखा है लेकिन इसबार तो चित्त होने की ही घटनाएं थी, मैं शेर बने कुनबे की अठखेलियों से बाहर निकलना चाह रही थी और टीवी का दामन थामा था लेकिन यहाँ तो शेर की किरकिरी हुई पड़ी थी। सारे ही मुहावरे झूठे हो गये थे, बहुत सुना है – शेर अकेले ही शिकार करता है, झुण्ड में तो गीदड़ करते हैं, लेकिन यहाँ तो छोटी सी सेई के सामने शेरों का झुण्ड था और खिसियाकर जाते हुए दिख रहे थे। भैंस माँ के सामने शेर को भागते देखा और जिराफ ने तो दम ही निकाल दिया। इसलिये शेर की कसमें मत खाओ, कसमें खानी है तो माँ की खाओ। कहो कि हम भारत माता की संतान हैं और जब तक हमारी माँ का आँचल सलामत है, कोई हमारी तरफ आँख नहीं उठा सकता। शेर दा पुत्तर बनने से ज्यादा अच्छा है माँ का पुत्तर बनना।
वैसे भी मुझे समझ नहीं आता की लोग खुद को शेर क्यों बताते हैं? शेर तो सबसे हिंसक जानवर होता है, सबसे बड़ा शिकारी। क्यों लोग अपनी तुलना शिकारी के साथ करते हैं? अब आक्रान्ताओं का जमाना तो रहा नहीं कि कहें की हम सबसे बड़े शूरवीर हैं और तुम्हें गाजर-मूली की तरह काट खाएंगे। शेर की उपमा तो विनाश की ओर धकेलती है, संदेश देती है कि हम शिकारी हैं और तुम हमारा शिकार हो। शेर तो और कुछ करता नहीं, बस शिकार करता है। वैसे अभी तक ये लोग जनता का शिकार ही कर रहे थे, इसलिये अपने लोगों को याद दिलाया गया है कि तुम शेर के बच्चे हो, टूट पड़ो जनता पर। तुम्हारा काम शिकार करना है और तुम्हीं एकमात्र इस जंगल के राजा हो। यह लोकतंत्र क्या होता है? शेर किसी लोकतंत्र को नहीं मानता। ललकार मिली है लोगों को, सोते से उठकर जागो और अपना स्वरूप पहचानो, तुम कल भी शिकारी थे और आज भी शिकारी हो। याद करो हमने ही 84 में एक कौम को सबक सिखाया था, हमने ही देश का बंटवारा करवाया था और जब ये छोटे-मोटे प्राणी सर उठाने लगे थे तब हमने ही आपातकाल लगाकर इनको सींखचों के अन्दर डाल दिया था। शेरों जाग जाओ, शिकार का समय हो गया है, बस टूट पड़ो। लेकिन कठिनाई यह हो गयी है कि अब भारत माता तनकर खड़ी हो गयी है और उसने अपने पुत्तरों की रक्षा का वचन दिया है, वह माँ बनकर शेरों के सामने खड़ी हो गयी है। कहीं ऐसा ना हो कि जैसे भैंस के सामने शेर भागा था और जैसे जिराफ ने शेर को पैरों तले रौंद डाला था, वैसा ही हाल इन शेरों का ना हो जाए! खैर भगवान रक्षा करे।

लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान

Written By: AjitGupta - Apr• 22•18

आज एक पुरानी कथा सुनाती हूँ, शायद पहले भी कभी सुनायी होगी। राजा वेन को उन्हीं के सभासदों ने मार डाला, अराजकता फैली तो वेन के पुत्र – पृथु ने भागकर अपनी जान बचाई। पृथु ने पहली बार धरती पर हल का प्रयोग कर खेती प्रारम्भ की, कहते हैं कि पृथु के नाम पर ही पृथ्वी नाम पड़ा। लेकिन कहानी का सार यह है कि राजा वेन का राज्य अब राजा विहीन हो गया था, प्रजा को समझ नहीं आ रहा था कि राज कैसे चलाएं। आखिर सभी ने पृथु को खोजने का विचार किया। पृथु के मिलने पर उसे राजा बनाया और कहा कि बिना राजा के प्रजा भीड़ होती है, इसलिये राजा का होना जरूरी है। लेकिन आज प्रश्न उठ रहा है कि राजा कैसा? अनुशासन प्रिय या फिर लुंज-पुंज? परिवार में जब माता या पिता कठोरता और अनुशासन के साथ परिवार का निर्माण करते हैं तो निर्माण की अवधि में कोई खुश नहीं रहता, लेकिन बाद में सब कहते नहीं अघाते कि हमारा अनुशासन के कारण निर्माण हुआ है। युवाओं को उच्छृंखलता रास आती है, लेकिन माता-पिता अनुशासन में रखकर उनका निर्माण करते हैं, ऐसे ही जनता की स्थिति होती है। जनता नैतिक-अनैतिक सारे ही काम करना चाहती है लेकिन देश-हित और जनता का हित किस में है यह अनुशासन प्रिय नेता तय करते हैं। जब भी किसी को लाभ प्राप्त नहीं होता है तो नाराजी प्रकट करता है और लोकतंत्र की दुहाई देता है। उसे लोकतंत्र का अर्थ लुंज-पुंज व्यवस्था में दिखायी देता है, जहाँ अनुशासनहीन समाज का निर्माण हो और भीड़तंत्र के द्वारा शासन में भागीदारी हो। परिवार से लेकर देश के लोकतंत्र में केवल उसी शासक की चाहना होती है जो लुंज-पुंज हो, जो व्यक्ति को सारी छूट दे सके।
जितनी छूट और जितनी लूट इस देश में है, उतनी शायद ही किसी देश में हो, जनता की आदत छूट और लूट का उपभोग करने की पड़ी है, जरा सा अनुशासन आते ही लोकतंत्र की दुहाई दी जाने लगती है। एक पुराना वित्त-मंत्री लोकतंत्र की दुहाई दे रहा है क्योंकि उसे लूट और छूट का फायदा नहीं मिल रहा है। वे समझ बैठे हैं कि एक अनुशासन में देश को रखने की पहल करना लोकतंत्र नहीं हो सकता। इसलिये अब वे अनुशासन से परे लुंज-पुंज व्यवस्था के समर्थन में खड़े हो गये हैं, दूसरी तरफ सारे ही वे लोग भी जो शासन को ले-देकर चलाना चाहते हैं वे भी साथ में जुटने लगे हैं। देश ने लुंज-पुंज शासन बहुत देखा है, जो आजतक ले-देकर चल रहा था। जिसने भी भीड़तंत्र का शोर मचाया, उसको टुकड़ा डाल दिया गया। देश रसातल में पहुंच गया लेकिन भीड़तंत्र आकाश छूने लगा। जनता को समझ आने लगा था कि बिना अनुशासन के राज नहीं हो सकता इसलिये वे पृथु की तरह अपने राजा को खोजने निकल पड़े और मोदी को खोजकर सिंहासन पर बैठा दिया। लेकिन अब सत्ते-पे-सत्ता फिल्म जैसे हालात हो गये हैं। घर में आयी भाभी घर को घर बनाना चाहती है और उच्छृंखलता में जीवन व्यतीत कर रहे सारे भाई अनुशासन में बंधना नहीं चाहते। देश भी आज इसी उधेड़-बुन में लगा है। चारों ओर लोकतंत्र की दुहाई दी जा रही है, बेईमान व्यापारी कह रहा है कि मुझे बेईमानी की छूट मिले, खुद को मर्द समझने वाले लोग कह रहे हैं कि हमें बलात्कार और तलाक की सुविधा मिले, राजनेता कह रहे हैं कि परिवार सहित सारे ही पद हमें मिलें, न्यायाधीश तक कहने लगे हैं कि बड़े मुनाफा वाले केस हमें मिलें, वकील कह रहे हैं कि हम जैसा चाहे फैसला वैसा हो, समाज का हर वर्ग कह रहा है कि हमें भी आरक्षण मिले। एक-एक व्यक्ति इस छूट और लूट का भागीदार होना चाहता है और कह रहा है कि लोकतंत्र खतरे में आ गया है। व्यक्ति को सारी ही छूट खुलेआम मिलने को ही वे लोकतंत्र कह रहे हैं। वे यह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में भी तंत्र जुड़ा है, कोई ना कोई अनुशासन तो रखना ही होगा नहीं तो यह देश लूट का देश बन जाएगा। अब तय जनता को ही करना है कि उसे अनुशासन में रहकर खुद का और देश का निर्माण करना है या फिर लुंज-पुंज व्यवस्था के तहत छूट और लूट की दुकान सजाए रखनी है। हम इस दुनिया में केवल अकेले देश नहीं है जो कैसा भी विकल्प चुन लेंगे, आज सैकड़ों देश हमारी ताक में बैठे हैं कि कब यहाँ पुरानी लुंज-पुंज व्यवस्था लागू हो और हम देश को ही हड़प लें। वैसे भी जब बेईमान लोग धमकाने लगें तो समझ लो कि देश कहाँ खड़ा है! चुनाव आपका है – लुंज-पुंज से लेकर छूट और लूट की दुकान या फिर अनुशासन से निकली सम्मान की दुकान।

जी-हुजूरियें आखिरी दाँव ढूंढ रहे हैं

Written By: AjitGupta - Apr• 20•18

बात 90 के दशक की है, हमारे कॉलेज में जब परीक्षाएं होती थी तब परीक्षा केन्द्रों पर सारे ही अध्यापकों की ड्यूटी लगती थी, लेकिन मेरी कभी नहीं। मैं सोचती थी शायद महिला होने के कारण मुक्ति मिल जाती होगी लेकिन फिर बाद में महिला होने के कारण ही लगने लगी, क्योंकि परीक्षा तो बालिकाएं भी दे रही होती थी। तब में देखती कि कुछ लोगों की नियमित ड्यूटी लगती है लेकिन कुछ लोगों की नहीं। मुझे प्रशासन से प्रश्न पूछने का फितूर है, उसका परिणाम भुक्ता भी बहुत है, तो तब भी पूछ लिया कि कुछ लोगों की ड्यूटी लगे और कुछ की नहीं? यहाँ यह भी देखने की बात थी कि उस समय ड्यूटी देने पर 10 रू. मिलते थे और इन्हीं 10 रूपयों के कारण लोगों का चयन होता था। मेरे प्रश्न पर एक ने कहा कि जो लोग हमारे नहीं, हम उन्हें किसी भी प्रकार का लाभ नहीं देते। जब प्रशासन का फार्मूला पता लगा तो सभी जगह यह दिखायी दिया। केवल मुठ्ठी भर लोग ही फायदों की जगह दिखायी देते बाकि सारे ही सामान्य प्रजा की तरह रहते। देश की राजनीति की चाल भी यही थी, जो सरकार के जी-हुजूरिये उन्हें ही सरकारी लाभ मिले शेष तो केवल प्रजा। देश की आजादी के बाद से यही सिलसिला चला और एक ही घराने का राजकाज होने के कारण लोकतंत्र की जगह राजतंत्र ही दिखायी देने लगा। हर क्षेत्र में एक वर्ग खड़ा हो गया, जो सारे लाभों का हकदार था। योजनाएं इतनी बनी और पुरस्कार व सम्मानों की बाढ़ आ गयी, अपने जी-हुजूरियों के लिये ही ये सारी थीं। 50 साल में जी-हुजूरियें पक्के हो गये, सभी को आदत हो गयी कि ये ही है समाज के सितारे। फिर धीर-धीरे शासन बदलने लगा और राजतंत्र से निकलकर लोकतंत्र की ओर बढ़ने लगा तब जाकर कहीं इन जी-हुजूरियों की जगह आम जनता को भी लाभ मिलने लगा। लेकिन जैसे ही मेरे जैसा एक आम व्यक्ति उस पंक्ति में खड़ा हुआ, चारों तरफ से शोर मच गया। जी-हुजूरियों को तो तनिक भी नहीं भाया लेकिन आम जनता भी उन जी-हुजूरियों को ही बुद्धीजीवी मान बैठी थी तो उनने भी प्रश्न खड़े कर दिये। अब प्रश्न भी बुद्धिमत्ता पर नहीं लेकिन बस शुरू कर दी छिछालेदारी।
2014 में आया मोदी-राज, अब तो पूर्ण लोकतंत्र लागू हो गया। कोई जी-हुजूरियें नहीं, बस योग्यता ही पैमाना। जहाँ सरकार की योजनाओं और पुरस्कार-सम्मान पर केवल इन जी-हुजूरियों का ही कब्जा था, नहीं रहा और लोकतंत्र स्थापित होने लगा। चारों तरफ से शोर मचने लगा कि हम कहाँ, हम कहाँ? जिन मंचों पर केवल वे थे अब समाज का प्रबुद्ध वर्ग दिखायी देने लगा, जिन योजनाओं पर आम गरीब व्यक्ति का हक था, अब योजना का लाभ उसे मिलने लगा तो शोर मचना लाजिमी था। लाखों गैस कनेक्शन फर्जी, लाखों राशन कार्ड फर्जी और न जाने क्या-क्या फर्जी। न जाने कितने व्यापारी कमीशन दलाल के रूप में काम कर रहे थे, अब उनका कमीशन बन्द। शोर यह भी मचा कि शासन में नया क्या है, सब तो हमारे जमाने का है। सच भी है, नया विशेष नहीं, बस योजनाएं लागू करने में नवीनता होने लगी। अब एक वर्ग का स्थान आम व्यक्ति ने ले लिया था तो यह विशेष वर्ग हरकत में आ गया। पत्रकार से लेकर साहित्यकार, वकील से लेकर न्यायाधीश, व्यापारी से लेकर दलाल, सारे ही शोर मचाने लगे। उन्हें ऐसा लग रहा है कि उनकी आँखों के सामने ही उनका खजाना आम जनता में बंट रहा हो! जिसपर केवल उनका हक था, वह हक सबका हो गया, यह तो घोर अनर्थ हो गया। वे लोग पैसे से भी गये और विशेष वर्ग की पहचान से भी। अब रोज भी नये उपद्रवों की खोज की जाने लगी, कभी थाणे में राजनीति तो कभी न्यायालय में राजनीति! संसद में केवल शोर-शराबा! क्योंकि ना तो प्रश्न थे और ना ही बहस के लिये विचार थे। कैसे कहें कि यह सब हमारा था, उसे कैसे निर्ममता से जनता में बांट रहे हो, तो संसद में केवल शोर रह गया। न्यायालय में केस दर्ज होने लगे, सोचा था कि अपने ही जज हैं तो न्याय के माध्यम से ही राजनीति कर लेंगे लेकिन जज महोदय ने तो साफ आईना दिखा दिया कि यह न्याय का मन्दिर है, यहाँ राजनीति नहीं चलेगी।
जी-हुजूरियें आखिरी दाँव ढूंढ रहे हैं, कैसे भी शासन वापस अपने ही हाथ में आ जाए और फिर चाहे 10 रू वाली परीक्षा में ड्यूटी हो या फिर विदेश-यात्राओं से लेकर पुरस्कार-सम्मान की बंदर-बांट। जिन जी-हुजूरियों को खास बनाया गया था, बस वे ही देश के फलक पर दिखने चाहिये, बाकि तो सब मच्छर है। 2019 तक देश में यही दृश्य रहने वाला है, सारे ही प्रलाप को तैयार हैं। एक प्रलाप में दम नहीं तो दूसरे दिन ही दूसरा प्रलाप तैयार मिलेगा। हम प्रलाप करने में माहिर हैं, इतना तो कर ही देंगे कि लोग कहने लगें कि बाबा मैं तो भूखा ही रह लूंगा, ले देश की रोटी तू ही खा ले। जैसे गाँधीजी के सामने रोटी फेंकी गयी थी कि तू रोटी खा, उपवास मत कर, हम ही मर जाएंगे। सावधान रहना होगा, क्योंकि ये आम जनता को भी टुकड़ा डालेंगे कि तुम हमारे साथ आ जाओ, हम तुम्हें भी खास की लाइन में खड़ा कर देंगे। बड़ा होना कौन नहीं चाहता! दूसरों के सामने सम्मान कौन नहीं चाहता! बस इसी का फायदा उठाया जाएगा और लोगों का अपने पक्ष में किया जाएगा। बचना बाबा इन जी-हुजूरियों से।

औरंगजेब के काल की याद आ रही है

Written By: AjitGupta - Apr• 17•18

पिछले कई दिनों से रह-रहकर औरंगजेब के काल की याद आ रही है, देश के किसी मन्दिर को बक्शा नहीं गया था और ना ही ऐसी कोई मूर्ति शेष रही थी जो तोड़े जाने से बच गयी हो। घर में भी पूजा करना दुश्वार हो गया था, लोग चोरी-छिपे पूजा करते थे और खुश हो लेते थे। लोगों के पास से मन्दिर बनाने का काम चुक गया तो लोग अपने परिवार बनाने लगे, परिवारों में मनुष्य तैयार होने लगे और देखते ही देखते औरंगजेब का काल समाप्त हो गया और मुगल सल्तनत का चाँद भी सूरज की रोशनी में कहीं खो गया। अंग्रेज आए, फिर मन्दिर बनने प्रारम्भ हुए और इस बार आर्य समाज ने सावचेत किया कि मूर्तियों से प्यार मत करो, अपितु देश से प्यार करो। विवेकानन्द ने भी कहा कि 50 साल तक सारे भगवानों को भूल जाओ और केवल भारत माता का स्मरण करो। लेकिन भारतीय मन नहीं माना और स्वतंत्रता के बाद तो मन्दिरों की बाढ़ सी आ गयी। आज सारे ही सम्प्रदाय के साधु-सन्त मन्दिर बनाने में होड़ कर रहे हैं, समाज का बेशकीमती पैसा और समय केवल मन्दिर बनाने में लग रहा है। लोग कह रहे हैं कि हिन्दू समाज शीघ्र ही अल्पसंख्यक होने वाला है, शायद 25-30 सालों में हो ही जाएगा। तो फिर वही प्रक्रिया दोहरायी जाएगी, मन्दिर टूंटेंगे और मूर्तियां टूटेंगी। एक तरफ मूर्तियां प्रतिष्ठित हो रहीं हैं और दूसरी तरफ मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ा है। मन्दिरों के कंगूरे सोने से मंड रहे हैं तो परिवार के आंगन समाप्त हो रहे हैं। समाज और देश को बचाने की मानसिकता ही परिवारों के साथ अवसान पर है।
राम मन्दिर निर्माण के लिये हम जोर-शोर से आवाज उठा रहे हैं, यदि मन्दिर 2-5 साल में बन भी गया तो 25-30 साल बाद शायद सबसे पहले यही टूटेगा। कोई भी औरंगजेब हमारी आस्था पर आघात ना कर पाए, हमें वह काम करना चाहिये ना कि सारा ध्यान मन्दिर बनाने में लगाना चाहिये। चारों तरफ से हिन्दू समाज पर आक्रमण हो रहा है, सामने वाले को बहुत जल्दी है, देश को बुत-विहीन करने की लेकिन हमें बुत बनाने से फुर्सत ही नहीं। देश में ऐसी-ऐसी समस्याओं ने जन्म ले लिया है, जो शायद किसी अन्य देश में हों। लेकिन हम आँखे मूंदे बस मन्दिर बना रहे हैं। हमारे पूर्वजों को कोई गाली देता है तो हम उनके पूर्वजों को गाली देने लगते हैं, यह नहीं देखते कि हम सब के पूर्वज एक ही हैं, हम खुद को ही गाली दे रहे हैं। लोग लिख रहे हैं कि सम्भलों हिन्दू, सम्भलों। लेकिन क्या कोई हिन्दू सम्भलने को तैयार है? तैयार तो तब हो जब कोई हिन्दू हो! यहाँ तो कोई हिन्दू है ही नहीं। सभी अपने-अपने सम्प्रदाय में विभक्त हैं। जैसे किसी जमाने में यहूदियों को समाप्त किया गया वैसे ही हिन्दुओं का हश्र होने वाला है। यहूदियों के समान ही फिर वे लोग जो हिन्दू से पहचान बताने में गौरव का भाव रखते हैं, पुन: एकत्र होंगे और इजरायल की तरह भारत के किसी कोने में नया भारत बनाएंगे। फिर वह नया भारत ऐसा सशक्त होगा कि उसकी तरफ कोई आँख उठाकर देखने की हिम्मत कोई भी नहीं कर पाएगा। तब तक शायद हम सब मन्दिर ही बनाते रहेंगे और मन्दिरों में मूर्तियां सजाते रहेंगे। उन्हें जल्दी है हमें मिटाने की और हमारे पास फुर्सत ही फुर्सत है। हमें गुलामी का अनुभव है तो अब गुलाम होने से डर भी नहीं लगता, सोचते हैं कि जैसे पहले के काल निकल गये, फिर निकल जाएंगे। आज साधु-संन्यासियों के पैरों में लौटते हैं तो कल हुक्मरानों के पैरों में लौट लेंगे, क्या अन्तर आएगा! हम तो पूजा करने वाले लोग हैं, तो इनकी ना सही तो उनकी कर लेंगे। हम किसी की नहीं सुनेंगे क्योंकि हमें उस अनजान सफर के लिये निकलना है, जिसका अता-पता तक हमारे पास नहीं है लेकिन जिस धरती का सच हमारी आँखों के सामने हैं, उसे जल्दी से जल्दी त्याग देना चाहते हैं। इस धरती से पीछा छुड़ाने का मंत्र एक ही है कि मन्दिर बनाओ और मूर्तियों की पूजा करो। चलिये समाप्त करती हूँ, आप सभी को मन्दिर जो जाना होगा।

हर मन में हमने हिंसा को कूट-कूटकर भर दिया है

Written By: AjitGupta - Apr• 16•18

यह शोर, यह अफरा-तफरी मचाने का प्रयास, आखिर किस के लिये है? एक आम आदमी अपनी रोटी-रोजी कमाने में व्यस्त है, आम गृहिणी अपने घर को सम्भालने में व्यस्त है, व्यापारी अपने व्यापार में व्यस्त है, कर्मचारी अपनी नौकरी में व्यस्त है लेकिन जिन्हें खबरे बनाने का हुनर है बस वे ही इन सारी व्यस्तताओं को अस्त-व्यस्त करने के फिराक में रहते हैं, कैसे भी दुनिया में उथल-पुथल मचे, बस इनका उद्देश्य यही रहता है। आप दिनभर लोगों से मिलिये, कोई खबरों पर चर्चा नहीं कर रहे होते हैं, बस एकाध बुद्धीजीवी मिल जाएंगे जो ऐसे चिंतित हो रहे होंगे जैसे भूचाल आ गया हो। सारी दुनिया शान्त है लेकिन पत्रकार और कुछ बुद्धिजीवी ता-ता-थैया करते फिर रहे हैं। ये व्यस्त दुनिया जो दिन में एकाध मिनट के लिये समाचार देख लिया करती थी, अब उसने एकाध मिनट को भी बाय-बाय कह दिया है। कुछ तो टीवी ही नहीं खोलते, या खोलते भी हैं तो अपने पसंदीदा सीरीयल देखे और झांकी बन्द। ये पत्रकार सोचते हैं कि हम जनता को भ्रमित कर लेंगे लेकिन जनता भ्रमित नहीं होती। हमें लगता है कि केण्डल मार्च निकालने वाले या धरना देने वाले सैकड़ों लोग थे लेकिन ये दल विशेष के कार्यकर्ता ही रहते हैं, जनता यहाँ नहीं होती है। असल में हम जनता को प्रभावित ही नहीं कर पाते, जनता अपने हिसाब से चलती है। आज देश में सारे वादों को लेकर कई संगठन हैं, जो अपने-अपने जाति और धर्म के लिये बने हैं लेकिन उन सारे ही संगठनों के काम पर दृष्टि डालिये, ये केवल अखबारों में होते हैं या मिडिया की चौपाल पर रहते हैं, बाकि इनका वजूद आम जनता के बीच नहीं है। यदि इन सारे ही संगठनों का एक साल तक मीडिया संज्ञान ना ले तो लोग इनका नाम तक भूल जांएगे।
दस दिन से राष्ट्र मण्डल खेल चल रहे थे, देश के खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, देश में इनकी चर्चा होनी चाहिये थी लेकिन अच्छाई के लिये समय नहीं है, जब की जनता के पास अच्छाई के लिये ही समय है। जनता जानती है कि जिन घटनाओं को मुद्दा बनाकर अच्छाई को ढकने का प्रयास किया जा रहा है, वे घटनाएं मनुष्य की मानसिकता से जुड़ी हैं और अनादि काल से चली आ रही हैं, किसी भी देश में ये आज तक नहीं रुकी हैं। इन घटनाओं को मुद्दा बनाकर नहीं अपितु सामाजिक जागरण से रोकथाम सम्भव है। दुनिया के सारे ही देश यौन-विकृति वाली मानसिकता से ग्रसित हैं और कल तक भी थे। हम किसी को भी उपदेश देने में सक्षम नहीं हैं और ना ही किसी को भी सुधारने में, बस पहल स्वयं से ही करनी है। हमारा बचपन भी आम बालिकाओं की तरह ही बीता, जहाँ कदम-कदम पर यौन शोषण का खतरा मंडराता रहता था। यौन शोषण करने वाले लोग आसपास से भी आते थे और अनजाने लोग और दूरदराज से भी। जैसे ही एक बालिका में समझ आने लगती है, सबसे पहले उसके मन में यौन-हिंसा के प्रति डर पैदा हो जाता है। वह जानती तक नहीं कि यौन-हिंसा होती क्या है लेकिन वह पुरुष का दूषित स्पर्श पहचान लेती है। समाज में शरीफ से शरीफ दिखने वाला व्यक्ति भी मौका मिलने पर दूषित मानसिकता से ग्रसित हो जाता है। इसलिये परिवारों को सावधान रहने की आवश्यकता है। बालिका हमारे लिये उस हीरे के समान है जो कीमती है और जरा सा आघात लगने पर उसकी कीमत का कोई मूल्य ही नहीं रह जाता है। इसलिये परिवारों को सावधानी की जरूरत है और बालिकाओं को भी सावचेत करते रहने की जरूरत है। परिवार के बालकों में यौन आकर्षण और हिंसा दोनों के अन्तर को भी बताते रहने की जरूरत है। किसी भी बालक को इतनी स्वच्छंदता ना दें कि वह हिंसक तक बन जाए और समाज में हिंसा को बलवती कर दे। इसलिये आज बालिका से अधिक बालकों पर ध्यान देने की जरूरत है।
पत्रकारों के लिये भी सनसनी बनाने पर रोक लगनी चाहिये, झूठी खबरे तो यौन हिंसा से भी खतरनाक है और इन पर कठोर दण्ड का प्रावधान होना चाहिये। कोई भी किसी के लिये झूठ प्रचारित करता है तो केवल माफी मांग लेने के न्याय समाप्त नहीं होना चाहिये अपितु यह यौन-हिंसा के समान ही कठोर दण्ड का अधिकारी होना चाहिये। आज शोर मचाने का सिलसिला बनता जा रहा है, अवधि पार होने पर पता लगता है कि शोर जिस बात पर था, मामला कुछ और था। लेकिन तब तक समाज में वैर स्थापित हो चुका होता है। चारों तरफ से तलवारे खिंच चुकी होती हैं, गाली-गलौच का वातावरण बन चुका होता है फिर चुप्पी होने से भी कुछ नहीं होता है। नफरत की दीवार ऊंची हो गयी होती है। इसलिये जो खुद को बुद्धीजीवी कहते हैं, उन्हें ऐसे शोर से बचना चाहिये। कुछ भी बोलने से बचने चाहिये और कुछ भी लिखने से बचना चाहिये। अपनी वफादारी सिद्ध करने के लिये जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। आपकी वफादारी किसी एक दल के प्रति ना होकर समाज और देश के प्रति होनी चाहिये और सबसे अधिक मानवता के लिये होनी चाहिए। हमें लिखने की जो आजादी मिली है, उसके दुरुपयोग से बचना चाहिये। यौन-हिंसा से एक व्यक्ति पीड़ित होता है लेकिन झूठ के प्रचार से सारा समाज और देश पीड़ित होता है। कभी हम हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं, कभी सवर्ण-दलित करने लगते हैं, कभी स्त्री-पुरुष तो कभी फलाना-ढिकाना। कोई अन्त ही नहीं है इस हिंसा का। हर मन में हमने हिंसा को कूट-कूटकर भर दिया है, इसपर लगाम लगानी होगी।