अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

शायद यही परिवर्तन है!

Written By: AjitGupta - Sep• 02•18

आजकल टीवी के लिये फिल्म बनाने की कवायद जोर-शोर से चल रही है इनमें से अधिकतर फिल्म आधुनिक सोच को लिये होती है। वे युवा मानसिकता को हवा देती हैं और एक सुगम और सरस मार्ग दिखाती हैं। हर कोई इनसे प्रभावित होता है। क्यों प्रभावित होता है? क्योंकि ऐसे जीवन में अनुशासन नहीं होता, पूर्ण स्वतंत्रता की मानसिकता को दर्शाने का प्रयास रहता है और जहाँ कोई भी अनुशासन नहीं हो भला वह सोच किसे नहीं पसन्द होगी! मैं नवीन पीढ़ी की सोच से रूबरू होना चाहती हूँ इसलिये जब भी मौका मिलता है इन फिल्मों को टीवी पर देख लेती हूँ। मेरी संतान के मन में भी क्या चल रहा है, मुझे भान हो जाता है और मैं सतर्क हो जाती हूँ। एक बात मैंने नोटिस की है, शायद यह पहले से ही होती रही हो लेकिन जब से जेएनयू का नाम रोशन हुआ है तब से मैंने नोटिस किया कि फिल्मों में जेएनयू का नाम खुलकर लिया जाता है और फिल्म का कोई भी करेक्टर यह जरूर कहता है कि मैं जेएनयू में पढ़ा हूँ। खैर बाते तो बहुत हैं लेकिन कल की ही बात करती हूँ, कल टीवी पर एक फिल्म आ रही थी, आधी-अधूरी ही देखी गयी, उसे दोबारा अवश्य देखूंगी। एक माँ है और उसकी एक युवा बेटी है, दोनो आधुनिक तरीके से रहती हैं। एक दिन माँ बेटी से कहती है कि मैं जेएनयू मैं पढ़ती थी और मुझे एक लड़के से प्यार हो गया और मैं उसके साथ भाग गयी। बेटी उसे प्रश्नचिह्न लगाकर देखती है लेकिन माँ आगे बोलती है कि तुम्हारे जो पापा है वे दूसरे हैं। मेरे भागने के दो साल बाद मुझे ये मिले और मुझे इतने पसन्द आये कि मैं फिर भाग गयी। बेटी एक क्षण के लिये ठिठकती है लेकिन अगले ही क्षण ठहाका मारकर हँस देती है कि वाह माँ। कहानी सोशल मीडिया पर आधारित है, कैसे लोग लिख रहे हैं और विचार को वायरल कर रहे हैं। कह रहे हैं कि हमारा नाम कहीं नहीं आता लेकिन हमारे विचार तो वायरल होते हैं, यही सुख देता है।
एक प्यारी नज्म है लेकिन सोशल मीडिया ने उसे तोड़-मरोडकर चुटकुला बना दिया है, नज्म लिखने वाले को पहले गुस्सा आता है लेकिन फिर वह देखता है कि लोग आनन्द ले रहे हैं तो मान जाता है। फिल्म में कहा जाता है कि सभी कुछ परिवर्तनशील है, जिसमें लोग आनन्द लें वही अच्छा है। नया जमाना है, जहाँ और जिससे सुख मिले बस वही करो। खुलकर अपनी बात कहो, कोई दुराव नहीं कोई छिपाव नहीं। सब कुछ सुन्दर हो, सजा-धजा हो जरूरी नहीं। मन को पसन्द है तो साथी अच्छा है। कई प्रयोग करने में भी कोई बुराई नहीं। माँ अपनी बात खुलकर कह रही है और साहस के साथ कह रही है, बेटी अपने मन की कर रही है, कोई रोक-टोक नहीं है। सोशल मीडिया के द्वारा जीवन को बदला जा रहा है। ये लोग किसी अनुशासन को नहीं मानते, संविधान को नहीं मानते। इनका संविधान है इनका मन। जो मन करे वह करो। ऐसी फिल्में गुडी-गुडी होती है मतलब अच्छी-अच्छी। कोई कठिनाई नहीं, कोई लड़ाई नहीं। जेएनयू के लिये बनी इन फिल्मों का सार है कि केवल अपने मन का सुख।
लेकिन इस संसार में केवल अपने मन की कब चली है? किसी भी प्राणी की ऐसी स्थिति नहीं है कि वह अपना मनमाना करे। सभी के कुछ ना कुछ अनुशासन है, मेरे घर की मुंडेर पर बैठे कबूतर को जोड़े को जब चोंच मिलाते देखती हूँ तब यह नहीं सोच लेती हूँ कि यह हर किसी कबूतर या कबूतरी से चोंच मिलाने को स्वतंत्र है। लेकिन कुछ लोग सोच लेते हैं कि सारी प्रकृति स्वतंत्र है तो हम भी स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता किसे अच्छी नहीं लगती, मुझे भी लगती है और आप सभी को भी लगती होगी लेकिन जब कभी इस स्वतंत्रता को खुली आँखों से देखने का प्रयास करती हूँ तो ताकतवर का कमजोर के प्रति शोषण ही दिखायी देता है। शायद मकसद भी यही हो कि हम स्वतंत्रता का खेल दिखाकर लोगों को घर-समाज और देश के अनुशासन से बाहर निकाल दें और फिर बाज की तरह इनपर टूट पड़ें। दुनिया में बढ़ रहे महिलाओं के प्रति अपराध इस ओर ही इंगित करते हैं। पहले क्लब के बहाने महिलाओं को पाने का प्रयास किया गया और अब जेएनयू की सभ्यता दिखाकर की सभी साथ रह रहे हैं, साथ सो रहे हैं। पहले रजामंदी से फिर जोर-जबरदस्ती से शोषण होगा। शोषण में पुरुष और स्त्री दोनों ही शामिल हैं। बस जो कमजोर है वह शोषित होगा। ये फिल्में बनती रहेंगी, हमें लुभाती रहेंगी और हमारा जीवन बदलती रहेंगी। क्योंकि हम कहते रहेंगे कि जीवन परिवर्तनशील है, सुन्दर हो, सजा-धजा हो यह आवश्यक नहीं, बस सुख देने वाला हो। भाषा बदल जाएगी, वेशभूषा बदल जाएगी, जिस सभ्यता को हमने संस्कृति के सहारे उच्च स्थान दिया था हम उसे प्रकृति के नाम पर विकृति की ओर ले जाते रहेंगे, शायद यही परिवर्तन है।

जनता तुम्हारा नोटा बना देगी

Written By: AjitGupta - Sep• 01•18

हमने पिताजी और माँ के जीवन को देखा था, वे क्या करते थे, वह सब हमारे जीवन में संस्कार बनकर उतरता चला गया। लेकिन जिन बातों के लिये वे हमें टोकते थे वह प्रतिक्रिया बनकर हमारे जीवन में टंग गया। प्रतिक्रिया भी भांत-भांत की, कोई एकदम नकारात्मक और कोई प्रश्नचिह्न लगी हुई। जब हवा चलती है तब हम कहते हैं कि यह जीवन दायिनी है लेकिन जब यही हवा अंधड़ के रूप में विकराल रूप धर लेती है तो कई अर्थ निकल जाते हैं। ऐसी ही होती हैं स्वाभाविक क्रिया और प्रतिक्रिया। मैंने कोशिश की जीवन में कि मैं बच्चों को कम से कम सीख दूँ, वे स्वाभाविक रूप से हमारे जीवन को देखें और अनुसरण करें। लेकिन कभी हमारे स्वाभाविक आचरण से भी प्रतिक्रिया हो जाती है। मुझे एक बात का स्मरण हो गया, मेरी ननद की शादी थी, यह शादी हमने ही की थी और धूमधाम से की थी। बेटा सबकुछ देख रहा था, उसने मुझसे पूछा कि क्या बहन की शादी भाई को ही करनी होती है? मैंने कहा कि यह प्रश्न क्यों? वह बोली कि यदि ऐसा है तो मैं तो नहीं करूंगा। बच्चे की बात पर हम सब हँसकर रह गये लेकिन जब आज उस बात को सोचती हूँ तो यह अच्छी बात की प्रतिक्रया लगती है। हम क्रिया कर रहे थे लेकिन बच्चे के दीमाग में प्रतिक्रिया जन्म ले रही थी। हम अक्सर सोचते हैं कि हमने तो अच्छा किया लेकिन लोगों ने हमारे साथ बुरा क्यों किया! कई बार देखा है कि जिन लोगों के साथ हमने अच्छा किया होता है, अक्सर वे लोग हमसे दूर हो जाते हैं। क्यों हो जाते हैं? जैसा मेरे बेटे ने कहा कि क्या मुझे भी यह करना होगा, बस यही बात हमें रिश्ते निभाने से दूर कर देती है। हमारे अच्छे काम अक्सर विपरीत असर दिखाते हैं, लोग कहते हैं कि हमें भी ऐसा ही करना होगा! चलो इनसे दूर हो लेते हैं।
अच्छे काम की बुरी प्रतिक्रिया परिवार में ही नहीं होती अपितु समाज में भी होती है और राजनीति में भी होती है। अच्छा राजा हो तो प्रजा की आँखों में खटकने लगता है क्योंकि प्रजा अपने कर्तव्य से भागना चाहती है। इसलिये जितने भी श्रेष्ठ राजा हुए हैं उन्हें कठिन संघर्ष से गुजरना पड़ा है। हमारे अन्दर सर्वाधिक भाव स्वार्थ का होता है, हम सबकुछ अपने लिये ही पाना चाहते हैं इसलिये जैसे ही किसी राजा ने या गृहस्वामी ने सबके लिये कार्य करना शुरू किया, हमारे मन में विरोध के भाव आ जाते हैं। आज की राजनीति को यदि देखें तो यही दिखायी देता है कि मोदी सरकार का सारा विरोध इसी बात को लेकर है। उनके समर्थक भी कह रहे हैं कि हमारे लिये विशेष अधिकार क्यों नहीं? उनके विरोधी भी कह रहे हैं कि सभी के लिये क्यों? सब अपना हिस्सा चाहते हैं। इसलिये घर में संतान को ही सम्पत्ती देने की परम्परा बनी, यदि संतान को सम्पत्ती नहीं तो वह शत्रु से भी अधिक क्षति करेगा। राजनीति में कुछ लोगों पर अनुग्रह करने की परम्परा बनी जिससे ये अनावश्यक रूप से शत्रु ना बन जाएं? मोदी सरकार की सबसे बड़ी भूल यही होगी कि उन्होंने लोगों के सामने चाँदी के सिक्के नहीं उछाले! आज हर समाज का तबका विशेष बनना चाह रहा है, वे सामाजिक रूप से कुछ नहीं कर रहे लेकिन उन्हें विशेषाधिकार चाहिये। जो लड़ाई समाज की है, जो कर्तव्य समाज के हैं, उन्हें वे राजनीति में घसीट रहे हैं। सब जानते हैं कि भारत में सदियों से छूआछूत है, किसी जाति को सारे अवसर मिले और किसी को कुछ मिलना तो दूर उसे इतना हीन बना दिया गया कि वह कल्पना में भी अपने लिये अच्छा नहीं सोच सकता था। यह सारी दुनिया में था लेकिन दुनिया ने इसे समझा और सामाजिक रूप से इस विभेद को दूर किया। आज दुनिया में सामाजिक छुआछूत इतना प्रबल नहीं है जितना भारत में दिखायी देता है। यह सब सामाजिक इच्छा शक्ति से हुआ है ना कि राजनीति द्वारा। आज देश में जितने भी सामाजिक और धार्मिक संगठन हैं उनसे प्रश्न करना होगा कि उनने सामाजिक समरसता के लिये कितने लोगों को उच्च या सवर्ण वर्ग में दीक्षित किया? बना दीजिये सभी को सवर्ण और स्थापित करिये बेटी-रोटी का सम्बन्ध फिर देखिये कहाँ विरोध रहता है? समाज में यदि वर्ग भेद को अपने मन से नहीं निकालेंगे और उन्हें खुलेआम नीचा दिखाने का काम करेंगे या सम्बोधन में नीचा दिखाएंगे तो वे प्रतिक्रिया अवश्य करेंगे। अब यदि अपने लिये विशेषाधिकार मांगते हुए ना मिलने की दशा में देश को की तबाह करने की सोच विकसित होने लगी तो देश तो तबाह नहीं होगा, हाँ आप जरूर तबाह हो जाओंगे।
मैं परिवार से लेकर देश तक, सबकुछ – सबके लिये के सिद्धान्त पर चली हूँ और आगे भी चलती रहूँगी। यह देश सभी का है, यदि किसी भी समाज ने केवल अपना आधिपत्य स्थापित करने की मानसिकता का प्रदर्शन किया और राजनीति को धमकाकर अपने लिये विशेषाधिकार की मांग की तो राजनीति करने वाले नष्ट नहीं होंगे अपितु आप का नामोनिशान मिट जाएगा। दुश्मन हजारों साल से हमारी इसी कमजोरी का फायदा उठाता रहा है और हमें तोड़ता रहा है लेकिन आज भी जिस शिक्षा और डिग्रियों के नाम पर इतराते फिरते हो, वे किसी काम की नहीं हैं जब आप को इतना ज्ञान भी नहीं कि एकता में ही शक्ति है। राजनीति में धमकाने की परम्परा को छोड़ दो, शायद भगवान के सामने भी कुछ लोगों ने यही धमकी दी होगी कि हम ना तो पुरुष को मानेंगे और ना ही स्त्री को तो भगवान ने उन्हें दोनों से ही अलग बना दिया। नोटा का प्रयोग भी यही है। कुछ नारे लगा रहे हैं कि घर-घर अफजल निकलेगा और कुछ नारे लगा रहे कि घर-घर नोटा निकलेगा। याद रखना जिस भी राजा के सामने संघर्षों की बाढ़ आयी है, वही राजा सुदृढ़ होकर निकला है, फिर चाहे वह चन्द्रगुप्त हो या अशोक। चाँदी के सिक्के तो तुम्हारे सामने मोदी उछालेगा नहीं, अब अपनी औकात में आ सको तो आ जाओ नहीं तो तुम नोटा दबाने की बात कर रहे हो, जनता तुम्हारा नोटा बना देगी।

इन मेहंदी से सजी हथेलियों के लिये

Written By: AjitGupta - Aug• 30•18

कभी आपने जंगल में खिलते पलाश को देखा है? मध्यम आकार का वृक्ष अपने हाथों को पसारकर खड़ा है और उसकी हथेलियों पर पलाश के फूल गुच्छे के आकार में खिले हैं। गहरे गुलाबी-बैंगनी फूल दप-दप करते वृक्ष की हथेली को सुगन्ध से भर देते हैं। एक मदमाती गन्ध वातावरण में फैल जाती है। जंगल के मन में दावानल जल उठता है, इससे अधिक सुन्दरता कोई चित्रकार भी नहीं उकेर सकता जितनी प्रकृति ने उकेर दी होती है। मैंने कई बार देखी है यह सुन्दरता। बचपन में देखी थी और इन टेसू के फूलों से होली के रंग बना लिये थे। ! (यह टेसू और पलाश एक ही है।) युवावस्था में देखी तो लगा कि जंगल में दावानल दहक रहा है, साक्षात कामदेव ने अपने सारे ही सर-संधान कर दिये हैं। भला ऐसी प्रकृति को छोड़कर कौन शहर की ओर दौड़ना चाहेगा! मन करता कि यही बस जाएं। हर पलाश का वृक्ष निमंत्रण देता सा लगता। लेकिन शहरी जीवन कब जाकर बसा है जंगलों में! इसने तो शहर में ही पलाश की सुन्दरता खोजने का काम कर लिया है।
मेरी नजर महिलाओं की हथेली पर पड़ी, सुन्दर-गुलाबी सी हथेली और उसपर रची मेहंदी। जब फोटो खिंचवाने के लिये हाथ ऊपर किये तो लगा कि पलाश के वृक्ष ने अपने तने को ऊपर किया है। मुझे हथेली पर पलाश के फूल खिलते दिखायी दिये। लाल-पीली सी मेहंदी और महकती मेहंदी, क्या किसी टेसू के फूल की उपस्थिति से कम है त्योहार पर अनेक हाथ जो मेहंदी से रच गये हैं, जंगल के पलाश-वृक्ष की अनुभूति करा रहे हैं। यह मेहंदी का रंग हथेली के साथ मन में भी रचता है, इस मेहंदी की खुशबू से हाथ ही नहीं महकते अपितु मन भी महकता है और अपनी हथेली में रची मेहंदी से दिल किसी ओर का डोलता है। जैसे जंगल पलाश के खिलने से जादुई हो जाता है, लगता है कि किसी तांत्रिक ने वशीकरण मंत्र से बांध दिया है सभी के मन को, वैसे ही मेहंदी से रचे हाथों में यह ताकत आ जाती है। खुमारी सी छाने लगती है और लगता है हर घर में वसन्त ने दस्तक दे दी हो।
महिलाओं ने मेहंदी का भरपूर प्रयोग किया है, जैसे प्रेम की रामबाण औषधि यही हो। बस कोई भी त्योहार हो, बहाना चाहिये और रच जाते हैं मेहंदी के हाथ। घण्टों तक मंडते हैं फिर घण्टों भर की देखभाल लेकिन घर में कहीं कोई उतावलापन नहीं। अपने हाथ से पानी भी नहीं पीने वाले पुरुष पत्नियों को पानी लाकर पिलाने लगते हैं। सब काम खरामा-खरामा होता है लेकिन घर का धैर्य बना रहता है। बिस्तर की चादर लाल हो जाती है, घर के आँगन में मेहंदी का चूरा बिछ जाता है, वाँशबेसन चितकबरे हो जाते हैं लेकिन कोई शिकायत नहीं। मेहंदी का जादू घर के सर पर चढ़कर बोलता है, उसकी खुशबू से सभी मदमस्त रहते हैं, बस इस इंतजार में कि कब मेहंदी सूखेगी और कब हथेली निखरेगी। जैसे ही हथेली से मेहंदी ने झरना शुरू किया, एक ही चाहत आँखों में बस जाती है कि कितना रंग चढ़ा? इस रंग को प्यार का नाम भी दिया गया कि जिसकी ज्यादा रचे, उसे प्यार अधिक मिले। प्रकृति ने हमें जहाँ टेसू के फूल में भरकर रंग दिये हैं वहीं मेहंदी के अन्दर भी रंग घोल दिये हैं। कुछ लोग मेहंदी के बहाने प्रकृति को घर में न्योत देते हैं और कुछ दूर से ही निहारते रहते हैं। जिसने भी प्रकृति के इस प्रेम की ताकत को पहचाना है उसने प्रेम को भी पहचान लिया है और जिसने इन रंगों को अपने जीवन से दूर किया है, उससे प्रेम भी रूठ गया है। हमारे जीवन में मेहंदी ऐसे ही रची-बसी रहे जैसे जंगल में पलाश। जंगल भी महकेंगे और घर भी महकेंगे। घर भी महकेंगे और मन भी महकेंगे।
विशेष – यह सावन-भादो का महिना हम महिलाओं के लिये विशेष होता है और फेसबुक पर मेहंदी से रची हथेलियों के फोटोज की भरमार है, यह पोस्ट उन्हीं के लिये।

बहन की मुठ्ठी में सम्मान रख दो

Written By: AjitGupta - Aug• 27•18

कई बार आज का जमाना अचानक आपको धक्का मारता है और आप गुजरे हुए जमाने में खुद को खड़ा पाते हैं, कल भी मेरे साथ यही हुआ। बहने सज-धज कर प्रेम का धागा लिये भाई के घर जाने लगी लेकिन भाई कहने लगे कि आज तो बहनों को कुछ देना पड़ेगा! कुछ यहाँ लिखने भी लगे कि बहनों की तो कमाई का दिन है आज। मुझे मेरी माँ का जमाना याद आ गया। जैसे ही गर्मियों की छिट्टियां होती और माँ के पास भाई का बुलावा आ जाता और माँ हमें लेकर अपने मायके चले जाती। ना भाई कभी कारू का खजाना लुटाता और ना ही माँ कभी उलाहना देती, बस मुठ्ठी में जो भी प्यार से रख देता, माँ के लिये साल भर के प्रेम की सौगात होती। मामा माँ को इतना सम्मान देते कि कभी मामी के स्वर ऊँचे नहीं होते। जब हमारे घर किसी भाई का विवाह होता तो मामा सबसे पहले आकर खड़े होते और वे मायरे में क्या लाए हैं यह कोई नहीं पूछता बस माँ के खुशी के आँसू ही उनका खजाना बता देते। राखी पर तो कोई आने-जाने का बंधन कभी दिखायी ही नहीं दिया। बस माँ की आँखों में हमेशा विश्वास बना रहा कि मेरी हर जरूरत पर मेरे भाई सबसे पहले आकर खड़े होंगे और हमारे मामा ने कभी उनके विश्वास को टूटने नहीं दिया। भाई-बहन का सम्मान वाला प्रेम मैंने अपने घर देखा है। माँ का जमाना बीता फिर हमारा जमाना आया, सम्मान तो अटल खड़ा था लेकिन उसकी बगल में चुपके से पैसा भी आकर खड़ा हो गया था। जैसे ही पैसा आपका आवरण बनने लगता है, रिश्तों से आवाजें आने लगती हैं जैसे यदि आपने बरसाती पहन रखी है तो उससे आवाज अवश्य होगी ही। लेकिन फिर भी रिश्ते में सम्मान बना रहा और हमारी आँखों में भी वैसे ही आँसू होते थे जैसे माँ की आँखों में होते थे, विश्वास के आँसू।
लेकिन ……. आज वैसा प्यार कहीं दिखायी नहीं देता है, सब ओर पैसे से तौल रहे हैं इस अनमोल प्यार को। बहन क्या लायी और भाई ने क्या दिया, बस इसी पड़ताल में लगे दिखते हैं। कोई कह रहा है कि आज तो बहनों का दिन है, आज तो बहनों की चाँदी है। त्योहार भाई का और पैसे के कारण हो गया बहनों का! बहन रात-दिन इसी में लगी रहे कि मेरा भाई हमेशा खुश रहे, वह मेरे ससुराल के समक्ष मेरा गौरव और सम्मान बनकर खड़ा रहे और भाई रिश्ते को पैसे से तौल रहा है! कल राखी थी, मेरी ननद को अचानक बाहर जाना पड़ा, मेरे पैर के नीचे से धरती खिसक गयी कि राखी कौन बांधेगा? लेकिन वह आ गयी। तब पता लगा कि जिनके बहने नहीं होती वे भाई इस प्यार को पाने से कितना वंचित होते होंगे! यह धागा प्रेम का है इसे पैसे से मत तौलो। यदि आज भी तराजू के एक पलड़े में राखी रख दोगे और दूसरे में तुम्हारा सारा धन तो भी पलड़ा हिलेगा नहीं, लेकिन यदि तुमने सम्मान का एक पैसा ही रख दिया तो पलड़ा ऊपर चले जाएगा। बहनें सम्मान के लिये होती हैं, इनसे पैसे का हिसाब मत करो, ये ऐसा अनमोल प्यार है जो दुनिया के सारे रिश्तों के प्यार से बड़ा है। इस रिश्ते पर किसी की आंच भी मत आने दो, भाई का सम्मान ही इस रिश्ते को किसी भी उलाहने से बचा सकता है। भाई का बड़प्पन भी इसी में है कि वह अपनी बहन को कितना सम्मान देता है।
मखौल में मत उड़ाओ इस रिश्ते को, यह भारत भूमि की अनमोल धरोहर है। जहाँ दुनिया अपनी वासना में ही प्रेम को ढूंढ रही है, वहीं भारत में यह अनमोल प्यार आज भी हम भाई-बहनों के दिलों में धड़कता है। पैसे को दूर कर दो, बस प्यार से बहन की मुठ्ठी में सम्मान रख दो, जैसे मेरी माँ के हाथ में रखा जाता था। इतना सम्मान दो कि आने वाली पीढ़ी भी उछल-उछलकर कहे कि आज हमारी बुआ आयी है, जैसे हम कहते थे। मुँह से बोले शब्द ही कभी मिटते नहीं तो भाई लोग तुम तो धमाधम लिखे जा रहे हो, बहनों के प्यार को पैसे से तौल रहे हो! हम बहनें तो नहीं तौलती पैसे से, हमें तो प्रेम का ही धागा बांधना आता है, हमने इसी धागे को राखी का रूप दिया है। जो सबसे सुन्दर लगता है बस हम वही धागा खरीद लेते हैं क्योंकि हम मानते हैं कि हमारा भाई भी इतना ही सुन्दर है।

#कुम्भलगढ़ जब बोल उठा

Written By: AjitGupta - Aug• 24•18

एक सुन्दर सी पेन्टिंग मेंरे सामने थी, लेकिन मुझे उसमें कुछ कमी लग रही थी। तभी दूसरी पेन्टिंग पर दृष्टि पड़ी और मन प्रफुल्लित हो गया। एक छोटा सा अन्तर था लेकिन उस छोटे से बदलाव ने पेन्टिंग में जीवन्तता भर दी थी। खूबसूरत मंजर था, हवेली थी, पहाड़ था, बादल था, सभी कुछ था लेकिन किसी जीवित का चिह्न नहीं था। दूसरे चित्र में कलाकार ने पैर के निशान बना दिये थे बस मेरी नजर में वह चित्र बोल उठा था। अचल प्रकृति को हम कितना भी सुन्दर चित्रित कर दें लेकिन मुझे उसमें खालीपन ही दिखायी देता है लेकिन जब कभी भी उसमें एक नन्ही चिड़िया ही आकर बैठ जाए, मेरे लिये वह दृश्य जीवन्त हो उठता है। अभी 15 अगस्त को कुम्भलगढ़ जाना हुआ, इसके पूर्व भी कई बार देखा है उस भव्य किले को लेकिन कभी उसकी बोली सुनाई नहीं दी। उस दिन रात को 7.30 बजे जब ध्वनी और प्रकाश का शो शुरू हुआ और पहाड़ों से टकराती आवाज गूंज उठी की मैं कुम्भलगढ़ हूँ तब लगा कि आज पूर्णता के दर्शन हो गये हैं।
मौन तपस्वी सा खड़ा कुम्भलगढ़ उस दिन अचानक बोल उठा, 2000 वर्ष पूर्व का इतिहास अचानक ही जीवन्त हो गया। कल्पना में सारे पात्र आकार लेने लगे। सम्राट अशोक के पौत्र ने इस पहाड़ पर आकर किसी मानव के पैरों को प्रतिष्ठित किया था, मुझे अशोक के काल का स्मरण हो आया कि किस सोच के साथ उनका यहाँ पदार्पण हुआ होगा! समय बीत गया और राजा हमीर का जीवन सामने आ खड़ा हुआ। फिर किला बोल उठा, बधाई गीत सुनायी दिये। लेकिन महाराणा कुम्भा ने सन् 1458 में इसे साकार रूप देकर जीवन्तता का नाम दे दिया – कुम्भलगढ़। किले की प्राचीर से, किले के हर पत्थर से आवाज गूंज रही थी कि मैं कल भी जीवित था और आज भी जीवित हूँ। कल तक मैं जनता की रक्षा कर रहा था और आज जनता मेरा यशोगान कर रही है। मेरे कल के कृतित्व को अपने हाथ से छूकर अनुभव कर रही है और हर कोने में झांककर उस इतिहास को अनुभूत कर रही है, जो उसका वर्तमान नहीं था। हजारों सैलानी आ रहे हैं, हम भी उनमें से एक थे, बेटे ने कहा कि कैसे बनाया होगा उस काल में यह किला! पहाड़ की ऊंची चोटी पर खड़ा होकर यह किला अपनी कहानी खुद कहता है, अपने भी आये और पराये भी आये लेकिन किले ने प्रजा की सदैव रक्षा की।
बस किले के साथ एक दुखद प्रसंग भी जुड़ा हुआ है जो दिल में बने नासूर की तरह लगता है। हमारे इतिहास को कलंकित करता है। किले की जो हवाएं इठला रही थी वे अचानक से स्तब्ध हो जाती है, सन्नाटा छा जाता है, जिस महाराणा कुम्भा ने मुझे अस्तित्व दिया उसी कुम्भा को सत्ता के लालच में बेटे ने तलवार से काट दिया। बेटा कहता है कि कब तक धैर्य धरूं, मेरा यौवन बीत रहा है और आपका अन्त नहीं होता और मन्दिर में ही तलवार उठ जाती है। जिस कुम्भा ने संगीत दिया, नृत्य दिया, वीरता दी, उसी कुम्भा को पुत्र ने अन्त दिया। पुत्र भी नहीं रहा लेकिन दुनिया को इतना कुछ देने वाले का भी ऐसा अन्त भारत के लालच की सच्चाई को दिखाता है। सत्ता का लालच कभी समाप्त नहीं होता, हर मजबूत किला यही कहता है और कुम्भलगढ़ भी यही कह रहा था।
लेकिन फिर कहानी आगे बढ़ती है, इसी किले ने बालक उदयसिंह को शरण दी, यहीं पर प्रताप और उनके पुत्र अमर सिंह का जन्म हुआ, यहीं से हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया, यहीं से दिवेर का युद्ध लड़ा गया। आखिर प्रताप ने विजय पायी और फिर कुम्भलगढ़ छूट गया। उदयसिंह ने उदयपुर बसा लिया और प्रताप ने चावण्ड को राजधानी बना लिया। अमर सिंह भी उदयपुर आ गये। चारों तरफ पहाड़ और एक पहाड़ पर किला, दुश्मन का पहुंचना नामुमकिन। आज भी वहाँ जाकर हमारा मोबाइल खामोश हो गया, नेटवर्क नहीं। लेकिन लोग आ रहे थे, शो के लिये कुछ बैंचें लगी थीं, हमने सोचा कि शायद दर्शक कम ही आते होंगे लेकिन जैसे ही 7.00 बजे, हलचल शुरू हो गयी, पंक्तियों पर कार्पेट बिछने लगे और देखते ही देखते पूरा मैदान भर गया। हम जो पसरकर बैठे थे अब सिकुड़ने लगे थे। चारों तरफ उत्सुकता थी, सभी इतिहास में जाने को उत्सुक थे। चारों तरफ सन्नाटा था और तभी पहाड़ों को चीरती हुई आवाज गूंज उठी कि मैं कुम्भलगढ़ हूँ। कथा आगे बढ़ती गयी और किले पर रोशनी होती गयी। अन्त में पूरा किला जगमगा उठा, आज विद्युत का प्रकाश है कल मशाले जलती होगी, आज मोटर गाड़ी की पीं-पीं है कल घोड़ों की टापे गूंजती होगी। किले और पूरे क्षेत्र को घेरती हुई 34 किलोमीटर की लम्बी दीवार पर जब घोड़े चलते होंगे और दीवार पर बने मोखों में बन्दूक लगाये सैनिक तैनात रहते होंगे तब कैसा मंजर होगा, बस यही कल्पना करते रहे और शौ समाप्त हो गया।