अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

अकेली विदाई

Written By: AjitGupta - Feb• 05•18

आप सभी को पता है कि मैं अभी अमेरिका जाकर आयी हूँ और कारण भी पता है कि पुत्रवधु को पुत्र हुआ था इसलिये जाना हुआ था। लेकिन जैसे ही अमेरिका की टिकट कटाने की बात कहीं भी चलती है, हर आदमी पूछ लेता है कि जापा कराने जा रहे हो क्या? यदि हवाई यात्रा में जाने वालों और आने वालों से पूछा जाए तो आधे से अधिक का अमेरिका जाने का कारण यही जापा होगा। वहाँ चाहे कितना ही दुख देखना पड़े लेकिन भारतीय माता-पिता जाते अवश्य हैं। क्यों जाते हैं! वे परिवार में नव-आगन्तुक का स्वागत करने और पुत्रवधु को परिवार की अहिमयत बताने जाते हैं। लेकिन कठिनाई यह है कि अमेरिका वाले इस परिवार-भाव को नहीं मानते और कहते हैं कि इस कार्य के लिये अमेरिका क्यों आना? मुझसे भी इमिग्रेशन में पूछा गया कि क्यों आए हो? मैंने कहा कि बेटा है, इसलिये आना हुआ है। फिर दोबारा प्रश्न हुआ कि तो आना क्यों हुआ? मैंने फिर जोर देकर कहा कि बेटा है इसलिये ही आना हुआ। क्योंकि मुझे पता था कि वे इस कार्य के निमित्त आने वाले को पसन्द नहीं करते। वे कहते हैं कि हमारे यहाँ प्रसव की उत्तम सुविधा उपलब्ध है और इसमें किसी की भी सेवाओं की आवश्यकता कहाँ है? वे पति को पूरा दक्ष कर देते हैं। लेकिन अमेरिका में बसे बेटे को भी अपनी इज्जत का सवाल लगता है कि उसके घर से कोई आया और भारत में बैठे परिवारों को भी लगता है कि इस अवसर पर जरूर जाना चाहिये। नहीं तो परिवार का मायने ही क्या हैं? हम चाहे सात समन्दर दूर रहते हों लेकिन खून तो हमारा पुकारता ही है, हम नए परिवारजन को एक परिवार का पाठ पढ़ाने जाते हैं।
4 फरवरी को उदयपुर के एक वृद्धाश्रम के बारे में अखबार में खबर छपी, एक दम्पत्ती ने बताया कि उन्होंने तीन साल से अपनी संतान से बात नहीं की है। अचरज भी हुआ और दुख भी। समाचार-पत्र ने वृद्धाश्रम की खबर तो छाप दी लेकिन जहाँ घर-घर में ऐसे ही वृद्धाश्रम बनते जा रहे हैं, उनकी शायद ही किसी ने खबर ली हो। एक तरफ हवाई जहाज में वृद्धों की भीड़ बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ वृद्धाश्रम में भी लोग अकेले रहने पर मजबूर हो रहे हैं, साथ ही शहर के अनेक घर भी वृद्ध-कुटीर में बदलते जा रहे हैं। परिवार टूट गये हैं, एकतरफा रिश्ता निभाया जा रहा है। एक पीढ़ी नये का स्वागत करने लाख दुख देखकर भी परदेस जाती है लेकिन दूसरी पीढ़ी अन्तिम विदाई के लिये भी आना जरूरी नहीं समझती। पहले और आज भी अधिकांश परिवारों में मृत्यु एक संस्कार माना जाता है और मृत व्यक्ति की आत्मा की शान्ति के लिये पूरा परिवार एकत्र होता है। दूर-दूर से रिश्तेदार आते हैं, एक पीढ़ी अपना सबकुछ देकर विदा होती है तो उसे विदा करने के लिये सब जुटते हैं। 12 दिन साथ रहते हैं और जो पीछे छूट गया है उसे अकेलेपन के अहसास से दूर रखने का प्रयास करते हैं। लेकिन अब कहा जाने लगा है कि जितना जल्दी हो काम खत्म करो और जो आ सके वह ठीक नहीं तो किसी को परेशान मत करो। जाने वाला ऐसे जाता है जैसे उसका कोई नहीं हो, उसने किसी संसार की रचना ही नहीं की हो। तभी तो वृद्धाश्रम में रह रहे एक व्यक्ति ने कहा कि जब अकेले ही रहना है तो विवाह ही क्यों करना और इसलिये मैंने विवाह किया ही नहीं था। वृद्धों की इस व्यथा को कैसे सुलझाया जाए? क्या वाकयी वृद्धाश्रम में जीवन है या फिर केवल मौत का इंतजार। अभी तो लोग नये का स्वागत कर रहे हैं कहीं ऐसा ना हो कि फिर नये का स्वागत भी बन्द हो जाए और सब अकेले हों जाएं!

एकला चलो रे

Written By: AjitGupta - Feb• 04•18

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने हम सबको सिखा दिया कि – एकला चलो रे! हमें भी लगा कि बात तो ठीक है, दुनिया की किच-किच से अच्छा है एकला चलो रे। लेखन ही ऐसा माध्यम हमें समझ आया जिसमें एकला चलो रे, का उद्घोष हम कर सकते थे और फिर रवीन्द्र बाबू तो लेखक के नाते ही कहकर गये थे – एकला चलो रे। हमने मन बना लिया कि अब एकला चलो रे – ही को मंत्र बनाएंगे, लेकिन हम एकला तो एक कदम भी नहीं चल पाए। अपने लिखे को जब तक कोई पढ़े नहीं तब तक लिखने का फायदा क्या है? जैसे ही लोगों को पता लगा कि हम लिखते हैं, लोग हमें खुशी-खुशी अपनी संस्था में स्वागत करने लगे, दो चार बार तो हमें ठीक लगा फिर देखा कि यहाँ तो हमारी पहचान भारतीयता और हिन्दुत्व को ही गरियाया जा रहा है, कुछ लोग गरिया रहे हैं, बाकि चुप है, हम अकेले कुलबुला रहे हैं। हमें रास नहीं आया, समूह में रहना, फिर वही मंत्र अपना लिया एकला चलो रे। तब तक सोशल मीडिया का जन्म हो चुका था और हमने ब्लाग की राह पकड़ी। यहाँ भी तत्काल ही समूह बनने प्रारम्भ हुए और उनका भी वही मिजाज कि हिन्दुत्व को गरियाओ। हमें लगा कि ये तो हमें ही गरिया रहे हैं, हम फिर समूह से छिटक गए। उन दिनों फेसबुक का फैशन भी चल निकला था, हमने यहीं एकला चलो रे को साधने की सोची। लेकिन देखते क्या हैं कि जो लोग बाहर भारतीयता को गरिया रहे थे, वे यहाँ भी थे, लेकिन अन्तर इतना था कि एक दूसरा समूह भी था जो भारतीयता का समर्थन कर रहा था। हमने सोचा चलो लेखन जारी रह सकेंगा, लेकिन यहाँ भी पेच फंस गया। एक वर्ग भारतीयता को गिरयाने के एवज में सत्ता से टुकड़े पा रहा था तो दूसरे वर्ग को यह बात अखर रही थी। अब वे भी भारतीयता वाली सरकारों को धमकाने लगे थे, कि ऐसा करो तो हम तुम्हें माने नहीं तो तुम्हें गरियाएंगे। कुल मिलाकर बात यह थी कि वे भी टुकड़ा मांग रहे थे।
जो वर्ग सालों से खाया-पीया था, उसे समझ आ गया कि इनको हमारे उपयोग में कैसे ले जिससे हमारी सरकारों की दुकानदारी वापस बनी रहे। वे कुछ भी सुरसुरी छोड़ देते और सबसे पहले यह हिन्दुत्ववादी शेर उस सुरसुरी को लपक लेते और एक सुर में हुँआ-हुँआ करने लगते। जब खूब शोर मचा लेते तब समझ आता कि हमने क्या किया! फिर चुप हो जाते। सामने वाले को खेल समझ आ गया और वे जहाँ भी चुनाव होने होते, बस कोई न कोई जाल बिछा देते। हर प्रान्त में नया जाल, लेकिन मंशा एक। पंजाब, दिल्ली से लेकर गुजरात में यह प्रयोग कर लिया गया। अब राजस्थान, मध्य-प्रदेश – छत्तीसगढ़ की बारी है, प्रयोग शुरू हो गया है। ऐसे में हमारा मंत्र एकला चलो रे वापस लौटने की जिद कर रहा है। लेकिन अकेले लेखन कैसे हो? सारी सोशल मीडिया पर तो अपनों के ही खिलाफ फतवा जारी किया हुआ है। कदम-कदम पर छावनी बना दी गयी है, हम उसे ही अपना नेता मानेंगे जो हमें टुकड़े डालेगा। अब टुकड़े तो बड़े नेताओं को मिलेंगे लेकिन बेचारे छोटे कार्यकर्ता समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इनका खेल क्या है? बड़े कब एक हो जाएंगे और सत्ता की मलाई खाएंगे। खैर जिसकी जो इच्छा हो वह करे, लोकतंत्र है, हम तो अपनी अलख जलाते रहेंगे। जिसे भी भारतीयता और हिन्दुत्व याने खुद में स्वाभिमान दिखायी देता है, वह हमारे साथ आए, नहीं तो एकला चलो रे, का मंत्र तो साथ है ही। हम तो सामाजिक प्राणी है और समाज की ही बात करते हैं, इसलिये कभी भारतीयता की भी बात कर लेते हैं, देखते हैं हमारे साथ कौन आता है?

#TED याने टेकनोलोजी, एन्टरटेंटमेंट और डिजाइन

Written By: AjitGupta - Jan• 30•18

कल रिमोट को आगे-पीछे करते एक श्रेष्ठ कार्यक्रम पर आकर तलाश रूक गयी, देखा एक सम्भ्रान्त महिला अपने मन को दर्शकों के सामने अभिव्यक्त कर रही थी, पेशे से चिकित्सक थी और 71 वर्ष की आयु में भी दुनिया भर में अपनी सेवाएं दे रही थी, उनकी अन्तिम पंक्ति थी की मैं कभी रिटायर्ड नहीं होऊंगी। उनका बोलना नयी प्रेरणा दे रहा था लेकिन शायद समय सीमा से वे बंधी थी और जब उनकी बात समाप्त हुई तब सारे ही दर्शक उनके सम्मान में खड़े हो गये। मैंने उनके बारे में पहले कभी नहीं सुना था। इसके बाद आए जावेद अख्तर, उन्होंने शब्दों के रचना संसार की बात की। उन्होंने कहा कि मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक ही अन्तर है और वह है शब्दों की दुनिया। मनुष्य शब्दों के माध्यम से अपनी विगत धरोहर को हम तक पहुंचाता है और हम स्वयं को जान पाते हैं कि हमारी विरासत क्या है। इसी प्रकार कुछ वैज्ञानिक, कुछ समाज शास्त्री कुछ कलाकारों ने अपनी बात कही। मैं अभिभूत थी, दिल में तीव्रता से उतरने वाला कार्यक्रम था। अभी गूगल सर्च में जाकर पता किया कि क्या है कार्यक्रम का उद्देश्य।
TED याने टेकनोलोजी, एन्टरटेंटमेंट और डिजाइन। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों का प्लेटफार्म। रविवार को शाम 7 बजे स्टार प्लस पर आता है। कल शाहरूख खान होस्ट कर रहे थे। हो सके तो इसे अवश्य देखें। कार्यक्रम में जितने भी लोगों ने अपनी बात रखी उनमें से अधिकतर गुमनाम थे, वे दुनिया को ऐसा कुछ दे रहे हैं जो आज के पहले हमने कभी जाना नहीं। कितनी अजीब बात है कि हम फिल्मी कलाकारों को, खिलाड़ियों को जानते हैं लेकिन जो लोग हमारे जीवन को विज्ञान से आत्मसात कराते हैं उनके बारे में नहीं जानते, जो कला के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त होना सिखाते हैं, उनको हम नहीं जानते और जो नयी दुनिया बना देते हैं हम उन्हें नहीं जानते। दुनिया में इन क्षेत्रों में कितना कार्य हो रहा है, हम इन सबसे अनजान है बस खेल के मैदान पर कब मैच हार गये और कब जीत गये उसी का गम और खुशी मनाते रहते हैं या कौन सी फिल्म में किसने क्या रोल किया है, उसी पर सारा ध्यान केन्द्रित रखते हैं लेकिन दुनिया में कितना कुछ हो रहा है उसपर चर्चा भी नहीं करते। यदि हम बड़े कामों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे तब फिल्म और खेल हमारे लिये चिन्ता का विषय नहीं होंगे और ना ही किसी ने क्या कह दिया और मीडिया किस पर हल्ला मचा रहा है यह हमारे लिये मायने नहीं रखेगा।
जब हम एक साधारण व्यक्ति की उड़ान देखते हैं और साधारण तरीके से उसने समाज को क्या दे डाला है तब हम प्रेरित होते हैं कि हम भी कुछ कर सकते हैं, लेकिन आज जो मीडिया द्वारा रचित विवाद हैं उसमें हम भी केवल विवाद करने वाले बनकर रह गये हैं। रचना का संसार हमसे पीछे छूट गया है और हम सब खरपतवार सरीखे बन गये हैं, जिसकी जरूरत किसे भी नहीं है। हम यहाँ शब्दों को गढ़ने वाले लोग हैं, शब्दों का विशाल संसार हमारे पास होना चाहिये जिससे हम अपनी बात कह सकें साथ में दृष्टि भी होनी चाहिये कि हमें दुनिया को क्या नया देना है। दुनिया में जो है उसी को हमने परोस दिया तो वह सृजन नहीं है, वह तो नकल है। इसलिये शब्दों के भण्डार का भी विस्तार करे और अपनी दृष्टि का भी। कोशिश करें कि जो हम देख रहे हैं, वह नया हो, उसकी अभिव्यक्ति भी नयी हो, तब हमारे लेखन का भी औचित्य होगा नहीं तो नकल की राह पर हम चल पड़ेंगे। आप आगामी रविवार को कार्यक्रम देखें, हो सकता है आपको भी प्रेरित कर जाए। मेरा तो दिल से आभार।

यही अन्तर है पूरब और पश्चिम का

Written By: AjitGupta - Jan• 27•18

कभी-कभी ऐसा भी होता है जब आपके पास कहने को या लिखने को कुछ होता है लेकिन आप लिख ही नहीं पाते हैं! बस यही सोचकर रह जाते हैं कि पहले नकारात्मक पक्ष लिखा जाए या पहले सकारात्मक पक्ष, और इसी उधेड़बुन में गाड़ी छूट जाती है। खैर आज सोच ही लिया की अब और नहीं। कभी आप सभी ने अपने बचपन को टटोला है और यदि यह टटोलना भी अपनो के बीच हो तो आनन्द दोगुना हो जाता है। हमारी पीढ़ी का बचपन भी क्या था! आज जो साधन दिखते हैं, उसमें से एक भी तब नहीं था, इसलिये समय सभी के पास था। साधनों की चकाचौंध में खोए हुए हैं आज हम और उसमें डूबते जा रहे हैं, अब किसी की जरूरत नहीं! बतियाने की भी जरूरत नहीं और किसी की सहायता की भी जरूरत नहीं। मैं मेरे एक आत्मीय परिवार के साथ याद कर रही थी कि कैसे हम सब एक दूसरे के काम आते थे, एक घर में फोन हुआ करता था और सारे ही मौहल्ले को आवाज देकर फोन आया है, बुलाया जाता था। सारे ही मौहल्ले को दो कारों की सोवाएं प्राप्त थी। सारी ही अच्छी बातें हम कर रहे थे, लेकिन उन अच्छी बातों में भी जो बात निकलकर आयी वह मेरे लिये लिखने का कारण बन गयी। एक युवा ने कहा कि यदि हम आज करोड़ों रूपया भी खर्च कर दें तो वैसा जीवन लौटाकर नहीं ला सकते। उस पुराने जीवन की लिये ललक, जहाँ समृद्धि नहीं थी, माता-पिता का कठोर अनुशासन था, उस ललक को देखकर दिल में ठण्डक सी पड़ गयी। लेकिन तभी कई दूसरे युवक सामने आ खड़े हुए। अन्तर दिखने लगा एक पीढ़ी का, नजरिये का।
अमेरिका जब भी जाना हुआ, युवाओं से सामना होता रहा। मन तरस जाता था यह सुनने के लिये कि हमें वो जमाना याद आता है। लेकिन जब एक दिन एक युवा से सुना- अब भारत जाने का मन नहीं करता, मैं तो माता-पिता से कहता हूँ कि जब मिलने का मन हो तब आप ही चले आना। यह शब्द तीर की तरह चुभ गए और अभी तक मन में रिस रहे हैं। फिर सुनायी दिया कि भारत में अव्यवस्थाएं बहुत हैं इसलिये जाने का मन ही नहीं करता। कैसा है यह मन! जो अपने अतीत से पीछा छुड़ाना चाहता है! हमें तो अतीत को सहलाने में ही स्वर्ग सा आनन्द आता है। जहाँ समृद्धि नहीं थी, फिर भी उसमें हम खुद को खोज रहे हैं, जहाँ अनुशासन की दीवार इतनी सशक्त थी कि प्रेम कहीं खो जाता था, उसमें भी हम प्रेम खोजकर आनन्दित हो लेते हैं और विदेश के मोह में फंसी पीढ़ी जो समृद्धि के दौर में पैदा हुई है, उसके लिये बचपन का परिसर महत्व ही नहीं रखता! हम पड़ोस के किए सहयोग को याद करके उनका अहसान मान रहे थे और विदेश में बसी पीढ़ी अपनों का भी अहसान नहीं मानती। वह कहती है कि देखो मैंने कितनी उन्नति की है, मैं कहाँ और तुम कहाँ। मुझे बचपन का सबकुछ याद है, यहाँ के युवाओं को याद है, वे सभी कुछ तो गिना रहे थे लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं। मन तो कभी थपेड़े मारता ही होगा, वे तब क्या कहते होंगे मन को! जब मैं परिवार के बीच बैठकर पुराने बीते हुए कल में जी लेती हूँ तब लगता है कि यह समय यहीं थम जाए और जब पुराने को बिसराने की होड़ लगी होती है तब लगता है कि समय दौड़ जाए और मैं वहीं पुराने समय में चली जाऊं। एक कहता है कि करोड़ो रूपये में भी वह माहौल नहीं मिल सकता और अब सुन रही हूँ कि उस माहौल में जिया नहीं जाता। बस यही अन्तर है पूरब और पश्चिम का। सारी चकाचौंध के बीच अपनापन कहीं नहीं है, सभी साधनों को भोग रहे हैं, बस मशीन बन गये हैं। एक मशीन से उतरते हैं और दूसरी की ओर दौड़ पड़ते हैं। दौड़ रहे हैं, हाँफ रहे हैं लेकिन सुकून नहीं तलाश पा रहे। हम यहाँ ठहरे हुए हैं लेकिन कभी अतीत में खो जाते हैं तो कभी अपनों में खो जाते हैं और अतीत व अपनों के इस जीवन से मकरंद निकाल लाते हैं। हम खुश हैं कि हमारे पास हमारा अतीत है, अतीत के उस परिसर को हम छू सकते हैं, देख सकते हैं और पल दो पल उसके साथ होने का सुख बंटोर सकते हैं। बस तुम्हारे पास सुख के साधन हैं लेकिन खुशी के वे पल नहीं हैं। सुखी तो हर कोई हो सकता है लेकिन खुश कितने हो पाते हैं! हमारे पास खुश रहने और हँसने का कारण है और इस हँसी-खुशी को हम आपस में मिलकर दोहराते रहते हैं। हम समृद्धि से अधिक अपनों का साथ चाहते हैं और उनके योगदान को अपनी थाती मानते हैं। काश आज फिर मिल जाए, वही माहौल!

अद्भुत रिटर्न पॉलिसी

Written By: AjitGupta - Jan• 24•18

अद्भुत रिटर्न पॉलिसी

अभी अमेरिका में सर्दी का मौसम था, जबकि जून-जुलाई में भी हल्की सर्दी रहती ही है, लेकिन तब वहाँ कोई स्वेटर नहीं पहनता है। हम जैसे लोग स्वेटर पहनेंगे भी तो चाहकर भी नये स्वेटर खरीदे नहीं जाते क्योंकि बाजार में उपलब्ध ही नहीं है। लेकिन इस बार हमारी यात्रा में सर्दी थी और सारी ही दुकानें गर्म कपड़ों से भरी थीं, ऊपर से क्रिसमस के कारण सेल लगी थी तो खरीददारी का कोई ठिकाना ही नहीं था। हर दुकान पर भीड़, दीवाली पर हमारे यहाँ भी भीड़ होती है लेकिन हम ग्राहक की मर्जी का ख्याल नहीं रखते। एक बार खऱीद लिया तो खरीद लिया, परिचित दुकान होगी तो वापस होने की सम्भावना है नहीं तो मस्त रहो। लेकिन ग्राहक का मतलब क्या होता है, यह अमेरिका में पता लगता है। आपने कैसा भी सामान खरीद लिया है, आपको एक निश्चित अवधि में वापस करने की पूरी छूट रहती है, आपको पूरा पैसा वापस मिल जाएगा। जब सेल लगी हो तो हर कोई यह कहता है कि जितना सामान उठाना है उठा लो, घर जाकर पसन्द कर लो और जो पसन्द ना आए उसे वापस कर दो। हमें कुछ जर्किन खऱीदनी थी, तीन-चार खरीद ली और जब देखा कि यह पसन्द नहीं है तो वापस कर दी। ग्राहक को कभी नाराज मत करो, वहाँ का यही सिद्धान्त है। वापस करने के लिये भी मगजमारी नहीं है, आपने जैसे कोस्को से सामान लिया है तो आप किसी भी कोस्को की दुकान पर वापस कर सकते हैं। अब तो बिल की भी मारामारी नहीं है, आपने कार्ड से भुगतान किया है तो कम्यूटर में एन्ट्री देखी और सामान वापस। इसलिये वहाँ जनवरी मास वापसी का महीना ही कहलाता है। पूरा दिसम्बर खरीददारी और फिर जनवरी में तसल्ली से वापसी।
हमारे यहाँ एक बार सामान खऱीद लिया तो समझो आपके गले ही पड़ गया, कुछ नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग इस व्यवस्था का लाभ भी उठाते हैं और चीज काम लेकर वापस कर देते हैं लेकिन व्यापार में यह चलता है। मैं और बिटिया एक मॉल में गये, हमने कुछ स्वेटर खऱीदे थे और उनमें कितनी छूट थी यह हमें समझ नहीं आ रहा था। हमने अपनी पसन्द के स्वेटर ले लिये, जब बिलिंग के लिये गये तो एकाध स्वेटर में दाम अधिक लगाए गये, हमने कहा कि जिस लाइन में ये लगे थे, वहाँ इतनी कीमत थी। वह हमसे बाते करती रही और उसने यह जान लिया कि हम विजिटर है। वह बोली की मैं आपको 15 प्रतिशत डिस्काउण्ट दे दूंगी, जो कि हमारे यहाँ विजिटर को देते हैं। उसने बिना कुछ कहे हमें डिस्काउण्ट दे दिया था क्योंकि यदि कोई ग्राहक कीमत के लिये कुछ भी शंका करता है तो वह उसे निराश नहीं करते। ऐसे ही खरीददारी करते हुए हमारे पास चिल्लर एकत्र हो गये, जब हमें छोटे नोटों की आवश्यकता पड़ी तो हमने सारी चिल्लर सामने रख दी, क्योंकि हमें पता ही नहीं था कि किस का क्या दाम है! उसने अपने आप गिनी और शेष लौटा दी।
आपने अनुभव किया होगा कि आप यात्रा पर निकले हैं और रास्ते में खाना खाने के लिये किसी ढाबे पर रुके हैं, आपके पास साथ में खाना भी है लेकिन आप वहाँ बैठकर अपने साथ का खाना नहीं खा सकते लेकिन मुझे बड़ा ताजुब्ब हुआ एक रेस्ट्रा में यह देखकर कि वहाँ काफी मात्रा में टेबल-कुर्सी लगी थी और एक टेबल पर माइक्रोवेव, पानी, प्लेट्स, चम्मच आदि सारा ही सामान भी रखा था। आप आइए, बैठिये, अपना खाना निकालिये और गर्म करके खा लीजिये। ना, इसके लिये कोई शुल्क नहीं था। यह बस व्यवसाय करने का उत्तम तरीका था। किसी ने आपके लिये इतनी पुख्ता व्यवस्था की है तो आपका भी फर्ज बनता है कि आप वहाँ से कुछ तो खरीदेंगे ही। इसी को ही कहते हैं उत्तम व्यवसाय।
रास्ते में किसी भी दुकान पर रुककर आप टॉयलेट काम में ले सकते हैं, हमारे यहाँ केवल ऐसी व्यवस्था पेट्रोल पम्प पर मिलती है। कई बार तो पेट्रोल पम्प पर भी टॉयलेट ताले में बन्द होते हैं। लेकिन थोड़ा खुश आप भी हों ले, क्योंकि हम भी एक जगह पेट्रोल पम्प पर ही रुके और वहाँ टॉयलेट ताले में बन्द थे। हमने पास के दुकानदार से चाबी ली और प्रयोग किया। कहीं भी कोई भी टॉयलेट गन्दा नहीं मिलेगा, बस टॉयलेट पेपर जरूर बिखरे हुए मिल जाएंगे, इसके अतिरिक्त कोई गन्दगी नहीं और ना ही कोई बदबू। सभी को टॉयलेट का प्रयोग आता है। हमारे यहाँ करोड़ो देशवासियों ने तो टॉयलेट देखे भी नहीं हैं तो भला काम में लेना कैसे आएगा! चलो अब मोदीजी की कृपा से घर-घर में टॉयलेट तो बन गए हैं, देर-सबेर काम में लेना भी आ ही जाएगा फिर यात्रा के समय गन्दे टॉयलेट का सामना नहीं करना पड़ेगा। बहुत ही सभ्य तरीके से व्यापार होता है वहाँ, बस देखना यह है कि कहीं अराजक ताकतें इस व्यवस्था को चौपाट ना कर दें।