अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

लौकी-टिण्डे-तौरई से शिकायत नहीं!

Written By: AjitGupta - Mar• 26•20

आभास हो रहा है कि सभी को घर का भोजन रास आ रहा है! लौकी-टिण्डे-तौरई पर गाज नहीं गिर रही है! मंगोड़ी, कढ़ी आदि की पैरवी करते लोग घूम रहे हैं। रायता तो खूब फैला ही रहे हैं, नहीं-नहीं बना रहे हैं! ना चाइनीज याद आ रहा है और ना इटालियन याद आ रहा है, बस ढूंढ-ढूंढकर

भारतीय भोजन याद आ रहा है। नानी-दादी के जमाने के व्यंजन याद किये जा रहे हैं। रसोई आबाद हो रही है और बाजार बन्द हो रहे हैं। बाजार का स्वाद जीभ को याद भी आ रहा होगा लेकिन फिर ध्यान आता है कि नहीं घर की सिवैया ही स्वादिष्ट हैं।

रोटी अब मालपुएं जैसी लग रही है, बल्कि यूँ कहूँ कि रोटी पिजा से बेहतर स्वाद दे रही है। बाजरे की रोटी भी याद आ रही है, मक्की की, ज्वार की, मिस्सी की, सभी मुँह में पानी ला रही है। कोई भी बच्चा तक चूँ नहीं बोल रहा है! हवा में गूँज हो रही है कि भोजन मिल रहा है, खा लो, क्या पता कल यह भी मिले या नहीं। इस चुप सी गूँज को भी लोग सुन पा रहे हैं। अब कोई नहीं कह रहा कि सब्जी में नमक कम है और मिर्ची ज्यादा पड़ गयी है, बस स्वाद है इसी का स्वर सुन रहे हैं।

कल तक कुछ पति सास की भूमिका में थे, बेचारी सास तो पुरानी बात हो चली थी लेकिन उनकी जगह पतियों ने ले ली थी, अब वे भी जिन्न की तरह बोतल में उतर गये हैं। मटर आना बन्द हो गये हैं नहीं तो पतियों के हाथ में मटर छीलने का ही काम अवश्य रहता। मटर की जगह पालक ने ले ली है। पत्नी थाली में पालक रखकर दे रही है, जरा साफ कर दो। पति को चाकू पकड़ना सिखाया जा रहा है, वह ना-नुकर करने की कोशिश कर रहा है लेकिन पत्नी कह रही है कि नहीं जी यह तो सीख ही लो, क्या पता कल क्या हो! पति डरते-डरते चाकू पकड़ रहे हैं।

बच्चे पूछ रहे हैं कि मम्मी, पापा ने चाय बनाना सीख लिया क्या? मैं बात को टाल जाती हूँ, क्योंकि जो काम फैलेगा वह चाय बनाने से अधिक होगा। घर में बैठा आदमी चाय की तलब से भी अधमरा हो रहा है लेकिन जैसे ही ख्याल आता है कि चाय बनाने में एक अदद भगोनी काम आती है, चलनी भी लगती है तो भूल जाता है चाय को। पता नहीं देश में चाय की खपत बढ़ी है या घटी है, यह तो आप सभी बता पाएंगे। लेकिन इतना जरूर है कि नखरे कम हो चले हैं।

घर की महिला को तो पहले भी घर में ही रहना था, अब भी है तो खास फरक नहीं पड़ा है। करोड़ों ऐसी महिलाएं हैं जिनने महानगर नहीं देखें हैं, रेले नहीं देखी हैं। वे पहले भी घर में रहकर मंगोड़ी-पापड़ बना रही थी, अब भी बना रही है। लेकिन अब मंगोड़ी-पापड़ बना रही महिला को सम्मान की नजर से देखा जा रहा है। महिला को हेय दृष्टि से देखना बन्द हो गया है। उसका काम महान की श्रेणी में आता जा रहा है। मैं तो इस बात से खुश हूँ कि कहीं से भी लौकी-तौरई-टिण्डे के खिलाफ आवाज सुनाई नहीं दे रही है। हमारी प्रिय सब्जियाँ सम्मान पा रही हैं। पहले घर को सम्मान मिला फिर महिला को और अब सब्जियों को। बाजार और बाहर निकलने का डर अच्छा है। डरते रहो और खुश रहो।

मुट्ठी बांध लें

Written By: AjitGupta - Mar• 25•20

आज रात नींद नहीं आयी, न जाने कितनों को नहीं आयी होगी! महिलाएं कुछ सोच रही होंगी और पुरुष कुछ और! मुझे सारे काम एक-एक कर याद आ रहे थे, उन्हें व्यवस्थित करने का क्रम ढूंढ रही थी। लेकिन शायद पुरुषों को चिन्ता सता रही थी कि हाय! बाहर निकलना बन्द! देश के प्रधानमंत्री के माथे पर भी चिन्ता की लकीरें थीं, वे सारे देश को बचाने के लिये चिंतित थे। उन्हें पता है कि जनता बच्चे के समान है, इस जनता को घर में बन्द रखना बहुत कठिन काम है! लेकिन वे कर रहे हैं। हम भी जानते हैं कि पूरे घर को अकेले अपने कंधों पर लादकर ले जाना कठिन काम है, हम कह उठते हैं कि नहीं, हम से नहीं हो पाएगा। लेकिन मोदीजी नहीं कह पाते। मोदीजी को देखकर हमें हौसला आता है कि नहीं जब वे पूरे देश की चिन्ता कर रहे हैं तो हम केवल अपने परिवार की चिन्ता नहीं कर सकते?

अपनी बूढ़ी होती हड्डियों को टटोलती हूँ और पूछ लेती हूँ कि कितना जोश है? इन हड्डियों में ताकत तो शेष होगी लेकिन आराम की लत भी तो लगी है जैसे हम सब में घर से बाहर निकलकर तमाशा देखने की लता पड़ी हुई है, वैसे ही हड्डियों में भी लत लगी है। ये बड़े-बड़े घर अब आफत लगने लगे हैं। बंगलों की शान-शौकत अब जी का जंजाल बन गयी है। किसी के घर में कुत्ते हैं तो कहीं दूसरे पशु! घर में काम करने वाले दो हाथ और कैसे हो पशुओं का निर्वाह! नौकर-चाकर सब अपने घरों में कैद हो गये हैं और हम अकेले ही सारी दुनिया के संघर्षों का सामना करने को तत्पर हो रहे हैं।

रात नींद तो नहीं आ रही थी, लेकिन सड़कों का सन्नाटा भी अजीब सा भय पैदा कर रहा था। गाड़ियों के शोर में सारी ही आवाजों दब जाती थी लेकिन कल रात को सन्नाटे की आवाजें भी कान में टकरा रही थीं। चारों तरफ शान्ति थी, बस कहीं दूर कुत्ता बिलबिला रहा था। रात कान के पास मच्छर भी भिनभिना गया। मच्छर का आना तो ओर भी डरा गया, क्या पता इसकी भिनभिनाहट भी आज सुनायी दी या यह रोज ही शोर मचाता है!

लगभग एक माह तक सारे ही परिवारजन एक घर में बन्द रहेंगे। जब नया सवेरा होगा तब क्या दुनिया बदल जाएगी! सारी दुनिया कितनी बेगानी सी हो गयी थी तो क्या अब अपनेपन की खुशबू आने लगेगी! मेरे जैसे कितने लोग होंगे जो अपनेपन की बातें करने को तरस जाते होंगे, अब कर लो बातें जी भर के। पता नहीं मन का अहंकार कितनों का डटा रहेगा और कितनों का रफूचक्कर हो जाएगा। “मैं ही श्रेष्ठ हूँ” यह लेकर चलने वाले लोग क्या बदल जाएंगे? बात-बात में दूसरों को ठुकराने वाले लोग क्या सच में बदल जाएंगे? दुनिया ने देखा था कि जब हम 22 तारीख को एक साथ आए थे तब लोगों की आँखे  भर आयी थीं, शायद इस एकान्त की घड़ी में हम फिर अपना लें उन अपनों को जिन्हें हमने छोटा कहकर दुत्कार दिया था! यह देश और इस देश के लोग हमारा अपना खून हैं, हम सदियों से इन्हें अलग करते गये और इनकी आँखों में पानी भरते गये, लेकिन आज फिर हाथ बढ़ाने का अवसर आया है, हम सभी की आँखों से पानी पौंछ डालें। घर-घर में विभेद दिखायी देता है, आदमी-आदमी में विभेद दिखायी देता है, बस यह विभेद कम हो जाए, हम अपना लें अपनों को। मुट्ठी बांध लें।

अपने होने के लिये कभी घण्टी ना बजानी पड़े!

Written By: AjitGupta - Mar• 23•20

इटली में लोग मर रहे हैं, घरों की बालकनी में आकर बन्द गाड़ियों में जाते शवों को देख रहे हैं फिर उन्हें लगता है कि हमें किसने अभी तक बचाकर रखा है? वे सोचने लगते हैं और जो चेहरे सामने आते हैं, वे होते हैं डॉक्टर के, पेरामेडिकल स्टाफ के, पुलिस के, आर्मी के। और फिर घर से निकाल लाते हैं बर्तन, गिटार या जो भी मिल जाए। बजाने लगते हैं, आभार में उन सबके, जो सेवा कर रहे हैं, उन्हें बचाकर रख रहे हैं। मौत का सन्नाटा चारों तरफ फैल रहा है, जब इन घण्टियों की आवाजें चारों तरफ फैलने लगती है तब और घरों से भी ताली बज उठती है, घण्टी बज जाती है। कृतज्ञता क्या होती है, मनुष्य समझने लगता है। आँख से झरझर पानी बहने लगता है, सोचता है कि देखों इन लोगों को जो हमें बचाने के लिये रात-दिन लगे हैं, खतरों से खेल रहे हैं!

कई मौहल्ले ऐसे भी होंगे जहाँ लोग थाली बजाकर बता रहे होंगे कि हम है, यहाँ हम अकेले रह गये हैं! कितना दर्दनाक दृश्य होगा वहाँ! कल तक जहाँ खुशी के तराने बज रहे थे आज वहाँ मौत का सन्नाटा पसरा है। कोई इन फरिश्तों को दुआएं दे रहे हैं और कोई अपने होने का प्रमाण दे रहे हैं। कभी चौकीदार कहता था – जागते रहो और आज लोग कह रहे हैं जगाते रहो। घर में रहो और बताते रहो।

भारत के प्रधानमंत्री ने कहा कि इतने बड़े भारत में करोड़ों लोग फरिश्ते बनकर हम सब की सेवा कर रहे हैं, सभी को कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिये 22 मार्च को शाम 5 बजे घण्टे घड़ियाल बजा दो। आजतक भगवान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने के लिये हम शंखनाद करते हैं लेकिन आज इन देवदूतों के लिये भी शंखनाद कर दो। मोदी की बात दिल को छू गयी, लोग निकल पड़े घर की छत  पर और सारे गगन को गुंजायमान कर दिया। हमने आखिर आभारी होना सीख लिया।

भारत में कम ही लोग हैं जो किसी का आभार मानते हैं, किसी को श्रेय देते हैं, अक्सर लोग दूसरे को श्रेय देने में अपनी तौहीन मानते हैं, शायद कल कुछ लोगों ने ऐसा किया भी हो लेकिन भारत के अधिकांश लोग कृतज्ञ हुए। वे सेवा करने वाले हर उस इंसान के प्रति कृतज्ञ हुए जो हमें प्रकृति की मार से बचा रहा है और हमारी सेवा कर रहा है। वातावरण में कृतज्ञता की सुगन्ध आने लगी, आँखे नम हो गयीं। आँखे उस महान मोदी के लिये भी नम हो गयी जो हमारे लिये रात-दिन लगा है, आँखे हर उस व्यक्ति के लिये नम हो गयी जो इस दुख की घड़ी में हमें सांत्वना दे रहा है। हम भूल गये थे कि दुनिया सभी के सहयोग से चलती है, हमारा अहम् बहुत छोटा है, दुनिया का साथ बहुत बड़ा है। हम अकेले दुनिया में कुछ नहीं है, सब हैं तो हम हैं। सब के लिये हमेशा ताली बजाते रहिये, सभी की पीठ थपथपाते रहिये, प्यार देते रहिये और खुशियाँ बाँटते रहिये। न जाने कब हमें घण्टी बजाकर बताना पड़ जाए कि सम्भालों हमें, हम अभी शेष हैं। बस सभी को ऐसे ही कृतज्ञता ज्ञापित करते रहिये।

एकान्तवास की बातें

Written By: AjitGupta - Mar• 22•20

मैंने बचपन से ही स्वयं से खूब बातें की हैं, मुझे कभी एकान्त मिला ही नहीं! मैं कभी अकेली हुई ही नहीं! क्योंकि मेरे साथ मेरा मन और मेरी बातें हमेशा रहती हैं। जब भी कोई सामने नहीं होता है, मेरा मन फुदककर मेरे पास आ जाता है और बोलता है – चल बातें करें। दुनिया जहान की बाते हैं मेरे मन के पास, कभी कहता है चल अपनी ही सुध ले ले, कभी कहता है कि देख दुनिया में क्या हो रहा है! मन इस होड़ में लगा रहता है कि मैं कहीं पिछड़ ना जाऊं! दुनिया में जितनी बातें चलती हैं उनका पूरा का पूरा विश्लेषण मुझ से कराकर ही दम लेता है। वह कहता रहता है कि नहीं इस तरह से सोच, नहीं इस तरह से सोच।

अब दुनिया अपने में सिमट रही है, सारे ही अपने घरों में आ गये हैं। मानो पक्षी अपने घरों में लौट आए हों। जब पक्षी अपने घरौंदों में लौटते हैं तो जिस पेड़ पर उनका घरौंदा होता है, वहाँ कभी शाम को जाना हुआ है आपका? कितनी चहचहाट होती है वहाँ, मानो हर पक्षी होड़ में लगा है कि अपनी बात कह ली जाए! मैं तो जब भी ऐसे पेड़ों के नीचे होती हूँ तो लगता है जैसे अपने ही मन का कोलाहल सुन रही हूँ। बस सुनती रहती हूँ। अब घर भी उस पेड़ की तरह लग रहे हैं, कोलाहल से भरे हुए। सभी को कुछ कहना है, किसी को किसी की नहीं सुननी। जब हम स्कूल/कॉलेज से आते थे तो बस अपनी बहन के साथ शुरू हो जाते थे, जितना दिन भर मन के अन्दर भरा था, सब निकाल देते थे। घर में चहचहाट सी हो जाती थी। फिर नम्बर आया हमारे बच्चों का, तब भी वहीं होता था। पहले मैं, पहले मैं की रट लग जाती थी। दोनों ही बच्चे सुनाने के बेताब रहते थे। भोजन की टेबल से उठकर वे मेरी गोद में घुसने की कोशिश में रहते थे और बतियाते रहते थे। जैसे ही पतिदेव की नजर पड़ती, बोलते कि पिल्ले माँ के साथ पड़े हुए हैं।

उन दिनों सारा घर ही बातें करता था, दूसरे कमरे में सास होती, ननद  होती, देवर होते, सारे ही बतिया रहे होते। मेरा मन तब कहता कि इतना शोर है घर में, मुझ से बात करने का अवसर ही नहीं है तेरे पास! लेकिन मैं तो मन से बात करने का मौका ढूंढ ही लेती। फिर लगा कि लिखना शुरू कर दो तब मन बिल्कुल मेरे पास आकर बैठ जाता और बोलता कि मैं जो कहूँ बस वही लिखना है। मैं उसी की लिखती रहती। तब मन को ऐसा सुगम रास्ता मिल गया कि मैं जैसे ही एकान्त पाऊं और मन कह दे कि चल मेरी बात लिख! अरे बाबा यह क्या है! कुछ थम जा। चल तू बात करते रहे, क्या पता कुछ अच्छा मिल जाए।

मेरा घर तो बरसों से एकान्तवास ही है, मेरे मन का पूरी तरह से कब्जा है मुझ पर। अब तो लिखने को प्लेटफार्म भी है, बस मन बकबक करता रहता है और मैं लिखती रहती हूँ। मुझे एकान्त तो कभी मिलता  ही नहीं। मैं अपने मन के साथ हमेशा धूणी रमाए रहती हूँ। रात को जब सोने जाती हूँ तब मन को कई बार डाँटना पड़ता है कि चुप हो जा, अब सोने दे। यह भी फेसबुक की तरह रात-दिन बतियाना ही चाहता है कमबख्त! मेरे दिन तो एकान्तवास में ही कटते हैं इसलिये मैं तो मजे में हूँ, आपको भी कह रही हूँ कि अपने मन से  बतियाना सीख लो और इस एकान्तवास के मजे लूटो।

वह घर जो सपने में आता है!

Written By: AjitGupta - Mar• 20•20

मेरे सपने में मेरे बचपन का घर ही आता है, क्यों आता है? क्योंकि मैंने उस घर से बातें की थी, उसे अपना हमराज बनाया था, अपने दिल में बसाया था। जब पिता की डाँट खायी थी और जब भाई का उलाहना सुना था तब उसी घर की दीवारों से लिपटकर न जाने कितनी बार रो लेती थी। लगता था इन दीवारों में अपनापन है, ये मेरी अपनी है। कभी किसी कोने में बैठकर बड़े होने का सपना देखा था और कभी चोर-सिपाही तो कभी रसोई बनाने का खेल खेला था! अपने घर के ठण्डे से फर्श पर न जाने कितनी गर्मियों की तपन से मुक्ति पायी थी! जब बरसात सभी ओर से भिगो देती थी तब इसी की तो छाँव मिलती थी। ठण्ड में कुड़कते हुए किसी कोने में सिगड़ी की गर्माहट से यही घर तो सुखी करता था! क्यों ना सपनों में बचपन का घर आएगा!

मेरा अपना घर जो मैंने अपने सारे प्रयासों में बनाया था, कभी सपनों में नहीं आता! मैं रोज आश्चर्य करती हूँ कि कभी तो आ जाए यह भी, आखिर इसे भी तो मैंने प्यार किया है! लेकिन नहीं आता! वह किराये का मकान जो वास्तव में घर था, हमारे सपनों में आता है और जो हमारा खुद का मकान है वह हमसे सपनों में भी रूठ जाता है! शायद इसे हमने घर नहीं बनाया! हमने यहाँ बैठकर बातें नहीं की, हमने यहाँ सपने नहीं संजोएं। बस भागते रहे अपने आप से, अपनों से और अपने घर से। सुबह उठो, जैसे-तैसे तैयार हो जाओ और निकल पड़ो नौकरी के लिये! वापस आकर कहो कि चल कहीं और चलते हैं, किसी बगीचे में या किसी रेस्ट्रा में! घर तो मानो रूठ जाता था, अरे तुम्हारे पास मेरे लिये दो पल का वक्त नहीं है! मैं भी तो सारा दिन तुम्हारी बाट जोहता हूँ और तुम मेरे पास आकर बैठते तक नहीं!

बच्चे आते हैं उनके पास घूमने जाने की लिस्ट  होती है, घर फिर रूठ जाता है, कहता है कि इतने दिन बाद बच्चे आए और ये भी मेरे साथ नहीं बैठे! घर तो निर्जीव सा हो चला है, हमारी आत्माएं इसमें प्रवेश ही नहीं कर पाती हैं। घर के कान भी बहरे हो चले हैं और जुबान भी गूंगी  हो गयी है। आखिर बात करे भी तो किस से करे! घर में दो लोग रह रहे हैं अबोला सा पसरा रहता है। आखिर एक जन ही कब तक बोले, घर में सन्नाटा पसर जाता है। घर भी हमारे साथ बूढ़ा हो रहा है, थक गया है बेचारा। यह कहानी मेरे घर की नहीं है, हम सबके घर  ही कमोबेश यही कहानी है। बड़े-बड़े घर हैं लेकिन रहता कोई नहीं है, जो भी रहता है वह बातें नहीं करता, बच्चों की खिलखिल नहीं आती। दरवाजे बन्द है तो चिड़िया का गान भी नहीं आता। बस चारों तरफ खामोशी है।

आखिर कल मोदीजी ने कहा कि 60 साल वाले घर के अन्दर रहो, घर से बातें करो इसे अपना बना लो। बहुत छटपटाहट हो रही है, कैसे रहेंगे घर के अन्दर! मुझे अच्छा लग रहा है, मैं बातें करने से खुश हूँ। मैं घर की बातें लिख रही हूँ, घर को महसूस कर रही हूँ, घर को आत्मसात कर रही हूँ। सोच रही हूँ कि घर नहीं होता तो क्या होता! क्या हम  बातें कर पाएंगे? इस मकान को क्या अपना प्यारा सा घर बना पाएंगे? क्या यह घर भी हमारे सपनों में आएंगा? इस महामारी के समय प्रयास कर लो, इसे ही अपना बना लो, जो बातें कभी नहीं की थी, अब कर लो, न जाने कब किसका साथ छूट जाए! जब हम ना होंगे तो यह घर ही तो है जो हमारी कहानी कहेगा, इसलिये बातें कर लो।