अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

महिला की हँसी उसकी चूंदड़ जैसी

Written By: AjitGupta - Sep• 23•17

जब भी किसी महिला को खिलखिलाकर हँसते देखती हूँ तो मन करता है, बस उसे देखती ही रहूँ। बच्चे की पावन हँसी से भी ज्यादा आकर्षक लगती है मुझे किसी महिला की हँसी। क्योंकि बच्चा तो मासूम है, उसके पास दर्द नहीं है, वह अपनी स्वाभाविक हँसी हँसता ही है लेकिन महिला यदि हँसती हैं तो वह मेरे लिये स्वर्ग से भी ज्यादा सुन्दर दृश्य होता है। फेसबुक पर कुछ महिलाएं अपनी हँसी डालती हैं. उनके जीवन को भी मैंने जाना है और अब जब उनकी हँसी देखती हूँ तो लगता है कि जीवन सार्थक हो रहा है। कहाँ हँस पाती है महिला? पल दो पल यदि किसी प्रसंग पर हँस लें तो कैसे उसे हँसना मान लेंगे?
बचपन में एक लड़की हँस रही थी, माता-पिता ने टोक दिया, ज्यादा हँसों मत, लड़कियों के लिये हँसना ठीक नहीं है। बेचारी लड़की समझ ही नहीं पायी कि हँसने में क्या हानि है? आते-जाते जब सभी ने टोका तो उसकी हँसी कहीं छिप गयी। सोचा जब अपना घर बसाऊंगी तो जी भर कर हँसूंगी लेकिन किसी पराये घर को अपना कहने में हँसी फंसकर रह गयी। दूसरों को हँसाने का साधन जो बनना था उसे, तो भला वह वहाँ भी कैसे हँसती? वार त्योहार जैसे चूंदड़ पहनकर अपनी पुरानी साड़ी को छिपाती आयी हैं महिलाएं, वैसे ही कभी हँसी को ओढ़ने का मौका मिल जाता है उन्हें। जब त्योंहार गया तो चूंदड़ को समेटकर पेटी में रख दिया बस।
बड़ा होने की बाट जोहती रही महिला, कब बेटा बड़ा हो और माँ का शासन चले तो जी भरकर हँसे। लेकिन तब तो पल दो पल की हँसी भी दुबक कर बैठ गयी। दिखने को लगता है कि किसने रोकी है हँसी? लेकिन महिला जानती है कि उसकी हँसी किसी पुरुष के अहम् को ठेस पहुँचाने का पाप कर देती है। शायद दुनिया का सबसे बड़ा पाप यही है। कोई काले लिबास में कैद है तो कोई सफेद लिबास में कैद है, उसका स्वतंत्र अस्तित्व कहीं है ही नहीं। हँसने पर आज्ञा-पत्र लेना होता है या किसी का साथ जरूरी होता है। महिलाएं इसलिये ही इतना रोती हैं कि उन्हें हँसने की आजादी नहीं है, वे रो-कर ही हँसने की कमी को पूरा करती हैं। इसलिये जब भी किसी महिला को रोते देखो तो समझ लेना कि यह हँसने की कमी पूरा कर रही है। मैं तो रोती भी नहीं हूँ बस किसी महिला को हँसते देख लेती हूँ तो मान लेती हूँ की मैं ही हँस रही हूँ।

झूठी शान से मुक्त होता पुरुष

Written By: AjitGupta - Sep• 22•17

झूठी शान से मुक्त होता पुरुष
कुछ लोग अलग मिट्टी से बने होते हैं, उनकी एक छोटी सी सोच उन्हें सबसे अलग बना देती है। कल केबीसी के सेट पर खिलाड़ी थी – अनुराधा, लेकिन मैं आज बात अनुराधा की नहीं कर रही हूँ। मेरी बात का नायक है अनुराधा का पति – दिनेश। कुछ लोग जीवन में एक उद्देश्य लेकर आगे बढ़ते हैं, स्वयं को बीज की तरह धरती में रोप देते हैं। उनका सारा ध्यान इस बात पर होता है कि मेरे इस बीज के त्याग से श्रेष्ठ बीजों का निर्माण हो सके। दिनेश का बचपन अशिक्षा की रात के साथ बीता, उसके दिल और दीमाग में एक ही बात घर कर गयी कि मेरी संतान आगे पढ़ेगी। लेकिन यह कैसे सम्भव होगा? बारह भाई-बहनों के गरीब परिवार में उम्मीद की किरण कहीं नहीं थी। शिक्षित युवती से विवाह का सपना तो सब कोई देख लेते हैं लेकिन उसके लिये खुद को होम देने की बात कितने कर पाते हैं? दिनेश ने पोलियों से ग्रस्त एक शिक्षित युवती – अनुराधा से विवाह किया और उसकी बैसाखी बन गया। अब अनुराधा पढ़ाई भी करती और नौकरी भी करती और घर सम्भालता दिनेश। रोटी बनाने से लेकर सारे ही काम दिनेश करता। धीरे-धीरे शिक्षिका अनुराधा डिप्टी-कलेक्टर बन गयी और कल केबीसी में हॉट-सीट पर थी।
जो पुरुष पत्नी के प्रमोशन होने पर भी शराब के अड्डे पर गम गलत करता दिख जाता है, वहीं दिनेश पूरे घर को मनोयोग से सम्भाल रहा है। दोनों पैरों से अपाहिज लड़की से विवाह करना, फिर घर की जिम्मेदारी वहन करना साहस का काम है। अपाहिज होने के बाद भी अनुराधा का आत्मविश्वास देखने लायक था। अक्सर पतियों के सपनों को पूरा करने में पत्नी खुद को झौंक देती है, अपने सपने के बारे में रत्ती भर नहीं सोचती है और बदले में सुनती है कि तुम करती ही क्या हो? किसी के भी सपने किसी दूसरे के सपनों को जमींदोज करके ही पूरे होते हैं। किसी भी सफल व्यक्तित्व के पीछे उसके साथी का हाथ होता है और हमारे देश में अक्सर यह हाथ महिला का होता है लेकिन कल दिनेश ने सिद्ध कर दिया कि पुरुष भी अपने झूठे अभिमान को त्याग दे तो एक सुखद जीवन और सुखी परिवार का निर्माता बन सकता है। ऐसे न जाने कितने दिनेश होंगे, बस उन्हें समाज जीवन में उदाहरण बनकर सामने आना है, तब झूठी शान से पुरुष मुक्त हो सकेगा और अपने अंकुरण से श्रेष्ठ संतान को जन्म देगा।

ब्राह्मण की पोथी लुटी और बणिये का धन लुटा

Written By: AjitGupta - Sep• 15•17

हम बनिये-ब्राह्मण उस सुन्दर लड़की की तरह हैं जिसे हर घर अपनी दुल्हन बनाना चाहता है। पहले का जमाना याद कीजिए, सुन्दर राजकुमारियों के दरवाजे दो-दो बारातें खड़ी हो जाती थी और तलवार के जोर पर ही फैसला होता था कि कौन दुल्हन को ले जाएगा? तभी से तो तोरण मारने का रिवाज पैदा हुआ था। हिन्दू समाज में बणिये और ब्राह्मण की स्थिति आज ऐसी ही है। ये भी हमारे समाज के सुन्दर और समृद्ध चेहरे हैं, इन पर ही आक्रान्ताओं की नजर सदैव से रहती है। युद्ध के बाद हमेशा ये ही लुटते हैं। इनके पास ही वैभव एकत्र है और इनके पास ही सुन्दरता है और ये ही समाज की दुर्बल कड़ी भी है। इन पर सारी दुनिया की नजर रहती है। बस इन्हें अपने समाज में मिला लो, हमारा समाज समृद्ध हो जाएगा, यही सोच सभी की रहती है। आसान शिकार भी यही हैं, जब असम में लूट मचती है तो सेठों को ही लूटा जाता है। जितने भी युद्ध हुए हैं उसमें बणिये-ब्राह्मण ही लुटे है। बाकी के पास तो लुटने के लिये था ही क्या और यदि था भी तो साथ में उनके पास तलवार भी थी अपनी रक्षा के लिये। युद्ध किसने लड़े? क्षत्रियों ने लड़े। सैनिक कौन बने? राजपूत, जाट, गुर्जर, आदिवासी आदि। युद्ध में कोई भी जीते या हारे, लड़ते हमेशा क्षत्रीय थे लेकिन लुटते हमेशा ही बणिये-ब्राह्मण थे।
छठी शताब्दी में सिन्ध पर मोहम्मद बिन कासिम का आक्रमण हुआ, उसने किसका कत्लेआम किया? ब्राह्मणों का। एक-एक को चुन-चुनकर मारा, लाखों का कत्लेआम किया। आज जो सिन्धी दिखायी देते है ना, वे सब ब्राह्मण थे। सिकन्दर ने किसे लूटा? गजनी ने किसे लूटा? बाबर ने किसे लूटा? अकबर ने किसे लूटा? औरंगजेब ने किसे लूटा? विभाजन में कौन लुटा? कश्मीर में कौन लुटा? आज भी जब दंगे होते हैं तो कौन लुटता है? ब्राह्मण की पोथी लुटी और बणिये का धन लुटा। सदियों से यही हो रहा है। इतिहास में क्या दर्ज है? इतने मण जनेऊ जली और इतने दिन पुस्तकालय जले। इतने मण सोना-चाँदी लूटे गये और इतने मण हीरे-जवाहरात लूटे गये। राजवंश कटे-मरे लेकिन लूट बणिये-ब्राह्मणों की हुई।
इसलिये सुरक्षा के लिये विचार किसे करना चाहिये? आज सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करने की जरूरत आन पड़ी है, सामाजिक सुरक्षा समाज का ही उत्तरदायित्व है। जिस समाज के पास हथियार की ताकत नहीं है, उन समाजों को दूसरों को अपनी ताकत बनाना होता है। हमें भी आज समाज के उन योद्धाओं को जो हमारी सुरक्षा में सक्षम है, ताकतवर और सुविधा सम्पन्न बनाना होगा। उनसे आत्मीयता बढ़ानी होगा। समाज के बिखराव को दूर करना हमारा ही उत्तरदायित्व है, इसी में हमारा बचाव है। जो लोग हिन्दू समाज पर घात लगाए बैठे हैं, वे इन जातियों के हमसे दूर करना चाहते हैं, जिससे हम एकदम कमजोर हो जाएं। पैसे और ज्ञान के बलबूते हम सुरक्षित नहीं रह सकते, सुरक्षा के लिये योद्धा जातियों को अपने साथ रखना ही होगा। अब तय आप को करना है कि बणिये-ब्राह्मण इन जातियों से दूरी बनाकर रखे या अपना रक्षक मानते हुए इन्हे सम्मान दें।

human values / nuisance values

Written By: AjitGupta - Sep• 11•17

human values / nuisance values
विवेकानन्द के पास क्या था? उनके पास थे मानवीय मूल्य। इन्हीं मानवीय मूल्यों ( human vallues) के आधार पर उन्होंने दुनिया को अपना बना लिया था। लेकिन एक होती है nuisance value (उपद्रव मूल्य) जो अपराधियों के पास होती है, उस काल में डाकुओं के पास उपद्रव मूल्य था। सत्ता के पास दोनों ही मूल्य होते हैं, वे कभी मानवीय मूल्यों के आधार पर शासन करते हैं तो कभी उपद्रव मूल्य पर भी शासन करते हैं। अंग्रेजों ने यही किया था। यदि आज के संदर्भ में देखे तो देश के प्रधानमंत्री मानवीय मूल्यों पर शासन कर रहे हैं और मीडिया के पास उपद्रव मूल्य या न्यूसेंस वेल्यू है। मीडिया अपनी इसी ताकत के बल पर किसी ने किसी उपद्रवकारी को पैदा करता रहता है और देश के विपक्षी-दल इन उपद्रवकारियों को हवा देते रहते हैं। कांग्रेस के इतिहास में इन न्यूसेंस कारकों का योगदान बहुत है, कभी-कभी तो लगता है कि उनका शासन न्यूसेंस वेल्यूज को सिद्धान्त पर ही चला। कभी भिण्डरावाला को पैदा कर दिया तो कभी 1984 में सिखों का कत्लेआम कर दिया। वर्तमान में राहुल गांधी हर उस जगह पहुंच जाते हैं जहाँ न्यूसेंस वेल्यू की उम्मीद हो। केजरीवाल ने तो अपना राजनैतिक केरियर इसी सिद्धान्त पर खड़ा किया था। लेकिन जब पंजाब में जीती हुई बाजी हार गये तब लगा कि केवल न्यूसेंस वेल्यू से काम नहीं चलता। कम से कम राजनीति में तो नहीं चलता, हाँ डाकू या आतंकी बनना है तो खूब चलता है। और उस बन्दे ने सबक सीखा, चुप रहना सीखा। परिणाम भी मिला, दिल्ली में बवाना सीट जीत गये।
वर्तमान में मोदीजी पूर्णतया मानवीय मूल्यों के आधार पर शासन कर रहे हैं लेकिन विपक्ष और अधिकांश मीडिया उपद्रव मूल्यों पर डटे हैं। ये सारे मिलकर देश में सनसनी तो फैला देते हैं लेकिन हासिल कुछ नहीं होता। कुछ अतिवादी हिन्दू भी उपद्रव मूल्य हासिल करना चाहते हैं, जैसे शिवसेना ने किया है। अब गोवंश के नाम पर करने का प्रयास रहता है। दोनों मूल्य आमने-सामने खड़े है, जब उपद्रव मूल्य हावी हो जाते हैं तब मारकाट मचती है, लेकिन तभी लोगों के अन्दर के मानवीय मूल्य जागृत होने लगते हैं और शान्ति स्थापित होती है। लेकिन यह भी सच है कि यदि केवल मानवीय मूल्य ही एकत्र हो जाएं और उपद्रव-मूल्य ना हो तो मनुष्य बचेगा भी नहीं, क्योंकि प्रकृति तो कहती है कि बलवान ही शेष रहेगा। इसलिये किसके पास कितना हो, यह हम सभी को निर्धारित करना होगा। समाज के पास कितने मानवीय मूल्य और कितने उपद्रव-मूल्य हों तथा शासन के पास कितने हो, यह बहुत ही समझदारी का विषय है। आज के संदर्भ में हमें इस बात पर गौर करना ही पड़ेगा।

एक विपरीत बात

Written By: AjitGupta - Sep• 05•17

मुझे आज तक समझ नहीं आया कि – a2 + b2 = 2ab इसका हमारे जीवन में क्या महत्व है? यह फार्मूला हमने रट लिया था, पता नहीं अब ठीक से लिखा गया भी है या नहीं। बीजगणित हमारे जागतिक संसार में कभी काम नहीं आयी। लेकिन खूब पढ़ी और मनोयोग से पढ़ी। ऐसी ही न जाने कितनी शिक्षा हमपर थोप दी गयी। हम रटते गये और पास होते गये, बस। शिक्षा की आड़ में हमारा ज्ञान नष्ट होने लगा। रामायण, महाभारत या अनेक पौराणिक ग्रन्थ हमसे दूर हो गये और हम जीवन के व्यावहारिक ज्ञान से दूर हो गये। चरित्र निर्माण की पाठशाला होती है, ऐतिहासिक चरित्रों को पढ़ना। सदियों से हमारे पुरखों ने राम और कृष्ण जैसे चरित्रों को पढ़कर ही समाज का चरित्र निर्माण किया था। बचपन में हम सभी नाटकों का मंचन करते थे और उनके पात्र हमारे पौराणिक पात्र ही होते थे, हमें स्वाभाविक रूप से ज्ञान मिलता था और इसी ज्ञान के माध्यम से दुनिया को जानने की रुचि जागृत होती थी। जैसे ही रुचि जागृत हुई व्यक्ति स्वत: ही शिक्षित होने लगता था। फिर उसे रटने की जरूरत नहीं होती थी। लेकिन हम पर थोपी हुई शिक्षा हमारे ज्ञान को भी नष्ट कर देती है। हम एक विषय के जानकार अवश्य हो जाते हैं लेकिन शेष विषयों में ज्ञान शून्य रह जाते हैं।
मुझे याद नहीं की मैंने विधिवत शिक्षा का कब प्रारम्भ किया, बस कुछ दिन तीसरी कक्षा के याद हैं तो कुछ माह पांचवी कक्षा के। छठी कक्षा से ही पढ़ाई प्रारम्भ हुई और जब तक ज्ञान प्राप्ति की। मैं आज भी सफल व्यक्तियों के जीवन चरित्र को प्राथमिकता से पढ़ती हूँ। आप गाँव में जाइए, बच्चे बकरी के बच्चों के साथ खेलते मिल जाएंगे लेकिन स्कूल में दिखायी नहीं देंगे। उन्हें बोझ लगती है यह पढ़ाई। जैसे हमें समझ नहीं आ रहा कि बीज गणित का हमारे जीवन में क्या लाभ है, वैसे ही वे भी नहीं समझ पा रहे कि इस इतिहास-भूगोल का उनके जीवन में क्या लाभ है! यदि हम सात साल तक केवल पौराणिक कथानकों को ही मौखिक पढ़ाते रहें और उनका मंचन कराते रहें तो फिर बच्चों को शिक्षा की ललक जगेगी। शिक्षा उतनी ही होनी चाहिये जितनी हमें आवश्यक है, लेकिन ज्ञान की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। आज शिक्षक दिवस पर यदि हम ऐसे प्रयोग कर लें तो हमारे देश का स्वरूप बदल जाएगा। कोई भी बच्चा किताबों के तले दबकर आत्महत्या नहीं करेगा ना अपने दिमाग का संतुलन खोएगा। बहुत हो चुका घिसापिटा प्रयोग, अब नवीन सोच की जरूरत है। देखे किस युग में हम नवीनता की पहल करेंगे?