अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

खानदान पुराना और खानसामा नया

Written By: AjitGupta - Jun• 24•19

खानदान पुराना और खानसामा नया

मणि नाम का साँप वापस अपने बिल से निकला, चारों तरफ देखा कि बाढ़ का पानी उतर तो गया है ना? कहीं जंगल में मोर तो नाच नहीं रहें हैं ना? आश्वस्त हुआ फिर बिल से बाहर आया। नहीं, कोई खतरा नहीं। जैसे ही बिल से थोड़ा दूर ही चला था कि पता लगा, मालिक पर संकट गहराया है। मालिक सिंहासन खाली करने की जिद पर अड़े हैं। वह सरपट दौड़ लगाकर दरबार तक पहुँचा, देखा कि सन्नाटा पसरा है। सारे ही जीव फुसफुसा रहे हैं, सभी के मुँह पर चिन्ता पसरी है। मालिक ने एक माह का समय दिया था, वह पूरा होने में है। सारे देश में मुनादी फिरा दी गयी है कि मालिक के पैर की जूती सिंहासन के लिये चाहिये लेकिन लोग पैर की जूती बनकर भी सिंहासन पर बैठना नहीं चाहते! डरते हैं कि कहीं सीताराम केसरी जैसा हाल ना हो जाए! भला किसकी औकात है जो मालिक की बराबरी कर सके? आखिर कहा तो यही जाएगा ना कि मालिक की जगह ये बैठे हैं सिंहासन पर! नहीं बराबरी तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन मालिक है कि मान ही नहीं रहे हैं। असल में मालिक बोर हो गये हैं, कब तक एक ही मोदी को गाली देते रहें! वे हवा परिवर्तन को जाना चाहते हैं। मणि नाम के साँप को मालिक का उठाया हर कदम ऐसा ही लगता है जैसे प्रभु ने कदम उठाया हो! लेकिन मणि को गुस्सा भी बहुत  है कि मालिक के सिवाय किसी भी ऐरे-गैरे-नत्थू-गैरे को मालिक तो नहीं कहा जाएगा! वह सोच में पड़ गया, क्या बोले समझ नहीं आ रहा था। तभी दरबार से आवाज आयी, अरे देखो, अपना परम विषधर मणि साँप आ गया है! सारे दरबारी नाचने लगे, इसके जहर का तो तोड़ नहीं है तो बता मणि ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाए?

मणि बोला कि करना क्या है, याद करो, पहले मालिक के प्रति वफादारी किसने निभायी थी। एक ने कहा कि सर, नेहरू के बाद ऐसा ही संकट पैदा हुआ था, इन्दिरा जी सिंहासन  पर बैठने में झिझक रही थी तो एक बौने से नेता को हमारे पूर्वजों ने सिंहासन पर बिठा दिया था। अभी बात भी पूरी नहीं हुई थी कि चारों तरफ से शोर उठ गया, नाम मत लो, ऐसे …. का। वह तो इन्दिरा जी का ऐसा प्रताप था कि उनको दूसरे देश में भेजकर हमेशा के लिये सुला दिया गया था, नहीं तो उसने इस खानदान को ही उलटने की तैयारी कर ली थी! चारों तरफ खामोशी छा गयी। तभी एक ओर से आवाज आयी कि एक जमाने में हमारे मालिक के ही वंशज हमारे प्रदेश की यात्रा पर आए थे, हमारे मुख्यमंत्री ने अपना कंधा आगे कर दिया था कि हुकुम आप इसपर पैर रखकर नीचे उतरें! इतनी वफादारी निभायी थी हमारे प्रदेश ने। इसलिये हमें अवसर मिले और हम मालिक के वफादार बनकर सिंहासन की रक्षा कर सकें। मणि साँप ने कहा कि बात तो उचित है। हम किसी को सिंहासन पर बिठा तो सकते हैं लेकिन सिंहासन का स्थान 10, जनपथ ही रहेगा और इसकी डोरी हमारे मालिक के पास ही रहेगी। बोलो मंजूर है? हम जैसे पालतू लोगों के लिये एक ठिकाना होना ही चाहिये, हम ठोर नहीं बदल सकते। अब कोई मुझ से कहे कि मैं बिल की जगह खुले खेत में रहने लगूँ तो कितने दिन जीवित रह सकूंगा? इसलिये तलाश करिये किसी अमचे-चमचे की, जो सदैव भगोने में रहने को बाध्य रहे। साँस भी लेनी हो तो मालिक से पूछकर ले। बस कुछ दिनों की बात है, मालिक तफरी से लौट जाएंगे और फिर ड्यूटी खत्म। फटी जेब का कुर्ता पहनकर मालिक बोर हो चले हैं, उन्हें नया कुछ चाहिये। जाने दीजिए उन्हें बैंकाक या लन्दन, जहाँ उनका मन करे, बस तरोताजा होने दीजिए। जब वापस लौटेंगे तब देखना उनके पास गालियों का भरपूर भण्डार होगा। मैं भी मालिक के साथ ही रहूँगा, उन्हें रोज थोड़ा-थोड़ा विष का सेवन कराऊंगा, जिससे वे अधिक जहर उगल सके। आप लोग चिन्ता ना करें, अब मैं आ गया हूँ. सब ठीक कर दूंगा। बस ध्यान रहे कि भूलकर भी नये व्यक्ति को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता मत देना। हमारे मालिक और हमारे मालिक का खानदान जब तक सूरज-चाँद रहेगा, तब तक रहना चाहिये। मैं साँप का वंशज, वचन देता हूँ कि मैं पृथ्वी पर अनादि काल से रहता आया हूँ, आगे भी रहूँगा, मेरे जहर से ना कोई बचा है और ना आगे भी बचेगा। लेकिन, लेकिन हकलाता सा एक कार्यकर्ता बोला कि आपके जहर से यह मोदी नामका नेता तो मरता नहीं हैं! आपके जहर में तो असर है ही नहीं, आप तो केवल फूंफकारते हो! मणि साँप धीरे से खिसक लिया, बोला कि मेरे विश्राम का समय हो गया है। जय मालिक, जय मालिक कहता हुआ वह वहीं अपने पुराने बिल में घुस गया। बस जाते-जाते कहता गया कि किसी को भी बिठा दो, लेकिन मालिक के खानदान पर आँच नहीं आनी चाहिये। बस खानदान पुराना और खानसामा नया।

साम्प्रदायिकता बिल में और राष्ट्रवाद परचम में

Written By: AjitGupta - May• 14•19

मेरे देश में साम्प्रदायिकता कहीं खो गयी है, मैं उसे हर बिल में खोज चुकी हूँ, गली-मौहल्ले में भी नहीं मिली, आखिर गयी तो गयी कहाँ? यह तो छिपने वाली चीज थी ही नहीं, देश की राजनीति में तो यह शाश्वत बन गयी थी! भला ऐसा कौन सा चुनाव होगा जब यह शब्द ही ब्रह्मास्त्र ना बनो हो! सारे ही मंचों से चिल्ला-चिल्लाकर आवाजें आती थी कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ हमें एकत्र  होना है। एक तो नारा हमने सुना था – इस्लाम खतरे में हैं, एकत्र हो जाओ और दूसरा सुना था कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ एकत्र हो जाओ। साँप-नेवले सारे ही एक छत के नीचे आ जाते थे। लेकिन इस बार तो यह नारा सिरे से ही खारिज हो गया! हमने आजादी के पहले से ही इस नारे को गढ़ लिया था और संगठनों पर प्रतिबन्ध की परम्परा को जन्म दे दिया था। आजादी के बाद भी यह नारा खतरे की घण्टी की तरह चला, जैसे ही सरकारों पर खतरा मंडराता, साम्प्रदायिकता का नारा जेब से निकल आता और फिर प्रतिबन्ध की आँधी के कारण लोकतंत्र के दरवाजे  बन्द  हो जाते।

हम जैसों ने इस नारे का ताण्डव खूब झेला, हम सरकार का हिस्सा नहीं थे तो झेलना पड़ा। लेकिन जो खुद को सरकार का  हिस्सा मानते थे वे हमारे खिलाफ कभी भी इस बिच्छू को निकाल देते थे और एकाध डंक लगाकर वापस जेब में रख लेते थे। लेकिन अचानक ही इस चुनाव में यह बिच्छू जैसा नारा गायब हो गया। बस हाय तौबा सी मची रही कि मोदी हटाओ, मोदी हटाओ। हमारे लिये तो दोहरी खुशी लेकर आया यह चुनाव। एक तो बिच्छू गायब हो गया, हम डंक से बच गये, दूसरी तरफ मोदीजी ने राष्ट्रवाद का परचम लहरा दिया। कहाँ हम पीड़ित होते रहे हैं और कहाँ अब इस राष्ट्रवाद के परचम को लपेटे हम, इतराकर चल रहे थे। सामने वाले कह रहे थे कि नहीं हम भी राष्ट्रवादी हैं। जैसे पहले हम कहते थे कि हम साम्प्रदायिक नहीं हैं लेकिन वे कहते थे कि नहीं तुम हो, हमारी सुनते ही नहीं थे। अब वे कह रहे हैं कि हम भी राष्ट्रवादी हैं लेकिन उनकी कोई नहीं सुन रहा है। वे कहते थे कि तुम साम्प्रदायिक नहीं हो तो लो यह टोपी पहनो! जैसे ही हमने मना किया कि नहीं टोपी तो नहीं पहनेंगे, वे झट से उछल पड़ते, ताली बजाकर चिल्लाते कि देखो तुम साम्प्रदायिक हो। इस बार उनकी भी टोपी उतर गयी। अब हम कह रहे हैं कि बोलो – भारतमाता की जय, वे चुप हो जाते हैं और हम ताली बजा लेते हैं कि नहीं, तुम नहीं हो राष्ट्रवादी।

सारे ही धर्मनिरपेक्षता की चौकड़ी वाली चादर ओढ़े नेता, बिना चादर के ही घूम रहे हैं, कोई तिलक लगाकर घूम रहा है तो कोई सूट के ऊपर जनेऊ दिखा रहा है! राम नवमी धूमधाम से मनी, रोजे पर दावतें दिख नहीं रही हैं! हम तो बेहद खुश हैं कि हमारे ऊपर लगा साम्प्रदायिकता का दाग, राष्ट्रवाद की साबुन के एकदम धुल गया है। अब हमारी चादर झकाझक चमक रही है। मैं अक्सर कहा करती हूँ कि परिवर्तन की प्रकिया में समय लगता होगा लेकिन परिवर्तन पलक झपकते ही आ जाता है। गुलाब के पौधे पर फूल जब लगता है, तब ना जाने कितना समय लगता होगा लेकिन जब फूल खिलता है तो पलक झपकते ही खिल जाता है। मोदीजी ने पाँच साल तक कठोर तपस्या की, हमें पता ही नहीं चला की यह साम्प्रदायिकता वाला जहरीला बिच्छू कब बिल में चला गया, लेकिन जब इस चुनावी बरसात में बाहर नहीं आया तब पता लगा कि हमने क्या पाया है! मोदी-काल का सबसे बड़ा परिवर्तन यही है। साम्प्रदायिकता का दंश गायब और राष्ट्रवाद का परचम हमारे हाँथ में। कल तक हम सफाई दे रहे थे, अब वे सफाई दे रहे हैं। मैं हमेशा से कहती हूँ कि प्रतिक्रिया मत करो, हमेशा क्रिया करने के अवसर ढूंढो। प्रतिक्रिया सामने वाले को करने पर मजबूर कर दो। मोदीजी आपको नमन! आपने इतनी बड़ी गाली से हमें निजाद दिला दी। अब हम साम्प्रदायिक नहीं रहे अपितु राष्ट्रवादी बन गये हैं। साम्प्रदायिकता बिल में चले गयी है और राष्ट्रवाद परचम में लहरा रहा है।

तीन पीढ़ी की माँ

Written By: AjitGupta - May• 12•19

आज सुबह से ही मन अपने अन्दर बसी माँ को ढूंढ रहा है। ढूंढते-ढूंढते कभी अपनी माँ सामने खड़ी हो जाती है, कभी अपनी बेटी सामने होती है तो कभी अपनी बहु सामने आ जाती है। तीन पीढ़ियों की तीन माँ की कहानी मेरे अन्दर है। एक माँ थी जिसे पता ही नहीं था कि दुलार क्या होता है! बस वह काम में जुती रहकर, बेटी को डर सिखाती थी। पिता का डर, भाइयों का डर, समाज का डर, दुनिया का डर, हव्वे का डर, भूत का डर। जितने डर माँ ने सिखाए उतने डर तो समय ने भी नहीं सिखाए। इस डर में दुलार कहीं खो जाता था। बस हम ही कभी उसके पेट  पर तो कभी पल्लू से लिपट जाया करते थे और हो जाता था दुलार। वह दौर ही डर का था, पिता घर में आते और सारा घर अनुशासन में आ जाता। ऐसा पता ही नहीं चलता कि अभी कुछ समय पहले तक यहाँ कितनी धमाल हुई है, लेकिन पिता के आने पर सबकुछ शान्त। आज की माँ और तब की माँ में कोई समानता नहीं है। प्यार चुप था, मुखर नहीं था। लड्डू बनते थे, हलुआ बनता था लेकिन ढिंढोरा नहीं पिटता था कि तेरे लिये बनाया है। ना माँ रोटी का कौर लेकर हमारे पीछे भागती थी और ना ही सोते समय लौरी सुनाती थी, बस कहानियाँ खूब थी। कभी राजकुमार की कहानी तो कभी चिड़िया की कहानी तो कभी ढोंगी बाबा की कहानी। बस जो भी दुलार था, यही था।

एक पीढ़ी गुजर गयी, मेरी पीढ़ी आ गयी। कुछ ज्यादा शिक्षित। बच्चों का मन समझने की पैरवी करती शिक्षा और प्रयोगों से लैस। तब नौकरी करती माँ सामने खड़ी थी, कितना समय किसको देना है, हिसाब-किताब रखती माँ थी। बच्चों की दुनिया माँ के इर्द-गिर्द रहने लगी, अब माँ  ही दोस्त थी, माँ ही शिक्षक भी थी। मेरे जैसी माँ सबकुछ सुनती, बच्चे स्कूल से आते ही ढेर सारी बातों का पिटारा साथ लाते, एक-एक बातों को बताने की जल्दी करते, माँ चुपके से उनका मन पढ़ लेती। हमने माँ से कुछ नहीं मांगा था लेकिन अब मुझसे बहुत कुछ मांगा जाता था। यही अन्तर में देख रही थी। कितना देना है, कितना नहीं देना है, अब मुझे यह अघिकार मिलने लगा था। मेरी माँ के पास भोजन का अधिकार था, कितना मिष्ठान्न देना है, कितना नहीं देना लेकिन मेरी पीढ़ी के पास बाजार के अधिकार भी आ गये थे। पूर्ण अधिकार वाली माँ के रूप में मैं खड़ी थी। मैं खुश थी कि मैं बच्चों को संस्कारित कर रही हूँ, उनके पीछे माँ का साया खड़ा है, इसलिये कोई डर उनके जीवन में आ ही नहीं सकता। मेरी माँ डर से परिचय करा रही थी और मैं डर को भगा रही थी। शायद दो पीढ़ियों का यही मूल अन्तर है।

आज तीसरी पीढ़ी मेरे सामने खड़ी है, मेरी बेटी के रूप में और मेरी पुत्रवधु के रूप में। माँ का गौरवगान बढ़ने लगा है, मातृदिवस भी मनने लगा है। मेरी माँ को पता ही नहीं था कि वही सबकुछ है, लेकिन मुझे समझ आने लगा था कि मैं भी कुछ हूँ, लेकिन आज माँ ही सबकुछ है, यह स्पष्ट होने लगा है। मेरी माँ से हम कुछ नहीं मांगते थे, मुझसे थोड़ा मांगा जाता था लेकिन अब मांग बढ़ गयी है। मांग बढ़ी है तो जिद भी बढ़ी है। डर जीवन से एकदम से रफूचक्कर हो गया है। अपने जीवन को अपने मन की इच्छाओं से मेल का समय है। संतान अपने मन के करीब जा रही है और माँ से दूर हो रही है। अब रिश्ते को बताना पड़ रहा है, पहले का मौन सा दुलार अब मुखर हो रहा है और मुखर होते-होते प्रखर वार करने लगा है।  माँ को बताना पड़ रहा है कि मैं तुम्हारी माँ हूँ, संतान से अपने रिश्ते की दुहाई देनी पड़ रही है। कभी लगने लगा है कि मनुष्य के बच्चे से अधिक अब गाय के बछड़े बन गये हैं, पैदा होते ही अपने पैरों पर खड़े हैं। अब बच्चे को माँ का पल्लू पकड़कर बैठने की फुर्सत नहीं है, वह कहानी भी नहीं सुनना चाहता, उसके पास मोबाइल है। मेरी माँ को याद करते-करते मैं खुद को देख लेती हूँ और फिर बेटी और पुत्रवधु को देख लेती हूँ। तीन पीढ़ियों की तीन माँ मेरे सामने हैं। कभी हम माँ से शिकायत करते थे कि माँ तुम हमें समय क्यों नहीं देती? फिर हम सीमित समय देने लगे लेकिन अब माँ पूछने लगी है कि बेटा क्या मेरे लिये कुछ समय है तुम्हारे पास! कल तक माँ के लिये कोई चर्चा नहीं थी लेकिन माँ परिवार में शीर्ष पर बैठी थी, आज मातृ-दिवस मनाती माँ, परिवार में कहीं नहीं है! कल दुलार मौन था और आज दुलार का दिखावा मुखर है! कल तक रिश्ते सहज थे और आज रिश्ते असहज हैं। फिर भी माँ तो है, संतान भी है, दुलार भी है, अनुशासन भी है, बस जो नाभिनाल से जुड़ाव के कारण संतान और माँ एकरूप थे आज मातृदिवस पर एक दिखायी देते हैं। लेकिन प्यार मुखर होकर खड़ा है, माँ भी खूब प्यार कर रही है और संतान भी मुखरता से कह रही है कि माँ मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। यह मुखरता कम से कम एक दिन तो मुखर होकर सुख दे ही जाती है, पहले तो एक दिन भी नहीं था।

बस आज मेरा मन ये सब ही देख पाया, तो आपको बता दिया। मैं खुश हूँ कि मैं माँ हूँ, मैं खुश हूँ कि जो भी स्त्री माँ है, वह जिम्मेदारी से पूर्ण है। यह जिम्मेदारी ही दुनिया को जिम्मेदार बनाती है। हे माँ तेरा वंदन है, अभिनन्दन है।

गाँधीजी का देश के साथ झूठ का प्रयोग!

Written By: AjitGupta - May• 10•19

सत्य के प्रयोग – गाँधी इन्हीं प्रयोगों के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे सत्य के प्रयोग अपने ऊपर करते रहे लेकिन वे देश के ऊपर झूठ के प्रयोग कर बैठे। मैं गाँधी की प्रशंसक रही हूँ लेकिन जब गाँधी उपनाम को लेकर चर्चा चली तब एक बात ध्यान में आयी कि यह गाँधीजी का उपनाम देने का प्रयोग तो झूठ और झांसा देने का प्रयोग था। इन्दिरा नेहरू फिरोज गंधी ( खान ) से निकाह करती है, कुछ लोग कहते हैं कि फिरोज पारसी मुसलमान थे और कहते हैं कि उनकी माँ के पीहर का व्यवसाय इत्र का था तो उनको गंधी कहते थे। लेकिन पिता का गोत्र क्या था? खैर मैं इस विवाद में नहीं पड़ती, बस फिरोज मुस्लिम थे, यह निर्विवाद सत्य है। इन्दिरा और फिरोज का निकाह हुआ, सभी जानते हैं कि मुस्लिम गैर मुस्लिम युवती से निकाह नहीं करते। इसके लिये वे पहले युवती का धर्म परिवर्तन कराते हैं. उसका नाम बदलते हैं फिर निकाह करते हैं। यहाँ भी ऐसा ही हुआ, इन्दिरा नेहरू का नाम बदल गया, मेमूना बेगम। जब गाँधीजी को इसकी खबर लगी, तब उन्होंने नेहरू को समझाया कि देश की आजादी सर पर है और तुम्हें प्रधानमंत्री बनना है, ऐसे में इन्दिरा का मुस्लिम हो जाना देश की प्रजा में असंतोष भर देगा। गाँधीजी ने फरेब किया, जनता को झांसा दिया और इन्दिरा व फिरौज का विवाह अपने समक्ष कराया। इतना ही नहीं उन्होंने अपना उपनाम भी उन्हें भेंट स्वरूप दिया। अब फिरोज गंधी या खान से बदलकर गाँधी हो गये और इन्दिरा जी भी मेमूना बेगम से हटकर इन्दिरा गाँधी हो गयी।

सत्य के प्रयोग करने वाले गाँधीजी ने देश के साथ इतना बड़ा झूठ का प्रयोग कर डाला। यह मुस्लिमों के साथ भी छल था और हिन्दुओं के साथ भी छल था। जो सच है उसे क्यों छिपाया जा रहा था? क्या गाँधीजी की नजर में मुस्लिम होना ठीक नहीं था? क्या गाँधीजी की नजर में देश में हिन्दू और मुस्लिम के बीच सौहार्द नहीं था? यदि वे इस कटु सत्य को जानते थे और उस पर पर्दा डाल रहे थे तो यह देश की जनता के साथ छल था। उन्होंने जो भ्रम की स्थिति बनाई उसका फायदा अनेक लोगों ने उठाया और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया। अनेक अभिनेताओं ने यही किया, वे वास्तव में मुस्लिम थे लेकिन उन्होंने हिन्दू नाम रख लिया। लोग उन्हें श्रद्धा की नजर से देख रहे थे, उनकी पूजा कर रहे थे लेकिन वे देश को धोखा दे रहे थे। गाँधीजी का यह झूठ के साथ प्रयोग देश के लिये खतरनाक खेल  बन गया। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही एक दूसरे के प्रति बैर भाव रखने लगे क्योंकि गाँधीजी ने मुस्लिम को देशहित में छोटा सिद्ध किया था और हिन्दू के साथ छल किया था। अधिकांश हिन्दू समाज भी मुस्लिमों के साथ अविश्वास का भाव रखने लगा और जह किसी भी कौम पर अविश्वास पैदा होने लगे तब वह कौम भी आक्रामक बनकर खड़ी हो जाती है। मुस्लिम अपनी कट्टरता के कारण पहले ही देश के टुकड़े करवा चुके थे और अब अविश्वास का वातावरण उन्हें सुख की नींद नहीं लेने दे रहा था। परिणाम निकला कि वे कांग्रेस को ब्लेकमेल करने लगे। यदि तुम हमारे धार्मिक स्थलों पर जाकर सर झुकाओ तो तुम्हें वोट दें, नहीं तो नहीं दें। यदि तुम हमारी पहचान के परिधान पहनों तो तुम्हें वोट दें नहीं तो नहीं दें। ऐसे कितनी ही रोजमर्रा की ब्लेकमेलिंग  शुरू हो गयी।

इसलिये आज जो कुछ देश में हो रहा है वे सब गाँधीजी के झूठ के प्रयोग के कारण हो रहा है। उनके सारे ही श्रेष्ठ कार्य मिट्टी में मिल गये बस शेष रह गयी एक दूसरे के प्रति नफरत। जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करो, क्यों नाम बदलते हो, क्यों उपनाम बदलते हो और क्यों धर्म बदलते हो? मैंने कल भी यही कहा था कि यदि राहुल गाँधी खुद को ईसाई मानते हैं तो खुलकर कहें कि वे ईसाई हैं, यदि मुस्लिम मानते हैं तो खुलकर कहें कि मुस्लिम हैं और यदि हिदू मानते हैं तो खुलकर कहें कि हिन्दू हैं। लेकिन कभी नाम बदल लेना, कभी खुद को जेनुऊधारी बता देना, कभी टोपीधारी बता देना, यह उचित नहीं लगता। इस देश में अनेक धर्म के लोग रहते हैं, सभी को किसी भी पद पर आने का हक है तो यह छल क्यों! भावनाओं से खेलकर यदि आप गद्दी पर बैठ भी गये तो आप कैसे लोगों का दिल जीत पाएंगे! इसलिये गाँधीजी के सत्य के साथ प्रयोग ही कीजिये, झूठ के साथ प्रयोग मत करिये।

यह ब्लेकमेलिंग नहीं तो क्या है?

Written By: AjitGupta - May• 09•19

यह ब्लेकमेलिंग नहीं तो क्या है? खुले आम हो रही है ब्लेकमेलिंग, सबसे ज्यादा मीडिया कर रहा है ब्लेकमेलिंग। कई दिन पुराना साक्षात्कार कल सुना, मीडिया की एक पत्रकार मोदीजी से प्रश्न करती है कि आपने मुस्लिमों के लिये क्या किया, क्यों आपसे मुस्लिम दूरी बनाकर रखते हैं?

मोदीजी ने उत्तर दिया – एक घटना बताता हूँ जब मैं मुख्यमंत्री था – सच्चर कमेटी के बारे में मीटिंग थी। मुझसे यही प्रश्न पूछा गया। मैंने कहा कि मैंने मुस्लिमों के लिये कुछ नहीं किया, लेकिन साथ में यह  भी बता देता हूँ कि मैंने हिन्दुओं के लिये भी कुछ नहीं किया। मैंने गुजरात के 5 करोड़ नागरिकों के लिये किया है।

यह प्रश्न बार-बार दोहराया जाता है, अब मुझे बताइये कि ये ब्लेकमेल नहीं है तो क्या है? अकेले किसी के लिये कोई भी शासक क्यों कुछ करेगा? यदि किसी के लिये करना पड़े तो वह कोई दवाब है जैसे बलेकमेल में होता है। यह दर्शाता है कि शासक हमें विशेष घोषित करे, यह सिद्ध करे कि उनका सम्प्रदाय शेष सम्प्रदाय से विशेष है। कोई भी शासक किसी भी सम्प्रदाय का सम्मान करे लेकिन उसका वेश धारण करके दूसरे सम्प्रदायों को गौण बताने की कोशिश करने की बाध्यता ब्लेकमेल नहीं है तो क्या है?

आखिर यह ब्लेकमेल की परम्परा कहाँ से और कब विकसित हुई? इकबाल और जिन्ना के सम्मिलित प्रयासों से यह शुरू हुई। अंग्रेज देश को 565 रियासतों में बांटना चाहते थे लेकिन सरदार पटेल के कारण यह सम्भव नहीं हो पा रहा था तो दो भागों में ही बाँट दिया। जिन्ना और इकबाल ने ब्लेकमेल की परम्परा शुरू की और इसे गाँधी और नेहरू ने अंजाम दिया।

एक बार धर्म के नाम पर ब्लेकमेलिंग शुरू होकर देश का बँटवारा हो गया तो यह परम्परा मुस्लिमों की विरासत बन गयी। हम विशेष है, केवल हमारे लिये ही सोचो, हम हज यात्रा पर जाएं तो हमें सब्सिडी दो, हमें नवाज पढ़ने की विशेष छुट्टी मिले, हमें जनसंख्या वृद्धि की छूट मिले, हमें टीकाकरण से छूट मिले, हमें बहुविवाह की छूट हो, आदि आदि अनन्त छूट इसी का हिस्सा रही। प्रशासन ब्लेकमेल होता रहा और ब्लेकमेलिंग की आदत सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती रही। आखिर मोदीजी ने लगाम लगाई। वे बोले कि मैं यदि गैस कनेस्शन दे रहा हूँ तो सभी को दे रहा हूँ, मैं यदि जनधन योजना में खाते खोल रहा हूँ तो सभी के खोल रहा हूँ, मैं यदि आयुष्मान योजना में स्वास्थ्य बीमा कर रहा हूँ तो सभी के लिये कर रहा हूँ तो ऐसे में किसी एक सम्प्रदाय के लिये ही करूँ यह स्वीकार नहीं। यह देश यदि धर्मनिरपेक्ष है तो एक सम्प्रदाय के लिये किसी योजना को इंगित करना संविधान के विरोध में जाएगा।

इसी ब्लेकमेलिंग के चलते रौल विंसी की हालत ना घर की रही और ना घाट की रही। उसे कभी अपना नाम राहुल रखना पड़ता है कभी रौल विंसी। वह आखिर दम ठोक कर क्यों नहीं कह पाता कि वह फिरोज खान का पोता है, उसकी माँ ईसाई है। वह कभी जनेऊ धारण कर लेता है, कभी टोपी पहन लेता है। रौल विंसी की ही तरह हर नेता इस ब्लेकमेलिंग का शिकार होता है। उसे मजबूर किया जाता है कि तुम्हें हमारे लिये ही बोलना होगा, हमारे परिधान पहनने होंगे।

मुझे गर्व है कि देश में एक नेता तो ऐसा आया जिसने इस ब्लेकमेलिंग को सिरे से नकार दिया। उसने कहा कि मेरे लिये सारे देशवासी एक हैं। ना मैं किसी का लिबास पहनूगा और ना ही किसी के लिये विशेष रियायत घोषित करूंगा। बस इस देश को ऐसा ही नेता चाहिये था। जिस दिन विशेष-विशेष का खेल और उससे उपजा ब्लेकमेल इस देश से मिट जाएगा, सारे देश में अमन चैन आ जाएगा। इसलिये मुझे मोदी पसन्द है, जो सीना चौड़ा करके कहते हैं कि ना मैं मुस्लिम के लिये काम करता हूँ और ना ही हिन्दू के लिये काम करता हूँ, मैं तो देश की समस्त जनता के लिये काम करता हूँ। सबका साथ – सबका विकास।