अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

संताप से भरे पुत्र का पत्र

Written By: AjitGupta - Jun• 21•17

कल एक पुत्र का संताप से भरा पत्र पढ़ने को मिला। उसके साथ ऐसी भयंकर दुर्घटना हुई थी जिसका संताप उसे आजीवन भुगतना ही होगा। पिता आपने शहर में अकेले रहते थे, उन्हें शाम को गाड़ी पकड़नी थी पुत्र के शहर जाने के लिये। सारे ही रिश्तेदारों से लेकरआस-पड़ोस तक को सूचित कर दिया गया था कि मैं पुत्र के पास जा रहा हूँ। नौकरानी भी काम कर के चले गयी थी। अखबार वाले और दूध वाले को भी मना कर दिया गया था। अटेची पेक हो चुकी थी लेकिन तभी अचानक मौत का हमला हुआ, यमराज ने समय ही नहीं दिया और वे पलंग पर ही दम तोड़ बैठे। पुत्र ने फोन किया कि कब निकल रहे हो, लेकिन उत्तर कौन दे! पुत्र ने सोचा कहीं व्यस्त होंगे। रात को फोन किया कि गाड़ी में बैठ गये हैं क्या? लेकिन फिर उत्तर नहीं! सोचा नेटवर्क की समस्या होगी। 48 घण्टे निकल गये, पुत्र का सम्पर्क नहीं हुआ। आस-पड़ोस ने भी घर की तरफ नहीं झांका। तभी अचानक एक परिचित मिलने चले आये, घण्टी बजाई, उत्तर नहीं। पड़ोस में गया, पूछा कि कही गए हैं क्या? पड़ोसी ने कहा कि हाँ पुत्र के पास गए हैं। लेकिन तभी परिचित के दिमाग में कुछ कौंधा, बोला कि यदि बाहर गये हैं तो चैनल गेट कैसे खुला है। अब पड़ोसी को भी लगा कि देखें क्या माजरा है? खिड़की में से जब अन्दर झांका गया तब उस विभत्स दृश्य को देखकर सब विचलित हो गये। दो दिन में शरीर सड़ चुका था और लाखों मक्खियां उसे नोच रही थीं। सारा परिवार आनन-फानन में एकत्र हुआ लेकिन पुत्र का संताप कौन हरे? वह अपने पत्र में लिख रहा है कि बार-बार फोन करो, अकेले रह रहे पिता की चिन्ता करो, आदि-आदि।
जब इस घटना और पत्र के बारे में मेरी मित्र ने मुझे बताया तो मुझे एक घटना याद आ गयी। माँ होती है ना, उसका दिल धड़कने लगता है, जब भी उसकी संतान पर कोई संकट आता है। लेकिन संतान बिरली ही होती है जिसको माता-पिता पर आये संकट का आभास होता है। मेरे देवर दूर शहर में पढ़ रहे थे, उन दिनों फोन की उतनी सुविधा नहीं थी कि हर मिनट के समाचार पता रहे। हमारी महिने में एकाध बार बात होती होगी बस, जब मनी-आर्डर भेजना होता था और एकाध बार और। उन दिनों हमारी माताजी भी हमारे पास आयी हुईं थीं। हमारी नयी-नयी गृहस्थी थी और हमारे पास संसाधन ना के बराबर थे। एक थाली में ही हम सब साथ-साथ खाना खा लेते थे। मैंने देखा कि वे ढंग से खाना नहीं खा रही हैं। दूसरे दिन भी वे अनमनी सी रहीं। फिर मैंने पूछ ही लिया कि क्या बात है? वे बोली कि राजू की चिंता हो रही है। मैंने पतिदेव से कहा कि एक बार फोन कर लो, चिन्ता दूर हो जाएगी। फोन किया तो चिंता बढ़ गयी। मालूम पड़ा कि अस्पताल में भर्ती है। अब पतिदेव बिना विलम्ब किये रवाना हो गये। हमने माताजी को कुछ नहीं बताया बस कहा कि जाकर देख आते हैं। शहर भी दूर था, पहुंचने में 20-22 घण्टे लगते थे लेकिन एक माँ की चिन्ता के कारण विपत्ति टल गयी और समय रहते हम सावधान हो गये।
ये जो हमारे खून के रिश्ते हैं, हमें हमेशा सावचेत करते हैं, बस कभी हम इनकी आवाज सुन नहीं पाते और कभी ध्यान नहीं देते। यदि हमारे दिल का एक कोना केवल अपने रिश्तों के लिये ही खाली रखें तो सात समन्दर पार से भी हिचकी आ ही जाती है। इन धमनियों में जो रक्त बह रहा है, उसमें हमारे रिश्ते भी रहते हैं। धमनी की रुकावट का परीक्षण तो हम करवा लेते हैं लेकिन रिश्ते कहीं हमें आवाज नहीं दे रहे हैं, उनकी गति रुक गयी है, उसका परीक्षण हम नहीं करवाते हैं। जब ऐसी घटना घट जाती है तब जीवन भर का संताप हमें दे जाती हैं। माँ का तो दिल सूचना दे ही देता है लेकिन संतान का दिल भी सूचना दे, इसके लिये रिश्तों की कद्र करो। आज वह पुत्र पत्र लिख-लिख कर लोगों को सावचेत कर रहा है कि अपने पिता को अकेला मत छोड़ो, फोन नहीं उठाएं तो बार-बार फोन करो, आस-पास करो, लेकिन बेफिक्र होकर मत बैठ जाओ। जैसे एक पुत्र अपनी आग में जल रहा है, वैसे ही कहीं औरों को ना जलना पड़े, इसलिये अपने दिल को अपनों के लिये धड़कने दो।

अपने अस्तित्व के साथ मरना

Written By: AjitGupta - Jun• 17•17

बचपन में जब किताबों की लत लगी हो तब कोई भी किताब हो, उसे पढ़ ही लिया जाता था। किताबें ही तो सहारा थी उन दिनों, दुनिया को जानने का उन से अधिक साधन दूसरा नहीं था। एकाध किताबें ज्योतिष की भी हाथ लग गयी और हम हस्त-रेखाओं के नाम-पते जान गये। थोड़ी सी इज्जत बढ़ जाती थी, हर कोई हमारे सामने हाथ फैला देता था और उस समय एक ही प्रश्न ज्यादा होता था कि विदेश यात्रा वाली रेखा है क्या? सभी के हाथ में तलाश की जाती और निराशा हाथ लगती। फिर चुपके से अपने हाथ में भी देख लेते और यहाँ भी हथेली साफ-सुथरी ही दिखायी देती। बचपन का खेल बचपन तक ही सीमित हो गया और हम बड़े हो गये, घर-परिवार के चक्कर में सारी कल्पनाएं छू-मंतर हो गयी। बच्चे बड़े होने लगे और उनके हाथ से ज्यादा मन में विदेश की रेखाएं बन गयी। एक दिन ऐसा भी आया कि उनकी रेखा ने परिणाम दिखा दिये। हम फिर से अपने हाथ की रेखा को तलाशने लगे। सोचते रहते कि हमारे हाथ में तो रेखा है नहीं इसलिये कोई चिन्ता की बात नहीं है लेकिन एक मित्र ने कहा कि इन रेखाओं पर मत जाओ, ये तो कभी भी बन जाती हैं। हम चक्कर में पड़ गये। नियति आगे बढ़ती गयी और हमें हमारे हाथ में रेखा गहरी होती दिखने लगी।
मुझे एक घटना का स्मरण हो गया। वृन्दावन में एक महिला से मिलना हुआ, वो अपने पति के साथ वहाँ मकान बनाकर रह रही थीं। उम्र भी कोई ज्यादा नहीं थी, शायद 60 के आसपास रही हो। मैं सोचने लगी कि अभी इनके हाथ-पैर चल रहे हैं और ये यहाँ वृन्दावन में रह रहे हैं लेकिन जब इनके हाथ-पैर चलना बन्द हो जाएंगे तब ये अपनी संतान की सेवाएं लेंगी। संतान को तब ये बोझ लगेंगे। इस बारे में मेरा चिंतन आगे बढ़ता इससे पूर्व ही वे बोल उठीं कि आप यह सोच रही होंगी कि जब हमारे हाथ-पैर चल रहे हैं तब तो यहाँ हैं और जब नहीं चलेंगे तब संतान के पास जाएंगे। मेरे मन की बात को उन्होंने पढ़ लिया था या यूं कहूं कि यह प्रश्न उनके लिये आम रहा होगा। लेकिन उनका उत्तर मेरे लिये आम नहीं था, वे बोलीं कि हम तो यहाँ मरने के लिये ही पड़े हैं। मतलब? उन्होंने जो उत्तर दिया वह मेरे लिये नवीन था, वे बोली कि वृन्दावन की भूमि में मरना सबसे बड़ा पुण्य है। यह बात नहीं है कि हमारी संतान हमारी परवाह नहीं करती लेकिन हमारी यह इच्छा है कि हमारा अंत इसी धरती पर हो। फिर उन्होंने बताया कि अभी दो वर्ष पूर्व अपने घर गयी थी, अचानक दिल का दौरा पड़ा और बेहोश हो गयी। होश आते ही जिद पकड़ ली कि मुझे वृन्दावन ले चलो, मुझे वहीं मरना है।
अपनी धरती पर या पुण्य भूमि पर मरने का सुख भी होता है, मैंने तभी जाना। शायद अपने अस्तित्व की बात होती है, जब अपनी धरती पर मरते हैं तब हम मरते हैं और दूसरी धरती पर मरते हैं तब संतान के मात-पिता मरते हैं। मेरा जीवन समाप्त हो गया, यह दुनिया जान ले, शायद यही चाहना होगी। पुण्य भूमि में मरने की चाह तो मोक्ष की चाहना भी रखती है। आज हम अपने अस्तित्व के लिए जागरूक होने लगे हैं। हम दुनिया को बताते रहते हैं कि हम हैं। लेकिन नयी पीढ़ी हमारी उपेक्षा ऐसे करती है जैसे कबाड़ की कोई चीज हो। जो संघर्ष पहले कहीं नहीं था आज घर-घर में दिखायी दे रहा है, पुरानी पीढ़ी कह रही है कि हम हैं और नयी कह रही है कि तुम हमारे लिये कबाड़ के अतिरिक्त कुछ नहीं हो। हम एक पीढ़ी तक सिमेट दिये गये हैं और हमारी पीढ़ी कसमसाकर रह जाती है। लेकिन जब कभी ऐसे रीत गये रिश्तों में नन्हीं सी कोंपल फूट आए तो हाथ की ये रेखा चिन्तित नहीं करती हैं। कल ऐसे ही हुआ, फोन पर आवाज आयी – भुआ आप कैसी हैं, इस बार आपको मेरे यहाँ आना ही होगा। कभी हम खुद को और कभी हाथ की रेखाओं को देखते हैं। न जाने कहाँ मरना हो? चलो मैं भी निश्चिन्त हो गयी कि कहीं भी मरे हमारी पहचान – हमारे मायके का रिश्ता वहाँ भी होगा।

गड़बड़ी पपोलने में है

Written By: AjitGupta - Jun• 16•17

कल मैंने दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक पति की लाचारी की दास्तान लिखी थी, सभी ने बेचारे पति पर तरस खाने की बात लिखी। अब मैं अपना पक्ष लिखती हूँ। आजादी के बाद घर में पुत्र का जन्म थाली बजाकर, ढिंढोरा पीटने का विषय होता था और माँ-दादी पुत्र को कलेजे के टुकड़े की तरह पालती थी। क्या मजाल जो उसे जमाने की हवा लग जाए। पानी भी उसके लिये बिस्तर पर ही आता था। उसे यह नहीं मालूम पड़ने दिया जाता था कि जो पानी तू पी रहा है, उसका स्त्रोत क्या है? दुनिया के सारे ही संघर्षों से उसे दूर रखा जाता था इसके विपरीत पुत्री को बार-बार यह कहा जाता था कि कुछ सीख लें, पराये घर जाना है। अब लड़की तो सीख गयी और लड़का भौंदूनाथ रह गया। शादी का समय आया, जन्मपत्री मिलायी गयी। मंगली लड़की हमारे बेटे के लिये नहीं चलेगी, क्योंकि मंगली लड़की मतलब तेजवान। हमारा लड़का तो जीते जी मर जाएगा। लड़के को पूरी तरह सुरक्षित रखने के सारे उपाय परिवार और समाज द्वारा किये जाने लगे। कम से कम चार साल छोटी लड़की देखना, दबकर रहेगी। लम्बी नहीं चलेगी, छोटी ही ठीक रहेगी। पढ़ी-लिखी, ना बाबा ना! बस थोड़ा बहुत पढ़ना जानती हो इतना ही। सारे जतन कर लिये, भौंदू भी बना दिया और उस भौंदूनाथ को सुरक्षित भी करने के जुगाड़ कर लिये। जैसे अभी रबड़ी देवी अपने भौंदूनाथों के लिये कह रही है।
अब शादी हो गयी। लड़के को कुछ पता नहीं कि दुनिया कैसे चलती है। लड़की पहले दिन ही बोल गयी कि अरे तुम्हें तो ढंग से खाना खाना भी नहीं आता! कभी कहती कपड़े पहनने की सहूर नहीं। लड़के को यह नहीं मालूम की सूरज पूरब से निकलता है या पश्चिम से। रोज-रोज उसे बताया जा रहा था कि तुम्हें कुछ नहीं आता। लड़के में हीन भावना घर कर गयी, अब वह कोशिश करने लगा कि जब पत्नी घर पर नहीं हो तो मैं ऐसा कुछ कर दूँ जिससे वह चमत्कृत हो उठे। लेकिन जिसने कभी कुछ देखा ही नहीं, वह भला क्या चमत्कार करेगा! तब और कुछ गुड़-गोबर कर दे। आखिर अपने से छोटी, कम पढ़ी-लिखी पत्नी के सामने भी वह घुघ्घू बन कर रह गया। सारी ही लड़कियां मांगलिक निकल गयीं। सारे ही सुरक्षा के उपाय धरशायी हो गये। कभी मारने को हाथ भी उठाये तो कब तक? आखिर जीवन भर गर्दन नीचे कर रहने को मजबूर हो गया। वह टेक्सी भी करता है तो पत्नी कहती है कि जरूर इसी को कुछ नहीं आता तभी तो दूसरी टेक्सी तो आ गयी लेकिन इसी की नहीं आयी और वह भी सोचता है कि जरूर मैंने ही कुछ गलत कर दिया होगा।
आज की पीढ़ी में ऐसा कम देखने को मिलता है, क्योंकि माता-पिता ने पुत्र और पुत्री का एक समान लालन-पालन किया है। ना पुत्र को चाय बनानी आती है और ना ही पुत्री को। अब हीन भावना कौन जागृत करे? दोनों ही मिल-जुलकर चाय बना लेते हैं और खुश रहते हैं। इसलिये संतान को संघर्ष करने दो, दुनिया कैसे चल रही है, उसे दिखाओ। जिन माता-पिता ने संतान को दुनिया दिखायी है, वहाँ ऐसी स्थिति नहीं है। इसलिये गड़बड़ी पपोलने में है, लड़के और लड़की में नहीं है। ऐसे पुरुषों पर तरस मत खाओ। ये लाड़-प्यार से पले हैं, उसकी कीमत उन्हें चुकानी ही होगी।

कल की पोस्ट – दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उबर-टेक्सी के इन्तजार में खड़े थे, देखा एक महिला बड़ी नाखुश होकर पति को हड़का रही थी। पति बेचारा हर आती गाड़ी में अपनी टेक्सी ढूंढ रहा था। पत्नी बोली – सारे जमाने की गाड़ियां आ गयी लेकिन बस इनने ही न जाने कौन सी टेक्सी बुलायी है? पति बोला – अब इसमें मैं क्या करूं। बहुत बुरा सीन था, पति की लाचारी देखी नहीं जा रही थी और पत्नी का बस चलता तो वहीं बर्तन-भांडे फेंक देती। आखिर उनकी टेक्सी आ गयी। पति नामक जीव पर इतना अत्याचार देखकर, दिल्ली में हर जगह लगे पोस्टर फिर से याद आ गये। “जब पत्नी सताये तो हमें बतायें”।

जमूरा भाग खड़ा हुआ

Written By: AjitGupta - Jun• 12•17

जमूरे नाच दिखा, जमूरे सलाम कर, ऐसे खेल तो आप सभी ने देखे होंगे। एक मदारी होता था, उसके साथ दो बन्दर रहते थे, मदारी डुगडुगी बजाता था और खेल देखने वालों की भीड़ जुट जाती थी। दर्शकों को पता था कि खेल बन्दर का है, उनका परिचित बन्दर होता था तो भीड़ भी खूब जुटती थी। अब यह खेल बन्द हो गया है, पशु-प्रेम की दुहाई देकर, वो बात अलग है कि पशुओं को उदरस्थ करने में यह प्रेम नहीं उमड़ता है। खैर मैं मदारी और जमूरे के खेल की बात कर रही हूँ। अब नये तरीके के मदारी पैदा हो गये हैं और जमूरे बन्दर नहीं होते वरन नामी गिरामी व्यक्ति होते हैं। यह खेल बड़े शहरों से लेकर छोटे गाँव-ढाणियों तक में खेला जाता है। जिस भी व्यक्ति को भीड़ एकत्र करने का शौक और कुव्वत होती है, वह यह खेल खेलता है। किसी संस्था के नाम पर, किसी संगठन के नाम पर, सरकार के नाम पर आदि आदि नाम पर इस खेल को खेलने के लिये मदारी होते हैं। बस उन्हें करतब दिखाने के लिये जमूरों की जरूरत होती है, वे कभी देश की, कभी समाज की, कभी जाति की तो कभी फलाने की और कभी ढिकाने की दुहाई देकर जमूरों को पटा लेते हैं। जैसे ही जमूरा पटा, भीड़ भी जुट जाती है और फिर शुरू होता है खेल। मदारी कहता है जमूरे खड़े हो जा, जमूरा खड़ा होता है, जमूरे अब तू दूसरे का खेल देख, जमूरा खेल देखता है। मदारी जानता है कि यह मुख्य जमूरा है, इसका खेल आखिर में होगा, नहीं तो भीड़ रवाना हो जाएगी। अब जमूरा कसमसाता रहता है, घड़ी देखने लगता है, कैसे पीछा छुड़ाये तरकीब सोचता रहता है, लेकिन उसकी सारी ही तरकीबे मदारी धराशाही कर देता है।
मैंने भी अनेक बार जमूरे का नाच किया है मदारी के इशारे पर। मैं देश के बड़े से बड़े व्यक्ति को और छोटे से छोटे व्यक्ति को भी जमूरा बनते देखती हूँ। जैसे ही मदारी ने आप से जमूरा बनने की हाँ भरायी, वैसे ही आप बंधक बन जाते हैं। अब मदारी जैसा कहे, वेसा जमूरा नाचने को मजबूर। दो-दो तीन-तीन घण्टे इस नौटंकी में बर्बाद हो जाएं। कई बार मन करे की बन्दर के गले में पड़ी रस्सी को तोड़कर भाग लिया जाए, लेकिन लिहाज की रस्सी तोड़ी ना जाए। समझ नहीं आ रहा था कि हिम्मत कैसे पैदा की जाए, लेकिन यह तय था कि अब अनावश्यक जमूरा नहीं बनना है। एकाध मदारियों को तो मैंने टरका दिया, कहा कि नहीं अब बन्दर बूढ़ा हो गया है, गुलाटी नहीं मार सकता। लेकिन सारे ही मदारी तो कच्चे खिलाड़ी नहीं होते, कुछ होशियार भी होते हैं, वे कैसे न कैसे फांस ही लेते हैं। अभी दो दिन पहले भी यही हुआ. हम जाल में फंस गये, मोह छुट नहीं पाया। जैसे ही करतब के मंच पर पहुंचे लगा की आज तो बुरे फंसे हैं। फिर हिम्मत जुटायी और दो घण्टे देने के बाद जमूरा खड़ा हो गया, मदारी ने कहा कि क्या हुआ, खेल तो अभी शुरू हुआ है। मैंने कहा कि नहीं, अब नहीं, जमूरे का समय समाप्त हो गया है। और जमूरा बनी मैं पूरी ताकत के साथ बाहर की ओर भागी, यह भी नहीं देखा कि कोई पीछे आ रहा है या नहीं। गाड़ी को तैयार रखा था, बस सीधे गाड़ी में धंस गये और जमूरा बिना खेल दिखाये ही चम्पत हो गया। घर आकर खूब ताली बजायी कि आज जमूरे में हिम्मत आ गयी। हे दुनिया के जमूरों, तुम भी हिम्मत पैदा करो और मदारियों के चंगुल से छूटकर जीवन को सुखी बनाओ।

माँ को भी जीने का अधिकार दे दो

Written By: AjitGupta - May• 21•17

इन दिनों सोशल मीडिया में माँ कुछ ज्यादा ही गुणगान पा रही है। हर ओर धूम मची है माँ के हाथ के खाने की। जैसै ही फेसबुक खोलते हैं, एक ना एक पोस्ट माँ पर होती है, उसके खाने पर होती है। मैं भी माँ हूँ, जैसे ही पढ़ती हूँ मेरे ऊपर नेतिक दवाब बढ़ने लगता है, अच्छे होने का। अभी हम जिस जमाने में जी रहे हैं, वहाँ संयुक्त परिवार विदा ले चुके हैं, अब तो एकल परिवार ही दिखायी दे रहे हैं। शिक्षा के कारण युवा एकल परिवार से भी वंचित हो गया है, अब युवक और युवती दोनों को ही अकेले किसी महानगर या विदेश में जीवन यापन करना होता है। विवाह की भी बात कर रही हूँ, जरा रूकिये। विवाह होने के बाद एक से दो हो जाते हैं लेकिन दोनों ही रसोई से अनजान होते हैं। जैसे-तैसे पेट भरने का जुगाड़ कर लिया जाता है लेकिन भोजन की तृप्ति क्या होती है, वे भूल ही जाते हैं। अब माँ याद आती है, माँ कैसा भी भोजन बनाती थी लेकिन वे जो खा रहे हैं उससे तो लाख गुणा अच्छा ही होता था। जब ऐसी परिस्थिति अपने घर में भी देखती हूँ तो मेरे ऊपर नैतिक दवाब स्वाभाविक रूप से पड़ने लगता है और मैं कुछ नया और कुछ रुचिकर बनाने की ओर ध्यान देने लगती हूँ।
अब अपनी माँ के बारे में सोचती हूँ, वह सीधा-सादा भोजन बनाती थी, हमें बिना हाथ हिलाये भोजन मिलता था तो परम स्वादिष्ट ही लगता था लेकिन दुनिया में आने वाले नये व्यंजनों को बनाने की शुरुआत हम ही करते थे। हम से मतलब नयी पीढ़ी है। हमें हमारी माँ के हाथ से बने भोजन की आदत सी हो जाती है और मन करने लगता है कि वही स्वाद हमें मिलता रहे। लेकिन माँ क्या चाहती है, यह कोई नहीं सोचता! जैसे ही नयी पीढ़ी आंगन में अंगड़ाई लेने लगती है, माँ भी सोचने लगती है कि अब मुझे भी कुछ नया व्यंजन खाने को मिलेगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। बस माँ तू अच्छी है, यही गुणगान सुनकर चुप लगा जाती है। भारतीय परिवारों में अभी तक नासमझी बरकरार है कि बेटे का घर बसेगा और बहु आकर सास की सेवा करेगी। माँ पलक-पाँवड़े बिछा देती है कि अब तो मुझे भी कोई भोजन कराएगा। लेकिन यह क्या बहु तो बेटे से भी अधिक कोरी निकल जाती है। उसने भी केवल शिक्षा पर ही ध्यान दिया, पेट कैसे भरा जाएगा चिन्तन ही नहीं किया!
बेचारी माँ, बुढ़ापे में भी रसोई में अपनी टूटी कमर को लेकर साधी खड़ी रहने का प्रयास करती है और माँ के हाथों में जन्नत है इस बात को पोर-पोर से सुनती हुई खाना बनाने को मजबूर होती रहती है। कोई बेटा नहीं कहता कि माँ मैं तेरी सेवा करना चाहता हूँ, तू मेरे पास चली आ, बस सभी यह कहते सुने जाते हैं कि माँ तेरे हाथ के खाने का मन कर रहा है। माँ महान होती है, पुत्र कपूत हो सकता है लेकिन माता कुमाता नहीं होती है। अरे बस भी करो, सारे भाषण! माँ को भी जीने का अधिकार दे दो। उसकी सेवाओं की भी उम्र तय कर दो। तुम सेवा नहीं कर सकते तो जाने दो लेकिन बुढ़ापे में उनकी उम्र पर तो गाज ना गिराओ।
अन्तिम बात, अब जब हम सारे काम खुद कर सकते हैं तो क्या लड़का और क्या लड़की दोनों को ही पेट भरने के और जीने के सारे ही काम सिखाइये। माँ को अनावश्यक महान मत बनाइये, वह भी जीवित प्राणी है, उसे भी कुछ चाहिये। माँ पर लिखने से पहले यह सोचिये कि क्या किसी माँ ने भी अपने बेटे पर लिखा कि उसने माँ का जीवन धन्य कर दिया हो। जब संतान बड़ी हो जाती है तब माँ का कर्तव्य पूरा हो जाता है, इसलिये परस्पर सम्मान और प्रेम देने की सोचिये ना कि खुद की नाकामी छिपाकर माँ को काम में जोतिए।
(सारी संतानों से क्षमा मांगते हुए)