अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

हम किसका दाना चुग रहे हैं!

Written By: AjitGupta - Jul• 17•19

आज जो हो रहा है, वही कल भी हो रहा था, हर युग में हो रहा था। हम पढ़ते आए हैं कि राक्षस बच्चों को खा जाते थे, आज भी बच्चों को खाया ही जा रहा है। मनुष्य और दानवों का युद्ध सदैव से ही चला आ रहा है। समस्याएं गिनाने से समस्याओं का अन्त नहीं होता अपितु समाधान निकालने से अन्त होता है। जंगल में राक्षसों का आतंक मचा था, ऋषि वशिष्ठ राजा दशरथ से राम को राक्षसों के वध के लिये मांगकर ले जाते हैं और राम राक्षसों का वध करते हैं। ऐसे ही पुराणों में सभी समस्याओं का समाधान है लेकिन हम केवल समस्याओं से भयाक्रान्त होते हैं, समस्या समाधान की ओर नहीं बढ़ते है। वशिष्ठ चाहते तो राजा दशरथ से कहते कि सेना लेकर राक्षसों का वध कर दें लेकिन उन्होंने अपने शिष्य  राम से ही राक्षसों का अन्त कराने का निर्णय लिया। बहुत सारी समस्याओं का अन्त सामाजिक होता है, हम समाज को जागृत करें, समाधान होने लगता है। जब समाज सो जाता है तब समस्याएं विकराल रूप धारण करती हैं। हम मनोरंजन के नाम पर जगे हुए हैं लेकिन अपनी सुरक्षा को नाम पर सोये हुएं हैं।

अमृत लाल नागर का प्रसिद्ध उपन्यास है – मानस का हंस। तुलसीदास जी की कथा पर आधारित है। तुलसीदास जी सरयू किनारे राम-कथा करते हैं लेकिन एक दिन पता लगता है कि आज रामकथा नहीं होगी! क्यों नहीं होगी? राम जन्मोत्सव के दिन औरंगजेब का फरमान निकल गया है कि आज रामकथा नहीं हो सकती। राम जन्मभूमि का विवाद तब भी अस्तित्व में था। तुलसीदास जी दुखी होते हैं लेकिन रामकथा करने का निर्णय करते हैं। गिरफ्तार होते हैं और छूटते भी हैं लेकिन वे समझ जाते हैं कि इस सोये समाज को जागृत करने के लिये कुछ करना होगा। वे रामचरित मानस की रचना करते हैं और गली-मौहल्लों में रामकथा का मंचन करने की प्रेरणा देते हैं। वे जानते हैं कि बिना समाज की जागृति के परिवर्तन नहीं हो सकता।

सोशल मीडिया समाज को जागृत करने का काम कर रहा है लेकिन इसके पास कोई सबल नेतृत्व नहीं है, यहाँ हमारी मुर्गी को कोई भी दाना डाल देता है और मुर्गी दाना चुगने लगती है। उसे पता ही नहीं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। लेकिन समाधान क्या? सन्त-महात्मा और हिन्दू संगठनों को दायित्व लेना ही होगा। डॉक्टर हेडगेवार जी ने सामाजिक संगठन बनाया था, यदि वे चाहते तो राजनैतिक संगठन बना सकते थे, वे कहते थे कि जब तक हिन्दू समाज संगठित और शिक्षित नहीं होगा, देश की समस्याएं दूर नहीं हो सकती हैं। उन्होंने सबसे पहले सामाजिक समरसता पर ध्यान दिया, वे जानते थे कि भारतीय समाज टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त है और यहाँ ऊँच-नीच की भावना प्रबल है। इसलिये पहले इस भावना को दूर करना होगा। लेकिन आजादी के बाद देखते-देखते 70 साल बीत गये, ऊँच-नीच की  भावना कम होने के स्थान पर बढ़ती चले गयी। वर्तमान में तो यह भावना पराकाष्ठा पर है। किसी भी समाज के महापुरुष ने सामाजिक समरसता के लिये गम्भीर प्रयास नहीं किये। हमारे यहाँ चार वर्ण माने गये हैं – ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रीय, शूद्र। यदि ये चारों एक स्थान पर बैठे हों तो चारों ही खुद को श्रेष्ठ और दूसरे को निकृष्ठ सिद्ध करने में लग जाएंगे। यहाँ तक भी साधु-सन्त भी यही करते हैं। ऐसे में हिन्दू समाज की रक्षा कैसे होगी? हिन्दू तो कोई दिखायी पड़ता ही नहीं! हम अभी तक दलितों को ब्राह्मण क्यों नहीं बना पाए? हमने अभी तक इस वर्ण व्यवस्था का एकीकरण क्यों नहीं किया? साधु-सन्त लखपति बन गये और जनता अनाथ हो गयी। सरकारें तो सेकुलर ही होती हैं लेकिन समाज तो हिन्दू-मुसलमान होते ही हैं ना! तब  हमने अपने समाज को दृढ़ क्योंकर नहीं किया। मुस्लिम समाज अपनी रक्षा के लिये संकल्पित है लेकिन हम बेपरवाह। आज राक्षसों का ताण्डव चारों ओर दिखायी दे रहा है लेकिन हमारा समाज निष्क्रिय सा बैठा है, वह जागता ही नहीं। कभी वह शतरंज में व्यस्त रहता है तो कभी तीतर-बटेर लड़ाने में, कभी कोठों में और आज क्रिकेट और फिल्मों में। इस समाज को जगाना ही होगा नहीं तो यहूदियों जैसा इतिहास हमारा भी होगा। हम भी मुठ्ठीभर बचकर इजरायल की तरह एक छोटे से भारत की स्थापना किसी कोने में कर लेंगे। हम अभी तो बस यह कर सकते है कि हमें दाना कौन डाल रहा है, हम किसका दाना चुग रहे हैं, इसका ध्यान रखें। हमें कोई भी दाना डाल देता है और बस मुर्गी की तरह दाना चुगने लगते हैं। हम कूंकड़ू कूं करने वाली मुर्गी ना बने।  

हम बड़े हैं, यही तो!

Written By: AjitGupta - Jul• 15•19

हम बड़े हैं, हम बड़े हैं यही तो! फोर्ड गाडी का विज्ञापन देखा ही होगा। सदियों से हमारी रग-रग में बसा है कि हम बड़े हैं, कोई उम्र से बड़ा है, कोई ज्ञान से बड़ा है, कोई पैसे से बड़ा है और कोई जाति से बड़ा है। बड़े होने का बहाना हर किसी के पास है। इस दौर में राजनेता कहते हैं – हम बड़े हैं, इसपर कानून के पहरेदार कहते हैं कि हम बड़े हैं। इन सबको पीछे धकेलते हुए पत्रकार कहते हैं कि हम बड़े हैं। जनता तो सबसे बड़ी है ही। बड़े होने का दर्प सभी को है लेकिन बड़े होने का उत्तरदायित्व किसी के पास नहीं है। मैं टीवी पर डीडी समाचार के अतिरिक्त दूसरे समाचार नहीं देखती हूँ, जागते रहो जैसी सनसनी फैलाने वाले समाचार बरसाती नालों की तरह होते हैं। कुछ दिन उफनते हैं फिर मिट्टी में मिल जाते हैं। लेकिन अपनी गन्दगी का प्रभाव छोड़ जाते हैं। मीडिया हाऊस केवल यह सिद्ध करने में लगे हैं कि हम बड़े हैं, हमारे पास शक्ति है, हमारी गाडी बड़ी है, हमें सारे अधिकार प्राप्त हैं। दो-तीन दिन से जो थूका-फजीती चल रही है उसके विपरीत कल डीडी न्यूज में एक समाचार था। कुछ मीडिया पर्सन विदेशों में जाकर भारत की किरकिरी कर रहे हैं, झूठ का आडम्बर रच रहे हैं। प्रसार भारती के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश ने कल जमकर मीडिया कर्मियों को लताड़ा। देश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है, संघ का एजेण्डा चल रहा है, सुप्रीम कोर्ट के जज तक संघ से ट्रेनिंग लेते हैं, आदि आदि। सारी दुनिया में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और पत्रकार स्वयं को  बड़ा सिद्ध करने में लगे हैं। बड़ा होना क्या होता है, यह इन्हें नहीं मालूम!

सदियों से इस देश की सबसे बड़ी समस्या यही रही है, हर वर्ग में बड़े होने की होड़ मची है, कोई ना कोई किसी ना किसी से बड़ा बन रहा है और नीचा दिखाने की मारकाट मचाने की जिद पर अड़ा है। अब तो सोशल मीडिया भी बड़ा बनता जा रहा है, अपना बड़प्पन दिखाने के स्थान पर बड़े होने की जिद इसे भी सवार है। किस समाचार को कितना दिखाना, कितनी प्रतिक्रिया करना, सोशल मीडिया भी भूलता जा रहा है। लग रहा है कि दो गाडियों की रेस है, दोनों एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में है। एक गाडी दूसरी को कट मारकर आगे निकल जाती है तो दूसरे का बन्दा चिल्लाता है कि वह कैसे हमें कट मार गया, हम बड़े हैं, उसे तू ने कैसे आगे निकलने दिया? बस हम भी ऐसे ही लगे हैं। तभी दूसरा विज्ञापन आता है, गाडी वाला घायल व्यक्ति को उठाकर गाडी में बैठाता है। हम घायल को वही छोड़ रहे हैं, समाज की समस्या का समाधान कैसे हो, कोई नहीं सोच रहा है बस बड़ा कौन है, सब यही सिद्ध करने में लगे हैं।

आजादी के बाद कुछ लोगों ने बड़े  होने का सर्टिफिकेट जारी करवा लिया, धीरे-धीरे वे किनारे होने लगे और 2014 के बाद काफी हद तक किनारे हो गये, बस सारा उत्पात यही से शुरू हुआ। क्या देश और क्या विदेश एक ही राग गाया जा रहा है कि देश बर्बाद हो रहा है। 20 करोड़ अल्पसंख्यकों पर जुर्म हो रहे हैं! कल सूर्य प्रकाश कहते हैं कि 10 साल तक देश में एक अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री था और उन्हें चलाने वाला रिमोट भी अल्पसंख्यक ही था, फिर कैसे अत्याचार हो गया? वे आगे कहते हैं कि भारत में एक अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति अत्याचार की बात करने वाले यह नहीं समझा पा रहे हैं कि दुनिया में इतने मुस्लिम देश होते हुए भी कैसे रोहिंग्या और बांगलादेशी भारत में ही शरण क्यों लेना चाह रहे हैं? यहाँ अत्याचार हैं तो शरण क्यों? हमने चूहों के लिये बिल्ली पाली, अब बिल्ली के लिये कुत्ता पाल रहे हैं। लोकतंत्र की रक्षा के लिये मी-लार्ड बिठाये, फिर मीडिया बनाया, लेकिन ना मी-लार्ड न्याय दे पाएं और ना ही मीडिया तटस्थ रह पायी। अब सोशल माडिया के रूप में एक और रक्षक तैनात किया है लेकिन वह भी अराजकता फैलाने में माहिर हो गया है। सब बड़े बन गये हैं, कोई बड़प्पन नहीं दिखा रहा है।   

कबीले ही कबीले खड़े क्यों नहीं करते?

Written By: AjitGupta - Jul• 02•19

घर में हम क्या करते हैं? या तो आपस में प्यार करते हैं या फिर लड़ते हैं। जब भी शान्त सा वातावरण होने लगता है, अजीब सी घुटन हो जाती है और हर व्यक्ति बोल उठता है कि बोर हो रहे हैं। हमारे देश का भी यही हाल है, कभी हम ईद-दीवाली मनाने लग जाते हैं और कभी हिन्दुस्थान-पाकिस्तान करने पर उतर आते हैं। दोनों स्थितियों में ही ठीकठाक सा लगता है लेकिन जैसे  ही शान्ति छाने लगती है, बस हम बोर होने लगते हैं। फिर कहते हैं कि कुछ और नहीं तो क्रिकेट ही करा दो। क्रिकेट करा दिया लेकिन हराना तो पाकिस्तान को है, कितनी बार हराएंगे! जैसे ही मौका मिला फिर से हरा दिया।

हम भारतीय भी अपनी ताकत भी दिखा देते हैं और सामने वाले को छोड़ भी देते हैं। हमारे अन्दर माफ करने का भाव कूट-कूटकर भरा है, दुश्मन को चारों खाने चित्त करके, उसके सीने पर तलवार रखकर, बोल देते हैं कि जा माफ किया। दुश्मन फिर आ टपकता है, हम फिर माफ कर देते हैं। समस्या को जड़ से खत्म नहीं करते। लेकिन जब कोई समस्या को उखाड़ने की कोशिश करता है तो अपनी नाराजी प्रगट कर देते हैं। हमारी क्रिकेट टीम ने कहा कि ना रहेगा बाँस और ना बजेगी बांसुरी, तो समस्या खत्म कर दी। अब हम सब कुलबुलाए जा रहे हैं कि मजा  ही नहीं आया। समस्या खत्म तो हम बोर!

हमने सारी बाते कर लीं, हर पहलू पर बात कर ली, लेकिन हमने इंग्लेण्ड को अपनी ताकत दिखाकर माफ कर दिया इसपर बात नहीं की। खेल ही खेल में कोई 300 रन कैसे बना सकता है! तीन-तीन मेडन ओवर डालकर, एक भी छक्का लगाए बिना 300 रन बनाना, हँसी खेल तो नहीं था! लेकिन हमने अंग्रेजों के सीने पर तलवार रख दी और कहा की माफ किया।

खेल दोनों के बीच चल रहा था लेकिन सफाया खरपतवार का हो गया। जब मैदान ही साफ हो गया तो हमारा बोर होना लाजिमी ही है ना! सुबह उठकर जब तक हम रोज दुश्मन को गाली ना दें लें, तब तक चाय तक हजम नहीं होती, अब बेकार में ही बोर हो रहे हैं। बोर होते-होते हम गलियों में ही डण्डे चलाने लगे, तोड़-फोड़ मचाने लगे। हमारे देश में तो खुद ही हिन्दुस्तान-पाकिस्तान मचा है, हमें सीमा पार जाने की जरूरत ही नहीं है, जब भी बोर होते हैं, यहाँ ही लठ्मलठ्ठा हो जाते हैं।

सरकारें कहती हैं कि छोटी-मोटी लड़ाई है, दो दिन में चुप बैठ जाएंगे लेकिन हम कहते हैं कि लड़ाई इस पार और उस पार की है, सरकारों को कुछ करना ही पड़ेगा। हम फेस बुक पर एक स्टेटस को कॉपी करते हैं और जाकर मन्दिर की लाइन में खड़े हो जाते हैं। हम वर्जिश तक नहीं करते कि कभी हमें भी लाठी उठाना पड़े तो तैयारी तो कर लें, लेकिन नहीं!

क्रिकेट टीम ने दरियादिली नहीं दिखायी तो हम रूठ गये, दरियादिली दिखाकर जीत जाते तो भी नाराज हो जाते, कहते कि क्या जरूरत थी? असल में हम प्यार करना तो भूल ही चुके हैं,  हम जब अपनों से ही प्यार नहीं कर पाते तो दूसरों से कहाँ कर पाएंगे! लड़ाई करने की  हिम्मत भी खो चुके हैं बस तू बचा तू  बचा का खेल खेलते हैं।

जब सरकार सेना को आदेश देकर सर्जिकल स्ट्राइक करा देती है तो ताली बजा लेते हैं, नहीं करा पाती तो बोर हो जाते हैं। बोर होते हैं तो गाली देने लगते हैं कि साले निकम्मे हैं। खुद कुछ नहीं करते। अभी देश में ऐसा ही माहौल है, राजनेता संसद में चीर फाड़ कर रहे हैं, सेना सीमा पर लेकिन हम यहाँ फेसबुक  पर चिल्ला रहे हैं कि सरकारें कुछ नहीं करती।

वे भीड़ बनकर निकल जाते हैं अपने घरों से और तुम दुबक जाते हों, अपने घरों में। कुछ ना कर सको तो कम से कम मौहल्ला समिति ही बना डालो, कुछ दण्ड पेल लो, वर्जिश कर लो। थोड़ा त्याग तो कर लो मेरे भाई। कमा-कमाकर क्यों कठफोड़वे जैसा आचरण कर रहे हो, कमाना बन्द करो और सुरक्षित रहना शुरू करो। कबीले ही कबीले खड़े कर दो, फिर देखना कौन तुम्हारे मन्दिर की ओर झांकने की हिम्मत करता है!

ना दीदी बची ना मैया, बाबा पड़े अकेले!

Written By: AjitGupta - Jul• 01•19

आजकल अपने राहुल बाबा बड़े सकते में हैं, अकेले राहुल बाबा ही नहीं सारा परिवार ही सकते में आ गया है। पहले क्या था कि गांधी परिवार खेत में दो-चार दाने डालते थे और दानों की जगह तेजी से खरपतवार उग आती थी तो वे सोचते थे कि देखों हमारे खेत में कितना दम है! लेकिन इस बार क्या हुआ कि जैसे ही राहुल बाबा ने हार-थककर, अपनी नाकामी को छिपाने के लिये रूठने का ढोंग किया तो उनके चारों ओर खरपतवार सरीखे उनके कार्यकर्ता भी सांत्वना को नहीं आए! किसी बन्दे ने यह तक नहीं कहा कि बाबा आप नहीं तो दीदी ही सही और दीदी नहीं तो मइया ही सही, बस यही चोट खा गया परिवार और सकते में आ गया।
दो चार जो इस खानदान की बगल में दबे पड़े रहते हैं, वे भी झूठ-मूठ का ही नाटक करते रहे लेकिन मुखर होकर कोई नहीं बोला कि बाबा आपके बिना तो हम अनाथ हो जाएंगे, आपके बिना भी जीना, कोई जीना है, लो हम भी आपके साथ ही धूणी रमा लेंगे। दिन में ही तारों का जमावड़ा आँखों के सामने आ गया, चक्कर से आ गये और तीनों लोकों के दर्शन एक साथ ही हो गये। रोज पूरा परिवार एक ही छत के नीचे एकत्र होता है, समस्या का कोई हल नहीं निकल पाता है लेकिन समस्या का विकराल रूप सामने आ-आकर डराने लगता है।
आखिर तीन दिन पहले विचार आया कि क्यों ना एक बार धमकी और दी जाए। धमकी दी कि मैं रूठ गया और तुम मनाने भी नहीं आये, मैं वापस आ रहा हूँ! पूरी पार्टी में भूचाल सा आ गया, बाबा की वापसी? इद्दी-पिद्दी को कहा गया कि इस्तीफा दो और कचरे के ढेर सा इस्तीफे का पुलिन्दा इकठ्ठा हो गया। बाबा ने कहा कि इस कचरे के ढेर का करूँ तो क्या करूँ! फिर समस्या वहीं की वहीं। 
बाबा अब दोराहे पर खड़े हैं, उन्हें थामने वाला कोई नहीं है। वापसी भी कर लेंगे तो इज्जत की वापसी कैसे होगी! पंजाब में तो मुझे पहले ही अमरिन्दर सिंह घुसने नहीं देता, अब तो राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी घुसने के लाले पड़ जाएंगे! इन दोनों को ही मैं बली का बकरा बनाना चाह रहा था लेकिन इन्होंने गर्दन को ऊपर-नीचे किया ही नहीं, बस पेण्डुलम की तरह चलाते रहे! 
वैसे भी कमलनाथ तो डेढ़ स्याणा है, 1984 में जमकर खून खराबा भी करा दिया और अब मुख्यमंत्री भी बनकर बैठ गया। अपने बेटे को भी चुनाव जिता दिया, यह अब मेरे चाळे क्या लगेगा! और वह अशोक गहलोत! दिखने में ही मेमना लगता है लेकिन है बहुत घाघ, मैंने साफ-साफ कहा कि तेरे बेटे के कारण हम हारे हैं लेकिन बन्दा टस से मस नहीं हुआ! 
बहना के नाम पर भी कोई आवाज नहीं उठी! एक बार में ही उसकी इज्जत का फलूदा निकल गया! थोथे चने जैसी पच करके फूट गयी! उसने भी हद ही कर दी थी, उसे मोदी को ऐसा नहीं बोलना चाहिये था! अब इतनी अक्ल तो उसमें होनी ही चाहिये थी कि मेरे देखा-देखी ना करे, मुझे तो सभी जानते हैं कि मैं एक नम्बर का गया गुजरा हूँ, लोग बस झेल रहे थे, लेकिन बहना को तो ध्यान रखना ही चाहिये था! जीजा के कारण लोग वैसे ही खाल उतारने को तैयार बैठे थे और इसने सूखी घास में तीली लगा दी!
लेकिन इतना बड़ा साम्राज्य ऐसे ही छोड़ा नहीं जा सकता है, इतने सारे इस्तीफों का जो ढेर लगा है, उसे ही बहाना बना लिया जाए कि लोग कितना प्यार करते हैं, मुझे! वापस लौट चलते हैं अपने सिंहासन पर। इज्जत की ऐसी-तैसी, वैसे भी कौन सी है! जेल में सड़ने से अच्छा है कि बे-गैरत होकर सिंहासन पर वापस बैठ जाता हूँ। ममा से भी नहीं पूछ सकता क्योंकि सत्ता जहर है, वह तो पहले ही यह बता चुकी हैं। उहापोह में पड़े हुए हैं बाबा! वापसी का कोई रास्ता दिखायी दे नहीं रहा है! 
उधर से तस्वीरे आ रही हैं मोदी की! पुतिन उनको सुनने को उतावला हो रहा है, ट्रम्प भी कैसे बैठा था मोदी के सामने! शी जिनपिंग ने भी दोस्ती का हाथ थाम रखा था। मोदी जापान में ऐसे घूम रहा था जैसे सबका नेता वही हो! मैं तो चींटी बराबर भी नहीं हूँ इसके सामने, मुझे अब कोई भी मसल देगा! हे यीशू मसीह अब तू ही पार लगा। मैं जाऊँ तो कहाँ जाऊँ? तेरी तरह सूली पर लटकना नहीं चाहता, अफलातून सा घूमना चाहता हूँ। ना कोई जिम्मेवारी हो और ना ही जवाबदेही बस राज ऐसा हो। इसबार मुश्किल घड़ी है, दीदी का बुलावा नहीं है, मैया का भी नहीं है, बस मैं कुरुक्षेत्र में अकेला खड़ा हूँ! दया कर प्रभु!

नेहरू – शेख अब्दुल्ला और कश्मीर?

Written By: AjitGupta - Jun• 30•19

किताबों के पन्ने पलटने का खेल बहुत खतरनाक है, वह भी इतिहास की किताबें। अब इतिहास तो तुम्हारे पुरखे ही लिख गये थे, तुम्हारे अपने लोग ही बता गये कि उनके काल में क्या घटा था! बस तुमने कभी पढ़ा नहीं और आज ये पढ़कर आ गये। जैसे-जैसे इतिहास के पन्ने पलटते गये, संसद में मौन पसरता गया। बेचारा मनीष तिवारी, कभी मणिशंकर, दिग्गी चाचा से भी बड़ा नाम हुआ करता था, आज मायूसी से घिरा था। एक कोन में अपने अधीर बाबू भी चुप लगाए बैठे थे। गाय-बछड़ा तो शायद जगंल की सैर पर गये थे। वैसे भी उन्हें भारत के इतिहास का पता नहीं, वे तो गाली देकर ही काम चलाया करते हैं तो भला ऐसी गम्भीर चर्चा के समय उनका काम भी नहीं था! कश्मीर के इतिहास पर प्रकाश डाल रहे थे अपने अमित जी, साथ में थे जितेन्द्र जी। कश्मीर की बात आएगी तो नेहरू सबसे पहले आएंगे ही, शेख अबदुल्ला का नाम भी लिया ही जाएगा। कैसे नेहरू ने हरिसिंह के हस्ताक्षर के बाद भी कश्मीर को विवाद का विषय बना दिया, यह बात तो बढ़-चढ़कर आएगी ही! जिस शेख अब्दुल्ला को नेहरू ने 16 वर्ष तक कैद रखा, उसे पलक झपकते ही उनकी बेटी इन्दिरा ने कैद से मुक्त कर दिया और मुख्यमंत्री भी बना दिया! आज संसद में शोर मचा रहे थे कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव क्यों नहीं करवाते? ये सोचते हैं कि लोकतंत्र के मायने कांग्रेस की जेब है, जब जेब से पर्चा निकाला और कभी फाड़ दिया और कभी अभय दे दिया! 
हमारे अमित भाई शाह ने बताया कि तुम्हारे नेहरू ने क्योंकर युद्धविराम कराया था? तो हमारे नेता का नाम मत लो, नाम मत लो, का शोर मच गया। अभी दो दिन पहले ही शोर मचा था कि हमारे नेता का नाम क्यों नहीं लिया, क्यों नहीं लिया! भाई लोगों तय तो कर लो कि नेहरू का नाम लेना है या नहीं! देश का विभाजन नेहरू कराए, उसमें लाखों लोग का कत्ल हो जाए लेकिन नेहरू महान कहलाएं, यह तो अचम्भे की बात है! 563 रियासतों का भारत में विलीनीकरण सरदार पटेल कराए और कश्मीर नेहरू अपनी मुठ्ठी में रख ले फिर विवाद का विषय बना दे, लेकिन उनके वारिस कहें कि जिक्र मत करो, यह तो घोर अचम्भे की बात है! नेहरू की वंशावली का देश में जिक्र ना हो, हम विवाह भी करते हैं तो सप्तपदी के समय पण्डित जी सात पीढ़ियों का नाम पूछते हैं लेकिन यहाँ देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाता है और दो पीढ़ी का नाम भी पता नहीं! कैसे विश्वास कर लें हम की तुमने और तुम्हारे नेहरू ने आजादी के समय ही कश्मीर का सौदा भी नहीं किया हो! इतिहास के पन्नों की खुदाई होनी चाहिये, गम्भीरता से होनी चाहिये कि आखिर नेहरू कौन था और उसने क्या-क्या कारनामें किये थे? सुभाष बोस पर उनका व्यवहार संदेह के घेरे में हैं, आजादी के नाम पर बंटवारे का खेल संदेह के घेरे में है और कश्मीर का खेल संदेह के घेरे में है। ऐसे छोटे-मोटे अनेक खेल संदेह के घेरे में है। कैसे सरदार पटेल और राजेन्द्र बाबू जैसे विशाल व्यक्तित्व हमारे पास थे फिर भी नेहरू को देश सौंप दिया गया, इसकी गम्भीरता से पड़ताल होनी चाहिये। इन पाँच सालों में देश के सामने दूध का दूध और पानी का पानी होना ही चाहिये। नेहरू के नाम पर संसद में शोर मचाने वालों को मुँहतोड़ जवाब देना चाहिये। आज देश गम्भीर साम्प्रदायिक तनाव से गुजर रहा है और यह तनाव धर्म के आधार पर विभाजन से उपजा है, आज प्रत्येक भारतीय संकट में घिरा है। यदि इन प्रश्नों के उत्तर शीघ्र देश के सामने नहीं आए तो देश को एक ओर कुरुक्षेत्र के लिये तैयार होना होगा क्योंकि इस बार बँटवारा नहीं होगा अपितु विलीनीकरण होगा। संसद में शोर मचा लिया, कामकाज ठप कर दिया, इससे अब काम नहीं चलेगा। नेहरू का इतिहास समग्रता से सामने लाना ही होगा। खंगालनी पड़ेंगी फाइलें जिसमें दुरभिसंधियां चुपचाप पड़ी हैं क्योंकि प्रश्न केवल भारत को बचाने का नहीं है एक ऐसी संस्कृति को बचाने का है जिसने दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाया था। भारत कहाँ नहीं था, सम्पूर्ण दुनिया में इसके निशान मौजूद हैं अभी दो दिन पहले ही इरान में श्रीराम की मूर्ती निकली है। जब से हमने भारतीय संस्कृति को मिटाने का प्रयास किया है तभी से आतंक और हिंस का बोलबाला रहा है। इसलिये सच्चाई तो देश के सामने लानी ही होगी। इतिहास के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं, बस इन्हें देश के सामने लाने की जरूरत है।