अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

मित्र मिला हो तो बताना

Written By: AjitGupta - Aug• 06•18

दुनिया में सबसे ज्यादा अजमाया जाने वाला नुस्खा है – मित्रता। एलोपेथी, आयुर्वेद, होम्योपेथी, झाड़-फूंक आदि-आदि के इतर एक नुस्खा जरूर आजमाया जाता है वह है विश्वास का नुस्खा। हर आदमी कहता है कि सारे ही इलाज कराए लेकिन मुझे तो इस नुस्खे पर विश्वास है। तुम भी आजमाकर देख लो। ना मंहगी दवा का चक्कर, ना कडुवी दवा का चक्कर, ना लम्बी दवा का चक्कर, बस छोटा सा नुस्खा और गम्भीर से गम्भीर बीमारी भी चुटकी बजाते ही ठीक। ऐसी ही होती है मित्रता! सारे रिश्तों पर भारी! माता-पिता बेकार, भाई-बहन बेकार, सारे रिश्ते बेकार बस मित्र है विश्वास पात्र! वातावरण में ऑक्सीजन की तरह घुली हुई है मित्रता की दलील। बचपन की याद आ गयी, एक सहेली पास आती है और कहती है कि – तू मेरी सबसे अच्छी सहेली है! मैं उसकी तरफ देखती हूँ और सोचती हूँ कि मुझ पर यह कृपा क्यों! जल्दी ही उसे और कोई मिल गया और मैं किस कोने में गयी, ना उसे पता और ना मुझे पता! फिर कुछ बड़े हुए फिर किसी ने कह दिया कि तुम मेरी सबसे अच्छी सहेली हो। फिर वही अन्त! और कुछ बड़े हुए किसी ने कहा – आप मेरी सबसे अच्छी सहेली हैं। सम्बोधन बदलते रहे लेकिन कहानी एक सी रही। कोई मित्र स्थायी नहीं हुआ। जब मुझसे काम पड़ा मित्रता की कसमें खा ली गयीं और जब काम खत्म तो मित्रता और मित्र दोनों की रफूचक्कर। जब मेरी समझ पुख्ता हो गयी तब मैं कहने लगी कि भाई रहने दो, तुमसे यह नहीं हो पाएगा। मेरे पास देने को कुछ नहीं है, बस मैं विश्वास दे सकती हूँ, तुम्हारी खुशी में खुश हो सकती हूँ और तुम्हारे दुख में दुखी, इसके अतिरिक्त मेरे पास कुछ नहीं है देने को। लेकिन लोग कहते कि नहीं हमें आपका साथ अच्छा लगता है इसलिये आपसे मित्रता चाहते हैं। मैं कहती रही कि यह चौंचले कुछ दिन के हैं फिर वही ढाक के तीन पात। यही होता, उनकी आशाएं धीरे-धीरे जागृत होती, मैं किसी के काम आती और काम जैसे ही होता मित्र और मित्रता दोनों नदारद! लोगों को मिलते होंगे सच्चे मित्र, मुझे तो कोई खास अनुभव नहीं आया।
इसके परे रिश्तों की कहानी ज्यादा मजबूती से खड़ी दिखायी दी। रिश्तों के पन्ने फड़फड़ाते जरूर हैं लेकिन ये अपनी जिल्द फाड़कर दूर नहीं हो पाते, कभी जिल्द फट भी जाती है लेकिन अधिकांश किताब हाथ में रह ही जाती है। जीवन में कुछ भी अघटित होता है, ये रिश्ते ही हैं जो रिश्तों की मजबूरी से चले आते हैं, उन्हें आना ही पड़ता है। मित्रता तो ठेंगा दिखा दे तो आप कुछ नहीं कर सकते लेकिन रिश्ते ठेंगा दिखा दें तो अनेक हाथ आ जाते हैं जो उन्हें आड़े हाथ ले लेते हैं। हमने मित्रता की आँच को इतनी हवा दी कि वह धू-धू कर जल उठी, उसने आसपास के सारे ही रिश्तों को लीलना शुरू किया, हमने भी ला-लाकर अपने रिश्ते इस आग में फेंकना शुरू किये और बस देखते ही देखते केवल मित्रता की आग हमारे सम्बन्धों की रोटी सेंकने को शेष रह गयी, शेष आग बुझती चले गयी। कुछ दिनों बाद देखा तो हमारे चारों तरफ आग ही आग थी लेकिन मित्र कहीं नहीं थे। रिश्तों को तो स्वाह कर ही दिया था, मित्र तो आहुति चाहते थे, आहुति पड़ना बन्द तो मित्र भी पानी डालकर चले गये। लेकिन मित्रता में एक फायदा जरूर है, जब चाहो तब तक रिश्ता है, एक ने भी नहीं चाहा तो तू तेरे रास्ते और मैं मेरे रास्ते। रिश्तों में यह नहीं हो सकता, कितने भी रास्ते अलग बना लें, कहीं ना कहीं एक दूसरे से टकरा ही जाएंगे! रिश्तों की तो बात ही अलग है लेकिन जिन मित्रता को हम रिश्तों का नाम दे देते हैं वे भी हमारा साथ निभाते हैं और जिनको केवल मित्र कहकर छोड़ देते हैं वे कबूतर के घौंसले ही सिद्ध होते हैं।
कल मित्र-दिवस आकर निकल गया, बाजार में तेजी आ गयी। हर कोई अपने मित्र को उपहार देना चाहता था, इसलिये बाजार में थेंक्स गिविंग की तरह रौनक थी। सोशल मीडिया के कारण कंजूस लोगों का भी काम बन गया था, फूलों का गुलदस्ता सभी तरफ घूम रहा था। कहीं भी विश्वास दिखायी नहीं दिया, कहीं प्रेम दिखायी नहीं दिया, कहीं अनकही बातें सुनायी नहीं दीं! कहीं राजनैतिक मखौल दिखायी दिया, कहीं धार्मिक उदाहरण खोज लिये गये और कहीं सोशल मिडिया की दोस्ती ही दिखायी दी। मेरा मन बहुत करता है कि कोई ऐसा हो जिसके साथ घण्टों मन की बात की जा सके, मिलते भी रहे हैं ऐसे मित्र लेकिन वे समय के साथ बिसरा दिये गये। कहीं समय ने उन्हें पीछे धकेल दिया तो कहीं आर्थिक सम्पन्नता और विपन्नता ने तो कहीं बदलते विचारों ने। मित्रता वही शेष रही जो दूर बैठी थी, नजदीक आने पर तो तू मुझे क्या दे सकता है और क्या नहीं दे पाया, इसका हिसाब ही मन ही मन लगाया जाता है। इसलिये मैं मित्रता की कमसें नहीं खाती, ना ही मित्रता को रिश्तों से ऊपर रखती हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ मित्रता के मायने। इसकी उम्र बहुत छोटी होती है। लम्बी उम्र यदि मिल जाती है तो वह दूरियाँ लिये होती हैं। इसलिये बार-बार कहती हूँ कि मित्रता को इतना महान मत बनाओ कि रिश्ते ही दूर चले जाएं। मित्र होते हैं लेकिन उनको बाजार के हवाले मत करो, जिन रिश्तों को भी हमने बाजार के हवाले किया है उनमें ठहराव अधिक दिन नहीं रह पाया है। मित्रता दिवस भी मनाओ लेकिन अपने अन्दर के सच्चे मित्र को खोजकर। आज ऐसी पोस्ट लिखकर सभी मित्रों को नाराज कर दिया, लेकिन मुझे बताएं जरूर कि किसी को ऐसा मित्र मिला क्या जो हर कटु परिस्थिति में उसके साथ खड़ा था। हम सभी को ऐसे लोगों का अभिनन्दन तो करना ही चाहिये।

प्रेम का यही पुश्तैनी ठिकाना है #fatehsagar

Written By: AjitGupta - Aug• 04•18

कभी आप उदयपुर में राजीव गांधी पार्क के सामने फतेहसागर को निहारने के लिये खड़े हुए हैं? मुझे तो वह दृश्य दीवाना बनाता है। चारों तरफ अरावली पर्वतमाला की श्रंखला और मध्य में लहलहाता फतेहसागर! फतेहसागर के किनारे जहाँ पानी कम है वहाँ कुछ पेड़ भी अपनी जड़े जमाएं मजबूती से खड़े हैं और इन पेड़ों पर पक्षी बसेरा बनाकर रहते हैं। मैं इस दृश्य को आँखों से पीने लगती हूँ, निगाहें चारों तरफ घूम जाती हैं, कभी पहाड़ की कोई चोटी जिस पर बना मन्दिर अपनी ओर ध्यान खींच लेता है तो कभी किलोल करते पक्षी मन लुभा लेते हैं। लेकिन एक दिन निगाहें एक शिल्पकार द्वारा बनाए शिल्प पर ठहर गयी। वैसे भी फतेहसागर के किनारे शिल्पकारों का सृजन खूबसूरती बढ़ाने में योगदान कर रहा है लेकिन एक शिल्प खड़ा था पानी में, उस पर एक कृत्रिम पक्षी बैठा था और नीचे लिखा था – यह झील हमारा भी पुश्तैनी घर है, इसे नष्ट होने से बचाएं। जहाँ मनुष्य हर उस चीज पर कब्जा करता जा रहा है, जहाँ तक उसकी पहुंच हो गयी है। वहीं पक्षियों के पुश्तैनी घर की बात करना प्रकृति को सम्मान देने का अनूठा प्रकार था। जब यह झील बनी होगी उसके पूर्व यहाँ जंगल ही होंगे, पहाड़ों से आकर पानी यहाँ एकत्र होता होगा और तब झील के लिये यह उपयुक्त स्थान लगा होगा और राजा द्वारा बना दी गयी होगी फतेहसागर झील। झील पशुओं के पानी पीने के लिये बनायी गयी थी, पशु और पक्षी यहाँ निर्भय होकर विचरण करते होंगे लेकिन आबादी बढ़ी, मनुष्य का हर स्थान पर दखल बढ़ा और पशुओं का तो आना ही बन्द हो गया लेकिन भला पक्षियों को कौन सी सरहद रोक सकती है? वे तो साइबेरिया से भी आ जाते हैं! इस झील पर भी ढेरों पक्षियों का डेरा रहता है लेकिन कैसी विडम्बना है जिस मनुष्य को हम सृष्टि के रक्षक के रूप में पहचानते हैं आज उसी मनुष्य से पक्षियों की रक्षा करने का आह्वान करते हैं!
अभी कुछ दिनों से पक्षियों की संख्या में कमी आयी है, झील सूनी-सूनी लग रही है, जैसे बच्चे विहीन घर हो। लेकिन जैसे ही मौसम का आमंत्रण मिलेगा, पक्षी यहाँ आ जाएंगे। वे लौट आएंगे अपने पुश्तैनी घर में। यहाँ देश-विदेश से हजारों की संख्या में पक्षी आते हैं, कुछ यहीं ठहर जाते हैं और कुछ वापस लौट जाते हैं। जो हमारे लिये कौतुहल है वह उनका घर है। इस कौतुहल को देखने प्रशासन ने जगह बना दी है, एक दीवार भी खड़ी कर दी है और चम्पा के पाँच पेड़ भी लगा दिये हैं। चम्पा खूब फूल रहा है, दीवार पर पूरी आड़ कर दी है चम्पा ने। इसके नीचे प्रेमी युगल आराम से बैठ सकते हैं, एकबारगी तो दिखायी भी नहीं देते लेकिन पास आने पर दिख ही जाते हैं। आजकल यहाँ लड़के-लड़की बैठे हुए मिल ही जाते हैं और उनके हाथ में या तो खाने का कोई सामान होता है या फिर वही से खऱीदे हुए भुट्टे तो होते ही हैं। वे डोली पर बैठते हैं, खाते हैं और कचरे को नीचे फेंक देते हैं। नीचे झील में प्लास्टिक का कचरा एकत्र होने लगता है और जब बड़ा सा बगुला अपनी चोंच को पानी के अन्दर डालकर मछली की तलाश करता है तब मछली के स्थान पर कचरा चोंच में आता है। हम खुबसूरती देखने आते हैं और बदसूरती दे जाते हैं। जो पक्षी निर्मल जल की तलाश में यहाँ तक आए थे, वे निराश होने लगते हैं। लड़के-लड़की प्रकृति के मध्य प्रेम करते हैं लेकिन प्रकृति को ही नष्ट कर देते हैं, यह कैसा आचरण है! होना तो यह चाहिये कि वे यहाँ आते और इसे और भी सुन्दर बना जाते, यहाँ वे भी लिख जाते कि प्रेम का यहाँ पुश्तैनी घर है, झीलों और प्रेम के रिश्तों को बचाकर रखे। कभी तो ऐसा लगता है कि हम मन्दिर जाएं और मन्दिर में ही गन्दगी फैलाकर आ जाएं! क्या ये झीलें किसी भी मन्दिर से कम हैं? जब इनका पीनी रीतने लगता है तब हम दुखी हो जाते हैं और जब यह लबालब होकर छलक जाती हैं तो हम खुशी से झूमने लगते हैं। क्या केवल प्रशासन के भरोसे ही झीलें स्वच्छ रह सकेंगी? क्या ये पक्षी हमें नहीं कह रहे हैं कि हमारे पुश्तैनी घर को गन्दा मत करो! नौजवान पीढ़ी जो प्रेम में है वह प्रेम के मायने ही नहीं समझें तो कैसा प्रेम है? प्रेम तो स्वच्छता चाहता है, पावनता चाहता है, सुरभित वातावरण चाहता है तभी तो हम किसी झील के किनारे या किसी कुंज में अपने प्रेम के साथ आकर बैठते हैं! लेकिन शायद ये प्रेमी नहीं हैं, ये प्रकृति को लूटने आए हैं, अपनी वासना के तले रौंदने आए हैं। ये मदमस्त होकर झीलों को उजाड़ने आए हैं। शायद कोई आ जाए जो लिख जाए कि ये प्रकृति प्रेम के कारण ही है, प्रेम का यही पुश्तैनी ठिकाना है, हम इसे सुन्दर बनाएंगे।
अजित गुप्ता

घरों पर लगते निशान!

Written By: AjitGupta - Aug• 02•18

बहुत दिनों पहले एक कहानी पढ़ी थी – एक गिलहरी की कहानी। सरकार का नुमाइंदा जंगल में जाता है और परिपक्व हो चले पेड़ों पर निशान बनाकर चले आता है। निशान का अर्थ था कि ये पेड़ कटेंगे। एक गिलहरी निशान लगाते आदमी को देखती है और कटते पेड़ के लिये दुखी होती है। उसे लगता है कि मैं कोशिश करूं तो शायद कुछ पेड़ कटने से बच जाएं! वह पेड़ के निशान मिटाने पर जुट जाती है और अपनी पूंछ से निशान मिटाने लगती है। गिलहरी एक प्रतीक बन गयी हैं इस कहानी में कि यदि छोटा व्यक्ति भी चाहे तो विनाश को रोकने में भागीदार बन सकता है। यह कहानी भला मुझे क्यों याद आयी! कल मैं अपने बराण्डे में बैठी थी, मुझे मेरे पति बताने लगे कि पड़ोस के बुजुर्ग दम्पत्ती तीन माह के लिये बेटी के पास गये हैं और अपनी नौकरानी की छुट्टी कर गये हैं। मैंने कहा कि हाँ, वे अब बुजुर्ग हो चले हैं और शायद ही वापस आएं। मुझे अचानक ख्याल आया कि अब इनके मकान का क्या होगा! इसका तो एक ही हल है कि वह बिकेगा। मेरा ध्यान अब ऐसे मकानों की तरफ मुड़ गया, मेरा मकान भी उसमें शामिल था और जैसे-जैसे में नजर दौड़ा रही थी मेरी गिनती बढ़ती ही जा रही थी। मैं निशान लगाने वाला सरकारी नुमाइंदा बन गयी थी और अब मुझे उस गिलहरी की कहानी याद आयी। न जाने कितने दलालों की नजर हम पर होगी और वे मन ही मन हमारे मकानों पर निशान लगा चुके होंगे। हो सकता है कि कुछ अवांछित तत्वों की निगाह भी हमारे मकानों पर हों और वे हम पर ही निशान लगा चुके हों! अब मेरा ध्यान गिलहरी पर केन्द्रित हो चला था, मैं उस गिलहरी को ढूंढ रही थी। शायद कोई गिलहरी कुछ मकानों पर लगे निशान मिटाने में जुटी हो! लेकिन मुझे छोटे शहरों के वीरान होते घरों में कोई गिलहरी की पदचाप सुनायी नहीं दी।
बच्चे बड़े शहरों में चले गये, क्योंकि उनकी रोजी-रोटी वहीं थी। कुछ विदेश चले गये, क्योंकि उनके सपने वहीं थे। कल मेरे एक मित्र ने प्रश्न किया कि आखिर युवा विदेश क्यों जाते हैं? मैंने बहुत सोचा, पुराने काल को भी टटोला। मनुष्य जिज्ञासु प्रवृत्ति का होता है, वह नापना चाहता है दुनिया को। नयी जगह बसना चाहता है, नये काम-धंधे चुनना चाहता है। पहले व्यापार के लिये भारतीयों ने सारी दुनिया नाप ली, अब बेहतर जीवन के लिये दुनिया की तलाश कर रहा है। गाँव से आदमी बाहर निकल रहा है, शहर जा रहा है, शहर से महानगर जा रहा है और महानगर से विदेश जा रहा है। जितनी दूर व्यक्ति चले जा रहा है उतना ही उसका सम्मान बढ़ रहा है, वह भी खुश है और लोग भी उसे सम्मान दे रहे हैं। आज गाँव रीतने लगे हैं, खेती के अलावा वहाँ कुछ नहीं है। वहाँ का युवा नजदीकी शहर के आकर्षण से बंध रहा है। शहर के युवा के पास महानगर के सपने हैं, वह महानगर की ओर दौड़ लगा रहा है। पढ़े-लिखे युवाओं की दौड़ विदेश तक होने लगी है। बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ महानगरों में जा रही हैं या नगरों को महानगर बना रही हैं इसकारण छोटे शहर पढ़े-लिखे युवाओं से विहीन होते जा रहे हैं। एक दिन मैंने अमेरिका में बसे मेरे पुत्र से पूछा कि आज के पचास साल पहले तुम्हारे इस शहर का नक्शा क्या था? क्योंकि आईटी कम्पनियां तो अभी आयी हैं! वह बोला कि यहाँ कुछ नहीं था लेकिन आज सबकुछ है। बड़ी कम्पनियों ने शहरों के मिजाज को ही बदल दिया है, सब इनके आकर्षण से खिंचे जा रहे हैं। युवाओं का आकर्षण ये बड़ी कम्पनियाँ बनती जा रही हैं। माता-पिता अपनी चौखट से बंधे हैं और उनकी संतान अपनी नौकरी से। नतीजा घर को भुगतना पड़ रहा है, अब वे घर ना होकर मकान में परिवर्तित होते जा रहे हैं। उन मकानों पर निशान लगाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, कोई गिलहरी भी दिखायी नहीं देती जो निशान मिटाने की जिद करे। माता-पिता भी कब तक चौखट पकड़े बैठे रहेंगे आखिर एक दिन तो उन्हें कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा नहीं तो भगवान ले लेगा। उन्हें अपनी कोठी खाली करनी ही होगी और इसे दलालों के सुपुर्द करना ही होगा। पहले घरों की उम्र बहुत लम्बी होती थी लेकिन आज छोटी होती जा रही है, कब किसका आशियाना बिखर जाए कोई नहीं जानता! पुरानी रीत अब बेमानी हो चली है, कहते थे कि जिस घर में डोली आयी है उसी घर से डोली भी उठेगी। अब घर ही घर नहीं रहा, जहाँ की दीवारें हमें पहचानती थी, अब तो नित नये मकानों का बसेरा है। छोटे शहरों के घर निशानों से भर उठे हैं, बदलाव तो होगा ही। अब एक जगह स्थिर होने का जमाना लद गया शायद हम सभी गाड़िया लुहार बन चुके हैं।

सौंठ-अजवाइन खाने का प्रबन्ध खुद करो

Written By: AjitGupta - Aug• 01•18

सौंठ-अजवाइन खाने का प्रबन्ध खुद करो
कभी कुछ प्रश्न ऐसे उठ खड़े होते हैं जिनसे मन छलनी-छलनी हो जाता है। कुछ दृश्य सजीव हो उठते हैं लेकिन समाधान कहीं नहीं मिलता। कल ऐसा ही एक प्रश्न मेरी सखी Rashmi Vyas ने कर दिया। प्रश्न ही प्रश्न चारों तरफ से निकल आए लेकिन समाधान तो कहीं नहीं था। मेरे पास भी नहीं, क्योंकि मैं खुद उस पीड़ा से गुजर रही हूँ। कहाँ से लाऊँ, ममता को बिसराने का समाधान! यह प्यार जैसा तो नहीं जिसकी महिमा शाश्वत होने की गायी जाती है लेकिन है क्षणभंगुर। यह तो ममता है, सृष्टि का शाश्वत सत्य। ममता भी कैसी! भारतीय माँ की ममता। कोई मुझसे पूछे कि भारतीय माँ और विदेशी माँ में क्या अन्तर होता है? माँ तो माँ होती है! मेरा उत्तर होगा नहीं, भारतीय माँ स्वयं से प्रेम नहीं करती जबकि विदेशी माँ स्वयं से प्रेम करती है और जो स्वयं से प्रेम करता है उसकी ममता स्व: प्रेम के नीचे दब जाती है। हम केवल अपनी संतान से प्रेम करते हैं, इस प्रेम के आगे हम खुद कहीं नहीं टिकते। संतान कितना ही सता ले, दुख दे दे लेकिन माँ की ममता वैसी ही बनी रहती है। हमारी माँ की पीढ़ी में और कहीं-कहीं हमारी पीढ़ी में भी 50 वर्ष की आयु होने पर एक माँ को विश्राम मिल जाता था, उसके सामने भोजन की थाली ससम्मान परोसी जाती थी। लेकिन आज 60 क्या 70 साल होने पर भी माँ को विश्राम नहीं है, वह खुद के लिये भी काम कर रही है और संतान के लिये भी काम कर रही है। दोनो घुटने काम नहीं करते, कमर टूटी पड़ी है लेकिन संतान के लिये विदेश जाना जरूरी है! विदेश में नौकर नहीं तो जो काम कभी देश में नहीं किये वे भी इस आयु में करने पड़ते हैं। माँ ने ममता लुटा दी लेकिन संतान सम्मान भी नहीं दे पाए! यदि सम्मान याने खुद के बराबर मान होता तो स्वतंत्र ही क्यों होती संतान!
विदेशी माँ ने ममता को कैसे पैरों के तले रौंद दिया? यह उसने अकेले नहीं किया अपितु उसके समाज ने ऐसा कराया। विदेश में समाज का कानून है कि खुद से प्रेम करो, तुम्हें अकेले ही जीवन में खुश रहना है। विवाह करना है तो करो नहीं तो अकेले रहो, कोई टोका-टोकी नहीं। 16 साल के बाद माता-पिता के साथ रहना जरूरी नहीं, अपितु स्वतंत्र रहने को बाध्य करता है समाज। संतान से कहा जाता है कि तुम कब बड़े होंगे, तुम कब तक माँ का पल्लू पकड़कर रहोगे? छोड़ो घर और अकेले रहना सीखो। माँ से कहा जाता है कि क्या तुम्हारी कोई जिन्दगी नहीं जो अभी तक संतान को पाल रही हो, उसे मुक्त करो। संतान पैदा होने पर, उसे प्रथम दिन से ही अलग सोना सिखाया जाता है, ममता पनपनी नहीं चाहिये। विवाहित संतान माँ के साथ नहीं रहती। इतने सारे जतन करने पर ममता बेचारी कैसे मन में डेरा डाले रहेगी! जब एक लड़की को पैदा होने के साथ ही तैयार किया जाता है कि इसे पराये घर जाना है तो लड़की और माँ दोनों तैयार हो जाती है ऐसे ही विदेश में माँ को तैयार किया जाता है। लेकिन भारत में उल्टा है, ममता जरूरी है। विवाह होने पर भी संतान माँ के साथ ही रहेगी यदि नहीं रहती है तो ताने सुनने पड़ते हैं।
अब यह समस्या भारत में आयी कैसे? जब दो विपरीत संस्कृति का साथ हुआ तो यह समस्या पैदा हुई। संतान विदेश में रहना पसन्द करे तो वहाँ की संस्कृति को मानना ही होगा। वे खुद से प्रेम करने लगे और माँ का प्रेम पीछे धकेल दिया गया। विदेश में माँ गौण है और पत्नी प्रमुख है तो पत्नी के प्रति पूर्ण समर्पण कानूनन जरूरी हो गया। आज अमेरिका में भारतीय जीवन पद्धति के प्रति जिज्ञासा उमड़ रही है और भारतीयों के अतिरिक्त सभी मानने लगे हैं कि प्रसव के समय अजवायन-सौंठ आदि अवश्य खाने चाहियें। अब पुत्रवधु के प्रसव होने वाला है तो उसे सौंठ-अजवायन कौन खिलाएगा? एक माँ ही खिलाएंगी ना! अब उसकी उम्र क्या है, उसके शरीर का क्या हाल है, यह देखा नहीं जाता क्योंकि पत्नी को खुश रखना उनकी कानूनन मजबूरी है। उन्हें यह भी पता है कि हमारी माँ ममता की मारी है इसलिये भावानात्मक शोषण करते हुए उनका उपयोग ले लिया जाएगा। ममता की मारी भारतीय माँ जब विदेश की धरती पर खड़ी होती है तब उसके हाथ से तोते उड़ जाते हैं। भारत में तो एक प्रसव के समय तीन महिलाएं रहती हैं और नौकर-चाकर तो जितने मन में आए रख लो। वहाँ बेचारी अकेली! तब ममता को धता बताकर पीड़ा मुखर होने लगती है और प्रश्न बनकर फूट पड़ती है। लेकिन समाधान तो उसके पास नहीं है! समाधान बस यही है कि हमें भी विदेशी जीवन-शैली अपनानी होगी, ममता को पहले दिन से ही दूर रखना होगा। संतान को बता देना होगा कि तुम्हारे जीवन में हमारा हस्तक्षेप नहीं होगा तो हमारे जीवन में भी तुम्हारा हस्तक्षेप नहीं होगा। तुम्हें प्रसव के समय सौंठ-अजवायन खानी है तो उसका स्वयं से प्रबन्ध करो, यह एक माँ का कर्तव्य नहीं। हमारी पीढ़ी को तो निजात नहीं मिल सकती है लेकिन आने वाली पीढ़ी दर पीढ़ी अवश्य ही इस समस्या से निजात पा लेगी।

बड़प्पन की चादर उतार दीजिए ना

Written By: AjitGupta - Jul• 30•18

लोग अंहकार की चादर ओढ़कर खुशियाँ ढूंढ रहे हैं, हमने भी कभी यही किया था लेकिन जैसे ही चादर को उठाकर फेंका, खुशियाँ झोली में आकर गिर पड़ीं। जैसे ही चादर भूले-भटके हमारे शरीर पर आ जाती है, खुशियाँ न जाने कहाँ चले जाती हैं! अहंकार भी किसका! बड़प्पन का। हम बड़े हैं तो हमें सम्मान मिलना ही चाहिये! मेरी दोहिती है 9 साल की, जब मैं उसके साथ होती हूँ और मैं कहती हूँ कि मिहू मेरे पास आकर बैठ, वह कहती है कि आप मेरे साथ खेलोगी? यदि मेरा उत्तर ना हो तो वह कहती है कि मैं चली खेलने। लेकिन जब मैं कहती हूँ कि हाँ खेलूंगी तो उसकी पसन्द का खेल खेलना होता है। वह कैरम निकाल लाती है, मुझसे पूछती है कि आपको आता है खेलना? मैं कहती हूँ कि हाँ तो खुश हो जाती है और जब मैं उसे जीतकर बताती हूँ तब उसकी आँखों में सम्मान आ जाता है। अब तो मम्मी-पापा को भी खेलने का निमंत्रण दे दिया जाता है और कहा जाता है कि मेरी टीम में नानी रहेंगी। एक दिन कहने लगी कि नानी चलो मेरे कमरे में चलो। मेरा हाथ पकड़कर ले गयी। मुझे कहा कि बैठो, आज मैं टीचर हूँ और आप स्टूडेंट हैं। अब क्लास शुरू हो चुकी थी। मेरे हाथ में कॉपी-पेंसिल थमा दी गयी थी। पहले मेथ्स की क्लास है, टीचर ने कहा। वह बोर्ड पर सवाल लिख रही थी और मुझे वैसा ही करने को कह रही थी। सारे ही प्लस-माइनस के सवाल कराने के बाद कॉपी चेक की गयी और वेरी गुड के साथ पीरियड समाप्त हुआ। लेकिन अभी दूसरा पीरियड बाकी था, जिसमें कठिनाई आने वाली थी। टीचर ने कहा कि अब साइन्स की क्लास है, कॉपी में लिखिये। लाइट और शेडो के बारे में बताया जाएगा। किन वस्तुओं में लाइट होती है और किन में नहीं, परछाई कैसे बनती है, सभी कुछ पढ़ा दिया गया। हमनें हमारे जमाने में विज्ञान को इतने विस्तार से नहीं पढ़ा था। लगने लगा कि 9 साल की दोहिती हमसे ज्यादा ज्ञानवान है। खैर जैसे-तैसे करके हमने अपना सम्मान बचाया और वेरी गुड तो नहीं, कई हिदायतों के बाद गुड तो पा ही लिया। इसकी पीढ़ी हमारी पीढ़ी से न जाने किस-किस में आगे निकल गयी है, हम बात-बात में उनका सहारा लेते हैं। कभी मोबाइल में अटक जाते हैं तो कभी कम्प्यूटर में, फिर कहते हैं कि हमारे बड़प्पन का सम्मान होना चाहिये।
मैं बरसों से लिख रही हूँ, हमारी पीढ़ी पढ़ लेती है लेकिन नयी पीढ़ी को कुछ लेना-देना नहीं। अब मुझे तय करना है कि मैं अपने लेखन को लेकर किसी कमरे में कैद हो जाऊँ या इस पीढ़ी के साथ बैठकर कैरम खेलने लगूँ। वे मेरे पास नहीं आएंगे, मुझे ही उनके पास जाना होगा। मेरा पोता है 11 साल का। पोता है तो आउट-डोर गेम में ज्यादा रुचि होगी ही! मैं जब उसके पास होती हूँ तो वह मेरे पास नहीं बैठता, या तो कम्प्यूटर के बारे में कुछ पूछ लो तो बैठेगा या फिर बाहर घूमने चलो। एक दिन छुट्टी के दिन अपने स्कूल ले गया, वह बास्केट-बॉल खेलता है, मुझे कहा कि आप बैठो मैं प्रेक्टिस करता हूँ। मुझे लगा कि इसके करीब आना है तो इसके साथ खेलना होगा। लेकिन बास्केट-बॉल की बॉल भी कभी पकड़ी नहीं थी, तो? लेकिन मैं मैदान में आ गयी, उसे बॉल लाकर देने लगी, अब उसे खेल में ज्यादा मजा आने लगा क्योंकि अब उसे टीचर बनने का अवसर मिलने वाला था। कुछ समय बाद वह मुझे बास्केट में बॉल डालना सिखाने लगा और मैंने सफलता हासिल की। जो काम बेहद कठिन लग रहा था उसमें मैं एक कदम रख चुकी थी। पोता टीचर बन चुका था और खुश था, वह खुश था तो मुझे भी खुशी मिल चुकी थी।
हमारी खुशियाँ ऐसी ही हैं, हमें झुककर उन्हें पकड़ना होगा। अब बड़प्पन के सहारे जिन्दगी में कुछ नहीं पाया जा सकता है। हम बड़े होने को ज्ञान का भण्डार मान बैठे हैं, नयी पीढ़ी को सम्मान करने का आदेश देते हैं और अगले ही पल अपना मोबाइल उनके पास ले जाकर पूछ लेते हैं कि यह फेसबुक क्या होती है? नयी पीढ़ी हमारे बड़प्पन की परवाह नहीं करती, वे बराबरी का व्यवहार चाहती है। आप उनके साथ कैरम खेलते हुए जीतने का माद्दा रखते हैं तो वे आपको पार्टनर बना लेंगे नहीं तो आपको खारिज कर देंगे। टॉफी-चाकलेट का लालच भी ज्यादा दिन तक उनको डिगा नहीं पाता है, बस उनके साथ उनके बराबर का ज्ञान रखो तो वे आपको साथी मानेंगे ना की बड़ा। एक आयु आने के बाद हम खुशियाँ तलाशते हैं, नयी पीढ़ी हमें धकेलकर आगे निकल जाना चाहती है। हम अकेले पड़ते जाते हैं और धीरे-धीरे अपने कमरे में सिमटने लगते हैं। ऐसे ही पल यदि हम अपने बड़प्पन की चादर को उठाकर फेंक दें और तीसरी पीढ़ी के साथ सामंजस्य बिठा लें तो जीवन आसान हो जाता है। लेकिन तीसरी पीढ़ी हमारे साथ नहीं हैं, तब क्या करें? कोई साथ है या नहीं लेकिन अहंकार की चादर का सहारा तो बिल्कुल ना लें। जो भी मिल जाए, उसमें ही खुशियाँ ढूंढ लें और भूलकर भी वह मौका हाथ से जाने ना दें। जितना ज्यादा छोटों के साथ झुकोंगे उतनी ही ज्यादा खुशियाँ तलाश लोंगे। वास्तविक दुनिया ना सही, यह वर्चुअल दुनिया ही सही, खुशियाँ तलाशने में देरी ना करें। नयी पीढ़ी की दुनिया उस बगिया की तरह है जहाँ नाना प्रकार के फूल खिले हैं, हमें वहाँ जाना ही है और खुशबू का आनन्द तो लेना ही है। यदि वे टीचर बनना चाहते हैं तो मैं शिष्य बनने में परहेज नहीं करती, बस मुझे चन्द पल की खुशियाँ चाहिये। साहित्यकार के पास यह चादर बहुत बड़ी है, इसका उतारना सरल नहीं हैं लेकिन कठिन काम करना ही तो खुशियाँ देता है।