अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

मिट्टी पलीद करवा ली ना!

Written By: AjitGupta - Jun• 29•19

मिट्टी पलीद कराना किसे कहते हैं, यह देखना हो तो कल राज्यसभा में देखना चाहिये था। मोदीजी हेडमास्टर बने हुए थे और सामने फैल हो गयी कांग्रेस की क्लास थी। अब मोदीजी डाँट रहे थे कि तुमको इस आसान प्रश्न का भी उत्तर नहीं आया? सरदार वल्लभ भाई  पटेल भी याद नहीं रहे तुमको! क्लास में केवल हीही करने ही आते हो या कुछ ध्यान से भी सुनते हो, बस जो मास्टर कहे उसकी खिल्ली उड़ा देते हो! सरदार पटेल तुम्हारे ही नेता थे ना! हमने कहा था कि यदि ये देश के प्रथम प्रधानमंत्री होते तो आज कश्मीर समस्या नहीं होती लेकिन यह तो हमारी बात थी, तुम्हें याद नहीं रही तो कोई बात नहीं लेकिन तुम्हें तो यह भी याद नहीं रहा कि सरदार पटेल ने देश की 563 रियासतों का विलीनीकरण कराया था, बोलो कराया था या नहीं? यह तो तुम्हें याद है ना! वे तुम्हारे स्कूल के ही हेडमास्टर थे ना! तो तुम यह भी भूल  गये, परीक्षा में खाली कॉपी छोड़ आए! इसके बाद मोदीजी कुछ नरम पड़े, बोले कि जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब तो सरदार पटेल की स्टेच्यू ऑफ यूनिटी पर जाकर नमन कर आओ, क्या कहा कि पैसे नहीं हैं तो ऐसा करो कि वहाँ मीटिंग ही रख लो, लेकिन अपने नेता को याद तो कर आओ। कैमरामेन भी कैमरा घुमा नहीं पा रहा था, एक तरफ चिदम्बरम मुँह को गोड़े में छिपाये बैठे थे तो दूसरी तरफ गुलाम नबी आजाद और आनन्द शर्मा कई बार के फैल छात्र की तरह फी-फी करके हँस रहे थे।

मोदीजी ने आगे कहा कि खाली कॉपी छोड़कर आते हो और कहते हो कि नम्बरों की गणना ठीक नहीं हुई। बेचारी मशीन क्या करेगी? चिल्लाते हो कि देश हार गया, हिन्दुस्थान हार  गया! साफ-साफ क्यों नहीं बोलते कि पाकिस्तान हार गया! वायनाड़ में तो जीता ना! रायबरेली में भी जीता ना! हाँ तुम्हारे लिये अमेठी में जरूर हारा! भूल जाओ यह कहना कि हिन्दुस्तान ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही हिन्दुस्तान है। यह स्कूल अब तुम्हारे नाम से नहीं जाना जाता बहुत सारे नये और होशियार छात्र यहाँ आ चुके हैं। इन छात्रों ने दुनिया में नाम ऊँचा किया है यहाँ का। बहुत मिट्टी पलीद की रे! जानते-बूझते भी क्यों ऊल-जुलूल बहस करते हैं और फिर सदन में जब डाँट पड़ती है तो मुँह लटकाकर बैठ जाते हैं! एकदम से फिसड्डी छात्र हैं, एक भी विषय में पास होने लायक नहीं बस हेराफेरी में माहिर, झूठ बोलने का कोर्स कर रखा है, गाली देने की तो माँ-बाप ने ही खुली छूट दे रखी है। ये कब तक छात्र कहलाएंगे? ऐसा ना हो कि इनके स्कूल से ही निकाल दिया जाए!

उच्च सदन याने कि राज्यसभा! कांग्रेस की सदस्य संख्या भाजपा से अधिक, लेकिन एक भी मुद्दे की बात नहीं। कहते हैं कि यह सदन विद्वानों के लिये बनाया है लेकिन यहाँ जो बैठे हैं वे तो केवल धूर्तों की जमात भर है। एक से एक धूर्त बात यहीं से आती है, ईवीएम का रोना भी यहीं से शुरू होता है, भाजपा जीत गयी और देश हार गया, यह कथन भी यहीं से आता है। हल्ला मचाना, सदन को चलने नहीं देना, कुछ भी बोल देना सब कुछ यहीं की देन है। क्या औचित्य है ऐसे सदन का? जो केवल नकारात्मक सोच के साथ चलते हों! कॉफी  हाऊस हुआ करते थे किसी जमाने में, वहाँ जमावड़ा रहता था तथाकथित बुद्धीजीवियों का। बस ऐसी की कुटिलता भरी बाते वहाँ होती थी, आज स्वरूप बदल गया है, मोटी पगार वाले हो गये हैं। लेकिन चरित्र वही है। मोदीजी ने यह भी कहा कि यह मत समझिये कि आपको कोई नहीं देख रहा है, आपके व्यवहार से चुनाव में हार-जीत नहीं होती है! जितना आप नकारात्मक बोलेंगे उतना ही हारेंगे। अब आपने तीन साल तक अपने नेता की तगारी उठाते  हुए फोटो का प्रचार किया, इससे देश का क्या भला हुआ लेकिन हमने कहा कि हाथ धोकर खाना खाना चाहिये तो आपने विरोध किया! जो शिक्षाप्रद विज्ञापन थे उनका विरोध और जो केवल प्रचार थे उनका समर्थन! यह आचरण आपको हराता है। खैर मोदीजी की क्लास बहुत लम्बी थी, लेकिन थी मजेदार। आईना भी दिखा दिया और बता भी दिया कि चेहरे पर धूल होने पर आईने को साफ नहीं किया जाता। लेकिन मैं दावे से कह सकती हूँ कि ये सारे इतने ठीट हैं कि इनकी खाल गैंडे की है, कोई असर नहीं। कोई बात नहीं, बार-बार होगी मिट्टी पलीद, हमारा क्या!  हम तो लिख्खाड़ है, फिर लिख देंगे।

एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह

Written By: AjitGupta - Jun• 27•19

आपको चेहरे पर यह मायूसी! आपका चेहरा गमगीन! आपका चेहरा मुरझाया हुआ! आप तो मक्कारी के लिये जाने जाते हैं, आप तो आँख मारने के लिये पहचाने जाते हैं, आप तो नुक्कड़ के लौण्ड़ों-लपाड़ों जैसी हरकत के लिये जाने जाते हैं! फिर भला यह मक्कारी कहाँ गायब है? आपके चारों तरफ जो घेरा था, वह भी तो नदारद है! भला आप करें भी तो क्या करें! आपने एक नवीन गालीबाज को अखाड़े का उस्ताद बनाकर उतारा, लेकिन उसने तो आपके चेहरे से मक्कारी का नूर ही छीन लिया! पहले तो आप खुश हुए कि चेले ने शुरूआत गाली देकर ही की है, मणि, दिग्गी जैसे शातिर पास नहीं हैं तो क्या? नए उदय हो रहे हैं! भला भारत में विषधरों की कहाँ कमी हैं! लेकिन अभी आपको खुश होने को दो पल भी नहीं मिले थे कि इस नये दंगलबाज ने तो आपकी ही खटिया खड़ी कर दी। सीधे ही मी-लार्ड को चैलेंज कर दिया! हिम्मत हो तो हाथ लगाओ मेरे आकाओं पर? अरे बाबू मोशाय, सिपाही को ही उकसा रहा है कि चोर को पकड़कर दिखा! जैसे-तैसे करके जमानत पर छूटा हूँ और यह नासमझ चैलेन्ज दे रहा है! 
पूरे चुनाव में मैंने विकास की कोई बात नहीं की, बस गाली देकर ही काम चलाया, चोर-चोर कहकर ही जनता का ध्यान बंटाया लेकिन यह मूर्खाधिराज काम गिनाने बैठ गया, कि हमने यह किया, हमने वो किया! यदि हमने किया होता तो ये आते क्या! यह मोदी तो चाहता ही यह है कि हम सीधे काम की बात पर आ जाएं और फिर आंकड़ों का खेल शुरू हो जाए! मुझे तो याद भी नहीं कि मैंने कौन सी डिग्री ली थी! क्योंकि मेरे मुँह से तो गाली के अतिरिक्त कुछ निकलता ही नहीं! गणित तो मेरे सपने में भी नहीं आती। लोग कहते रहे कि मोदी 50 करोड़ लोगों की रसोई और तिजोरी तक पहुँच गया है, अब मेरी गणित अच्छी होती तो समझ आता कि 50 करोड़ का मतलब क्या होता है! मेरे लिये तो काला अक्षर भैंस बराबर हो गया था। मुझे समझ ही नहीं आया कि कितने लोगों को गाली और चोर-चोर के खेल से भ्रमित कर लूंगा! मैं समझता रहा कि बस एक ही सम्प्रदाय है जो मेरी कस्ती को पार लगा देगी, लेकिन यह भूल गया था कि कि ऐसे कट्टरपंथी वोट अधिक से अधिक 10 करोड़ होंगे, मेरे चेले चपाटे कितने होंगे? 50 करोड़ में से मैं कितने काट लूंगा? 10 या 20! बाकि 30 तो मोदी के पास ही रहेंगे ना! गणित किसी की भी ठीक नहीं थी क्या? मनमोहन सिंह तो अर्थशास्त्री है, फिर उसने क्यों नहीं बताया? खैर वह तो मौन रहता है, मेरे कहने पर ही बोल पाता है, उसको क्या भला-बुरा कहूँ! मेरी बहन तो करोड़ो का खेल खेलती है, फिर उसने सावधान क्यों नहीं किया? जमीन हड़पने में और जमीनी हकीकत देखने में अन्तर होता है, अब मैं समझ पा रहा हूँ। त्याग-पत्र तो पहले ही दे चुका हूँ लेकिन दूसरा कोई तैयार नहीं हो रहा। तैयार होते ही चुपचाप कहीं निकल लूंगा, वैसे भी फिर माँ के पल्लू से लगकर बैठने का अवसर शायद ना मिले। मैं चुपचाप अपने ही नेता के शब्दों से निकले तीरों को झेल रहा था और कल्पना कर रहा था कि कितने बाण सामने से आएंगे? मैं छिपा रहा, बचता रहा, लेकिन उस जयन्त सिन्हा ने तो सीधे ही पूछ लिया कि अब अध्यक्ष रहे हैं या नहीं। लोगों ने भी कह दिया कि नहीं! मैं दम साध कर बैठा था कि अखाड़े का सबसे दबंग पहलवान आकर मुझे कैसी-कैसी पटकनी देगा लेकिन मुझे थोड़ी राहत मिली जब उसने कह दिया कि जमानत एनजॉय करो! सहिष्णुता, लिंचिंग आदि समस्याओं से मुझे धैला भर भी फर्क नहीं पड़ता, आपातकाल भी मेरी चिन्ता का विषय नहीं है बस चिन्ता एक ही है कि पासपोर्ट जब्त ना हो जाए. इस अधीर बने हुए नये नेता के कारण। पासपोर्ट में तो कितने राज छिपे हैं, तब क्या होगा! न्यायालय कह दे कि हमें चैलेंज कर रहे हैं तो लाओ फाइल, अब न्याय करते हैं। वैसे भी न्याय करने का इन्हें शौक चर्राया था, तो हम ही कर देते हैं। फिर भला जज भी हमारी आस में कब तक बैठे रहेंगे? वे भी तो अपने आकाओं का बदलाव कर सकते हैं ना! इसलिये मैं आज लुटा-पिटा सा बैठा हूँ, मेरे सामने प्रलय आ गयी है। अब आप कह लो कि – एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह! कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे! जो कभी अपनी महफिल हुआ करती थी, आज परायी क्यों हैं? मेरे चेहरे पर अब नूर नहीं बेचैनी ही रहेगी। मुझे माफ करना।

खानदान पुराना और खानसामा नया

Written By: AjitGupta - Jun• 24•19

खानदान पुराना और खानसामा नया

मणि नाम का साँप वापस अपने बिल से निकला, चारों तरफ देखा कि बाढ़ का पानी उतर तो गया है ना? कहीं जंगल में मोर तो नाच नहीं रहें हैं ना? आश्वस्त हुआ फिर बिल से बाहर आया। नहीं, कोई खतरा नहीं। जैसे ही बिल से थोड़ा दूर ही चला था कि पता लगा, मालिक पर संकट गहराया है। मालिक सिंहासन खाली करने की जिद पर अड़े हैं। वह सरपट दौड़ लगाकर दरबार तक पहुँचा, देखा कि सन्नाटा पसरा है। सारे ही जीव फुसफुसा रहे हैं, सभी के मुँह पर चिन्ता पसरी है। मालिक ने एक माह का समय दिया था, वह पूरा होने में है। सारे देश में मुनादी फिरा दी गयी है कि मालिक के पैर की जूती सिंहासन के लिये चाहिये लेकिन लोग पैर की जूती बनकर भी सिंहासन पर बैठना नहीं चाहते! डरते हैं कि कहीं सीताराम केसरी जैसा हाल ना हो जाए! भला किसकी औकात है जो मालिक की बराबरी कर सके? आखिर कहा तो यही जाएगा ना कि मालिक की जगह ये बैठे हैं सिंहासन पर! नहीं बराबरी तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन मालिक है कि मान ही नहीं रहे हैं। असल में मालिक बोर हो गये हैं, कब तक एक ही मोदी को गाली देते रहें! वे हवा परिवर्तन को जाना चाहते हैं। मणि नाम के साँप को मालिक का उठाया हर कदम ऐसा ही लगता है जैसे प्रभु ने कदम उठाया हो! लेकिन मणि को गुस्सा भी बहुत  है कि मालिक के सिवाय किसी भी ऐरे-गैरे-नत्थू-गैरे को मालिक तो नहीं कहा जाएगा! वह सोच में पड़ गया, क्या बोले समझ नहीं आ रहा था। तभी दरबार से आवाज आयी, अरे देखो, अपना परम विषधर मणि साँप आ गया है! सारे दरबारी नाचने लगे, इसके जहर का तो तोड़ नहीं है तो बता मणि ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाए?

मणि बोला कि करना क्या है, याद करो, पहले मालिक के प्रति वफादारी किसने निभायी थी। एक ने कहा कि सर, नेहरू के बाद ऐसा ही संकट पैदा हुआ था, इन्दिरा जी सिंहासन  पर बैठने में झिझक रही थी तो एक बौने से नेता को हमारे पूर्वजों ने सिंहासन पर बिठा दिया था। अभी बात भी पूरी नहीं हुई थी कि चारों तरफ से शोर उठ गया, नाम मत लो, ऐसे …. का। वह तो इन्दिरा जी का ऐसा प्रताप था कि उनको दूसरे देश में भेजकर हमेशा के लिये सुला दिया गया था, नहीं तो उसने इस खानदान को ही उलटने की तैयारी कर ली थी! चारों तरफ खामोशी छा गयी। तभी एक ओर से आवाज आयी कि एक जमाने में हमारे मालिक के ही वंशज हमारे प्रदेश की यात्रा पर आए थे, हमारे मुख्यमंत्री ने अपना कंधा आगे कर दिया था कि हुकुम आप इसपर पैर रखकर नीचे उतरें! इतनी वफादारी निभायी थी हमारे प्रदेश ने। इसलिये हमें अवसर मिले और हम मालिक के वफादार बनकर सिंहासन की रक्षा कर सकें। मणि साँप ने कहा कि बात तो उचित है। हम किसी को सिंहासन पर बिठा तो सकते हैं लेकिन सिंहासन का स्थान 10, जनपथ ही रहेगा और इसकी डोरी हमारे मालिक के पास ही रहेगी। बोलो मंजूर है? हम जैसे पालतू लोगों के लिये एक ठिकाना होना ही चाहिये, हम ठोर नहीं बदल सकते। अब कोई मुझ से कहे कि मैं बिल की जगह खुले खेत में रहने लगूँ तो कितने दिन जीवित रह सकूंगा? इसलिये तलाश करिये किसी अमचे-चमचे की, जो सदैव भगोने में रहने को बाध्य रहे। साँस भी लेनी हो तो मालिक से पूछकर ले। बस कुछ दिनों की बात है, मालिक तफरी से लौट जाएंगे और फिर ड्यूटी खत्म। फटी जेब का कुर्ता पहनकर मालिक बोर हो चले हैं, उन्हें नया कुछ चाहिये। जाने दीजिए उन्हें बैंकाक या लन्दन, जहाँ उनका मन करे, बस तरोताजा होने दीजिए। जब वापस लौटेंगे तब देखना उनके पास गालियों का भरपूर भण्डार होगा। मैं भी मालिक के साथ ही रहूँगा, उन्हें रोज थोड़ा-थोड़ा विष का सेवन कराऊंगा, जिससे वे अधिक जहर उगल सके। आप लोग चिन्ता ना करें, अब मैं आ गया हूँ. सब ठीक कर दूंगा। बस ध्यान रहे कि भूलकर भी नये व्यक्ति को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता मत देना। हमारे मालिक और हमारे मालिक का खानदान जब तक सूरज-चाँद रहेगा, तब तक रहना चाहिये। मैं साँप का वंशज, वचन देता हूँ कि मैं पृथ्वी पर अनादि काल से रहता आया हूँ, आगे भी रहूँगा, मेरे जहर से ना कोई बचा है और ना आगे भी बचेगा। लेकिन, लेकिन हकलाता सा एक कार्यकर्ता बोला कि आपके जहर से यह मोदी नामका नेता तो मरता नहीं हैं! आपके जहर में तो असर है ही नहीं, आप तो केवल फूंफकारते हो! मणि साँप धीरे से खिसक लिया, बोला कि मेरे विश्राम का समय हो गया है। जय मालिक, जय मालिक कहता हुआ वह वहीं अपने पुराने बिल में घुस गया। बस जाते-जाते कहता गया कि किसी को भी बिठा दो, लेकिन मालिक के खानदान पर आँच नहीं आनी चाहिये। बस खानदान पुराना और खानसामा नया।

साम्प्रदायिकता बिल में और राष्ट्रवाद परचम में

Written By: AjitGupta - May• 14•19

मेरे देश में साम्प्रदायिकता कहीं खो गयी है, मैं उसे हर बिल में खोज चुकी हूँ, गली-मौहल्ले में भी नहीं मिली, आखिर गयी तो गयी कहाँ? यह तो छिपने वाली चीज थी ही नहीं, देश की राजनीति में तो यह शाश्वत बन गयी थी! भला ऐसा कौन सा चुनाव होगा जब यह शब्द ही ब्रह्मास्त्र ना बनो हो! सारे ही मंचों से चिल्ला-चिल्लाकर आवाजें आती थी कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ हमें एकत्र  होना है। एक तो नारा हमने सुना था – इस्लाम खतरे में हैं, एकत्र हो जाओ और दूसरा सुना था कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ एकत्र हो जाओ। साँप-नेवले सारे ही एक छत के नीचे आ जाते थे। लेकिन इस बार तो यह नारा सिरे से ही खारिज हो गया! हमने आजादी के पहले से ही इस नारे को गढ़ लिया था और संगठनों पर प्रतिबन्ध की परम्परा को जन्म दे दिया था। आजादी के बाद भी यह नारा खतरे की घण्टी की तरह चला, जैसे ही सरकारों पर खतरा मंडराता, साम्प्रदायिकता का नारा जेब से निकल आता और फिर प्रतिबन्ध की आँधी के कारण लोकतंत्र के दरवाजे  बन्द  हो जाते।

हम जैसों ने इस नारे का ताण्डव खूब झेला, हम सरकार का हिस्सा नहीं थे तो झेलना पड़ा। लेकिन जो खुद को सरकार का  हिस्सा मानते थे वे हमारे खिलाफ कभी भी इस बिच्छू को निकाल देते थे और एकाध डंक लगाकर वापस जेब में रख लेते थे। लेकिन अचानक ही इस चुनाव में यह बिच्छू जैसा नारा गायब हो गया। बस हाय तौबा सी मची रही कि मोदी हटाओ, मोदी हटाओ। हमारे लिये तो दोहरी खुशी लेकर आया यह चुनाव। एक तो बिच्छू गायब हो गया, हम डंक से बच गये, दूसरी तरफ मोदीजी ने राष्ट्रवाद का परचम लहरा दिया। कहाँ हम पीड़ित होते रहे हैं और कहाँ अब इस राष्ट्रवाद के परचम को लपेटे हम, इतराकर चल रहे थे। सामने वाले कह रहे थे कि नहीं हम भी राष्ट्रवादी हैं। जैसे पहले हम कहते थे कि हम साम्प्रदायिक नहीं हैं लेकिन वे कहते थे कि नहीं तुम हो, हमारी सुनते ही नहीं थे। अब वे कह रहे हैं कि हम भी राष्ट्रवादी हैं लेकिन उनकी कोई नहीं सुन रहा है। वे कहते थे कि तुम साम्प्रदायिक नहीं हो तो लो यह टोपी पहनो! जैसे ही हमने मना किया कि नहीं टोपी तो नहीं पहनेंगे, वे झट से उछल पड़ते, ताली बजाकर चिल्लाते कि देखो तुम साम्प्रदायिक हो। इस बार उनकी भी टोपी उतर गयी। अब हम कह रहे हैं कि बोलो – भारतमाता की जय, वे चुप हो जाते हैं और हम ताली बजा लेते हैं कि नहीं, तुम नहीं हो राष्ट्रवादी।

सारे ही धर्मनिरपेक्षता की चौकड़ी वाली चादर ओढ़े नेता, बिना चादर के ही घूम रहे हैं, कोई तिलक लगाकर घूम रहा है तो कोई सूट के ऊपर जनेऊ दिखा रहा है! राम नवमी धूमधाम से मनी, रोजे पर दावतें दिख नहीं रही हैं! हम तो बेहद खुश हैं कि हमारे ऊपर लगा साम्प्रदायिकता का दाग, राष्ट्रवाद की साबुन के एकदम धुल गया है। अब हमारी चादर झकाझक चमक रही है। मैं अक्सर कहा करती हूँ कि परिवर्तन की प्रकिया में समय लगता होगा लेकिन परिवर्तन पलक झपकते ही आ जाता है। गुलाब के पौधे पर फूल जब लगता है, तब ना जाने कितना समय लगता होगा लेकिन जब फूल खिलता है तो पलक झपकते ही खिल जाता है। मोदीजी ने पाँच साल तक कठोर तपस्या की, हमें पता ही नहीं चला की यह साम्प्रदायिकता वाला जहरीला बिच्छू कब बिल में चला गया, लेकिन जब इस चुनावी बरसात में बाहर नहीं आया तब पता लगा कि हमने क्या पाया है! मोदी-काल का सबसे बड़ा परिवर्तन यही है। साम्प्रदायिकता का दंश गायब और राष्ट्रवाद का परचम हमारे हाँथ में। कल तक हम सफाई दे रहे थे, अब वे सफाई दे रहे हैं। मैं हमेशा से कहती हूँ कि प्रतिक्रिया मत करो, हमेशा क्रिया करने के अवसर ढूंढो। प्रतिक्रिया सामने वाले को करने पर मजबूर कर दो। मोदीजी आपको नमन! आपने इतनी बड़ी गाली से हमें निजाद दिला दी। अब हम साम्प्रदायिक नहीं रहे अपितु राष्ट्रवादी बन गये हैं। साम्प्रदायिकता बिल में चले गयी है और राष्ट्रवाद परचम में लहरा रहा है।

तीन पीढ़ी की माँ

Written By: AjitGupta - May• 12•19

आज सुबह से ही मन अपने अन्दर बसी माँ को ढूंढ रहा है। ढूंढते-ढूंढते कभी अपनी माँ सामने खड़ी हो जाती है, कभी अपनी बेटी सामने होती है तो कभी अपनी बहु सामने आ जाती है। तीन पीढ़ियों की तीन माँ की कहानी मेरे अन्दर है। एक माँ थी जिसे पता ही नहीं था कि दुलार क्या होता है! बस वह काम में जुती रहकर, बेटी को डर सिखाती थी। पिता का डर, भाइयों का डर, समाज का डर, दुनिया का डर, हव्वे का डर, भूत का डर। जितने डर माँ ने सिखाए उतने डर तो समय ने भी नहीं सिखाए। इस डर में दुलार कहीं खो जाता था। बस हम ही कभी उसके पेट  पर तो कभी पल्लू से लिपट जाया करते थे और हो जाता था दुलार। वह दौर ही डर का था, पिता घर में आते और सारा घर अनुशासन में आ जाता। ऐसा पता ही नहीं चलता कि अभी कुछ समय पहले तक यहाँ कितनी धमाल हुई है, लेकिन पिता के आने पर सबकुछ शान्त। आज की माँ और तब की माँ में कोई समानता नहीं है। प्यार चुप था, मुखर नहीं था। लड्डू बनते थे, हलुआ बनता था लेकिन ढिंढोरा नहीं पिटता था कि तेरे लिये बनाया है। ना माँ रोटी का कौर लेकर हमारे पीछे भागती थी और ना ही सोते समय लौरी सुनाती थी, बस कहानियाँ खूब थी। कभी राजकुमार की कहानी तो कभी चिड़िया की कहानी तो कभी ढोंगी बाबा की कहानी। बस जो भी दुलार था, यही था।

एक पीढ़ी गुजर गयी, मेरी पीढ़ी आ गयी। कुछ ज्यादा शिक्षित। बच्चों का मन समझने की पैरवी करती शिक्षा और प्रयोगों से लैस। तब नौकरी करती माँ सामने खड़ी थी, कितना समय किसको देना है, हिसाब-किताब रखती माँ थी। बच्चों की दुनिया माँ के इर्द-गिर्द रहने लगी, अब माँ  ही दोस्त थी, माँ ही शिक्षक भी थी। मेरे जैसी माँ सबकुछ सुनती, बच्चे स्कूल से आते ही ढेर सारी बातों का पिटारा साथ लाते, एक-एक बातों को बताने की जल्दी करते, माँ चुपके से उनका मन पढ़ लेती। हमने माँ से कुछ नहीं मांगा था लेकिन अब मुझसे बहुत कुछ मांगा जाता था। यही अन्तर में देख रही थी। कितना देना है, कितना नहीं देना है, अब मुझे यह अघिकार मिलने लगा था। मेरी माँ के पास भोजन का अधिकार था, कितना मिष्ठान्न देना है, कितना नहीं देना लेकिन मेरी पीढ़ी के पास बाजार के अधिकार भी आ गये थे। पूर्ण अधिकार वाली माँ के रूप में मैं खड़ी थी। मैं खुश थी कि मैं बच्चों को संस्कारित कर रही हूँ, उनके पीछे माँ का साया खड़ा है, इसलिये कोई डर उनके जीवन में आ ही नहीं सकता। मेरी माँ डर से परिचय करा रही थी और मैं डर को भगा रही थी। शायद दो पीढ़ियों का यही मूल अन्तर है।

आज तीसरी पीढ़ी मेरे सामने खड़ी है, मेरी बेटी के रूप में और मेरी पुत्रवधु के रूप में। माँ का गौरवगान बढ़ने लगा है, मातृदिवस भी मनने लगा है। मेरी माँ को पता ही नहीं था कि वही सबकुछ है, लेकिन मुझे समझ आने लगा था कि मैं भी कुछ हूँ, लेकिन आज माँ ही सबकुछ है, यह स्पष्ट होने लगा है। मेरी माँ से हम कुछ नहीं मांगते थे, मुझसे थोड़ा मांगा जाता था लेकिन अब मांग बढ़ गयी है। मांग बढ़ी है तो जिद भी बढ़ी है। डर जीवन से एकदम से रफूचक्कर हो गया है। अपने जीवन को अपने मन की इच्छाओं से मेल का समय है। संतान अपने मन के करीब जा रही है और माँ से दूर हो रही है। अब रिश्ते को बताना पड़ रहा है, पहले का मौन सा दुलार अब मुखर हो रहा है और मुखर होते-होते प्रखर वार करने लगा है।  माँ को बताना पड़ रहा है कि मैं तुम्हारी माँ हूँ, संतान से अपने रिश्ते की दुहाई देनी पड़ रही है। कभी लगने लगा है कि मनुष्य के बच्चे से अधिक अब गाय के बछड़े बन गये हैं, पैदा होते ही अपने पैरों पर खड़े हैं। अब बच्चे को माँ का पल्लू पकड़कर बैठने की फुर्सत नहीं है, वह कहानी भी नहीं सुनना चाहता, उसके पास मोबाइल है। मेरी माँ को याद करते-करते मैं खुद को देख लेती हूँ और फिर बेटी और पुत्रवधु को देख लेती हूँ। तीन पीढ़ियों की तीन माँ मेरे सामने हैं। कभी हम माँ से शिकायत करते थे कि माँ तुम हमें समय क्यों नहीं देती? फिर हम सीमित समय देने लगे लेकिन अब माँ पूछने लगी है कि बेटा क्या मेरे लिये कुछ समय है तुम्हारे पास! कल तक माँ के लिये कोई चर्चा नहीं थी लेकिन माँ परिवार में शीर्ष पर बैठी थी, आज मातृ-दिवस मनाती माँ, परिवार में कहीं नहीं है! कल दुलार मौन था और आज दुलार का दिखावा मुखर है! कल तक रिश्ते सहज थे और आज रिश्ते असहज हैं। फिर भी माँ तो है, संतान भी है, दुलार भी है, अनुशासन भी है, बस जो नाभिनाल से जुड़ाव के कारण संतान और माँ एकरूप थे आज मातृदिवस पर एक दिखायी देते हैं। लेकिन प्यार मुखर होकर खड़ा है, माँ भी खूब प्यार कर रही है और संतान भी मुखरता से कह रही है कि माँ मैं तुम्हें प्यार करता हूँ। यह मुखरता कम से कम एक दिन तो मुखर होकर सुख दे ही जाती है, पहले तो एक दिन भी नहीं था।

बस आज मेरा मन ये सब ही देख पाया, तो आपको बता दिया। मैं खुश हूँ कि मैं माँ हूँ, मैं खुश हूँ कि जो भी स्त्री माँ है, वह जिम्मेदारी से पूर्ण है। यह जिम्मेदारी ही दुनिया को जिम्मेदार बनाती है। हे माँ तेरा वंदन है, अभिनन्दन है।