अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

कहाँ सरक गया रेगिस्तान!

Written By: AjitGupta - Nov• 15•18

बचपन में रेत के टीले हमारे खेल के मैदान हुआ करते थे, चारों तरफ रेत ही रेत थी जीवन में। हम सोते भी थे तो सुबह रेत हमें जगा रही होती थी, खाते भी थे तो रेत अपना वजूद बता देती थी, पैर में छाले ना पड़ जाएं तो दौड़ाती भी थी और रात को ठण्डी चादर की तरह सहलाती भी थी। लेकिन समय बीतता रहा और रेत हमारे जीवन से खिसक गयी, हमने मुठ्ठी में बांधकर रखी थी कुछ रेत लेकिन वह ना जाने कब हथेली को रिक्त कर चले गयी। लेकिन हमें ललचाती जरूर रही और जब भी बालू-रेत के टीले निमंत्रण देते, हम दौड़कर चले जाते। इस बार टीलों ने हमारे जन्मदिन पर निमंत्रण दिया, लगा की बचपन को साकार कर लेंगे और दौड़ पड़े हम परिवार सहित जैसलमेर के धौरों के निमंत्रण पर। काली चमचमाती सड़क पर हमारी गाड़ी दौड़ रही थी लेकिन हम सड़क के बाजुओं में टीलों को खोज रहे थे जो कभी हठीले से बनकर सड़क पर आ धमकते थे। निगाहें बराबर टिकी थी लेकिन रेत ने सड़क को हथियाया नहीं। हम आगे बढ़े और जैसलमेर के सम तक जा पहुंचे, फटाफट अपने टेण्ट में सामान रखा और एक खुली जीप में ऊंट सी चाल में टीलों के बीच जा पहुंचे। बच्चे लोग ऊंट का आनन्द लेकर पहुंचे। जीप वाला बोला कि लो आ गया सम, याने जैसलमेर का जहाँ रेगिस्तान है। हैं! हमें आश्चर्य ने घेर लिया! तीस साल पहले आए थे तो रेत का समुद्र हुआ करता था और आज तो तालाब सा भी नहीं है! हम बावले से हो गये, हर आदमी से पूछने लगे कि कहाँ गया रेगिस्तान! होटल का वेटर बोला की यही तो है रेगिस्तान! अरे नहीं, हम तीस साल पहले आए थे तब दूर-दूर तक बस वही था। वह हँस दिया और बोला कि मेरी उम्र भी इतनी नहीं है तो मैं कैसे बताऊं कि तब क्या था! हम पूछे जा रहे थे और लोग टुकड़े-टुकड़ों में बता रहे थे कि नहर आ गयी, बरसात आ गयी और रेत माफिया सक्रीय हो गये। रेत के टीले अब खेत में बदल गये, हरियाली छा गयी और रेगिस्तान 100 किमी. दूर जा पहुंचा। हमारा मन उचट गया, कहाँ समुद्र देखने का ख्वाब पाले थे और कहाँ तालाब के किनारे ही बैठकर खुश होने का स्वांग कर रहे हैं। कभी धोरों पर गायकी होती थी और अब रिसोर्ट पर होने लगी है। कुदरत की जगह कृत्रिम सा वातावरण बना दिया गया है। सुन्दर से टैण्ट आ गये हैं, रेत के धोरों वाला नरम बिस्तरा नहीं है, टीलों पर चढ़ना और फिसलना नहीं है, बस एक परिधि है उसमें ही सारे आनन्द लेने हैं। रात को नींद तो आयी लेकिन सुबह फिर तारों भरे आकाश को देखने के लिये नींद विदा हो गयी। तारे चमचमा रहे थे और हमें सुकून दे रहे थे, मैं वहीं कुर्सी डालकर बैठ गयी कि इन तारों के सहारे ही रेगिस्तान तक संदेश पहुंचा देती हूँ कि तुम बहुत प्यारे थे। दूर जा बैठे हो, अब क्या पता जब कभी आना हो तो तुम हमारे देश की सीमा में भी रहो या नहीं। लेकिन खैर, तुम दूर चले गये हो, कोई बात नहीं, यहाँ के लोग खुश हैं। जिन बच्चों के कभी बरसात के मतलब बताने में पसीने छूटते थे अब वे हर साल आती बरसात से परिचित हैं। केर-सांगरी का खाना अब फैशन बन गया है, अब तो ढेर सारी हरी सब्जियां उपलब्ध है। रेगिस्तान दूर जा बैठा लेकिन पर्यटक बाढ़ की तरह बढ़े जा रहे हैं। कहीं तिल धरने को भी जगह नहीं। जैसलमेर के किले पर जाना असम्भव हो गया आखिर हारकर बेटी-दामाद से कहा कि तुम ऑटो लेकर किले पर जाओ। वे भी जैसे-तैसे भीड़ को चीरते हुए आधा-अधूरा सा किला देखकर आए और मन की प्यास अधूरी ही छोड़ आए। शहर में हमारी गाडी घूमती रही लेकिन कहीं जाने का मार्ग उपलब्ध नहीं, रेस्ट्रा भी सारे भीड़ से पटे हुए, आखिर वापस होटल की शऱण ली और वहीं खाने का ऑर्डर किया। हमने तो रेगिस्तान को मुठ्ठी भर रेत में तब्दील होते देखा, किले की विशालता को दूर से ही नमन कर लिया और पटुओं की हवेली तो पुरानी यादों से निकालकर ताजा कर लिया।
लेकिन एक गांव देखा – कुलधरा गाँव। उजड़ा हुआ लेकिन अपने में इतिहास समेटे हुए। पालीवाल ब्राह्मणों का गाँव जो रातों-रात उजड़ गया। कोई कहता है कि एक मुस्लिम मंत्री के कारण रातों-रात पलायन हो गया, कोई कहता है कि भूकम्प आ गया। लेकिन अब लोग भूत-प्रेत तलाश रहे हैं। राजस्थान सरकार ने पर्यटन स्थल का दर्जा देने के कारण यहाँ पर्यटक बड़ी संख्या में आने लगे हैं। लेकिन लग रहा था कि लोग इतिहास को जानने नहीं बस भूत देखने आ रहे थे!
जैसलमेर में एक अद्भुत और रोमांचित करने वाला वार-म्यूजियम भी है और इसी के साथ रात को होने वाला प्रकाश और ध्वनि कार्यक्रम भी अनूठा है। लोंगेवाला का युद्ध साकार हो उठता है और हमारे वीर सैनिक, बोर्डर फिल्म की कहानी के पात्रों के माध्यम से जीवित हो उठते हैं। पर्यटकों को इसे अवश्य देखना चाहिये। जैसलमेर की कहानी लम्बी है लेकिन अभी यही विराम।

अतिथि तुम कब जाओगे?

Written By: AjitGupta - Oct• 26•18

जब बच्चे थे तब भी दीवाली की सफाई करते थे और अब, जब हम बूढ़े हो रहे हैं तब भी सफाई कर रहे हैं। 50 साल में क्या बदला? पहले हम ढेर सारा सामान निकालते थे, कुछ खुद ही वापस ले लेते थे, कुछ भाई लोग ले जाते थे और जब थोड़ा बचता था तो वह कचरे के डिब्बे में जाता था। जैसे ही पिताजी की नजर कचरे के डिब्बे में जाती थी, वह सूतली उठा लेते थे और कहते थे कि यह तो बड़े काम की है, इसे कैसे फेंक दिया! आज भी यही हो रहा है, पहले केवल धूल ही कचरे में बच पाती थी और आज थोड़ी थैलियां और जुड़ गयी हैं। धीरे-धीरे करके एक-एक चीजें वापस अपने ठिकाने बिराज जाती हैं। कोई ना कोई इनकी तरफदारी करने आ ही जाता है। इस बार पुराने कपड़ों का ढेर निकाल डाला लेकिन फिकने में नहीं आ रहा। फेंके भी तो कहाँ? फेंकते समय हर चीज काम की लगती है और अगले साल फिर वही चीज फेंकने वाली लिस्ट में होती है, बरसों बरस यह क्रम चलता ही रहता है और इन्हें कोई ना कोई प्रशान्त भूषण सा वकील मिल ही जाता है। देश का कचरा देश में ही स्थापित हो जाता है।
आज एक अलमारी खोली गयी, सामान ढूंसकर भरा था। यह कहाँ से आया? बिजली के कुछ बोर्ड बदलवाए गये थे और पुरानों को अल्मारी में बकायदा स्थान दे दिया गया था। जैसे ये सीनियर सिटिजन हों और उनके लिये एक कोठरी बना दी जाये! जब पुराने को बदल ही दिया गया है तो उसे सुरक्षित म्यूजियम बनाकर रखने की क्या आवश्यकता है? लेकिन हमारी मानसिकता में फेंकना तो मानो गुनाह है। मैंने अल्मारी खाली कर दी लेकिन वह सामान किसी दूसरे स्टोर में जगह पा ही जाएगा, यह निश्चित है। अच्छा कुछ सामान तो कबाड़ी भी नहीं खऱीदता, वह कहता है कि किसी काम का नहीं। लेकिन फिर भी हमारे यहाँ बिराजमान है। मेरी सबसे बड़ा समस्या है मोमण्टो। कबाड़ी कहता है कि नहीं ले जाता, अल्मारी कहती है कि किस-किस को समेटूं और किस-किस को याद रखूं। देश में भी ना न जाने कैसी-कैसी प्रथा बन जाती है! देने वाले के पैसे खर्च होते हैं और लेने वाले की समस्या बन जाते हैं। उपहार देना फैशन से भी बढ़कर आवश्यकता बन गया है, उपहार के बदले फिर वापसी में उपहार! कई बार तो लगता है कि हम सामान के बीच किसी खांचे में रहते हैं। जैसे सारे शऱीर में हड्डियों का जाल और बेचारा नन्हा सा दिल एक कोने में चुपचाप धड़कता रहता है। 18 बाय 22 के कमरे में हम सामानों से घिरे हैं और हमारे लिये बामुश्किल 5-6 फीट की जगह बची है। अल्मारी में सामान और पुस्तकें बढ़ती जाती हैं। दीवाली पर जब कुछ जगह बनाने की सोचते हैं तो कुछ किताबें ही फालतू के रिश्तों जैसे बाहर हो जाती हैं। बिग-बॉस के घर में बेचारी कविता की किताबों के कोई जगह नहीं होती। पत्रिकाएं तो महिने भर भी अपनी जगह स्थिर नहीं रख पाती, फिर चाहे उनके पन्नों में हम ही क्यों ना बैठे हों। यह तो भला हो कैमरे के डिजिटल होने का, नहीं तो ना जाने कितने नेगेटिव पड़े-पड़े अपने कालेपन को धोने को बेताब रहते। अब हम लेपटॉप को भरते रहते हैं। लेपटॉप की जगह दुनिया के एक कोने में कहीं सुरक्षित है, जिसका हमें भी नहीं पता है। कभी दुनिया नष्ट होगी और फिर आबाद होगी तो यह भूतिया महल लोगों के लिये आश्चर्य का कारण बनेगा! सारे दुनिया के डेटा यहाँ भरे हैं, लोग इस पहेली को हल करते-करते ना जाने कितनी सदियां निकाल देंगे। इस इलेक्ट्रोनिक कचरे की सोचकर तो मुझे कुछ राहत सी मिली है, मेरे पास तो एकाध अल्मारी में ही उछल-कूद मचाए है लेकिन दुनिया में ना जाने कितने देश की जगह ये लील रहे हैं! हम कहते हैं कि हर चीज नश्वर है, जो आया है वह जाएगा लेकिन इन्हें कैसे भस्मीभूत करें, समस्या बने हुए हैं! लगता है अलादीन का चिराग है, बोतल से निकलते ही समस्या कर देता है। कहाँ से लाएं वह बोतल, जिसमें कचरे को भर दें और ढक्कन लगाकर समुद्र में फेंक दें। हे! फालतू सामानों, तुम्हें हम कचरा कहते हैं, हमारे घर से, हमारे मन से निकलने का जतन करो। हमने यह मकान अपने लिये बनवाया था और तुमने इसपर अधिकार जमा लिया है। तुम क्यों उस अतिथि की तरह हो गये हो जिसे कहना पड़ता है – अतिथि तुम कब जाओगे? लेकिन तुम तो हमारे मन में बस गये हो, तुम्हें कैसे निकालें। मैं निष्ठुर हो जाती हूँ और बंगलादेशी समझकर बाहर कर देती हूँ लेकिन तभी पतिदेव प्रशान्त भूषण को अपने साथ ले आते हैं और स्टे लग जाता है। बचा ले मुझे!

इस ओर ध्यान दीजिए माननीय

Written By: AjitGupta - Oct• 25•18

यह जो श्रद्धा होती है ना वह सबकी अपनी-अपनी होती है, जैसे सत्य सबके अपने-अपने होते हैं। अब आप कहेंगे कि सत्य कैसे अलग-अलग हो सकते हैं? जिसे मैंने देखा और जिसे मैंने अनुभूत किया वह मेरा सत्य होता है और जिसे आपने देखा और आपने अनुभूत किया वह आपका सत्य होता है उसी प्रकार श्रद्धा भी अपनी अनुभूति का विषय है। इसपर विवाद करना ऐसा ही है जैसे भारत में बैठकर मैं कहूँ कि अभी दिन है और अमेरिका में बैठकर आप कहें कि अभी रात है और दोनों ही विवाद में उलझे रहेंगे, परिणाम कुछ नहीं निकलने वाला। न्यायालय के फैसले इसी सत्य पर आने चाहिये। पटाखे चलाना पर्यावरण को हानि पहुंचाता है, यह सच है, जैसे परमाणु बम्म विनाश करता है, यह भी सच है। इसलिये पटाखे ऐसे बनाए जाएं जो पर्यावरण को हानि नहीं पहुंचाएं। बहुसंख्यक आबादी को समझाना कठिन है लेकिन पटाखे बनाने वाले कम संख्या की कम्पनी को समझाना आसान है। पटाखे उल्लास का प्रतीक हैं तो जरूरी नहीं कि तेज आवाज करने वाले और ज्यादा धुआँ छोड़ने वाले पटाखे ही चलाए जाएं। न्याय का काम है कि वह जनता का दृष्टिकोण पर्यावरण की ओर मोड़े ना कि धार्मिकता की ओर। किसी त्योहार विशेष पर जब आप कानून लागू करते हैं तब वह श्रद्धा पर केन्द्रित हो जाता है। और फिर व्यक्ति प्रतिक्रिया में कानून अधिक तोड़ता है।
पुणे और बैंगलोर ऐसे शहर रहे हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से उत्तम थे लेकिन आज वहाँ के क्या हाल हैं? कभी जिन शहरों में घरों में सीलिंग फैन तक नहीं हुआ करते थे आज एसी लग रहे हैं। बड़ी-बड़ी कम्पनियां इन दोनों शहरों में आगयी हैं और इनके ऑफिस पूर्णतया वातावुकूलित हैं। इन शहरों में कम्पनी लाने का कारण ही यह था कि यहाँ का तापमान कम रहता है लेकिन हमने एसी लगाकर तापमान की ऐसी की तैसी कर दी। शहर में परमाणु बम्म डाल दिया और पटाखे चलाने से मना करते हो! यदि कम्पनियाँ आयी थी तो उनकी बिल्डिंग बिना एसी की होनी चाहिये थी, खुली-खुली। लेकिन जब माननीय न्यायालय जाग नहीं रहे थे और ना ही सरकारें जाग रही थीं, अब जब हम आकण्ठ प्रदूषण से डूब रहे हैं तब तिनका उठाने की बात करते हैं! यह उपाय पर्यावरण की रक्षा तो नहीं कर पाएंगे उल्टा सामाजिक प्रदूषण को बढ़ा जरूर देंगे। आज भी समय है यदि हम इन बड़ी कम्पनियों से कहें कि कम करिये एसी के प्रदूषण को तो शायद आने वाले खतरों से बच पाएंगे।
हम सारे काम उल्टे करते हैं, सीधे नाक पकड़ने की जगह घुमाकर नाक पकड़ते हैं। तकनीकी का उपयोग कितना और कहाँ जरूरी है, इसपर मंथन नहीं करते बस छोटे टोटके करते हैं। दिल्ली में पेट्रोल की समस्या से निजात सीएनजी ने दिलायी थी तो ऐसे ही जागृति से काम होंगे। न्यायालय का सभी श्रद्धा के स्थानों पर धकल देना देशहित में नहीं है। जैसे पहले ज्यूरी की व्यवस्था होती थी वैसे ही श्रद्धा के मामलों पर ज्यूरी को निर्णय देना चाहिये जो समग्रता से न्याय दें। अकेले कानून थोपने से व्यवस्थाएं सुधरने वाली नहीं हैं। सामाजिक मुद्दों पर समाज द्वारा ही निर्णय आने चाहिये। न्यायालय का कार्य केवल कानून की अवलेहना में न्याय देना होना चाहिये। शेष सारे ही सामाजिक और श्रद्धा से जुड़ी समस्याओं को ज्यूरी बनाकर हल करना चाहिये। देखना इस दीवाली पर पटाखे सारी रात चलेंगे, कोई नहीं रोक पाएगा। एक गरीब बालक एक बम्म की लड़ी फोड़कर खुश हो लेता है और सारे साल के अभाव को भूल जाता है। उसे नहीं समझ आता कि मेरे एक पटाखे से कैसे खतरा पैदा हो जाता है जबकि सड़क पर चलती लाखों गाड़ियों से खतरा दूर से ही विदा हो लेता है! वह समझ नहीं पाता कि उसकी एक पतंग से कैसे जीव-हत्या हो जाती है जबकि शहर में रोज ही लाखों पशुओं को मारकर खाया जाता है। वह समझ नहीं पाता कि रंगों से कैसे नुक्सान होता है जबकि रंगों से क्या कपड़ें और क्या घर रोज ही रंगे जाते हैं! ऐसे कितने ही प्रश्न हैं जो हर व्यक्ति के मन में आते हैं, जब समझ नहीं आते तो पटाखे को फोड़कर विरोध दर्ज कराता है। यही विरोध पर्यावरण का दुश्मन है, इस ओर ध्यान दीजिए माननीय।

मैं इसे पाप कहूंगी

Written By: AjitGupta - Oct• 23•18

अभी शनिवार को माउण्ट आबू जाना हुआ, जैसे ही पहाड़ पर चढ़ने लगे, वन विभाग के बोर्ड दिखायी देने लगे। “वन्य प्राणियों को खाद्य सामग्री डालने पर तीन साल की सजा”, जंगल के जीव की आदत नहीं बिगड़नी चाहिये, यदि आदत बिगड़ गयी तो ये सभी के लिये हानिकारक सिद्ध होंगे। आश्चर्य तब होता है जब देखते हैं कि भूखे को रोटी खिलाना पुण्य कार्य है – का बोर्ड लगा होता है। पूरे देश में हर सम्प्रदाय ने भोजनशाला संचालित कर रखी है, जहाँ लाखों लोग प्रतिदिन मुफ्त की रोटी तोड़ते हैं। धार्मिक स्थानों पर तो मुफ्त की रोटी या रियायती दरों पर रोटी मिलना आम बात है। सरकारों को भी बाध्य किया जाता है कि वे भी रियायती दरों पर भोजन उपलब्ध कराए। एक तरफ भिक्षावृत्ती अपराध है लेकिन दूसरी तरफ धर्म के नाम पर जायज है। हमने मनुष्य जीवन प्राप्त किया है, लेकिन क्या हम खुद के लिये रोटी कमाने में भी असमर्थ हैं? सारे देश में मुफ्त रोटी की व्यवस्था करना क्या मनुष्य की आदत बिगाड़ने का काम नहीं है? एक बार अयोध्या जाना हुआ, वहाँ शंकर गढ़ी में प्रतिदिन 5000 लोगों को भोजन खिलाया जाता है। वे 5000 लोग संन्यासी कम और भिखारी ज्यादा हैं, उनकों जिस प्रकार का भोजन मिलता है और उससे वह भिखारी बने हुए हैं, देखकर तरस आता है कि क्या ये लोग मनुष्य कहलाने लायक हैं? किसी को किस का नशा होता है किसी को किसका लेकिन भारत में मुफ्त रोटी का नशा परोसा जा रहा है। लोग पुण्य कमा रहे हैं, भूखे को रोटी देकर। लोग पुण्य कमाना चाहते हैं वन्य प्राणियों को रोटी देकर, लेकिन एक पुण्य पाप बताया गया है और दूसरा पाप पुण्य बताया जा रहा है!
हम कहते हैं कि – अतिथि देवोभव:, लेकिन यह कब और किसके लिये कहा गया था? पूर्व काल में जब बाजार में भोजन नहीं मिलता था, राहगीर गाँव आते थे, रात हो जाती थी तब कहा गया था कि अतिथि को देवता मानकर भोजन कराओ। यह कहीं नहीं कहा गया कि लोगों को मुफ्त की रोटी तोडने के लिये वातावरण बनाओ। देश में बहुत धन्ना सेठ हैं, उनका अकूत पैसा कोठियों में बन्द है, उसका वह सदुपयोग लोगों की आदते बिगाड़ने के लिये कर रहे हैं। हर महिने लोग पहुँच जाते हैं धार्मिक स्थानों पर, खाना मुफ्त मिल जाता है, फिर क्या परेशानी! सड़कों पर भीड़ बढ़ रही है, रेलें भरी पड़ी है, क्योंकि खाना मुफ्त और रहना भी तकरीबन मुफ्त। हर आदमी की आदत बिगाड़ दी गयी है। हम साल में एक बार कहीं घूमने का कार्यक्रम बनाते हैं, बजट देखकर पैर सीमित दायरे में ही फैलाते हैं लेकिन धार्मिक यात्रा करने वाले रोज ही निकल पड़ते हैं। अब तो ये धन्ना सेठ यात्राएं भी मुफ्त कराने लगे हैं! देश की पूरी 125 करोड़ की जनसंख्या इस मुफ्तखोरी की समस्या से ग्रस्त हो गयी है।
हम अमेरिका गये, वहाँ भी इस बीमारी ने पैर पसार लिये हैं। मन्दिर गुरुद्वारे सभी जगह लंगर चल रहे हैं। कुछ युवा तो प्रतिदिन वहीं खाना खा रहे हैं। थोड़ा सेवा कर दी और खाना मुफ्त! कौन करे घर में खटराग! आप लोग मेरे विरोध में कितना ही खड़े हो जाना लेकिन मुझे तो यह कृत्य अमानवीय लगता है। यदि भोजनशाला चलानी ही है तो पैसा पूरा लीजिये, बिना परिश्रम के रोटी तोड़ने की इजाजत नहीं होनी चाहिये। हमने हर व्यक्ति को भिखारी बना दिया है, मैं जब भी ऐसे किसी स्थान पर खाना खाती हूँ तो खुद में भिखारी की गन्ध अनुभव करती हूँ। आप कहेंगे कि पैसा दान कर दो, अरे भाई पैसा तो दान कर दोगे लेकिन मनुष्य को निठल्ला बनाने की प्रक्रिया का क्या करोगे? आज हम शहरों में बन्दरों की समस्या से परेशान रहते हैं, क्यों रहते हैं परेशान? क्योंकि हमने रोटी खिलाकर ही उन्हें जंगलों से दूर कर दिया है, अब वे घरों में आक्रमण करने लगे हैं। एक दिन ऐसा आएगा जब मनुष्य भी घरों में आक्रमण करने लगेगा। आप इसे पुण्य कहते रहिये, लेकिन मैं तो इसे पाप ही कहूंगी।

अब कब 565?

Written By: AjitGupta - Oct• 09•18

हमारा भारत है ना, यह 565 रियासतों से मिलकर बना है। अंग्रेजों ने इन्हें स्वतंत्र भी कर दिया था लेकिन सरदार पटेल ने इन्हें एकता के सूत्र में बांध दिया। ये शरीर से तो एक हो गये लेकिन मन से कभी एक नहीं हो पाए। हर रियासतवासी स्वयं को श्रेष्ठ मानता है और दूसरे को निकृष्ठ। हजारों साल का द्वेष हमारे अन्दर समाया हुआ है, यह द्वेष एक प्रकार का नहीं है. इसके न जाने कितने पैर हैं। कातर या कंछला होता है ना, उसके अनगिनत पैरों जैसे हमारे अन्दर द्वेष हैं। क्षेत्र, भाषा, धर्म, जाति, पंथ, वर्ण, लिंग, वैभव, पद आदि-आदि, न जाने कितने भेद हैं हममें। कदम-कदम पर हम एक दूसरे को आहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। हमारी हर बात में दूसरे के लिये द्वेष है। यही कारण है कि हम खुश नहीं रह पाते। कहने को तो हम सम्पन्न हैं, शिक्षित हैं, ज्ञानवान हैं लेकिन फिर भी खुश नहीं हैं! क्यों नहीं हैं! क्योंकि हम द्वेष से भरे हैं। हमें खुशियाँ दिखती ही नहीं, बस हर घड़ी द्वेष निकलकर बाहर आ जाता है।
हम कहते हैं कि हमारे अन्दर प्रेम का सागर हिलोरे मारता है लेकिन मुझे लगने लगा है कि हमारे अन्दर द्वेष का ज्वालामुखी खदबदाता रहता है। मेरे बगीचे में एक फूल लगा है, उसमें फल के रूप में फलियां लगती हैं और वे फलियां ठसाठस परागकण व बीजों से भरी होती हैं। कभी आपने आक का झाड़ देखा होगा तो उसमें भी जो आक की डोडी होती है वह बीजों और परागकणों से ठसाठस भरी होती है। जैसे ही यह फली पकती है, फट जाती है और इसके अन्दर भरे हुए परागकण व बीज तेजी से उड़ने लगते हैं। आक के डोडे में भी यही होता है। रूईनुमा इन परागकणों की कोई सीमा नहीं होती, ये अनन्त यात्रा पर भी निकल सकते हैं। बस इसी प्रकार हमारे अन्दर जो द्वेष का दावानल खदबदाता रहता है वह जब वातावरण की गर्मी से परिपक्व होता है तब फली की तरह फट जाता है और द्वेष के रेशे न जाने कहाँ-कहाँ तक जा पहुँचते हैं।
हम हर घड़ी दूसरे को आहत करने के लिये सज्ज रहते हैं, इसलिये कुछ लोग इस बात का फायदा उठाते हैं। हमारे लिये कहा जाता है कि यहाँ लोगों को हथियार देने की जरूरत ही नहीं है, लोगों के अन्दर इतना द्वेष भरा है कि वे बिना हथियार के ही एक दूसरे को चीर-फाड़ डालेंगे। जंगल घर्षण से जल उठते हैं, लेकिन यहाँ तो केवल पकी हुई फली पर हाथ रखना है, वह फट जाएगी और उसके परागकण ना जाने कहाँ-कहाँ तक पहुंच जाएंगे! क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद आदि आदि का खेल हमारे यहाँ रोज ही खेला जाता है। हम एक देश में रहते हुए भी बाहरी के तमगे से नवाजे जाते हैं। गुजरात या महाराष्ट्र से बिहारियों को निकालने का मसला तो बहुत बड़ा है लेकिन यहाँ राजस्थान में भी हर शहर में दूसरे शहर का निवासी भी बाहरी हो जाता है। हमारे अन्दर अनेकता के इतने खांचे हैं कि एकता का कोई भी खोल उन्हें समेट ही नहीं पाता है। मजेदार बात यह है कि जितने भी प्रबुद्ध लोग हैं जो इस दावानल के विष्फोट में माहिर हैं वे हमारे अन्दर की आग को तो कभी बुझने नहीं देते हैं लेकिन जो वास्तव में बाहरी हैं, विदेशी हैं, आक्रमणकारी हैं, हमें रौंदनेवाले हैं, हम उनका स्वागत करते हैं। यह कहानी आज की नहीं है, सदियों से यही चल रहा है। हम विदेश आक्रान्ताओं का स्वागत करते हैं और अपनों का विरोध करते हैं। आज भी रोंहिग्या को बसाने की वकालात करते हैं और गुजराती-बिहारी को लड़ाने की जुगत बिठाते हैं।
क्या हम भारतीय कहलाने वाले लोग, अधिक दिनों तक भारतीय रह पाएंगे? मुझे तो लगता है कि हमारे अन्दर जो रियासत जड़ जमाए बैठी है, हम एक दिन उसी में बदल जाएंगे। 565 बने या ज्यादा बने या कम, बनेगे शायद। यदि बंटवारा हुआ तो क्या केवल क्षेत्र का होगा? नहीं अभी तो धर्म है, सम्प्रदाय है, वर्ण हैं और भी बहुत कुछ है। कितने बंटेंगे हम? हमारे द्वेष का घड़ा कितनी बार फूटेगा? कितना जहर धरती पर फैलेगा। हे भगवान! तू ने केवल मनुष्य को बुद्धि दी, अच्छा किया, नहीं तो इस सृष्टि में कितनी बार प्रलय होती! क्या हमें फिर से समुद्र मंथन की जरूरत नहीं है? इस बार हमें अपने अन्दर मंथन करना होगा, जहर और अमृत को अलग-अलग करना होगा। हमारे अन्दर जो द्वेष का अग्निकुण्ड धधक रहा है उसके लिये कुछ तो करना ही होगा। कोई उपाय नहीं खोजा तो सृष्टि खोज लेगी उपाय। फिर से अनादि काल में ले जाएगी और फिर जुट जाएगा मनुष्य सभ्यता बनाने में। शायद हमें नष्ट होना ही है। बीज रूप में धरती में गड़ना ही है और फिर नष्ट होकर नये वृक्ष को जन्म देना ही है। तभी हम से द्वेष नामक विष दूर होगा और हमारे वृक्ष पर अमृत फल लग सकेंगे।