अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

तिनके का सहारा

Written By: AjitGupta - Sep• 14•19

कहावत है कि “डूबते को तिनके का सहारा”, जीवन का भी यही सच है। हम दुनिया जहान का काम करते हैं लेकिन जीवन में तिनका भर सहारे से हम तिरते जाते हैं, तिरते जाते हैं। हमारे सामने यदि तिनके जितना भी सहारा नहीं होता तो हम बिखरने लगते हैं, इसलिये डूब से बचने के लिये और जिन्दगी में सुगमता से तैरने के लिये तिनके भर का ही सहारा चाहिये।

आप भी किसी का सहारा बनकर देखिये, बस तिनके जितना ही। हम शाम को फतेहसागर पर घूमने जाते हैं, कई बार अकेले होते हैं, पैर बोझिल  होने लगते हैं तभी सामने से कोई हाथ हमें देखकर हिल जाता है और लगता है कि नहीं, हम अकेले नहीं हैं। पैरों में स्फूर्ति आ जाती है, लगता है हम किसी के साथ चल रहे हैं। यह केवल मात्र तिनके का सहारा ही होता है जो हमारा मन बदल देता है।

घर में भी यही होता है, कोई आकर पूछ लेता है कि मैं कुछ मदद करूँ तो मन और हाथ दौड़ने लगते हैं और जब लगता है कि कोई आवाज नहीं, कोई शब्द नहीं तो खामोशी में डूबने जैसा मन होने लगता है। जिन्दगी बोझिल सी हो जाती है। हम चारों तरफ तिनका ढूंढने लगते हैं।

मन बहुत विचित्र है, कब खुश हो जाता है और कब दुखी, कुछ कहा नहीं जाता। बस साथ चाहता है, तिनके भर का साथ चाहता है। तिनका भर साथ तो खुश हो जाता है और तिनके का सहारा नहीं तो दुखी हो जाता है।

आजकल मैं भी तिनके का सहारा ढूंढ रही हूँ, बस तिनके जितना सहारा। यह तिनका ही लिखना सिखाता है, यह तिनका ही मन को बाहर निकालता है और यह तिनका ही कहता है कि अभी हम भी हैं। बस कोशिश करो कि घर में या बाहर तिनका जितना सहारा बनने की शुरूआत होगी। पता नहीं हम कितने लोगों के जीवन में खुशियाँ ला सकते हैं, बस प्रयास जरूर करें।

छिपे रुस्तम हो गुरु आप!

Written By: AjitGupta - Sep• 05•19

अहा! ये कॉपी-पेस्ट करने की छूट भी कितनों को ज्ञानी बना देती है! बिना शिक्षक के ही हम ज्ञानवान बनते जाते हैं, नहीं-नहीं, ज्ञानवान नहीं बनते अपितु दिखते ज्ञानवान जैसे ही हैं। लोग भ्रम में जीते हैं कि जो हम पढ़ रहे हैं, वह इसी ने लिखा है! विश्वास नहीं होता लेकिन रोज-रोज के ज्ञान से विश्वास होने लगता है। लेकिन कभी-कभी ऐसी मूर्खता उजागर हो जाती है कि हमारा विश्वास डोल जाता है, शक होने लगता है कि क्या यह विद्वान प्राणी वास्तव में विद्वान है! शीघ्र ही पोल खुलने लगती है लेकिन जब तक पोल खुले तब तक वह व्यक्ति कॉपी-पेस्ट में माहिर हो जाता है। उसे ब्रह्म ज्ञान  हो जाता है, नशा सा सवार हो जाता है और दोनों कानों में रूई ठूसकर निकल  पड़ता है कॉपी-पेस्ट करने। कई बार हम जैसे दुष्ट प्रवृत्ति के लोग टोक देते हैं कि क्या कर रहे हो, तो हमें अपने मार्ग से हटाते हुऐ उनका काम बदस्तूर जारी रहता है। धन्य है ये सोशल मीडिया, जो नये-नये ज्ञानी पैदा कर रही है!

विगत में लोगों ने बहुत लिखा, अपना-अपना ज्ञान लिपिबद्ध किया और फिर कोई ऐसा विद्वान आया कि उसने सारे लिखे को एक पुस्तक का रूप दे दिया। जिसे वेद कहा गया। न जाने कितने लोगों ने लिखा, कितने विषयों पर लिखा, सभी को एकत्रित कर विषयों के आधार  पर पुस्तकों में संकलित कर दिया। आज दुनिया के लिये ये ज्ञान अनमोल विरासत है। वर्तमान में भी कुछ ऐसे ही  प्रयोग हो  रहे हैं, कौन लिख रहा है, कौन उसे कॉपी कर रहा है,  फिर कौन उसे पेस्ट कर रहा है, कुछ  पता नहीं। ज्ञान को अज्ञान भी बनाया जा रहा है, अर्थ का अनर्थ भी किया जा रहा है, लेकिन सब चल रहा है। होड़ मची है, कॉपी-पेस्ट करने की। पुरुष महिला की खिल्ली उड़ा रहा है, महिला भी समझ नहीं पा रही, वह भी तुरन्त कॉपी करके पेस्ट कर रही है। अपनी खिल्ली खुद ही उड़ा रही है। पुरुष भी ऐसा ही कर रहा है। कई साल पहले सरदारों पर चुटकुले आते थे, सरदार भी सुनाते थे। लोग कहते हैं कि देखो कितने  बड़े दिल का आदमी है! ये  बड़े दिल के लोग नहीं हैं, मूर्ख हैं और विद्वान बनने की चाह रखते हैं। कुछ भी फोकट का मिल जाए, हम उसे उड़ा लेंगे और अपने खिलाफ ही प्रयोग कर डालेंगे, फिर कहेंगे की हमें मूर्ख कैसे कहा!

एक कहानी पढ़ी थी, एक बैंक के सामने एक सफाई कर्मचारी सफाई करते समय बोल देता है कि क्या बैंक दिवालिया हो गया है, जो अलग से सफाई कर्मचारी लगाए हैं! बात ही बात में बात बढ़ती जाती है और खबर शहर में पहुँच जाती है कि बैंक दिवालिया हो गया है। फिर क्या था, बैंक के बाहर लम्बी कतारें लग जाती हैं, पैसा निकालने वालों की और शाम तक वास्तव में बैंक दिवालिया हो जाता है। खबरों का कॉपी-पेस्ट होना ऐसा ही है। चुटकुला का भी ऐसा ही है और कहानियों का भी। कुछ शातिर लोग झूठा-सच्चा कुछ भी परोस रहे हैं और लोग दौड़ पड़ते हैं कॉपी-पेस्ट करने के लिये, बिना यह देखे कि यह कितना उचित है और कितना अनुचित! लेकिन लोगों को उचित और अनुचित का ज्ञान  हो जाए तो फिर दुनिया स्यानी ना बन जाए! फिर ढोंगी बाबा, पीर-फकीर के पास लम्बी कतारों में जाने से गुरेज ना करें हम! दुनिया ऐसे ही चलेगी, ज्ञान की दुकानें ऐसे  ही चलेंगी। लेकिन सच यह है कि हम ज्ञानी बनने के चक्कर में मुर्ख सिद्ध होने लगते हैं क्योंकि उधारी का ज्ञान हमें कभी भी ज्ञानी नहीं बना सकता। शिक्षक दिवस पर ऐसे ज्ञानियों को भी नमन, जो अज्ञान की तूती  बजा रहे हैं और खुश हो रहे हैं। चलो किसी बहाने से ही सही, खुशी का इण्डेक्स तो भारत में  बढ़ने की सम्भावना बढ़ ही रही है। आप सभी का वन्दन और जो आज नाराज या गुस्सा हो रहे हैं, मेरी पोस्ट को पढ़कर उससे क्षमा भी मांग लेगे जी,  हमारी क्षमावणी भी आने ही वाली है। हम तो फिर कहेंगे कि अजी आप तो छुपे रुस्तम हैं जी!

तुम हर क़ानून से बड़े हो

Written By: AjitGupta - Sep• 03•19

बधाई! देश के उन सभी देशवासियों को बधाई जो स्वयं को किसी दायरे में बाँधने को कभी तैयार नहीं है। मोदीजी फ़िट मूवमेंट चलाते हैं और हम रस्सी तोड़कर भागने का जुगत बिठा लेते हैं। मोदीजी क़ानून बना देते है कि सड़क पर ग़ाडी दौड़ाने के लिये नियमों का पालन करना पड़ेगा नहीं तो हर्ज़ाना देना होगा। मेरी जूत्ती देगी हर्ज़ाना, हुंअ! मेरा बच्चा भी गाड़ी दौड़ाएगा और किसी को मारेगा भी, तुम कौन मुझे रोकने वाले! हमने फिर समाधान ढूँढ लिया! पुलिसवालों खा जाएँगे जुर्माना! पुलिसवाले तो जब खाएँगे ना जब आप क़ानून तोड़ेंगे! वाह हम दुनिया के सबसे प्राचीन सभ्यता वाले लोग भला किसी क़ानून में बँधने के लिये है? मैं तो नहीं लगाऊँगा हेलमेट। 
बधाई तो बनती ही है, हिम्मत की दिलेरी की। एक कहानी याद आ गयी, एक चोर था, जुलाहे के घर में घुस गया चोरी करने। जुलाहे ने खिड़की के पास अपना ताना-बाना रखा था, चोर की आँख में घुस गया। चोर की एक आँख गयी। चोर राजा के पास पहुँच गया बोला कि न्याय दो। मेरा काम चोरी करना है और इस जुलाहे के कारण मेरी आँख फूट गयी। राजा ने कहा की बात उचित है, जुलाहे की एक आँख फोड़ दी जाए!
बेचारा जुलाहा बोला कि न्याय राजन! मैं जुलाहा हूँ और दोनों आँख से ही ताना-बाना बुनता हूँ, एक बार इधर देखना पड़ता है और दूसरी बार उधर। राजा ने कहा की यह भी उचित बात है। फिर सुझाव आया कि गली के नुक्कड़ पर जो मोची बैठता है वह एक तरफ़ देखकर ही जूती गाँठता है तो उसकी एक आँख निकाल ली जाए! न्याय पूरा हुआ। 
चोरी जायज़ है, सड़क पर गाड़ी दौड़ाने में कोई नियम नहीं होने चाहिये इसलिये कैसा जुर्माना! मोदी ने फ़िट करने की सारी कोशिशों को धता बताने के लिये बधाई। हम दुनिया में अनूठे हैं, भला हम किसी क़ानून में बँधने के लिये हैं! नहीं हैं , आप महान संस्कृति के वाहक हैं भला आपके लिये क़ानून! कदापि नहीं। परम्परा जारी रखिये, विरोध की परम्परा टूटनी नहीं चाहिये। यह देश हमेशा आपका ऋणि रहेगा। 
हमारे पूर्वज हमेशा जंगलों में रहते आए हैं, हमने कोई नियम नहीं माने और अब मोदी राज्य में नियम! चोरी मत करो, रिश्वत मत लो, कालाधन नहीं चलेगा, गाड़ी ऐसे चलाओ, वैसे चलाओ, अब हम अपनी इच्छा से जिए भी नहीं! तुम सरकार चलाओ और हमें परिवार चलाने दो। हम नहीं मानते क़ानून। देशवासियों क्या कहते हो तुम कि वे क़ानून थोपेंगे लेकिन तुम चोरी पर अड़े रहना। देश के महान नागरिकों, तुम्हें अपने बच्चे से इतना डर लगता है कि तुम उसे गाड़ी की चाबी देने से मना नहीं कर सकते। बिल्कुल ठीक है। आख़िर तुम परिवार वाले हो, वे क्या जाने बच्चे का मोह! तुम तो माँग करो कि हमारे बच्चे से कोई मर भी जाए को इसे पुरस्कार मिलना चाहिये। बधाई आप सभी को। कभी मत बँधना क़ानून से, तुम हर क़ानून से बड़े हो। 

तेरा पैसा + मेरा पैसा नहीं तो मंदी

Written By: AjitGupta - Sep• 02•19

मेरा पैसा तेरे पास कैसे पहुँचे और लगातार पहुँचता ही रहे, इस चाल को कहते हैं आर्थिक आवागमन। जैसे ही मेरा पैसा मैंने अपने पास रोक लिया तो कहते  हैं कि मंदी आ गयी, मंदी आ गयी। जयपुर में एक बड़ा बाँध हुआ करता था – रामगढ़। सारे जयपुर की जीवनरेखा। जब रामगढ़ भरता था तो सारा जयपुर देखने को उलटता था कि हमारी जीवनरेखा लबालब है लेकिन कुछ साल पहले क्या हुआ कि गाँव-गाँव में एनीकट बनने लगे और गाँव का पानी रामगढ़ तक नहीं पहुँचा, परिणाम रामगढ़ सूख गया। रामगढ़ के रास्ते में न जाने कितने अवरोध खड़े हो गये। ऐसे ही देश में मंदी-मंदी का राग शुरू हुआ है। आर्थिक बातें तो मेरे वैसे ही पल्ले नहीं पड़ती तो जब से आर्थिक मंदी का राग अलापा जा रहा है, मेरे तो समझ नहीं आ रहा कि यह होता क्या है! मैं सीनियर सिटिजन हो गयी हूँ, मुझे लगता है कि बाजार से कुछ भी खरीदने की अब जरूरत नहीं है, जो है उसे ही समाप्त कर लें तो बड़ी बात है। मेरा बाजार जाना बन्द क्या हुआ, देश में मन्दी आगयी! मेरे गाँव में एनीकट से पानी क्या रोक  लिया कि रामगढ़ सूख गया! मेरा पैसा बड़े साहूकारों के पास जाए तो मंदी नहीं लेकिन मेरा पैसा मेरे पास ही रहे तो मंदी हो गयी! यह कैसा गणित है! क्या देश का पैसा कम हो गया जैसे पाकिस्तान का हो गया है? हमारा विदेशी मुद्रा भण्डार लगातार बढ़ रहा है तो मंदी कहाँ से आ गयी?

मैं फिर कह रही हूँ कि मुझे पैसे की बात का ज्ञान नहीं है और मेरे जैसे करोड़ों को नहीं है लेकिन इतना जानते हैं कि हमारा पैसा कम नहीं हुआ है और ना ही हम  बाजार खरीदने की शक्ति भी गवाँ बैठे हैं! हमारा देश मितव्ययी देश है, अनावश्यक खरीदारी नहीं करता है। युवा पीढ़ी जब कमाने योग्य होती है तब उसे खरीदारी का चश्का लगता है लेकिन कुछ दिन बाद वे भी मितव्ययी ही हो जाते हैं। रोज-रोज गाडियाँ बदलने का शौक हमारे देश में नहीं है। देश अपनी रफ्तार से चल रहा है लेकिन कुछ लोग चिल्ला रहे हैं कि मंदी से चल रहा है! आज गणेश चतुर्थी है, देखना कैसे दौड़ लगाएंगे लोग! कितने गणेश पण्डालों में कितना दान एकत्र होता है! तब आंकना मंदी को!

त्योहार मनाने में कहीं भी कृपणता दिखायी दे तो मानना मंदी है। बड़े दुकानदारों के पास कितनी भीड़ आयी और कितनी नहीं आयी, इससे आकलन मत करिये। भारत में चार मास चौमासा रहता है, इस काल में लोग शान्त रहते हैं। शुभ कार्य भी कम होते हैं। जैसे ही चौमासा गया फिर देखना बाजारों की रौनक। आज तो गणेश जी की स्थापना हुई है, मंगल कार्य शुरू होंगे। बाजार भी भरेगा और खूब भरेगा। यह भारत का बाजार है, विदेशी आँख से देखने की कोशिश करोंगे तो कुछ नहीं समझ सकोगे। भारत की नजर से देखो और शान्ति से रहो। हाहाकार मचाने से मन्दी दूर नहीं होगी और ना ही कुछ अन्तर आने वाला है। अभी धैर्य रखो, पाँच साल में न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे फिर भी कुछ हाथ नहीं आने वाला। तुम्हारा सामना मोदी से हुआ है, तुम मंदी का डर दिखा दो या तेजी का कुछ असर नहीं पड़ने वाला। तुम तो आज गणेशजी का आगमन करो और फिर दीवाली देखना, तुम्हें पता चल जाएगा कि देश कितना खुश है।

यह देश कभी भी मंदी का शिकार हो ही नहीं सकता क्योंकि हम मितव्ययी है, जरूरत होने पर ही बाजार जाते हैं। त्यागी भी हैं, क्योंकि एक उम्र होने के बाद हम त्याग पर ध्यान देते हैं। युवा पीढ़ी को भी हम संयम का पाठ पढ़ाते हैं तो यह देश कभी आर्थिक तंगी या मंदी का शिकार नहीं हो सकता। हम पाकिस्तान जैसे देश नहीं है जो किसी का विनाश करने के लिये खुद को ही कंगाल बना डालें। हम खुद भी उन्नत होते रहते हैं और दूसरों को भी उन्नत होने की कामना ही करते हैं। इसलिये देशवासियों खुश रहो। ये जो लोग हैं मंदी का रोना रोकर खुद की तंगी दूर कर रहे हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं है। मस्त रहो, गणेश जी का वंदन करो और ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करो।

मोदी ट्रम्प को धौल जमा रहे हैं!

Written By: AjitGupta - Aug• 27•19

तुम्हारे पास क्या है? मोदी पूछ रहे थे! हमारे पास स्वर्ग जैसे देश हैं, हम पूर्ण विकसित हैं। अमेरिका, फ्रांस सरीखे विकसित देश बता रहे थे और फिर प्रतिप्रश्न करते हैं कि तुम्हारे  पास क्या है? भारत देश के लोग कहते हैं कि हमारे पास कृष्ण हैं! एक तरफ सात देश साथ खड़े थे, दुनिया को  बता रहे थे कि हमारे देश स्वर्ग हैं, हम दुनिया को बताने एकत्र हुए हैं कि कैसे धरती को स्वर्ग जैसा बनाया जा सकता है। क्योंकि हमारे पास अनुभव है। लेकिन इन समृद्ध लोगों की चिंतन बैठक में भारत जैसे उदीयमान देश के प्रधानमंत्री को सुझाव के लिये बुलाया जाता है, मानो कृष्ण को बुलावा भेजा हो कि आओ और दुनिया को अपने परामर्श से अवगत कराओ।

एक तरफ सात समृद्ध देशों का जमावड़ा था तो दूसरी तरफ गरीब माने जाने वाले देश के प्रधानमंत्री को सादर आमंत्रण था! आमंत्रण भी परामर्श देने के लिये था! मोदीजी बोल रहे थे और सब सुन रहे थे। मोदीजी ताल ठोक रहे थे, ट्रम्प को प्यार से धौल जमा रहे थे और ट्रम्प हँस रहे थे! कितनी विचित्र बात लग रही थी!

मोदीजी के पास ज्ञान का अकूत भण्डार है, यह मोदीजी का ज्ञान शुद्ध भारतीय ज्ञान है। गीता से, पुराणों से लिया हुआ ज्ञान। जब दुनिया सभ्यता के मायने ढूंढ रही थी तब भारत के ऋषियों ने सृष्टि के लिये ज्ञान के भण्डार भर दिये थे और मोदीजी इन भण्डारों को आत्मसात कर लिया था।

पर्यावरण की रक्षा कैसे की जाती है? स्वास्थ्य की रक्षा कैसे की जाती है? शिक्षा कैसी होनी चाहिये? मानवता की ही नहीं अपितु सम्पूर्ण चराचर जगत की रक्षा कैसे हो? इन सारे ही विषयों का ज्ञान हमारे पुराणों में है और मोदीजी इसके मास्टर बन चुके हैं। मोदीजी दुनिया के सामने इस ज्ञान के भण्डार का एक बूंद भी टपकाते हैं तो वे सारे धन्य हो जाते हैं। ज्ञान का यह प्रकार दुनिया के लिये अनोखा है और ज्ञान देने का प्रकार भी अनोखा है इसलिये दुनिया को मोदी कृष्ण लगने लगे हैं। वे कहते हैं कि आओ और प्रबंधन का नवीन ज्ञान हमें बताकर जाओ।

मैं मोदी के आमंत्रण को समझने का प्रयास कर रही हूँ। भला सात समृद्ध देश किसी ऐसे देश को आमंत्रण क्यों देंगे जिसे कल तक गरीब देश कहा जाता था। जिसके पूर्व प्रधानमंत्री अमेरिका के राष्ट्रपति से हाथ मिलाने में भी गौरव का अनुभव करते थे और आज हमारे प्रधानमंत्री धौल जमा रहे हैं! आश्चर्य होता है! ऐसा लग रहा है मानो समृद्धता बौनी हो गयी हो और ज्ञान कृष्ण जितना विशाल बन गया हो! हम कहते रहे हैं कि भारत एक दिन पुन: विश्वगुरु बनेगा! आज इस बैठक में मोदीजी की उपस्थिति इस बात को पुष्ट करती है।

क्या नहीं था हमारे पास! लेकिन हमने अपने मॉडल को नहीं चुना अपितु ऐसे मॉडल को चुना जो विश्व के गरीब देश भी नहीं चुनते! सारे देश को कचरा पात्र बना दिया! सारी जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की योजनाएं लागू कर दी! हमारी दिनचर्या, रात्रिचर्या दूषित बना दी गयी। जो कहीं नहीं होता, ऐसा फूहड़ प्रदर्शन हमारे देश में होने लगा। मानो हम स्वयं ही खुद को समाप्त करने में जुट गये। सारा देश कचरे का पात्र हो गया। अस्पतालों में लम्बी-लम्बी कतारे लग गयीं। भिखारियों की बाढ़ आ गयी। धरती प्यासी हो गयी, नदियां गन्दगी से पट गयी लेकिन हमारे राजनेता पैसों के ढेर पर बैठ गये। इन राजनेताओं और अधिकारियों ने अपने-अपने किले बना लिये और किले के बाहर गरीबी का ताण्डव होता रहा। कभी आरक्षण के नाम पर टुकड़े फेंक दिये गये तो कभी गरीबी के नाम पर!

लेकिन आज मोदी युग आया है, मानो चन्द्रगुप्त का राज स्थापित हुआ हो, धनानन्द जैसे क्रूर शासक को हटाकर। दुनिया भी देख रही है, इस ज्ञानवान मोदी को जो भारतीय पद्धति से देश को सभ्य बनाने में लगा है। सारी दुनिया आशा भरी नजरों से मोदी को देख रही है और स्वर्ग के इन्द्र कहे जाने वाले नेता भी मृत्यु लोक से कृष्ण को निमंत्रण देने लगे हैं। अब दुनिया का मॉडल बदलेगा। अकेले मानवता को बचाने से मानवता नहीं बचती अपितु प्राणी मात्र की रक्षा करने से मानवता बचती है, यह मोदीजी सिखा रहे हैं और शाकाहार का पाठ पढ़ा रहे हैं। एक तरफ धर्म के नाम पर लाखों-करोड़ों पशुओं का कत्ल हो रहा हो तब मानवता के लिये भी खतरा पैदा हो जाता है, यह बात मोदी समझा रहे हैं। वे मेन वर्सेस वाइल्ड में भी यही संदेश देते हैं कि सृष्टि में हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिये। हम रक्षक बने ना कि भक्षक। हमें मोदीजी पर नाज है कि वे भारत के ज्ञान को पुन: प्रस्फुटित कर रहे हैं और दुनिया को बाँट रहे हैं। आभार मोदी जी।