अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

बड़प्पन की चादर उतार दीजिए ना

Written By: AjitGupta - Jul• 30•18

लोग अंहकार की चादर ओढ़कर खुशियाँ ढूंढ रहे हैं, हमने भी कभी यही किया था लेकिन जैसे ही चादर को उठाकर फेंका, खुशियाँ झोली में आकर गिर पड़ीं। जैसे ही चादर भूले-भटके हमारे शरीर पर आ जाती है, खुशियाँ न जाने कहाँ चले जाती हैं! अहंकार भी किसका! बड़प्पन का। हम बड़े हैं तो हमें सम्मान मिलना ही चाहिये! मेरी दोहिती है 9 साल की, जब मैं उसके साथ होती हूँ और मैं कहती हूँ कि मिहू मेरे पास आकर बैठ, वह कहती है कि आप मेरे साथ खेलोगी? यदि मेरा उत्तर ना हो तो वह कहती है कि मैं चली खेलने। लेकिन जब मैं कहती हूँ कि हाँ खेलूंगी तो उसकी पसन्द का खेल खेलना होता है। वह कैरम निकाल लाती है, मुझसे पूछती है कि आपको आता है खेलना? मैं कहती हूँ कि हाँ तो खुश हो जाती है और जब मैं उसे जीतकर बताती हूँ तब उसकी आँखों में सम्मान आ जाता है। अब तो मम्मी-पापा को भी खेलने का निमंत्रण दे दिया जाता है और कहा जाता है कि मेरी टीम में नानी रहेंगी। एक दिन कहने लगी कि नानी चलो मेरे कमरे में चलो। मेरा हाथ पकड़कर ले गयी। मुझे कहा कि बैठो, आज मैं टीचर हूँ और आप स्टूडेंट हैं। अब क्लास शुरू हो चुकी थी। मेरे हाथ में कॉपी-पेंसिल थमा दी गयी थी। पहले मेथ्स की क्लास है, टीचर ने कहा। वह बोर्ड पर सवाल लिख रही थी और मुझे वैसा ही करने को कह रही थी। सारे ही प्लस-माइनस के सवाल कराने के बाद कॉपी चेक की गयी और वेरी गुड के साथ पीरियड समाप्त हुआ। लेकिन अभी दूसरा पीरियड बाकी था, जिसमें कठिनाई आने वाली थी। टीचर ने कहा कि अब साइन्स की क्लास है, कॉपी में लिखिये। लाइट और शेडो के बारे में बताया जाएगा। किन वस्तुओं में लाइट होती है और किन में नहीं, परछाई कैसे बनती है, सभी कुछ पढ़ा दिया गया। हमनें हमारे जमाने में विज्ञान को इतने विस्तार से नहीं पढ़ा था। लगने लगा कि 9 साल की दोहिती हमसे ज्यादा ज्ञानवान है। खैर जैसे-तैसे करके हमने अपना सम्मान बचाया और वेरी गुड तो नहीं, कई हिदायतों के बाद गुड तो पा ही लिया। इसकी पीढ़ी हमारी पीढ़ी से न जाने किस-किस में आगे निकल गयी है, हम बात-बात में उनका सहारा लेते हैं। कभी मोबाइल में अटक जाते हैं तो कभी कम्प्यूटर में, फिर कहते हैं कि हमारे बड़प्पन का सम्मान होना चाहिये।
मैं बरसों से लिख रही हूँ, हमारी पीढ़ी पढ़ लेती है लेकिन नयी पीढ़ी को कुछ लेना-देना नहीं। अब मुझे तय करना है कि मैं अपने लेखन को लेकर किसी कमरे में कैद हो जाऊँ या इस पीढ़ी के साथ बैठकर कैरम खेलने लगूँ। वे मेरे पास नहीं आएंगे, मुझे ही उनके पास जाना होगा। मेरा पोता है 11 साल का। पोता है तो आउट-डोर गेम में ज्यादा रुचि होगी ही! मैं जब उसके पास होती हूँ तो वह मेरे पास नहीं बैठता, या तो कम्प्यूटर के बारे में कुछ पूछ लो तो बैठेगा या फिर बाहर घूमने चलो। एक दिन छुट्टी के दिन अपने स्कूल ले गया, वह बास्केट-बॉल खेलता है, मुझे कहा कि आप बैठो मैं प्रेक्टिस करता हूँ। मुझे लगा कि इसके करीब आना है तो इसके साथ खेलना होगा। लेकिन बास्केट-बॉल की बॉल भी कभी पकड़ी नहीं थी, तो? लेकिन मैं मैदान में आ गयी, उसे बॉल लाकर देने लगी, अब उसे खेल में ज्यादा मजा आने लगा क्योंकि अब उसे टीचर बनने का अवसर मिलने वाला था। कुछ समय बाद वह मुझे बास्केट में बॉल डालना सिखाने लगा और मैंने सफलता हासिल की। जो काम बेहद कठिन लग रहा था उसमें मैं एक कदम रख चुकी थी। पोता टीचर बन चुका था और खुश था, वह खुश था तो मुझे भी खुशी मिल चुकी थी।
हमारी खुशियाँ ऐसी ही हैं, हमें झुककर उन्हें पकड़ना होगा। अब बड़प्पन के सहारे जिन्दगी में कुछ नहीं पाया जा सकता है। हम बड़े होने को ज्ञान का भण्डार मान बैठे हैं, नयी पीढ़ी को सम्मान करने का आदेश देते हैं और अगले ही पल अपना मोबाइल उनके पास ले जाकर पूछ लेते हैं कि यह फेसबुक क्या होती है? नयी पीढ़ी हमारे बड़प्पन की परवाह नहीं करती, वे बराबरी का व्यवहार चाहती है। आप उनके साथ कैरम खेलते हुए जीतने का माद्दा रखते हैं तो वे आपको पार्टनर बना लेंगे नहीं तो आपको खारिज कर देंगे। टॉफी-चाकलेट का लालच भी ज्यादा दिन तक उनको डिगा नहीं पाता है, बस उनके साथ उनके बराबर का ज्ञान रखो तो वे आपको साथी मानेंगे ना की बड़ा। एक आयु आने के बाद हम खुशियाँ तलाशते हैं, नयी पीढ़ी हमें धकेलकर आगे निकल जाना चाहती है। हम अकेले पड़ते जाते हैं और धीरे-धीरे अपने कमरे में सिमटने लगते हैं। ऐसे ही पल यदि हम अपने बड़प्पन की चादर को उठाकर फेंक दें और तीसरी पीढ़ी के साथ सामंजस्य बिठा लें तो जीवन आसान हो जाता है। लेकिन तीसरी पीढ़ी हमारे साथ नहीं हैं, तब क्या करें? कोई साथ है या नहीं लेकिन अहंकार की चादर का सहारा तो बिल्कुल ना लें। जो भी मिल जाए, उसमें ही खुशियाँ ढूंढ लें और भूलकर भी वह मौका हाथ से जाने ना दें। जितना ज्यादा छोटों के साथ झुकोंगे उतनी ही ज्यादा खुशियाँ तलाश लोंगे। वास्तविक दुनिया ना सही, यह वर्चुअल दुनिया ही सही, खुशियाँ तलाशने में देरी ना करें। नयी पीढ़ी की दुनिया उस बगिया की तरह है जहाँ नाना प्रकार के फूल खिले हैं, हमें वहाँ जाना ही है और खुशबू का आनन्द तो लेना ही है। यदि वे टीचर बनना चाहते हैं तो मैं शिष्य बनने में परहेज नहीं करती, बस मुझे चन्द पल की खुशियाँ चाहिये। साहित्यकार के पास यह चादर बहुत बड़ी है, इसका उतारना सरल नहीं हैं लेकिन कठिन काम करना ही तो खुशियाँ देता है।

बातें हैं तो हम-तुम हैं

Written By: AjitGupta - Jul• 28•18

बातें – बातें और बातें, बस यही है जिन्दगी। चुप तो एक दिन होना ही है। उस अन्तिम चुप के आने तक जो बातें हैं वे ही हमें जीवित रखती हैं। महिलाओं के बीच बैठ जाइए, जीवन की टंकार सुनायी देगी। टंकार क्यों? टंकार तलवारों के खड़कने से भी होती है और मन के टन्न बोलने से भी होती है। झगड़े में भी जीवन है और प्रेम में भी जीवन है। मैं जब महिलाओं के समूह को पढ़ती हूँ तो वहाँ मुझे जीवन की दस्तक सुनायी देती है, कहीं चुलबुली हँसी बिखर रही होती है तो कहीं शिकायत का दौर, लेकिन लगता है कि हम सब खुद को अभिव्यक्त कर रहे हैं। जहाँ अभिव्यक्ति नहीं वहाँ मानो जीवन ही नहीं है। महिला की अभिव्यक्ति बगिया जैसी होती है, भाँत-भाँत के फूल और भाँत-भाँत की अभिव्यक्ति। जीवन के सारे ही अनुभव का पिटारा लिये होती है महिला। उसका घर ही सृष्टि का पर्याय बन जाता है। बगिया के फूलों के रंग आपको सावचेत करते हैं कि आपके बिखरते और बेतरतीब हुए रंगों को आप सम्भाल लें नहीं तो हमारे बीच बदरंगी नहीं चलेगी। इसलिये जीवन में करीने से सजने का नाम भी है महिला। खुद सजना, औरों को सजाना और सबके मिजाज को खुशगवार बना देना।
अजी चुप सी क्यूँ लगी है, जरा कुछ तो बोलिये, यह कहते-कहते मेरी जुबान भी चुप रहना सीख गयी, लेकिन बातें तो अन्दर दफन हैं, उन्हें तो निकास चाहिये। जुबान का काम हाथों की अंगुलियों ने करना शुरू किया और बातें कागज पर अपने मांडने मांडने लगी। पुरुषों के साथ जीवन बिताते बिताते कब जीवन-रस से वंचित हो गयी पता ही नहीं चला लेकिन एक दिन बोधि-वृक्ष मिल गया और उसके नीचे बैठकर लगा कि जीवन को महिला की तरह जीकर देखना चाहिये। देर तो बहुतेरी हो चली थी लेकिन सोचा जब जागें तभी सवेरा। मुझे इतने रंग दिखायी दिये जिनका मेरी जिन्दगी से नाता ही टूट गया था, मैंने सारे रंगों का अपने पास बुलाया, उन्हें हाथों से सहलाया, दुलार किया और कहा कि मेरे जीवन में भी आ जाओ। लेकिन सूर्य और चन्द्रमा के बीच जैसे पृथ्वी आ जाए और चन्द्रमा अपनी रंगत ही खो दे वैसे ही मेरे और रंगों के बीच उम्र का तकाजा आ जाए और मन के रंग अपनी रंगत को बचाने में लग जाएं, ऐसी ही स्थिति मेरी है।
मैंने जिन्दगी में बहुत कुछ खो दिया है, महिला होने का सुख मैंने जाना ही नहीं क्योंकि जीवन ही पुरुषों के बीच निकला। घर में भी चुप लगी रहती है तो मेरा मौन मुखर कब हो? साक्षात जीवन में यौवन का साथ बामुश्किल मिलता है, क्योंकि यौवन तो उल्लास है और थके-हारे पैर उल्लास का साथ दें तो कैसे दें, बस पिछड़ जाते हैं हम जैसे लोग। जीवन को भरपूर जीना और भरपूर जीवन को महसूस करना, दोनों ही सुख हैं। कोई सा मिल जाए, बस जीना हो जाता है। कुछ लोग जीवन में जीते हैं और कुछ लोग सपनों में जीते हैं लेकिन अब दोनों व्यवस्थाएं विज्ञान ने साक्षात उपलब्ध करा दी हैं। सपनों में जीने के लिये आँख मूंदना जरूरी नहीं अपितु अब आँख खोलना जरूरी है, नेट खोलिये और महिलाओं के समूह को पढ़ने की लत लगाइए, जीवन आँखों में उतरता जाएंगा। मैं भी यही करने लगी हूँ, आप लोगों का साथ जीवन के सारे ही रंगों से परिचय कराने लगा है। हँसी अपने आप दहलीज पर आकर घण्टी बजाने लगी है, मुझे उठकर दरवाजा खोलना ही पड़ता है। बातें जो अपना स्वाद कभी जुबान को चखने नहीं देती थी अब आँखों के रास्ते रस बरसाने लगी हैं और जुबान की बेचैनी कम हुई है। मैं यौवन को नहीं कहती कि तू मेरे द्वार आ, बस मैं ही यौवन की हँसी अनुभूत कर लेती हूँ। बादल से एक बूंद गिरी थी, लेकिन सूर्य ने उस बूंद में इन्द्रधनुष के रंग भर दिये और सारा जीवन दौड़कर बाहर आ गया, इस सुन्दर रंगों के जादुई नजारे को देखने। आप बस खिलखिलाती रहें जिससे हमारा जीवन भी खिलखिलाने को उतावला हो जाए। बस याद रखना अपनी बातों का खजाना, इसे कम ना होने देना क्योंकि बातें हैं तो जीवन है, बातें हैं तो यौवन है और बातें हैं तो हम-तुम हैं।

लेखक वहीं क्यों खड़ा है!

Written By: AjitGupta - Jul• 24•18

रोजमर्रा की जिन्दगी को जीना ही जीवन है और रोजमर्रा की जिन्दगी को लिखना ही लेखन है। रोज नया सूरज उगता है, रोज नया जीवन खिलता है, रोज नयी कहानी बनती है और रोज नयी विपदा आती है। पहले की कहानी में छोटा सा राज्य भी खुद को राष्ट्र कहता था लेकिन आज विशाल साम्राज्य भी राष्ट्र की श्रेणी में नहीं आते। दुनिया कभी विविधताओं से भरी विशाल समुद्र दिखायी देती है तो कभी एक सी सोच को विकसित करता छोटा सा गाँव। पहले के जमाने में हम थे और साथ था हमारा भगवान लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब हम है और साथ में है हमारा नया संसार। इसलिये पहले लिखते थे खुद के बारे में और भगवान के बारे में लेकिन आज लिख रहे हैं नये संसार के बारे में। यह नया संसार अनोखा है, रोज नये पर्तों के अन्दर घुसने और समाने का अवसर मिलता है। पुरानी वर्जनाएं दम तोड़ रही है, क्योंकि अनावश्यक डर निकलता जा रहा है। दुनिया का विशाल वितान सामने ही छा गया है, सारे रंग ही एकसाथ हमारी नजरों में समा गये हैं, दोनों हाथ लूटने को तैयार हैं कि किस वितान को छूं लूं और किस रंग को अपनी मुठ्ठी में भर लूँ। पहले के जीवन में रोज मर्यादाएं गढ़ते थे लेकिन आज रोज मर्यादाओं को तोड़ते हैं। इसलिये लेखन भी बदल गया है, लेखक भी बदल गया है और जो नहीं बदला है वह बासी रोटी की तरह हो गया है जिसे कोई नहीं खाना चाहता।
परिवार में परम्परागत रिश्ते नहीं रहे, एक दूसरे का हाथ थामे कोई दिखायी नहीं देता बस अपने आप को दुनिया में फिट करने की होड़ मची है, कैसे भी हो दुनिया के सारे रंग अपनी झोली में भरने की दौड़ लगी है, इसके लिये कुछ भी मर्यादाहीन नहीं है। यदि आप प्यार में हैं तो आपके लिये सारी कायनात साथी बन रही है और दुनिया का यही सबसे बड़ा सच है। यदि आप किसी मुसीबत में हैं तो दुनिया का हर जुर्म जायज है। कैसे भी अकूत सम्पदा मेरी झोली में आनी चाहिये फिर मैं इसका उपयोग कर सकूँ या नहीं, लेकिन मेरा बस यही लक्ष्य है। परिवार में सब अकेले हैं, कोई किसी का साथी नहीं है, पूरी तरह जंगलराज की तरह है हमारा जीवन, जब शेर बूढ़ा हो जाता है तब एक गुफा में चले जाता है और वहीं अपने प्राण त्याग देता है। ऐसा ही मनुष्यों के साथ होता जा रहा है इसलिये लेखन के उद्देश्य बदल गये हैं।
लेखन में दो वर्ग बन गये हैं, एक दुनिया की रंगीनियां दिखा रहे हैं तो दूसरे अकेलापन। अब भगवान बहुत कम याद आते हैं, जीवन में जब साथ मिलता है तब भगवान भी याद आते हैं लेकिन जब अकेले हो जाते हैं तब जद्दोजेहद में कहाँ भगवान याद आते हैं! स्वर्ग और नरक जब यहीं दिखने लगें तब कहाँ भगवान का स्मरण शेष रहता है! कुछ लोग पीड़ित हो जाते हैं क्योंकि उन्हें दुनिया के चलन की खबर ही नहीं लगी क्योंकि वे पुरातन में ही खोये रहे, लेकिन कुछ लोगों के कदम सद जाते हैं क्योंकि वे नवीन की खबर रखते थे। जमाने की हवा किस ओर बह रही है, यह तो पतंग उड़ाने वाले को भी मालूम रखना होता है, हम तो जीवन को उड़ा रहे हैं! पहले आदमी को सभ्य बनाया जाता था लेकिन आज आदमी को असभ्य बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है क्योंकि उसे अकेले ही संघर्ष करना है। नजाकत दम तोड़ती दिखायी देती है और कठोरता बाजूओं सहित दिल में भी समा गयी है। दुनिया एकदम से बदल गयी है तो लेखक वहीं क्यों खड़ा है! लोगों के सर पर अचानक ही बादल फट गया है ऐसे में लेखक ने उसे सावचेत क्यों नहीं किया? क्यों लेखक ने नयी राह की ओर इशारा नहीं किया? आजकी सबसे बड़ा समस्या यही है कि हम पुरातन में खोये रहे और दुनिया आँधी के अंधड़ के साथ नये मुकाम पर आकर खड़ी हो गयी, जहाँ सबकुछ नया था। नये किशोर के सपने अलग हैं, वह सृजन से अधिक भोग करना चाहता है, उसकी दुनिया बहुत बड़ी है लेकिन उस बड़ी दुनिया में किसी भी रिश्ते को कोई जगह नहीं है। वह सैलानी बनना चाहता है, रुकना कहीं नहीं चाहता। रिश्ते रोकते हैं इसलिये अकेले ही रहना चाहता है। अकेली होती जा रही दुनिया का जानकार लेखक भी नहीं रहा, उसने भी पुरातन में ही धूनी रमा ली। इसलिये मैं कहती हूँ कि बाहर निकलो और दुनिया को बताओ कि अकेले रहकर कैसे सुखी रहा जा सकता है? इस दुनिया का चोला बदल रहा है, या तो नया धारण कर लो या फिर फटेहाल हो जाओ। लेखक ने हर युग की आहट को पहचाना है और लोगों को सावचेत किया है, वापस हमें यही करना होगा। सपनों की जगह सच्चाई को दिखाना होगा। क्रूर सच्चाई को। बताना होगा कि अब दिन का उजाला नहीं रात की रंगीनियाँ अधिक लुभाती हैं, हम एक-दूसरे के पूरक नहीं अपितु केवल जरूरत भर हैं। लेखनी उठाओ और करो सामना नयी पीढ़ी का और सावचेत करो पुरानी पीढ़ी को, दोनों के बीच पुल बनने का मिजाज तैयार करो। तभी तुम लेखक हो नहीं तो भजन गाते रहो।

मोदी को पकड़कर वैतरणी पार करना

Written By: AjitGupta - Jul• 23•18

लोकतंत्र में छल की कितनी गुंजाइश है यह अभी लोकसभा में देखने को मिली। कभी दादी मर गयी तो कभी बाप मर गया से लेकर ये तुमको मार देगा और वो तुमको लूट लेगा वाला छल अभी तक चला है, लेकिन शुक्रवार को नये प्रकार के छल का प्रयोग किया गया! प्यार का छल! हम सबसे प्यार करते हैं, दुश्मन से भी गले लग जाते हैं, हम प्यार के मसीहा हैं! सत्ता के लिये छल के तो लाखों उदाहरण राजशाही में देखे जाते हैं लेकिन लोकतंत्र में भी प्यार का छल यह नया प्रयोग था। इस छल से तो पीठ में छुरा ही घोंपा जाता है, दूसरी तो कोई बात हो ही नहीं सकती। लोकतंत्र में सत्ता की प्राप्ति तो जनता द्वारा होती है, राजाशाही में बल या छल से होती थी। मौत के सौदागर से लेकर सूट-बूट वाले चोर के गले में लटक जाना प्यार कैसे हो गया! यह तो निरा छल है। आपके द्वारा लगाए गये पोस्टर नफरत या प्यार, एक धोखा है। लोकसभा में ऐसा लग रहा था जैसे एक अफीमची अपनी ही पीनक में अनर्गल प्रलाप कर रहा हो और फिर नौटंकी करते हुए प्रधानमंत्री के गले जा पड़े। यह प्यार कैसे हो गया! मुझे अपनी शरण में ले लो, यह तो हो सकता है लेकिन प्यार तो कदापि नहीं।
लोकतंत्र में आप अपने कार्य प्रणाली की बात करिये और जनता का दिल जीतिये, लेकिन जनता को बेवकूफ मानते हुए छल मत करिये। जनता के सामने अब भोजन की थाली सजने लगी है, उसे बाप मरने की और दादी मरने का छल भी समझ आने लगा है तो कैसे अपनी थाली तुम जैसे छली को दे दे। बहुत भूखा मारा है तुमने, अब और नहीं। तुमने अपना घर भर लिया और अपने को बचाने के लिये 10 प्रतिशत लोगों को टुकड़े फेंक कर सुरक्षा दीवार खड़ी कर ली, इसका यह अर्थ नहीं कि शेष 90 प्रतिशत जनता हमेशा छली जाएगी! छलना बन्द करो और काम करो। पड़ोसी देश तक में नारे लग रहे हैं कि हम मोदी की तरह काम करके दिखाएंगे और तुम अभी भी नौटंकी से ही काम चलाना चाहते हो। 10 प्रतिशत अपने चाटुकारों से बाहर निकलो और जनता की आँखों में देखो, वहाँ सपने पलने लगे हैं। मोदी की आँख में आँख डालने से कुछ नहीं होगा, हो सके तो जनता की ओर देखो। जिस झोपड़ी में तुम गये थे, उसी झोपड़ी में तुम्हारे पिता भी गये थे, झोपड़ी झोपड़ी ही रही लेकिन तुम्हारे खानदान ने सत्ता हड़प ली। हमारे देश में तो सुदामा एक बार गया था कृष्ण के घर और उसकी झोपड़ी महल में बदल गयी थी। तुम तो झोपड़ी में खुद जा आए और झोपड़ी वैसी ही खड़ी है!
प्यार का नाटक बहुत हुआ, तुम्हारे पोस्टर से लग रहा है कि आखिर तुमने भी मोदी का सहारा ही लिया। मोदी गाय नहीं है जो उसकी पूंछ पकड़कर वैतरणी पार कर जाओंगे! एक काम करो, राजनीति से संन्यास लो और मोदी के शरणागत आ जाओ, तुम्हें ओर कुछ नहीं तो जीने का तरीका जरूर आ जाएंगा। जीवन में छल और श्रेष्ठों के लिये तुम्हारे अन्दर जो गालियों का समन्दर लहराता रहता है उसका अवसान हो जाएगा। यदि यह मंजूर नहीं और मोदी का मुकाबला ही करना चाहते हो तो मोदी का सहारा मत लो, अपने ऊपर विश्वास करना सीखो। लोकतंत्र में छल की जगह नहीं होती है, लेकिन तुम्हारे पूरे खानदान ने छल से ही सत्ता हथियायी है बस अब और नहीं। तुम्हारा मोदी के गले पड़ना तुमको सत्ता से बहुत दूर ले गया है इसलिये अपने पादरी के पास जाकर प्रायश्चित कर लो, शायद कुछ पवित्रता का आभास हो जाए।

काले बदरा और पहाड़ का मन्दिर

Written By: AjitGupta - Jul• 19•18

आँखों के सामने होती है कई चीजें लेकिन कभी नजर नहीं पड़ती तो कभी दिखायी नहीं देती! कल ऐसा ही हुआ, शाम को आदतन घूमने निकले। मौसम खतरनाक हो रहा था, सारा आकाश गहरे-काले बादलों से अटा पड़ा था। बादलों का आकर्षण ही हमें घूमने पर मजबूर कर रहा था इसलिये निगाहें आकाश की ओर ही थीं। काले बादलों के समन्दर के नीचे पहाड़ियां चमक रही थीं और एक पहाड़ी पर बना नीमज माता का मन्दिर भी। कभी ध्यान ही नहीं गया और ना कभी दिखायी दिया कि यहाँ से नीमज माता का मन्दिर भी दिखायी देता है! दूसरे पहाड़ को देखा, वहाँ भी बन रहे निर्माण दिखायी दिये। जब आसमान घनघोर रूप से काला हो तब उसके नीचे की सफेदी दिखायी दे जाती है। काले बादल कह रहे थे कि लौट जाओ, हम कहर बरपाने वाले हैं लेकिन उनके अद्भुत सौंदर्य को देखने का मोह छूट नहीं रहा था और जब एकाध बूंद हमारे ऊपर आकर चेतावनी दे गयी तब हम वापस लौट ही गए। लेकिन नाम मात्र की बारिश आकर रह गयी और वे काले-बदरा न जाने कहाँ जाकर अपना बोझ हल्का कर पाएं होंगे! लेकिन हमें तो सीख दे ही गये कि जब काले बादल आकाश में छाये हों और कुछ सूरज का प्रकाश पहाड़ों पर गिर रहा हो तब पहाड़ों पर बने मन्दिर चमक उठते हैं और दूर से दिखायी देने लगते हैं।
एक बार मैं पाटन (गुजरात) के इतिहास पर लिखे उपन्यास को पढ़ रही थी, वहाँ के राजा के मंत्री एक सपना देखते हैं कि गिरनार की पहाड़ियों पर मन्दिर की श्रंखला हो तो कितनी सुन्दर लगेंगी! यह कल्पना एक मंत्री की नहीं थी अपितु भारत के हर राजा और मंत्री की यही कल्पना रही है कि पहाड़ों पर दूर से चमकते मन्दिर हों और उन पर लहराता ध्वज भारतीयता का प्रतीक बनकर दूर से दिखायी देता रहे। न जाने कितने पहाड़ों पर कितने मन्दिर बने हैं, यह भारत की ही विशेषता है। शायद किसी भी अन्य देश में ऐसी परम्परा नहीं है। सौंदर्य को प्रकृति के साथ कैसे एकाकार करें यह बात हमारे शिल्पकार बहुत अच्छी तरह से जानते थे। समुद्र के किनारे आकाश-दीप बनाने की परम्परा भी शायद यहीं से आयी होगी! जैसे ही आकाश-दीप दिखायी देता है, नाविक चिल्ला उठते हैं कि किनारा आ रहा है, कोई नगर आ रहा है, ऐसे ही जब पहाड़ पर कोई ध्वजा लहराती दिखायी दे जाती है तब हम जान लेते हैं कि यह भारत है। कैसा भी काला अंधेरा हो लेकिन हमारे मन्दिर राहगीरों का पथ-प्रदर्शन करेंगे ही। हमारे सम्बल के लिये कोई सहारा होगा ही। जिन पहाड़ों पर वीराना पसरा हो, वहाँ भी मन्दिर और ध्वजा मिल ही जाती है, मतलब हम दूसरों को रास्ता दिखाने का काम हर हाल में करते ही हैं। शायद यही हमारी थाती है। कोई मार्ग ना भटके और भटक भी जाए तो उसे ठिकाना मिल जाए, आसरा मिल जाए, हमारे भारत में यही परम्परा रही है। हजारों सालों से यही आकर्षण विदेशियों को भारत की ओर खींच लाता है, कुछ भारत को समझने चले आते हैं तो कुछ लूटने चले आते हैं। आज भी यह सिलसिला जारी है, समझने का और लूटने का भी। शायद बिजली की कृत्रिम रोशनी के कारण हमें पहाड़ों पर बने हमारे आकाश-दीप दिखायी नहीं देते, शायद किसी दिन ऐसे ही काले बादल जब घिरेंगे तब हमें ये आकाश-दीप ही रास्ता दिखाएंगे। फिर हमें समझ आने लगेगा कि कौन समझने चला आया है और कौन लूटने चला आया है। अभी तो सब एकाकार हो रहे हैं, हम लुटेरों को पहचान ही नहीं पा रहे हैं, हम उदारता का परिचय दे रहे हैं। लेकिन ये आकाश-दीप हमें मार्ग जरूर दिखाएंगे इसलिये इन आकाश-दीपों को सम्भाल कर रखिये।