अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

घाव है तो हँसिये

Written By: AjitGupta - Jun• 12•20

मुँह का एक छाला होता है, जिसे मेडीकल भाषा में Aphthous ulcer कहते है। मैंने इस छाले को बहुत झेला है। कारण ढूंढा तो पता लगा कि मानसिक तनाव से होता है। अब जिसने संघर्षों से ही भाग्य को गुदवाया हो, वह तनाव तो झेलेगा ही! लेकिन मुझे जैसे ही समझ आया कि यह छाला तनाव के कारण है मैंने वैसे ही हँसने के बहाने ढूँढ लिये। एक बार यह छाला हो जाए तो इसके घाव को भरने में दो सप्ताह तक लग जाए और दर्द इतना की हालत पतली कर दे।
मैंने प्रयोग किया हँसने का, अन्दर से हँसने का। बस चुटकी बजाते ही दर्द दूर। मैंने छाले से पीछा छुड़ा लिया था। लेकिन फिर भी कभी-कभी चोर रास्ते से मुझे पकड़ ही लेता है। खाना खाते समय दाँत के नीचे मुँह के अन्दर का कोई भी हिस्सा आ जाए तो समझो कि यह एपथस अल्सर बनकर ही रहेगा। अभी दो-चार दिन पहले ऐसा ही हुआ और कल तक घाव बन गया। दर्द शुरू। कोरोना ने तनाव दे रखा था, हँसने का बहाना ही नहीं था लेकिन कुछ फ़ेसबुक से, कुछ बातों से हँसने के बहाने ढूँढ ही लिये। बस फिर क्या था, लगभग आधे दिन कोशिश रही कि हंसते रहें और सफलता हाथ लग गयी। आज दर्द से छुट्टी!
अब सोचो जब हँसने से एक घाव भरता है तो अन्दर के कितने घाव भी भरते ही होंगे। लेकिन हंसना दिखावे का नहीं होना चाहिये, अन्दर तक के हार्मोन सक्रिय होने चाहिये। इसलिये गुनगुनाते रहिये, हंसते रहिये। अन्दर से खुश रहिये। कैसे भी घाव हों, भर ही जाएँगे।

शाबाश अमेरिकी पुलिस

Written By: AjitGupta - Jun• 03•20

अमेरिकी पुलिस का एक चित्र कल वायरल हो रहा था- घुटने पर बैठकर क्षमायाचना करते हुए। यह चित्र पुलिस का धैर्य और समन्वय प्रदर्शित करता है। सत्ता का मद और शक्ति का प्रदर्शन कभी भी शान्ति स्थापित नहीं कर सकता। श्रेष्ठ शासक हमेशा धैर्यवान होता है, वह प्रत्येक परिस्थिति में समन्वय बैठाकर चलता है। कल पुलिस का अधिकारी बोल रहा था कि आप देश से प्यार करने वाले लोग हैं, सभी से प्यार करने वाले लोग हैं, शान्ति पूर्वक प्रदर्शन करना आपका अधिकार है लेकिन दंगे करना आप भी पसन्द नहीं करेंगे।
मुझे मोदीजी याद आ गये, हमेशा सकारात्मक बोलने वाले, दूसरों को श्रेय देने वाले और कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं खोने वाले। असल में हम अपने स्वभाव के अनुरूप सरकार से व्यवहार चाहते हैं। हमारा स्वभाव है कि हम बच्चे को थप्पड़ मारकर सुधारना चाहते हैं तो सभी से यहा उम्मीद रखते हैं। यदि हम बच्चे को प्यार से समझाना चाहते हैं तो सरकारों से भी प्यार की भाषा की उम्मीद रखते है। सत्ताधीश अपने स्वभाव के अनुरूप चलता है और विजय प्राप्त करता है। उन्हें धैर्य का मार्ग ही अपनाना होता है लेकिन जनता चाहती है कि सत्ता शक्ति का प्रदर्शन करे। बस हम हमारे प्रिय नेता की भी आलोचना करने लगते हैं। जनता के पास केवल एक पक्ष होता है लेकिन सरकार के पास अनेक पक्ष होते हैं और सभी को ध्यान में रखते हुए स्थिति को क़ाबू करना होता है। मुझे अमेरिकी पुलिस का व्यवहार बहुत अच्छा लगा कि वे अपने ही लोगों के सामने झुके और हिंसा को रोक लिया। नहीं तो वे गोलीबारी भी कर सकते थे और फिर नफ़रत का खेल हमेशा के लिये स्थाई हो जाता। ट्रम्प भी इसी धैर्य के लिये मोदी का प्रशंसक है और वह प्रत्येक प्लेटफ़ॉर्म पर मोदी का साथ चाहता है। शाबाश अमेरिकी पुलिस।

नफ़रत सौंप रहे हैं हम

Written By: AjitGupta - Jun• 03•20

अमेरिका में नफ़रत का बाज़ार गर्म है। रंगभेद की नफ़रत को न जाने कौन-कौन सी ताक़तें हवा दे रही हैं! एक सिपाही आम नागरिक को पैर तले कुचल देता है और आम नागरिक अमेरिका में आग लगा देता है। यह दो रंगों के बीच बोयी गयी नफ़रत है जो सैंकड़ों सालों से पनप रही है। हम गौर वर्ण है तो काले को हेय मानेंगे और काले हैं तो संगठित होकर आक्रमण करेंगे! यह नफ़रत हमारे अन्दर बस गयी है। यहाँ तक की स्त्री- पुरुष के बीच भी युगल भाव के स्थान पर नफ़रत ने जगह बना ली है। रिश्तों का प्रेम कहीं छिप गया है। हम पीढ़ी दर पीढ़ी रिश्तों को दूसरी पीढ़ी को सौंपते जाते हैं लेकिन अब नफ़रत सौंप रहे हैं। कहाँ हमने वसुधैव कुटुम्बकम् की कल्पना की थी और कहाँ अब एक पीढ़ी तक ही परिवार सिमट गया है। बस दूसरी पीढ़ी को तो हम नफ़रत देकर जा रहे है। हम ही श्रेष्ठ हैं यह अहंकार हमें दूसरे को सम्मान और प्रेम देने ही नहीं देता, फिर प्रेम के अभाव में ग़ुस्सा और नफ़रत पनपने लगती है।
अमेरिका में जो हो रहा है, वह सारी दुनिया का सत्य है। किसी दूसरे की नफ़रत भी अपनी बन जाती है और फिर सभी अपनी-अपनी नफ़रतों से घिरने लगते हैं। कहीं ज्वालामुखी फूट पड़ता है तो कहीं भूकंप के झटके महसूस किये जाते हैं। अकेले व्यक्ति से लेकर देशों तक की नफ़रत आज देखी जा सकती है, व्यक्ति बस मौक़े की तलाश में है कि कब मौक़ा मिले और मैं आग लगा दूँ। भारत भी ज्वालामुखी के ढेर पर बैठा है, बस एक चिंगारी की देर है। अमेरिका की आग भारत की ओर कब मुँह मोड़ लेगी कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि यहाँ तो हर व्यक्ति में आग है। हम इंच-इंच बँटे हुए हैं तो इंच-इंच बिखरने को तैयार हैं। एक तरफ़ कोरोना हमें निगल रहा है तो दूसरी तरफ़ हमारी नफ़रत हमें कोरोना का ग्रास बनाने को उकसा रही है। समय हमें देख रहा है और हम समय को देख रहे हैं। बस इन्तज़ार ही शेष है।

भीड़ से अलग होना ही असाधारण है

Written By: AjitGupta - May• 21•20

भीड़ में खड़ा हर व्यक्ति साधारण है लेकिन मंच पर बैठा व्यक्ति असाधारण हो जाता है। साधारण व्यक्ति को हम नहीं जानना चाहते लेकिन असाधारण व्यक्ति को हम समझना चाहते हैं, उसे जानना चाहते हैं। कल मेरे हाथ में “अग्नि की उड़ान” पुस्तक थी। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की जीवनी पर लिखी पुस्तक। स्मपूर्ण पुस्तक पढ़ लीजिए आप को यही लगेगा कि एक साधारण व्यक्ति की कहानी है। हम में से हर उस व्यक्ति की कहानी है जो शिक्षित होना चाहता है, कुछ बनना चाहता है! कुछ भी अनोखा नहीं है। फिर कैसे कलाम असाधारण बन गये? दुनिया में दो तरह के लोग हैं, एक मंच पर बैठे हैं और दूसरे मंच से सामने है। मंच पर जो हैं वे नेतृत्व कर रहे हैं और वे सार्वजनिक जीवन जी रहे हैं, मंच के सामने वाले नेपथ्य में जीवन जी रहे हैं, बस। जब हमारा सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ होता है तब हमें लोग जानना चाहते हैं, वे समझना चाहते हैं कि इसमें ऐसा क्या है, जो यह इस मंच तक जा पहुँचा! कई बार लगता है कि यह तो हम जैसा ही है, फिर मंच तक कैसे पहुँच गया? लोग कह उठते हैं कि भाग्य है भाई!

हो सकता है भाग्य हो लेकिन साधारण और असाधारण व्यक्तित्व में बस यही अन्तर होता है कि वह नेतृत्व के योग्य ठहराया जाता है और फिर उसके व्यक्तित्व की परते उघड़ने लगती है जब लगता है कि कुछ तो है! किसी भी क्षेत्र का भीड़ से अलग व्यक्ति हमेशा जानने योग्य रहता है। लोग उसकी जड़े तक खोद डालते हैं और फिर कलाम जैसे व्यक्ति असाधारण बन जाते हैं। सोचिये यदि कलाम राष्ट्रपति नहीं बनते तो क्या वे इतने असाधारण होते? वे अपने क्षेत्र में असाधारण होते लेकिन आमजन उनके जीवन में रुचि नहीं लेते। एक लड़का छोटे से गाँव में, गरीब परिवार में जन्म लेता है, पढ़ता है और वैज्ञानिक बन जाता है। सभी की कहानी तो ऐसी ही है। भीड़ से अलग हटने में उसने क्या प्रयास किये बस यही मूल्यवान है। कलाम ने हर कदम पर स्वयं को भीड़ के अलग रखा, वे सभी की दृष्टि में आते रहे। अपने काम की धुन के कारण, अपनी सोच के कारण या किसी ओर बात के कारण। बस जैसे ही हम भीड़ से अलग दिखने लगते हैं, वैसे ही स्वयं मंच पर पहुँच जाते हैं। साधारण से असाधारण बन जाते हैं और लोग हमें जानने की चाह करने लगते हैं।

कुछ लोग कहते सुने जाते हैं कि क्या है इस व्यक्तित्व में? हम भी ऐसे ही हैं, इससे ज्यादा शिक्षित हैं लेकिन यह क्यों नेतृत्व कर रहा है और मैं क्यों नहीं? वे समझ नहीं पाते कि भीड़ का हिस्सा बनकर रहना और भीड़ से अलग बन जाना ही अन्तर है! कलाम को पढ़ते हुए मुझे यही लगा कि जो भीड़ से अलग दिखने लगता है वह असाधारण बन जाता है और जो भीड़ में खो जाता है वह साधारण बनकर रह जाता है। जब भीड़ से पृथक खड़ा व्यक्ति सार्वजनिक जीवन के योग्य बन जाता है तब उसे असाधारण व्यक्ति मानकर उसे समझने की ललक पैदा होती है। आप या मैं सभी एक पृष्ठभूमि से आए हैं, सभी भीड़ का अंग हैं, बस कोशिश करिये कि भीड़ से पृथक होकर अपना अलग व्यक्तित्व बना सकें। इसलिये वैज्ञानिक कलाम और राष्ट्रपति कलाम में बस यही अन्तर है। किसी भी ऐसे ही व्यक्तित्व की आलोचना करने से पूर्व यह देख लीजिये की वह कहाँ खड़ा है! मैंने जब अपने पिता पर पुस्तक लिखी तो परिवार के एक सदस्य ने कहा कि एक साधारण व्यक्ति पर पुस्तक? मैंने तब समझा कि भीड़ से अलग खड़ा व्यक्ति ही असाधारण बन जाता है और उन्हीं पर लिखने का मन करता है। जब कलाम को  पढ़ा तो मैंने जाना कि साधारण और असाधारण में बस यही अन्तर  होता है।

मन की किवड़ियां खोल

Written By: AjitGupta - May• 17•20

समय काटे से कट नहीं रहा है, एक अनजान भय भी सभी के सर पर मंडरा रहा है, लोग अपनी जमापूंजी का बहीखाता लेकर बैठ गये हैं। सोना-चाँदी, बैंक डिपाजिट, रोकड़ा, जमीन, जायदाद सभी सम्भालने में लगे हैं। जीवन में लाभ-हानि का हिसाब लगा रहे हैं। अपनी शेष आयु को भी हिसाब में सम्मिलित कर लिया है। कितना उपभोग कर पाएंगे और कितना शेष रह जाएगा? मैं इस आपदा काल में ही नहीं पहले से करती आयी हूँ। अपने जीवन को सुव्यवस्थित रखने का हमेशा से ही प्रयास किया है। ऐसा कोई कर्तव्य नहीं जो पूर्ण नहीं किया हो और ऐसी जीवनचर्या का साधन नहीं जिसे प्राप्त नहीं किया हो! प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक स्तर होता है, समाज के अनुरूप वह स्तर रहता है, उसी स्तर के अनुरूप हम श्रेष्ठ करते रहे हैं। लाभ-हानि भी बहुत हुई है फिर भी बूंद-बूंद करके घड़ा भरता ही गया। सारी आवश्यकतों की पूर्ति करने के बाद, संतानों को अच्छा जीवन देने के बाद भी घड़ा भर गया। सोचा अब इस घड़े का सदुपयोग वृद्धावस्था में होगा। लेकिन किसे मालूम था कि कोरेना काल उपस्थित हो जाएगा और दुनिया को जीवन का मर्म समझा देगा!

जीवन की आवश्यकताएं मुठ्ठीभर अर्थ से पूर्ण हो जाती हैं, शेष तो प्रतिस्पर्धा है। इस काल में प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गयी है, विलासिता कहीं मुँह ढककर सो गयी है, बस आवश्यकताएं ही शेष हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने घड़े को टटोल रहा है, किसी के पास एक घड़ा है, किसी के पास दो हैं या फिर किसी के पास अनगिनत है। रात-दिन हिसाब लग रहा है, सभी आश्चर्य चकित भी हैं कि इतना वैभव संचित कर लिया! फिर उम्र का गणित देखते हैं, पता लगता है कि यह तो फिसलती जा रही है! जीवन क्षणभंगुर दिखने लगा है, अब?

मेरे पास चिंतन के लिये समय हमेशा रहा है, यह समय और यह चिंतन ही मेरी पूंजी है। लोग कह रहे हैं कि अब समय बहुत मिल रहा है लेकिन मेरे पास तो पूर्व में भी बहुत समय था। जीवन के प्रत्येक कदम पर मैंने चिन्तन किया है। मैंने जीवन के सारे ही उपादानों को संतोष पूर्वक जीया है और मन को भी संतुष्ट किया है। लेकिन अब सभी लोगों को कहते सुन रही हूँ कि यह अर्थ का संचय व्यर्थ गया! यह अब किसी काम का नहीं है। इस अर्थ के कारण ही तो हमने प्रेम की जगह अहंकार को चुना था, निरन्तर हम प्रदर्शन कर रहे थे। लोग कह रहे हैं कि रिश्तों की हमने कद्र नहीं की, यहाँ तक की अपनी गृहस्थी तक सुखपूर्वक भोग नहीं पाए! केवल अर्थसंग्रह में लगे रहे और सारा दिन यायावर बनकर घर से बाहर रहे। किसी के पास एक मिनट का समय नहीं था जो अपनों को दे सके! आज समय ही समय है, पति-पत्नी के पास इतना समय है कि वह इस छोटे से काल में ही सात जन्मों का समय व्यतीत कर सकते हैं। जिस संतान के पास माता-पिता के लिये समय ही नहीं था आज वे भी क्या बात करें, यह ढूंढ रहे हैं! अभी भी लोग खेलों का सहारा ले रहे हैं, अपने मन को नहीं खोल रहे हैं। अपने जीवन के आनन्द को नहीं पा रहे हैं। कितने बेटे हैं जो माँ की गोद में लेटकर सर में तैल लगवा रहे हैं, या कितनी बेटियाँ हैं जो माँ को कुर्सी पर बैठाकर उनकी चोटी बना रही हैं। सारे ही लाड़ आज भी अधूरे से खड़े हैं। कर लो इन्हें भी पूरा कर लो, जीवन के ये पल दो क्षण के ही सही लेकिन अमृत की दो बूंद जैसे लगेंगे। घड़े की ओर मत देखो वह तो इतिहास में किसी अन्य के काम आएगा लेकिन अपना सुख, अपना लाड़-प्यार अपने लिये ही है, इसे प्राप्त कर सको तो कर लो। बतिया लो अपनों से, जो आपको लाड़ दे सके, जो आपके अस्तित्व को स्वीकार कर सके। समय व्यर्थ मत करें, जहाँ विष है उसे जीवन से दूर रखे, बस अमृत की दो बूंद की तलाश करिये।