अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

आखिर प्रेम का गान जीत ही गया

Written By: AjitGupta - Jul• 26•19

एक फालतू पोस्ट के  बाद इसे भी पढ़ ही लें।

लोहे के पेड़ हरे होंगे

तू गान प्रेम का गाता चल

यह कविता दिनकर जी की है, मैंने जब  पहली बार पढ़ी थी तब मन को छू गयी थी, मैं  अक्सर इन दो लाइनों को गुनगुना लेती थी। लेकिन धीरे-धीरे सबकुछ बदलने लगा और लगा कि नहीं लोहे के पेड़ कभी हरे नहीं होंगे, यह बस कवि की कल्पना ही है। आज बरसों बाद अचानक ही यह पंक्तियां मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। कहने लगी कि कवि को ललकार रही हो! देखो तुम्हारे लोहे के पेड़ की ओर देखो! उस समय मैं अंधे कूप में डूब रही थी, मुझे दिख रहा था इस अंधकार में अपना भविष्य। तभी लोहे के पेड़ से हरी पत्तियां फूट निकली, देखते ही देखते तना हरा हो गया। असम्भव सम्भव बनकर सामने खड़ा था, मैं अन्धे कूप से डर नहीं रही थी अपितु मैंने मजबूती से हरे होते लोहे के पेड़ को थाम लिया था। अब अंधेरे में अकेले होने का संत्रास नहीं था, बस खुशी थी कि मेरा प्रेम जीत गया है, मेरा लोहे का पेड़ हरा हो गया है। कवि की कल्पना ने पंख ले लिये हैं और प्रेम के गान की आखिर जीत हो गयी है। अब गम नहीं, अब शिकायत भी नहीं, बस अब तो अंधेरे में भी जीवन को ढूंढ ही लूंगी।

आप समझ नहीं पा रहे होंगे कि क्या घटित हो रहा है मेरे जीवन में! लेकिन आज अपनी कहने का मन हो आया है। कैसे लोहे के पेड़ को हरे होंगे, कल्पना साकार हो उठी है! कहानी तो बहुत बड़ी है लेकिन एक अंश भर छूने का मन है, अमेरिका में बसे पोते का मन हुआ कि अब बड़ा हो रहा हूँ तो भारत आकर दादी और नानी के पास रहकर देखता हूँ। एक सप्ताह मेरे पास रहा, मैंने उसे मुक्त छोड़ दिया। उपदेश देने की कोई जिद नहीं और ना ही अपना सा बनाने का कोई आग्रह। वह खुश रहा और वापस लौट गया। माता-पिता ने देखा कि बेटा अचानक खुश रहना सीख गया है! मतलब हमारे लालन-पालन में कुछ अन्तर है। इधर मेरा जीवन अंधे कुए की ओर बढ़ने लगा, मैंने देखा की मेरे आंगन में लोहे का पेड़ खड़ा है, सारे प्रेम गीतों के बाद भी कोई उम्मीद नहीं है हरी पत्तियों की। बस सारे संघर्ष मेरे अपने है।

बेटे से बात होती है, वह कहता है कि हम गलत थे, मैं समझ गया हूँ कि खुशियाँ कैसे आती हैं। अपने  बेटे के चेहरे पर खुशियाँ देख रहा हूँ और अपने जीवन में बदलाव लाने का प्रयास कर रहा हूँ। तब मैंने कहा कि तुम्हारी नयी पीढ़ी ने सारे रिश्तों के सामने पैसे की दीवार खड़ी कर दी, रिश्तों को नहीं देखा बस देखा तो पैसे को, इसके लिये इतना और इसके लिये इतना। तुमने माँ से कहा कि तुम बहुत दृढ़ हो, सारे काम तुम्हारे, हमारा कुछ नहीं। घर के सभी ने कहा कि सारे काम तुम्हारे। मेरे ऊपर बोझ लदता चला गया और तुम सब मुक्त होते चले गये। लेकिन मैंने कभी हँसना नहीं छोड़ा, मैंने कभी अपना दर्द किसी पर लादना नहीं चाहा, बस प्रेम देने में कसर नहीं छोड़ी। इस विश्वास पर जीती रही कि लोहे का पेड़ शायद हरा हो जाए! विश्वास टूट गया लेकिन फिर भी जिद रही कि अपना स्वभाव तो नहीं छोड़ना। और एक दिन जब मैं अंधे कुएं में गिर रही थी, मैंने लोहे के पेड़ को थामने की कोशिश की अचानक ही देखा कि लोहे के पेड़ पर हरी पत्तियां उगने लगी हैं। मेरा परिश्रम बेकार नहीं गया है, अब मैं जी उठूंगी, अकेले ही सारे संघर्ष कर लूंगी क्योंकि एक सम्बल मेरे साथ आकर खड़ा हो गया है। मैं पैसे को हराना चाहती थी, लेकिन हरा नहीं पाती थी। मैं रिश्तों को जीत दिलाना चाहती थी लेकिन दिला नहीं पाती थी। हर हार के बाद भी जीतने का क्रम जारी रखती थी, मन में एक ही धुन थी कि गान तो प्रेम का ही गाना है, पैसे का गान नहीं। जिस दिन मेरे लिये काली रात थी, जिस दिन मैंने देखा कि मैं हार रही हूँ, लेकिन नहीं प्रेम कभी हारता नहीं और पैसा कभी जीतता नहीं। जैसे ही प्रेम जीता, पैसा गौण हो गया। पैसे के गौण होते ही सब कुछ प्रेममय हो गया। व्यक्ति अक्सर कहता है कि मैं क्या करूँ, कैसे करूँ? असल में वह पैसे का हिसाब लगा रहा होता है कि ऐसा करूंगा तो इतना खर्च होगा और वैसा करूंगा तो इतना! फिर वह अपने आपसे भागता है, खुशियों से भागने लगता है। इसी भागमभाग में दुनिया अकेली होती जा रही है, हम हिसाब-किताब करते रह जाते हैं और खुशियाँ ना जाने किस कोने में दुबक जाती हैं। पैसे कमाने के लिये हम  दौड़ लगा रहे हैं, अपनी मजबूरी बता रहे हैं लेकिन यही पैसा एक दिन हमारे लिये मिट्टी के ढेर से ज्यादा कीमती नहीं रह जाता है। सारे वैभव के बीच हम सुख को तलाशते रहते हैं। क्योंकि खुशियों की आदत ही खो जाती है। हरा भरा पेड़ कब लोहे का पेड़ बन जाता है, पता नहीं चलता। लेकिन मैं खुश हूँ कि मेरे लोहे के पेड़ पर हरी पत्तियां आने लगी हैं। आखिर प्रेम का गान जीत ही गया।

एक फालतू सी पोस्ट

Written By: AjitGupta - Jul• 21•19

जिन्दगी में आप कितना बदल जाते हैं, कभी गौर करके देखना। बचपन से लेकर जवानी तक और जवानी से लेकर बुढ़ापे तक हमारी सूरत ही नहीं बदलती अपितु हमारी सोच भी बदल जाती है। कई बार हम अधिक सहिष्णु बन जाते हैं और कई बार हम अधीर। बुढ़ापे के ऐप से तो अपनी फोटो मिलान करा ली लेकिन हमारी सोच में कितना बदलाव आया है, इसकी भी कभी गणना करना। मेरा बचपन में खिलंदड़ा स्वभाव था, अन्दर कितना ही रोना छिपा हो लेकिन बाहर से हमेशा हँसते रहना ही आदत थी। कठोर अनुशासन में बचपन बीता लेकिन अपना स्वभाव नहीं बदला। लेकिन जब जिन्दगी के दूसरे पड़ाव में आए तब स्वभाव बदलने लगा। जो काम कठोर अनुशासन नहीं कर पाया वही काम हमारी लकीर को छोटी करने का हर क्षण करते प्रयास ने कर डाला। नौकरी करना ऐसा ही होता है जैसे गुलामी करना, जहाँ गुलाम को कभी अहसास नहीं होने दिया जाता कि तू कुछ काम का है, वैसे ही नौकरी में हर क्षण सिद्ध किया जाता है कि तुम बेकार हो। हमें भी लगने लगा कि वाकयी में हम कुछ नहीं जानते। जैसे ही आपको लगता है कि आप कुछ नहीं जानते, बस उसी क्षण आपका खिलंदड़ा स्वभाव कहीं पर्दे के  पीछे छिपने लगता है। स्वाभाविकता कहीं खो जाती है। हम महिलाओं के साथ स्वाभाविकता खोने के दो कारण होते हैं, एक नौकरी और दूसरा पराया घर। नौकरी तो आप छोड़ सकते हैं लेकिन पराये घर को तो अपनाने की जिद होती है तो अपनाते रहते हैं, बस अपनाते रहते हैं। इस अपनाने में हम पूरी तरह अपना स्वभाव बदल देते हैं।

पराया घर तो होता ही है, हमें बदलने के लिये। तभी तो कहा जाता है कि इस घर में ऐसा नहीं चलेगा। इस संसार में हर व्यक्ति एक काम जरूर करता है और वह है कि दूसरे पर खुद को थोपना। जैसे ही हमें अंश मात्र अधिकार मिलता है, हम दूसरों को बदलने के लिये आतुर हो जाते हैं। बच्चों को हम अपनी मर्जी का बनाना चाहते हैं। पति पत्नी को अपनी राह पर चलने को मजबूर करता है और पत्नी भी पति को बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ती। हमारा प्रत्येक व्यक्ति से मिलना प्रेम और आनन्द के लिये नहीं होता, अपितु दूसरे को परिवर्तन के लिये होता है। हम हर क्षण दूसरे को प्रभावित करने की फिराक में रहते हैं।

हमने अपने जीवन में क्या किया? यदि इस कसौटी पर खुद को जाँचे तो बहुत सारी खामियाँ  हम में निकल जाएंगी। हम मुक्त नहीं कर पाते हैं। अपना अधिकार मान लेते हैं कि इन पर शासन करना हमारा अधिकार है। मैं बचपन को अनुशासन से इतनी संतृप्त थी कि मैंने प्रण लिया कि बच्चों को खुली हवा में सांस लेने दूंगी। वे जो बनना चाहे बने, जैसा जीवन जीना चाहे जीएं, मेरा हस्तक्षेप नहीं होगा। लेकिन फिर भी ना चाहते हुए भी हमने न जाने कितनी बातें उनपर थोपी होंगी। कई बार मैं आश्चर्य में पड़ जाती हूँ जब बच्चों के बीच होती हूँ। उनके पास शिकायत रहती ही है, जिसकी आपको कल्पना तक नहीं होती, वह शिकायत पालकर बैठे होते हैं। तब मैं और बदल जाती हूँ। घर परिवार के किसी सदस्य से बात करके देख लीजिये, उनके पास एक नई कहानी होगी। आप क्या सोचते हैं उसके परे उनकी कहानी है। आपकी करनी  पर उनकी कहानी भारी पड़ने लगती है और बदलने लगते हैं। आप चाहे बदले या नहीं, लेकिन मैं जरूर बदल जाती हूँ।

जिन्दगी भर देखा कि यहाँ हर व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति की तलाश रहती है, जिसे वह अपना अनुयायी कह सके, उसे अपने अनुरूप उपयोग कर सके। लेकिन कोई किसी को आनन्द के लिये नहीं ढूंढता है। मुझे यह व्यक्ति अच्छा लगता है, इसकी बाते अच्छी लगती है, इसकारण कोई किसी के पास नहीं फटकता बस उपयोग ढूंढता है। बहुत कम लोग  हैं जो जिन्दगी भर आनन्द का रिश्ता निभा पाते हैं नहीं तो उपयोग लिया और फेंक दिया वाली बात ही अधिकतर रहती है। मैं जब भी किसी व्यक्ति से मिलती हूँ तो मुझे लगता है कि मैं इसके लिये क्या कर सकती हूँ लेकिन मेरा अनुभव है कि अक्सर लोग मुझसे मिलते हैं तो यही सोचते हैं कि मैं इसका उपयोग कैसे ले सकता हूँ। मैं कुछ लोगों से प्रभावित होकर निकटता बनाने का प्रयास करती हूँ तो क्या पाती हूँ कि लोग मुझे अपना अनुयायी बनाने में जुट गये हैं। कुछ दिनों बाद वे अचानक ही मुझसे दूर हो गये! मैं आश्चर्य में पड़ जाती हूँ कि क्या हुआ! पता लगता है कि मुझे अनुयायी  बनाने की कुव्वत नहीं रखते तो किनारा कर लिया। ऐसे में मैं बदलने लगती हूँ।

मैं आज जमाने की ठोकरों से इतना बदल गयी हूँ कि अपना बदला रूप देखने के लिये मुझे किसी ऐप की जरूरत नहीं पड़ती, मुझे खुद को ही समझ आता है कि मेरा खिलंदड़ा स्वभाव कहीं छिप गया है। खो गया है या नष्ट  हो गया है, यह तो नहीं लिख सकती, बस छिप गया है। मन का आनन्द कम होने लगा है। रोज नए सम्बन्ध बनाने में रुचि नहीं रही, क्योंकि मैं शायद अब किसी के उपयोग की वस्तु नहीं रही। लेकिन फिर भी एकान्त में लेखन ही मुझे उस खिलंदड़े स्वभाव को याद दिला देता है, मन के आनन्द की झलक दिखा देता है और कभी कोई महिला हँसती हुई दिख जाती है तो सुकुन मिल जाता है कि अभी हँसी का जीवन शेष है।

सन्नाटा पसर रहा है, कुछ करिये

Written By: AjitGupta - Jul• 19•19

इतना सन्नाटा क्यों है भाई! आजकल  पूरे देश में यही सवाल पूछा जा रहा है। जिस देश को कॉमेडी शो देखने की लत लगी हो, भला उसके बिना वह कैसे जी पाएगा! हमारे लेखन के तो मानो ताले ही नहीं खुल रहे हैं, सुबह होती है और कोई सरसरी ही नहीं होती! हम ढूंढ रहे हैं, भाई राहुल गाँधी को, राहुल ना सही कोई और ही हो, कोई तो बयानवीर निकले। राज्यसभा तक में बिल पास हो रहे हैं! कल मैंने देखा कि सोनिया गाँधी तक मेज थपथपा रही थी, वह भी जोर-जोर से। मैं उस हाथ को तलाश रही थी कि अब आगे बढ़ेगा और सोनिया मम्मा को रोक देगा। लेकिन इतनी गहरी शून्यता! अब लिखे तो किस पर लिखें! देश मौन हुआ पड़ा है। औवेसी कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था कि हमारे अमित शाह जी ने अंगुली दिखाकर कह दिया कि तुम्हें अब सुनना पड़ेगा

मुझे रह-रहकर एक कहानी याद आ रही है। एक व्यक्ति के पिता की हत्या करके अपराधी मुम्बई भाग गया। बेटा हत्यारे के पीछे मुम्बई आ गया। मुम्बई की भीड़ में बेटा घबरा गया, सात दिन हो गये, ना हत्यारे का पता लगे और ना ही कोई बोलने वाला मिले! उसके होंठ सिल गये, जुबान हलक से चिपक गयी, वह बात करने के लिये तड़प गया। अचानक उसे हत्यारा दिखायी दे गया। वह भागा, चाकू उसके हाथ में था, लेकिन जैसे ही हत्यारे के नजदीक गया, चाकू दूर गिर गया और वह हत्यारे के गले लग गया। बोला कि भाई सात दिन से बात करने के लिये तरस गया हूँ। दुश्मनी गयी भाड़ में।

ऐसा ही हाल अपना है, शान्त झील में कंकर फेंककर हलचल मचाने की जुगतकर रही हूँ लेकिन नाकामयाब रहती हूँ। मोदीजी भी चुप है, मानो वह भी राहुल के जाने से गमनीन है! उनके पास नामजादा नहीं है और कोई भी नहीं है, उनका दर्द तो मेरे से भी ज्यादा है। कांग्रेस किसी को अध्यक्ष बना भी नहीं रही है, कलकत्ते से अधीर रंजन चौधरी आए थे, मुझे तो अच्छे लगे थे, उछल-उछलकर भाषण देते थे। बार-बार अपनी रस्सी की पकड़ को देखते भी जाते थे कि कितना उछलना है और कितना नहीं। लेकिन उनकी उछलकूद कुछ कम पड़ गयी है। सर्वत्र उदासी छायी है।

अब मोदीजी आपको ही कुछ करना होगा, ऐसे नहीं चलेगा। देश इस भीषण संकट में ज्यादा देर नहीं रह सकता। आप जानते ही हैं कि देश मतलब सोशल मीडिया है, यदि सोशल मीडिया में मंदी आ गयी तो शेयर मार्केट गिर पड़ेगा! लोगों को कॉपी-पेस्ट करने का मसाला नहीं मिल रहा है। आपको गाली देने का बहाना भी नहीं मिल रहा है। और ये क्या? आप दूसरे दल के बयानवीरों को भाजपा में मिला रहे हो! अब तो खामोशी के अतिरिक्त और क्या बचेगा?

मेरी तो विनती है कि बयानवीर-मंत्रालय बना दीजिये। दिनभर चहल-पहल रहेगी। मीडिया के सूने पड़े मंडी-हाउस में भी बहार आ जाएगी। कोई बकरा खरादेगा तो कोई बछड़ा खरीदेगा। न जाने कितने पहलवान दण्ड पेलते नजर आ जाएंगे। आप सभी की खामोशी ने देश को विदेशियों की तरफ मोड़ दिया है, कभी वे इमरान की और देखने लगते हैं तो कभी ट्रम्प की तरफ। पता नहीं आपने ऐसा क्या कर दिया है जो विदेशी भी सारे आपकी तरफ खड़े हो गये हैं, अब यह भी कहीं होता है कि 15 में से 15 वोट आपको मिल जाए, बस एक वोट इमरान को मिले। फिर ईवीएम फिक्स करने का आरोप लग जाएगा!

अभी राहुल का बयान आता तो कितना मसाला मिलता,  लेकिन उस बेचारे को आपने चढ़ती उम्र में ही संन्यास दिला दिया! कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक खामोशी बरकरार है। बस एक काफिला है जो चला आ रहा है आपकी तरफ। सारी नदियां समुद्र में मिलना चाह रही हैं! कल देखा था मैंने एक नजारा, हजारों पक्षी, लम्बी कतार में चले जा रहे थे, उनका अन्त नहीं था, बस कतार खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसी ही कतार चल पड़ी है आप की ओर, लोग आप में समा जाना चाहते हैं। यदि सभी कुछ मोदीमय हो जाएगा तो नीरस हो जाएगी जिन्दगी।

कुछ करिये, राहुल जैसों को वापस लाइए। नहीं तो आप ही कुछ बोल जाइए। देश तो आलोचना में सिद्धहस्त है, वे राहुल की जगह आपकी शुरू कर देंगे, बस उन्हें मौके की तलाश है। देश पहले उस फिल्म की तरह था जहाँ हीरो अलग था, विलेन था, कॉमेडियन था लेकिन अब हीरो ही सबकुछ हो गया है। देश को जब बोरियत होती है तो हीरो को ही विलेन बना देता है और हीरो को ही कॉमेडियन। लेकिन एक से काम नहीं चलेगा, आप मनाकर लाइए हमारे सोशलमीडिया के नेता को।

हम किसका दाना चुग रहे हैं!

Written By: AjitGupta - Jul• 17•19

आज जो हो रहा है, वही कल भी हो रहा था, हर युग में हो रहा था। हम पढ़ते आए हैं कि राक्षस बच्चों को खा जाते थे, आज भी बच्चों को खाया ही जा रहा है। मनुष्य और दानवों का युद्ध सदैव से ही चला आ रहा है। समस्याएं गिनाने से समस्याओं का अन्त नहीं होता अपितु समाधान निकालने से अन्त होता है। जंगल में राक्षसों का आतंक मचा था, ऋषि वशिष्ठ राजा दशरथ से राम को राक्षसों के वध के लिये मांगकर ले जाते हैं और राम राक्षसों का वध करते हैं। ऐसे ही पुराणों में सभी समस्याओं का समाधान है लेकिन हम केवल समस्याओं से भयाक्रान्त होते हैं, समस्या समाधान की ओर नहीं बढ़ते है। वशिष्ठ चाहते तो राजा दशरथ से कहते कि सेना लेकर राक्षसों का वध कर दें लेकिन उन्होंने अपने शिष्य  राम से ही राक्षसों का अन्त कराने का निर्णय लिया। बहुत सारी समस्याओं का अन्त सामाजिक होता है, हम समाज को जागृत करें, समाधान होने लगता है। जब समाज सो जाता है तब समस्याएं विकराल रूप धारण करती हैं। हम मनोरंजन के नाम पर जगे हुए हैं लेकिन अपनी सुरक्षा को नाम पर सोये हुएं हैं।

अमृत लाल नागर का प्रसिद्ध उपन्यास है – मानस का हंस। तुलसीदास जी की कथा पर आधारित है। तुलसीदास जी सरयू किनारे राम-कथा करते हैं लेकिन एक दिन पता लगता है कि आज रामकथा नहीं होगी! क्यों नहीं होगी? राम जन्मोत्सव के दिन औरंगजेब का फरमान निकल गया है कि आज रामकथा नहीं हो सकती। राम जन्मभूमि का विवाद तब भी अस्तित्व में था। तुलसीदास जी दुखी होते हैं लेकिन रामकथा करने का निर्णय करते हैं। गिरफ्तार होते हैं और छूटते भी हैं लेकिन वे समझ जाते हैं कि इस सोये समाज को जागृत करने के लिये कुछ करना होगा। वे रामचरित मानस की रचना करते हैं और गली-मौहल्लों में रामकथा का मंचन करने की प्रेरणा देते हैं। वे जानते हैं कि बिना समाज की जागृति के परिवर्तन नहीं हो सकता।

सोशल मीडिया समाज को जागृत करने का काम कर रहा है लेकिन इसके पास कोई सबल नेतृत्व नहीं है, यहाँ हमारी मुर्गी को कोई भी दाना डाल देता है और मुर्गी दाना चुगने लगती है। उसे पता ही नहीं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। लेकिन समाधान क्या? सन्त-महात्मा और हिन्दू संगठनों को दायित्व लेना ही होगा। डॉक्टर हेडगेवार जी ने सामाजिक संगठन बनाया था, यदि वे चाहते तो राजनैतिक संगठन बना सकते थे, वे कहते थे कि जब तक हिन्दू समाज संगठित और शिक्षित नहीं होगा, देश की समस्याएं दूर नहीं हो सकती हैं। उन्होंने सबसे पहले सामाजिक समरसता पर ध्यान दिया, वे जानते थे कि भारतीय समाज टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त है और यहाँ ऊँच-नीच की भावना प्रबल है। इसलिये पहले इस भावना को दूर करना होगा। लेकिन आजादी के बाद देखते-देखते 70 साल बीत गये, ऊँच-नीच की  भावना कम होने के स्थान पर बढ़ती चले गयी। वर्तमान में तो यह भावना पराकाष्ठा पर है। किसी भी समाज के महापुरुष ने सामाजिक समरसता के लिये गम्भीर प्रयास नहीं किये। हमारे यहाँ चार वर्ण माने गये हैं – ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रीय, शूद्र। यदि ये चारों एक स्थान पर बैठे हों तो चारों ही खुद को श्रेष्ठ और दूसरे को निकृष्ठ सिद्ध करने में लग जाएंगे। यहाँ तक भी साधु-सन्त भी यही करते हैं। ऐसे में हिन्दू समाज की रक्षा कैसे होगी? हिन्दू तो कोई दिखायी पड़ता ही नहीं! हम अभी तक दलितों को ब्राह्मण क्यों नहीं बना पाए? हमने अभी तक इस वर्ण व्यवस्था का एकीकरण क्यों नहीं किया? साधु-सन्त लखपति बन गये और जनता अनाथ हो गयी। सरकारें तो सेकुलर ही होती हैं लेकिन समाज तो हिन्दू-मुसलमान होते ही हैं ना! तब  हमने अपने समाज को दृढ़ क्योंकर नहीं किया। मुस्लिम समाज अपनी रक्षा के लिये संकल्पित है लेकिन हम बेपरवाह। आज राक्षसों का ताण्डव चारों ओर दिखायी दे रहा है लेकिन हमारा समाज निष्क्रिय सा बैठा है, वह जागता ही नहीं। कभी वह शतरंज में व्यस्त रहता है तो कभी तीतर-बटेर लड़ाने में, कभी कोठों में और आज क्रिकेट और फिल्मों में। इस समाज को जगाना ही होगा नहीं तो यहूदियों जैसा इतिहास हमारा भी होगा। हम भी मुठ्ठीभर बचकर इजरायल की तरह एक छोटे से भारत की स्थापना किसी कोने में कर लेंगे। हम अभी तो बस यह कर सकते है कि हमें दाना कौन डाल रहा है, हम किसका दाना चुग रहे हैं, इसका ध्यान रखें। हमें कोई भी दाना डाल देता है और बस मुर्गी की तरह दाना चुगने लगते हैं। हम कूंकड़ू कूं करने वाली मुर्गी ना बने।  

हम बड़े हैं, यही तो!

Written By: AjitGupta - Jul• 15•19

हम बड़े हैं, हम बड़े हैं यही तो! फोर्ड गाडी का विज्ञापन देखा ही होगा। सदियों से हमारी रग-रग में बसा है कि हम बड़े हैं, कोई उम्र से बड़ा है, कोई ज्ञान से बड़ा है, कोई पैसे से बड़ा है और कोई जाति से बड़ा है। बड़े होने का बहाना हर किसी के पास है। इस दौर में राजनेता कहते हैं – हम बड़े हैं, इसपर कानून के पहरेदार कहते हैं कि हम बड़े हैं। इन सबको पीछे धकेलते हुए पत्रकार कहते हैं कि हम बड़े हैं। जनता तो सबसे बड़ी है ही। बड़े होने का दर्प सभी को है लेकिन बड़े होने का उत्तरदायित्व किसी के पास नहीं है। मैं टीवी पर डीडी समाचार के अतिरिक्त दूसरे समाचार नहीं देखती हूँ, जागते रहो जैसी सनसनी फैलाने वाले समाचार बरसाती नालों की तरह होते हैं। कुछ दिन उफनते हैं फिर मिट्टी में मिल जाते हैं। लेकिन अपनी गन्दगी का प्रभाव छोड़ जाते हैं। मीडिया हाऊस केवल यह सिद्ध करने में लगे हैं कि हम बड़े हैं, हमारे पास शक्ति है, हमारी गाडी बड़ी है, हमें सारे अधिकार प्राप्त हैं। दो-तीन दिन से जो थूका-फजीती चल रही है उसके विपरीत कल डीडी न्यूज में एक समाचार था। कुछ मीडिया पर्सन विदेशों में जाकर भारत की किरकिरी कर रहे हैं, झूठ का आडम्बर रच रहे हैं। प्रसार भारती के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश ने कल जमकर मीडिया कर्मियों को लताड़ा। देश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है, संघ का एजेण्डा चल रहा है, सुप्रीम कोर्ट के जज तक संघ से ट्रेनिंग लेते हैं, आदि आदि। सारी दुनिया में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और पत्रकार स्वयं को  बड़ा सिद्ध करने में लगे हैं। बड़ा होना क्या होता है, यह इन्हें नहीं मालूम!

सदियों से इस देश की सबसे बड़ी समस्या यही रही है, हर वर्ग में बड़े होने की होड़ मची है, कोई ना कोई किसी ना किसी से बड़ा बन रहा है और नीचा दिखाने की मारकाट मचाने की जिद पर अड़ा है। अब तो सोशल मीडिया भी बड़ा बनता जा रहा है, अपना बड़प्पन दिखाने के स्थान पर बड़े होने की जिद इसे भी सवार है। किस समाचार को कितना दिखाना, कितनी प्रतिक्रिया करना, सोशल मीडिया भी भूलता जा रहा है। लग रहा है कि दो गाडियों की रेस है, दोनों एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में है। एक गाडी दूसरी को कट मारकर आगे निकल जाती है तो दूसरे का बन्दा चिल्लाता है कि वह कैसे हमें कट मार गया, हम बड़े हैं, उसे तू ने कैसे आगे निकलने दिया? बस हम भी ऐसे ही लगे हैं। तभी दूसरा विज्ञापन आता है, गाडी वाला घायल व्यक्ति को उठाकर गाडी में बैठाता है। हम घायल को वही छोड़ रहे हैं, समाज की समस्या का समाधान कैसे हो, कोई नहीं सोच रहा है बस बड़ा कौन है, सब यही सिद्ध करने में लगे हैं।

आजादी के बाद कुछ लोगों ने बड़े  होने का सर्टिफिकेट जारी करवा लिया, धीरे-धीरे वे किनारे होने लगे और 2014 के बाद काफी हद तक किनारे हो गये, बस सारा उत्पात यही से शुरू हुआ। क्या देश और क्या विदेश एक ही राग गाया जा रहा है कि देश बर्बाद हो रहा है। 20 करोड़ अल्पसंख्यकों पर जुर्म हो रहे हैं! कल सूर्य प्रकाश कहते हैं कि 10 साल तक देश में एक अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री था और उन्हें चलाने वाला रिमोट भी अल्पसंख्यक ही था, फिर कैसे अत्याचार हो गया? वे आगे कहते हैं कि भारत में एक अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति अत्याचार की बात करने वाले यह नहीं समझा पा रहे हैं कि दुनिया में इतने मुस्लिम देश होते हुए भी कैसे रोहिंग्या और बांगलादेशी भारत में ही शरण क्यों लेना चाह रहे हैं? यहाँ अत्याचार हैं तो शरण क्यों? हमने चूहों के लिये बिल्ली पाली, अब बिल्ली के लिये कुत्ता पाल रहे हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिये मी-लार्ड बिठाये, फिर मीडिया बनाया, लेकिन ना मी-लार्ड न्याय दे पाएं और ना ही मीडिया तटस्थ रह पायी। अब सोशल माडिया के रूप में एक और रक्षक तैनात किया है लेकिन वह भी अराजकता फैलाने में माहिर हो गया है। सब बड़े बन गये हैं, कोई बड़प्पन नहीं दिखा रहा है।