अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

human values / nuisance values

Written By: AjitGupta - Sep• 11•17

human values / nuisance values
विवेकानन्द के पास क्या था? उनके पास थे मानवीय मूल्य। इन्हीं मानवीय मूल्यों ( human vallues) के आधार पर उन्होंने दुनिया को अपना बना लिया था। लेकिन एक होती है nuisance value (उपद्रव मूल्य) जो अपराधियों के पास होती है, उस काल में डाकुओं के पास उपद्रव मूल्य था। सत्ता के पास दोनों ही मूल्य होते हैं, वे कभी मानवीय मूल्यों के आधार पर शासन करते हैं तो कभी उपद्रव मूल्य पर भी शासन करते हैं। अंग्रेजों ने यही किया था। यदि आज के संदर्भ में देखे तो देश के प्रधानमंत्री मानवीय मूल्यों पर शासन कर रहे हैं और मीडिया के पास उपद्रव मूल्य या न्यूसेंस वेल्यू है। मीडिया अपनी इसी ताकत के बल पर किसी ने किसी उपद्रवकारी को पैदा करता रहता है और देश के विपक्षी-दल इन उपद्रवकारियों को हवा देते रहते हैं। कांग्रेस के इतिहास में इन न्यूसेंस कारकों का योगदान बहुत है, कभी-कभी तो लगता है कि उनका शासन न्यूसेंस वेल्यूज को सिद्धान्त पर ही चला। कभी भिण्डरावाला को पैदा कर दिया तो कभी 1984 में सिखों का कत्लेआम कर दिया। वर्तमान में राहुल गांधी हर उस जगह पहुंच जाते हैं जहाँ न्यूसेंस वेल्यू की उम्मीद हो। केजरीवाल ने तो अपना राजनैतिक केरियर इसी सिद्धान्त पर खड़ा किया था। लेकिन जब पंजाब में जीती हुई बाजी हार गये तब लगा कि केवल न्यूसेंस वेल्यू से काम नहीं चलता। कम से कम राजनीति में तो नहीं चलता, हाँ डाकू या आतंकी बनना है तो खूब चलता है। और उस बन्दे ने सबक सीखा, चुप रहना सीखा। परिणाम भी मिला, दिल्ली में बवाना सीट जीत गये।
वर्तमान में मोदीजी पूर्णतया मानवीय मूल्यों के आधार पर शासन कर रहे हैं लेकिन विपक्ष और अधिकांश मीडिया उपद्रव मूल्यों पर डटे हैं। ये सारे मिलकर देश में सनसनी तो फैला देते हैं लेकिन हासिल कुछ नहीं होता। कुछ अतिवादी हिन्दू भी उपद्रव मूल्य हासिल करना चाहते हैं, जैसे शिवसेना ने किया है। अब गोवंश के नाम पर करने का प्रयास रहता है। दोनों मूल्य आमने-सामने खड़े है, जब उपद्रव मूल्य हावी हो जाते हैं तब मारकाट मचती है, लेकिन तभी लोगों के अन्दर के मानवीय मूल्य जागृत होने लगते हैं और शान्ति स्थापित होती है। लेकिन यह भी सच है कि यदि केवल मानवीय मूल्य ही एकत्र हो जाएं और उपद्रव-मूल्य ना हो तो मनुष्य बचेगा भी नहीं, क्योंकि प्रकृति तो कहती है कि बलवान ही शेष रहेगा। इसलिये किसके पास कितना हो, यह हम सभी को निर्धारित करना होगा। समाज के पास कितने मानवीय मूल्य और कितने उपद्रव-मूल्य हों तथा शासन के पास कितने हो, यह बहुत ही समझदारी का विषय है। आज के संदर्भ में हमें इस बात पर गौर करना ही पड़ेगा।

एक विपरीत बात

Written By: AjitGupta - Sep• 05•17

मुझे आज तक समझ नहीं आया कि – a2 + b2 = 2ab इसका हमारे जीवन में क्या महत्व है? यह फार्मूला हमने रट लिया था, पता नहीं अब ठीक से लिखा गया भी है या नहीं। बीजगणित हमारे जागतिक संसार में कभी काम नहीं आयी। लेकिन खूब पढ़ी और मनोयोग से पढ़ी। ऐसी ही न जाने कितनी शिक्षा हमपर थोप दी गयी। हम रटते गये और पास होते गये, बस। शिक्षा की आड़ में हमारा ज्ञान नष्ट होने लगा। रामायण, महाभारत या अनेक पौराणिक ग्रन्थ हमसे दूर हो गये और हम जीवन के व्यावहारिक ज्ञान से दूर हो गये। चरित्र निर्माण की पाठशाला होती है, ऐतिहासिक चरित्रों को पढ़ना। सदियों से हमारे पुरखों ने राम और कृष्ण जैसे चरित्रों को पढ़कर ही समाज का चरित्र निर्माण किया था। बचपन में हम सभी नाटकों का मंचन करते थे और उनके पात्र हमारे पौराणिक पात्र ही होते थे, हमें स्वाभाविक रूप से ज्ञान मिलता था और इसी ज्ञान के माध्यम से दुनिया को जानने की रुचि जागृत होती थी। जैसे ही रुचि जागृत हुई व्यक्ति स्वत: ही शिक्षित होने लगता था। फिर उसे रटने की जरूरत नहीं होती थी। लेकिन हम पर थोपी हुई शिक्षा हमारे ज्ञान को भी नष्ट कर देती है। हम एक विषय के जानकार अवश्य हो जाते हैं लेकिन शेष विषयों में ज्ञान शून्य रह जाते हैं।
मुझे याद नहीं की मैंने विधिवत शिक्षा का कब प्रारम्भ किया, बस कुछ दिन तीसरी कक्षा के याद हैं तो कुछ माह पांचवी कक्षा के। छठी कक्षा से ही पढ़ाई प्रारम्भ हुई और जब तक ज्ञान प्राप्ति की। मैं आज भी सफल व्यक्तियों के जीवन चरित्र को प्राथमिकता से पढ़ती हूँ। आप गाँव में जाइए, बच्चे बकरी के बच्चों के साथ खेलते मिल जाएंगे लेकिन स्कूल में दिखायी नहीं देंगे। उन्हें बोझ लगती है यह पढ़ाई। जैसे हमें समझ नहीं आ रहा कि बीज गणित का हमारे जीवन में क्या लाभ है, वैसे ही वे भी नहीं समझ पा रहे कि इस इतिहास-भूगोल का उनके जीवन में क्या लाभ है! यदि हम सात साल तक केवल पौराणिक कथानकों को ही मौखिक पढ़ाते रहें और उनका मंचन कराते रहें तो फिर बच्चों को शिक्षा की ललक जगेगी। शिक्षा उतनी ही होनी चाहिये जितनी हमें आवश्यक है, लेकिन ज्ञान की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। आज शिक्षक दिवस पर यदि हम ऐसे प्रयोग कर लें तो हमारे देश का स्वरूप बदल जाएगा। कोई भी बच्चा किताबों के तले दबकर आत्महत्या नहीं करेगा ना अपने दिमाग का संतुलन खोएगा। बहुत हो चुका घिसापिटा प्रयोग, अब नवीन सोच की जरूरत है। देखे किस युग में हम नवीनता की पहल करेंगे?

बतंगड़ या समाधान

Written By: AjitGupta - Sep• 01•17

हम अपने-अपने सांचों में कैद हैं, हमारी सोच भी एक सांचे में बन्द है, उस सांचे को हम तोड़कर बाहर ही नहीं आना चाहते। कितना ही नुकसान हो जाए लेकिन हमारी सोच में परिवर्तन नहीं होता, कभी हमें पता भी होता है कि हम गलत तर्क के साथ खड़े हैं तब भी हम वहीं खड़े होते हैं और उसके लिये भी कोई तर्क ढूंढ लेते हैं। भीष्म अपनी प्रतीज्ञा के साथ खड़े थे, सारा वंश नष्ट हो गया लेकिन वे परिवर्तित नहीं हुए, कर्ण भी अपनी मित्रता के साथ खड़े थे, सब कुछ नष्ट हो गया लेकिन वे परिवर्तित नहीं हुए। हम लेखक लोग जब कुछ लिखते हैं तो हम अपना बिम्ब बनाते हैं और उसी के अनुसार अपनी बात कहते हैं लेकिन यह आवश्यक नहीं कि पाठक उस बिम्ब को समझ ले, बस वह और कुछ समझ लेता है। दोनों ही हैरान हैं कि क्या लिखा गया और क्या पढ़ा गया! ऐसे ही हर व्यक्ति की अपनी मानसिकता है, उसने स्वयं को अपने दायरे तक सामित कर लिया है। अधिकांश व्यक्ति भेड़चाल के होते हैं, जो चलन में आ गया, बस वे भी वहीं चल देते हैं और इसके विपरीत यदि कोई दूसरी बात कह दें तो उसे कदापि नहीं मानेंगे।
कल जोधपुर मेडीकल कॉलेज के समाचार आ रहे थे, एक पत्रकार समझ ही नहीं पा रही थी कि भला कोई भी डॉक्टर असभ्य भाषा का प्रयोग कैसे कर सकता है? उस जैसे करोड़ो लोग इसी सत्य के साथ जीते हैं कि डॉक्टर जैसे पेशे वाले लोग बड़े ही सलीके वाले होते हैं। वे ऑपरेशन थियेटर में, जहाँ मरीज का पेट चिरा हुआ हो, कैसे आपस में गाली-गलोज करते हुए लड़ सकते हैं? करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि एक संन्यासी कैसे व्यभिचार कर सकता है! करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि जो भी मिडिया दिखा रहा है, भला वह झूठ कैसे हो सकता है! करोड़ो लोग इस सत्य के साथ जीते हैं कि भला न्यायपालिका कैसे व्यक्ति का जाति और धर्म देखकर न्याय कर सकता है! इसलिये जब समाज में कोई घटना घटती है तब सभी लोग अपने-अपने तर्क गढ़ लेते हैं और हम जैसे लोग जो समग्रता में विचार करते हैं, जब किसी घटना पर दूसरी तरह से विचार कर लेते हैं तब बतंगड़ बन जाता है। कोई यह नहीं कहता कि यह भी एक विचार है, इस पक्ष पर भी विचार करना चाहिये लेकिन सभी अपनी बात पर अडिग रहते हैं और केवल एक पक्ष को सत्य बनाने में तुल जाते हैं।
हम अपनी बात पर अड़िग रहते हैं लेकिन समस्या का समाधान नहीं ढूंढते। मुझे हमेशा ही समाधान ढूंढना पसन्द है इसलिये दूसरे मार्ग की भी बात करती हूँ। लेकिन जैसे ही दूसरी बात की और जलजला आ जाता है। आज यदि हम समाधान के लिये जुट जाएं तो देश अधिक सुन्दर होगा। जोधपुर में हुए काण्ड में मीडिया अपनी मानसिकता दिखा रहा था जब कि सत्य और कुछ था। परिणाम क्या होगा, किसी पर कोई आरोप सिद्ध नहीं होंगे। जितने भी इस देश में बाबा हैं, हम उन पर भी अपने-अपने तरीके से अरोप मढ़ते हैं। समग्रता में विचार नहीं करते कि इस परिस्थिति में समाधान कैसे निकालें। बस एकबारगी तो हो-हल्ला खूब हो जाता है लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकलता है। हमें समाधान की ओर बढ़ना चाहिये ना कि अपनी मानसिकता को साथ खड़े रहना चाहिये। कम से कम मीडिया, बुद्धिजीवि, कानून आदि को समग्रता के साथ ही रहना चाहिये, जिसमें देश हित हो वही कार्य करना चाहिये।

अब महिला के पक्ष में वोट बैंक आएगा

Written By: AjitGupta - Aug• 24•17

एक प्रसंग जो कभी भूलता नहीं और बार-बार उदाहरण बनकर कलम की पकड़ में आ जाता है। मेरी मित्र #sushmakumawat ने कामकाजी महिलाओं की एक कार्यशाला की, उसमें मुझे आमंत्रित किया। कार्यशाला में 100 मुस्लिम महिलाएं थी। मुझे वहाँ कुछ बोलना था, मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं क्या विषय लूं जो इन्हें समझ आ जाये! फिर मैंने कहा कि आज हम केवल बातचीत करते हैं और आपके जो प्रश्न हो उनको हल करने का प्रयास करते हैं। दो प्रश्न आए – पहला – तलाक-तलाक-तलाक कब तक और दूसरा बुर्का कब तक। वहाँ 100 महिलाओं में हर उम्र की महिला थी, अधिकांश पीड़ित थीं, तलाकशुदा थीं। हम उनका दर्द जानने का प्रयास कर ही रहे थे कि नीचे शोर मचा। तब मुझे बताया गया कि किसी महिला के कमरे में मौलवी घुसकर जबरदस्ती कर रहा है और महिला चिल्ला रही है लेकिन बचाने की हिम्मत किसी में नहीं है। तब मैंने इस बात को कई बार दोहराया कि मुस्लिम समाज में अवश्य क्रांति आएगी और महिलाओं के द्वारा ही आएगी। आज पहले प्रश्न का समाधान आ गया है बस दूसरा उसके सहारे ही हल हो जाएगा।
साहित्यिक महिलाओं की एक विचार गोष्ठी किसी परिवार में आयोजित थी, वहाँ महिला अधिकारों की बात हो रही थी। मुस्लिम बहन कह रही थी कि हमें कोई अधिकार नहीं हैं, हमारे नाम मकान नहीं है, कोई सम्पत्ती नहीं है। ताज्जुब तब हुआ जब हिन्दू बहने भी उसी रो में बहती दिखीं। मैंने कहा कि हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं है, मेरे नाम मकान है और पूरा घर मेरा है। मुस्लिमों की इस समस्या को हिन्दुओं की क्यों बनाते हो। महिला मुक्ति आंदोलन में यही स्थिति बनी। यूरोप में महिलाओं ने चर्च के खिलाफ मोर्चा खोला तो आग हमारे यहाँ भी लगी, जबकि भारत में ऐसा नहीं था। दोनों बातें सामने आयीं, एक ईसाई महिला पादरियों का शिकार हो रही थीं और दूसरा मुस्लिम महिला मौलवियों का शिकार बन रही थी। लेकिन लपेटे में हिन्दू समाज भी आ रहा था। हिन्दू समाज के सन्तों ने भी स्वयं को भगवान का दर्जा दिया और महिलाओं का शोषण करने का प्रयास प्रारम्भ किया। मुस्लिम समाज में भी जहाँ एक तरफ तीन तलाक का बोलबाला था तो हिन्दू समाज के पुरुष भी महिला को अपनी अनुगामिनी मानने लगे और सभी जगह अपना वर्चस्व स्थापित करने में लग गये।
इसलिये कल का दिन इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया है जब स्त्रियों को आजादी मिली है। प्रत्यक्ष आजादी मुस्लिम महिला को मिली है लेकिन अप्रत्यक्ष आजादी सभी को मिली है। जो अपराध समाज में बढ़ता जा रहा था और उसके छींटे सारे समाजों पर पड़ रहे थे, उससे समाज और देश को मुक्ति मिली है। हलाला को नाम पर यौन उत्पीड़न का दौर शुरू हुआ था जो हवस बनकर विस्तार ले रहा था। सारा महिला समाज असुरक्षित हो गया था, नन्हीं बच्चियां तक असुरक्षित हो गयी थीं। जब किसी एक वर्ग की तानाशाही समाप्त होती है तो बहुत सारे अपराध और जुल्म भी समाप्त होते हैं। यह विभेद बहुत पहले ही समाप्त हो जाता यदि शाहबानो के केस में राजीव गांधी महिलाओं के पक्ष में खड़े होते। आज मोदी जी का लाख-लाख धन्यवाद है कि वे महिलाओं के पक्ष में खड़े हुए और उन्हें न्याय मिलने के मार्ग में बाधक नहीं बने। हमारा उनको नमन। यह सृष्टि जितनी पुरुषों की है उतनी ही महिलाओं की है, किसी एक को इसे अपनी मन मर्जी से चलाने का हक नहीं है। अब महिला ने खड़ा होना सीख लिया है, वे अपने अधिकार लेकर ही रहेगी। धर्म के नाम पर महिलाएं कल यूरोप में पादरियों से मुक्त हुई थीं और आज भारत में मौलवियों से। अब महिला का स्वाभिमान लौटेगा और उसका यथोचित सम्मान समाज को देना ही पड़ेगा। जिन महिलाओं ने भी इस आंदोलन को लड़ा है उन्हें भी प्रणाम। इस आंदोलन से देश बदलेगा और सारे ही समीकरण बदलेंगे। अब वोट बैंक के लिये महिला का अधिकार नहीं छीना जाएगा। अब महिला के पक्ष में वोट बैंक आएगा।

हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है

Written By: AjitGupta - Aug• 19•17

मैं कहीं अटक गयी हूँ, मुझे जीवन का छोर दिखायी नहीं दे रहा है। मैं उस पेड़ को निहार रही हूँ जहाँ पक्षी आ रहे हैं, बसेरा बना रहे हैं। कहाँ से आ रहे हैं ये पक्षी? मन में प्रश्न था। शायद ये कहीं दूर से आए हैं और इनने अपना ठिकाना कुछ दिनों के लिये यहाँ बसा लिया है। पहले तो इन पक्षियों को कभी यहाँ नहीं देखा, बस दो-चार साल से ही दिखायी पड़ रहे हैं। सफेद और काले पक्षी, बड़े-बड़े पंखों वाले पक्षी। उड़ते हैं तो आकाश नाप लेते हैं और जब जल में उतर जाते हैं तो किस तरह इठलाते हुए तैरते हैं। इनका उड़ना, इनका लहराकर पेड़ पर बैठना कितना आकर्षक है! मेरे रोज का क्रम हो गया है इन पक्षियों को देखने का। मन करता है कि यहाँ से नजर हटे ही ना। इन बड़े पक्षियों के साथ नन्हीं चिड़ियाओं की दुनिया भी यहाँ बसती है। सैकड़ों की तादाद में आती हैं और इन्हीं तीन-चार पेड़ों पर अपना ठिकाना बना लेती हैं। शाम पड़ते ही इनका काफिला फतेहसागर की ओर चल पड़ता है, चहचहाट पूरे वातावरण को संगीतमय बना देती है। ये चिड़िया भी अपनी गौरैया नहीं है, कोई विदेशी नस्ल की ही दिखायी देती हैं। रात होने को है और अब चिड़ियाएं धीरे से उड़कर पेड़ के नीचे के हिस्से में चले गयी हैं, वहाँ सुरक्षित जो हैं। ये पेड़ मानों इन पक्षियों की हवेली है जिसमें नीचे की मंजिल में नन्हीं चिड़िया रहती हैं और ऊपर बड़े पक्षी।
गर्मी के दिनों में नन्हीं चिड़ियाएं दिखायी नहीं दे रही थी, शायद वे भी ननिहाल गयी होंगी! लेकिन जैसे ही मौसम सुहावना हुआ, ये लौट आयी हैं। बड़े पक्षी अपने देश नहीं लौटे और इनने अपना पक्का ठिकाना यहाँ पर ही बना लिया है। तभी आकाश में हवाईजहाज गरजने लगता है, न जाने कितने पक्षी दूसरे देश में बसेरा ढूंढने निकल पड़े होंगे! मेरी इस खूबसूरत झील में दुनिया जहान के पक्षी आए हैं अपना सुकून ढूंढने, ये लौटकर नहीं जा रहे हैं और इस जहाज में लदकर न जाने कितने बाशिंदे दूसरे देश में सुकून ढूंढ रहे हैं। तभी लगता है कि जीवन रीतने लगा है, इस पेड़ पर बड़े पक्षी हैं तो नन्हें पक्षी भी है। ये आपस में बतियाते तो होंगे, सारा वातावरण तो गूंज रहा है इनकी बातों से। लेकिन मन खामोश है, न जाने कितने घर खामोश हैं और शहर खामोश हैं। इन घरों की बाते रीत गयी हैं, यहाँ कोई बतियाने नहीं आता। घरों के पक्षियों ने दूसरे देश में सुकून ढूंढ लिया है। बूढ़े होते माँ-बाप पूछ रहे हैं कि किस पेड़ पर जीवन मिलेगा? क्या हमें भी अपना बसेरा उजाड़ना पड़ेगा? क्या हमें भी सात समन्दर पार जाना पड़ेगा? ये पक्षी तो मेरे शहर में आ बसे हैं लेकिन शायद मुझे इनका साथ छोड़ना पड़ेगा।
मनुष्य क्यों यायावर बन गया है, ये पक्षी शायद इन्हें यायावरी सिखा रहे हैं। अब मुझे क्रोध आने लगा है इन पर, तुम क्यों चले आये अपने देश से? तुमने ही तो सिखाया है मनुष्य को दूसरे देशों में बसना। तुम्हारा जीवन तो सरल है लेकिन हमारा जीवन सरल नहीं है, तुम्हारें पास लोभ नहीं है, संग्रह नहीं है, तुम छोड़कर कुछ नहीं आते। लेकिन हमें तो जीवन का हिसाब करना होता है। किस-किस माँ को क्या-क्या जवाब दूं कि परिंदों सा जीवन नहीं हैं हमारा। परिंदे जब उड़ते हैं तो आजादी तलाशते हैं, वे किसी झील को अपना मुकाम बना लेते हैं, जहाँ जीवन में सब कुछ पाना हो जाता है। ये परिंदे भी सबकुछ अपने पीछे छोड़कर आए हैं, इनके पीछे कोई नहीं आया। सभी के पेड़ निर्धारित हैं, सभी की झीलें निर्धारित हैं। कोई इस देश की झील में बसेरा करता है तो कोई पराये देश की झील में बसेरा करता है। मनुष्य कब तक स्वयं को दूसरों से अलग मानता रहेगा? घुलना-मिलना ही होगा हमें इन पक्षियों के साथ। इनके जीवन की तरह अकेले रहकर ही बनाना होगा अपना आशियाना। जब ये पक्षी अकेले ही जीवन जीते हैं तो हम क्यों नहीं! हमने घौंसला बनाया, परिंदों को पाला, लेकिन अब वे उड़ गये हैं। उन्हें उड़ने दो, अपना संसार बसा लेने दो। उनकी गर्मी-सर्दी उनकी है, हम किस-किस को अपनी छत देंगे? कब तक देंगे और कब तक देने की स्थिति में रहेंगे? वे भी हमें कब तक आश्वासन देंगे? यहाँ फतेहसागर की झील में कितने ही पक्षियों का बसेरा है, हम भी हमारे ही देश में इन परिन्दों की तरह बसे रहेंगे। पेड़ बन जाएंगे जहाँ पक्षी अपना बसेरा बना सके। इन जहाजों में जाने दो युवाओं को, उनको दूर देश की झील ने मोह लिया है लेकिन हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है।