अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

तुम हर क़ानून से बड़े हो

Written By: AjitGupta - Sep• 03•19

बधाई! देश के उन सभी देशवासियों को बधाई जो स्वयं को किसी दायरे में बाँधने को कभी तैयार नहीं है। मोदीजी फ़िट मूवमेंट चलाते हैं और हम रस्सी तोड़कर भागने का जुगत बिठा लेते हैं। मोदीजी क़ानून बना देते है कि सड़क पर ग़ाडी दौड़ाने के लिये नियमों का पालन करना पड़ेगा नहीं तो हर्ज़ाना देना होगा। मेरी जूत्ती देगी हर्ज़ाना, हुंअ! मेरा बच्चा भी गाड़ी दौड़ाएगा और किसी को मारेगा भी, तुम कौन मुझे रोकने वाले! हमने फिर समाधान ढूँढ लिया! पुलिसवालों खा जाएँगे जुर्माना! पुलिसवाले तो जब खाएँगे ना जब आप क़ानून तोड़ेंगे! वाह हम दुनिया के सबसे प्राचीन सभ्यता वाले लोग भला किसी क़ानून में बँधने के लिये है? मैं तो नहीं लगाऊँगा हेलमेट। 
बधाई तो बनती ही है, हिम्मत की दिलेरी की। एक कहानी याद आ गयी, एक चोर था, जुलाहे के घर में घुस गया चोरी करने। जुलाहे ने खिड़की के पास अपना ताना-बाना रखा था, चोर की आँख में घुस गया। चोर की एक आँख गयी। चोर राजा के पास पहुँच गया बोला कि न्याय दो। मेरा काम चोरी करना है और इस जुलाहे के कारण मेरी आँख फूट गयी। राजा ने कहा की बात उचित है, जुलाहे की एक आँख फोड़ दी जाए!
बेचारा जुलाहा बोला कि न्याय राजन! मैं जुलाहा हूँ और दोनों आँख से ही ताना-बाना बुनता हूँ, एक बार इधर देखना पड़ता है और दूसरी बार उधर। राजा ने कहा की यह भी उचित बात है। फिर सुझाव आया कि गली के नुक्कड़ पर जो मोची बैठता है वह एक तरफ़ देखकर ही जूती गाँठता है तो उसकी एक आँख निकाल ली जाए! न्याय पूरा हुआ। 
चोरी जायज़ है, सड़क पर गाड़ी दौड़ाने में कोई नियम नहीं होने चाहिये इसलिये कैसा जुर्माना! मोदी ने फ़िट करने की सारी कोशिशों को धता बताने के लिये बधाई। हम दुनिया में अनूठे हैं, भला हम किसी क़ानून में बँधने के लिये हैं! नहीं हैं , आप महान संस्कृति के वाहक हैं भला आपके लिये क़ानून! कदापि नहीं। परम्परा जारी रखिये, विरोध की परम्परा टूटनी नहीं चाहिये। यह देश हमेशा आपका ऋणि रहेगा। 
हमारे पूर्वज हमेशा जंगलों में रहते आए हैं, हमने कोई नियम नहीं माने और अब मोदी राज्य में नियम! चोरी मत करो, रिश्वत मत लो, कालाधन नहीं चलेगा, गाड़ी ऐसे चलाओ, वैसे चलाओ, अब हम अपनी इच्छा से जिए भी नहीं! तुम सरकार चलाओ और हमें परिवार चलाने दो। हम नहीं मानते क़ानून। देशवासियों क्या कहते हो तुम कि वे क़ानून थोपेंगे लेकिन तुम चोरी पर अड़े रहना। देश के महान नागरिकों, तुम्हें अपने बच्चे से इतना डर लगता है कि तुम उसे गाड़ी की चाबी देने से मना नहीं कर सकते। बिल्कुल ठीक है। आख़िर तुम परिवार वाले हो, वे क्या जाने बच्चे का मोह! तुम तो माँग करो कि हमारे बच्चे से कोई मर भी जाए को इसे पुरस्कार मिलना चाहिये। बधाई आप सभी को। कभी मत बँधना क़ानून से, तुम हर क़ानून से बड़े हो। 

तेरा पैसा + मेरा पैसा नहीं तो मंदी

Written By: AjitGupta - Sep• 02•19

मेरा पैसा तेरे पास कैसे पहुँचे और लगातार पहुँचता ही रहे, इस चाल को कहते हैं आर्थिक आवागमन। जैसे ही मेरा पैसा मैंने अपने पास रोक लिया तो कहते  हैं कि मंदी आ गयी, मंदी आ गयी। जयपुर में एक बड़ा बाँध हुआ करता था – रामगढ़। सारे जयपुर की जीवनरेखा। जब रामगढ़ भरता था तो सारा जयपुर देखने को उलटता था कि हमारी जीवनरेखा लबालब है लेकिन कुछ साल पहले क्या हुआ कि गाँव-गाँव में एनीकट बनने लगे और गाँव का पानी रामगढ़ तक नहीं पहुँचा, परिणाम रामगढ़ सूख गया। रामगढ़ के रास्ते में न जाने कितने अवरोध खड़े हो गये। ऐसे ही देश में मंदी-मंदी का राग शुरू हुआ है। आर्थिक बातें तो मेरे वैसे ही पल्ले नहीं पड़ती तो जब से आर्थिक मंदी का राग अलापा जा रहा है, मेरे तो समझ नहीं आ रहा कि यह होता क्या है! मैं सीनियर सिटिजन हो गयी हूँ, मुझे लगता है कि बाजार से कुछ भी खरीदने की अब जरूरत नहीं है, जो है उसे ही समाप्त कर लें तो बड़ी बात है। मेरा बाजार जाना बन्द क्या हुआ, देश में मन्दी आगयी! मेरे गाँव में एनीकट से पानी क्या रोक  लिया कि रामगढ़ सूख गया! मेरा पैसा बड़े साहूकारों के पास जाए तो मंदी नहीं लेकिन मेरा पैसा मेरे पास ही रहे तो मंदी हो गयी! यह कैसा गणित है! क्या देश का पैसा कम हो गया जैसे पाकिस्तान का हो गया है? हमारा विदेशी मुद्रा भण्डार लगातार बढ़ रहा है तो मंदी कहाँ से आ गयी?

मैं फिर कह रही हूँ कि मुझे पैसे की बात का ज्ञान नहीं है और मेरे जैसे करोड़ों को नहीं है लेकिन इतना जानते हैं कि हमारा पैसा कम नहीं हुआ है और ना ही हम  बाजार खरीदने की शक्ति भी गवाँ बैठे हैं! हमारा देश मितव्ययी देश है, अनावश्यक खरीदारी नहीं करता है। युवा पीढ़ी जब कमाने योग्य होती है तब उसे खरीदारी का चश्का लगता है लेकिन कुछ दिन बाद वे भी मितव्ययी ही हो जाते हैं। रोज-रोज गाडियाँ बदलने का शौक हमारे देश में नहीं है। देश अपनी रफ्तार से चल रहा है लेकिन कुछ लोग चिल्ला रहे हैं कि मंदी से चल रहा है! आज गणेश चतुर्थी है, देखना कैसे दौड़ लगाएंगे लोग! कितने गणेश पण्डालों में कितना दान एकत्र होता है! तब आंकना मंदी को!

त्योहार मनाने में कहीं भी कृपणता दिखायी दे तो मानना मंदी है। बड़े दुकानदारों के पास कितनी भीड़ आयी और कितनी नहीं आयी, इससे आकलन मत करिये। भारत में चार मास चौमासा रहता है, इस काल में लोग शान्त रहते हैं। शुभ कार्य भी कम होते हैं। जैसे ही चौमासा गया फिर देखना बाजारों की रौनक। आज तो गणेश जी की स्थापना हुई है, मंगल कार्य शुरू होंगे। बाजार भी भरेगा और खूब भरेगा। यह भारत का बाजार है, विदेशी आँख से देखने की कोशिश करोंगे तो कुछ नहीं समझ सकोगे। भारत की नजर से देखो और शान्ति से रहो। हाहाकार मचाने से मन्दी दूर नहीं होगी और ना ही कुछ अन्तर आने वाला है। अभी धैर्य रखो, पाँच साल में न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे फिर भी कुछ हाथ नहीं आने वाला। तुम्हारा सामना मोदी से हुआ है, तुम मंदी का डर दिखा दो या तेजी का कुछ असर नहीं पड़ने वाला। तुम तो आज गणेशजी का आगमन करो और फिर दीवाली देखना, तुम्हें पता चल जाएगा कि देश कितना खुश है।

यह देश कभी भी मंदी का शिकार हो ही नहीं सकता क्योंकि हम मितव्ययी है, जरूरत होने पर ही बाजार जाते हैं। त्यागी भी हैं, क्योंकि एक उम्र होने के बाद हम त्याग पर ध्यान देते हैं। युवा पीढ़ी को भी हम संयम का पाठ पढ़ाते हैं तो यह देश कभी आर्थिक तंगी या मंदी का शिकार नहीं हो सकता। हम पाकिस्तान जैसे देश नहीं है जो किसी का विनाश करने के लिये खुद को ही कंगाल बना डालें। हम खुद भी उन्नत होते रहते हैं और दूसरों को भी उन्नत होने की कामना ही करते हैं। इसलिये देशवासियों खुश रहो। ये जो लोग हैं मंदी का रोना रोकर खुद की तंगी दूर कर रहे हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं है। मस्त रहो, गणेश जी का वंदन करो और ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करो।

मोदी ट्रम्प को धौल जमा रहे हैं!

Written By: AjitGupta - Aug• 27•19

तुम्हारे पास क्या है? मोदी पूछ रहे थे! हमारे पास स्वर्ग जैसे देश हैं, हम पूर्ण विकसित हैं। अमेरिका, फ्रांस सरीखे विकसित देश बता रहे थे और फिर प्रतिप्रश्न करते हैं कि तुम्हारे  पास क्या है? भारत देश के लोग कहते हैं कि हमारे पास कृष्ण हैं! एक तरफ सात देश साथ खड़े थे, दुनिया को  बता रहे थे कि हमारे देश स्वर्ग हैं, हम दुनिया को बताने एकत्र हुए हैं कि कैसे धरती को स्वर्ग जैसा बनाया जा सकता है। क्योंकि हमारे पास अनुभव है। लेकिन इन समृद्ध लोगों की चिंतन बैठक में भारत जैसे उदीयमान देश के प्रधानमंत्री को सुझाव के लिये बुलाया जाता है, मानो कृष्ण को बुलावा भेजा हो कि आओ और दुनिया को अपने परामर्श से अवगत कराओ।

एक तरफ सात समृद्ध देशों का जमावड़ा था तो दूसरी तरफ गरीब माने जाने वाले देश के प्रधानमंत्री को सादर आमंत्रण था! आमंत्रण भी परामर्श देने के लिये था! मोदीजी बोल रहे थे और सब सुन रहे थे। मोदीजी ताल ठोक रहे थे, ट्रम्प को प्यार से धौल जमा रहे थे और ट्रम्प हँस रहे थे! कितनी विचित्र बात लग रही थी!

मोदीजी के पास ज्ञान का अकूत भण्डार है, यह मोदीजी का ज्ञान शुद्ध भारतीय ज्ञान है। गीता से, पुराणों से लिया हुआ ज्ञान। जब दुनिया सभ्यता के मायने ढूंढ रही थी तब भारत के ऋषियों ने सृष्टि के लिये ज्ञान के भण्डार भर दिये थे और मोदीजी इन भण्डारों को आत्मसात कर लिया था।

पर्यावरण की रक्षा कैसे की जाती है? स्वास्थ्य की रक्षा कैसे की जाती है? शिक्षा कैसी होनी चाहिये? मानवता की ही नहीं अपितु सम्पूर्ण चराचर जगत की रक्षा कैसे हो? इन सारे ही विषयों का ज्ञान हमारे पुराणों में है और मोदीजी इसके मास्टर बन चुके हैं। मोदीजी दुनिया के सामने इस ज्ञान के भण्डार का एक बूंद भी टपकाते हैं तो वे सारे धन्य हो जाते हैं। ज्ञान का यह प्रकार दुनिया के लिये अनोखा है और ज्ञान देने का प्रकार भी अनोखा है इसलिये दुनिया को मोदी कृष्ण लगने लगे हैं। वे कहते हैं कि आओ और प्रबंधन का नवीन ज्ञान हमें बताकर जाओ।

मैं मोदी के आमंत्रण को समझने का प्रयास कर रही हूँ। भला सात समृद्ध देश किसी ऐसे देश को आमंत्रण क्यों देंगे जिसे कल तक गरीब देश कहा जाता था। जिसके पूर्व प्रधानमंत्री अमेरिका के राष्ट्रपति से हाथ मिलाने में भी गौरव का अनुभव करते थे और आज हमारे प्रधानमंत्री धौल जमा रहे हैं! आश्चर्य होता है! ऐसा लग रहा है मानो समृद्धता बौनी हो गयी हो और ज्ञान कृष्ण जितना विशाल बन गया हो! हम कहते रहे हैं कि भारत एक दिन पुन: विश्वगुरु बनेगा! आज इस बैठक में मोदीजी की उपस्थिति इस बात को पुष्ट करती है।

क्या नहीं था हमारे पास! लेकिन हमने अपने मॉडल को नहीं चुना अपितु ऐसे मॉडल को चुना जो विश्व के गरीब देश भी नहीं चुनते! सारे देश को कचरा पात्र बना दिया! सारी जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की योजनाएं लागू कर दी! हमारी दिनचर्या, रात्रिचर्या दूषित बना दी गयी। जो कहीं नहीं होता, ऐसा फूहड़ प्रदर्शन हमारे देश में होने लगा। मानो हम स्वयं ही खुद को समाप्त करने में जुट गये। सारा देश कचरे का पात्र हो गया। अस्पतालों में लम्बी-लम्बी कतारे लग गयीं। भिखारियों की बाढ़ आ गयी। धरती प्यासी हो गयी, नदियां गन्दगी से पट गयी लेकिन हमारे राजनेता पैसों के ढेर पर बैठ गये। इन राजनेताओं और अधिकारियों ने अपने-अपने किले बना लिये और किले के बाहर गरीबी का ताण्डव होता रहा। कभी आरक्षण के नाम पर टुकड़े फेंक दिये गये तो कभी गरीबी के नाम पर!

लेकिन आज मोदी युग आया है, मानो चन्द्रगुप्त का राज स्थापित हुआ हो, धनानन्द जैसे क्रूर शासक को हटाकर। दुनिया भी देख रही है, इस ज्ञानवान मोदी को जो भारतीय पद्धति से देश को सभ्य बनाने में लगा है। सारी दुनिया आशा भरी नजरों से मोदी को देख रही है और स्वर्ग के इन्द्र कहे जाने वाले नेता भी मृत्यु लोक से कृष्ण को निमंत्रण देने लगे हैं। अब दुनिया का मॉडल बदलेगा। अकेले मानवता को बचाने से मानवता नहीं बचती अपितु प्राणी मात्र की रक्षा करने से मानवता बचती है, यह मोदीजी सिखा रहे हैं और शाकाहार का पाठ पढ़ा रहे हैं। एक तरफ धर्म के नाम पर लाखों-करोड़ों पशुओं का कत्ल हो रहा हो तब मानवता के लिये भी खतरा पैदा हो जाता है, यह बात मोदी समझा रहे हैं। वे मेन वर्सेस वाइल्ड में भी यही संदेश देते हैं कि सृष्टि में हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिये। हम रक्षक बने ना कि भक्षक। हमें मोदीजी पर नाज है कि वे भारत के ज्ञान को पुन: प्रस्फुटित कर रहे हैं और दुनिया को बाँट रहे हैं। आभार मोदी जी।

नेहरू और पाकिस्तान का हव्वा-हव्वा का खेल

Written By: AjitGupta - Aug• 26•19

यह जो डर होता है ना, वह हमें चैन से रहने नहीं देता। डर ही है जो हमें ऐसे-ऐसे काम कराता है जिसकी हम कल्पना तक नहीं करते। बच्चे को हम डराते हैं कि चुप हो जा, नहीं तो हव्वा आ जाएगा! हव्वे का डर बच्चे के दीमाग में बैठ जाता है और बड़ो को आराम हो जाता है। जब भी कोई समस्या आए तो बड़े हव्वा को बाहर निकाल लाते  हैं! लेकिन सोचो यदि यह हव्वा समाप्त हो जाए, इसका अस्तित्व ही मिट जाए तो बच्चे आजाद हो जाएंगे। बड़ों के पास डराने को कुछ नहीं रहेगा!

ऐसा ही कश्मीर में हुआ, 370 रूपी हव्वा से हम देश को और कश्मीर को डराते रहे। मोदीजी ने  370 को एक झटके में समाप्त कर दिया और 70 साल के हव्वे का नामोनिशान मिटा दिया। डर समाप्त हो गया तो लोकतंत्र आ गया। लेकिन कुछ लोगों को यह रास नहीं आया, डर तो आखिर डर है ना! यह हमेशा रहना ही चाहिये! इसके समाप्त होने से तो कुछ लोगों की मनमर्जी चल नहीं सकती।

हमारे लोकप्रिय नेता राहुल गाँधी ने एक कुनबा खड़ा किया, सारे ही लोकप्रिय नेताओं को शामिल किया और चल पड़े मुहिम पर हव्वे को स्थापित करने। कश्मीर के लोगों को बताने निकल पड़े कि हव्वा था और हमेशा रहेगा, तुम इससे मुक्त नहीं हो सकते। तुम्हारी भलाई हव्वे के अस्तित्व के साथ ही जुड़ी है। भला वो बच्चा ही क्या जो हव्वे से ना डरे, यह तो ऐसा ही हुआ कि बच्चे से उसका बचपन छीन लो, उसे यकायक बड़ा बना दो। नहीं ऐसा नहीं चलेगा। राहुल गांधी ने कहा कि अभी मेरा बचपन ही अक्षुण्ण है तो कश्मीरियों का भी रहना चाहिये, डर जरूरी है।

एक टोली बनाकर हवाई-जहाज में  बैठ गये कि कुछ भी हो जाए, हव्वे को जीवित करके ही दम लेंगे। अब मोदीजी ने क्या कर दिया की हव्वे को वेंटीलेटर तक पर नहीं रखा, सीधे ही राम नाम सत्य कर दिया! सारे क्रिया-कर्म भी कर दिये। राख में से वापस हव्वे को जीवित करने हमारे जुझारू नेता निकल पड़े। कश्मीर के हवाई-अड्डे पर जा पहुँचे। लेकिन वहाँ जाकर कहा गया कि आप जिस हव्वे की तलाश में आए हो वह तो नाम मात्र का भी यहाँ नहीं है, उसके नाम का डर  भी समाप्त हो रहा है। लोग घर के दरवाजे खुले रखकर आराम से घूम रहे हैं और उन्हे दूर-दूर तक हव्वा दिखायी नहीं दे रहा है। लेकिन यदि आप लोग यहाँ से  बाहर गये तो लोग आपके कपड़े जरूर फाड़ डालेंगे। पूछेंगे कि बता हव्वा कहाँ था? इसलिये भलाई इसी में है कि आप लोग वापस जहाज में बैठ जाओ। जहाज का पंछी पुन: जहाज में आवे, वाली बात कर लो। खैर राहुल जी वापस आ गये, उनके सारे ही शागीर्द भी वापस आ गये लेकिन आकर बोले कि मैंने देखा था कि दूर झाड़ियों के पीछे हव्वा था। आपने कितनी दूर तक देख लिया था? लोग पूछ रहे थे।

असल में वहाँ एक दर्पण लगा था, उस दर्पण में दूर से धुंधली सी तस्वीर खुद की ही दिख रही थी, इन्हें ऐसा लगा कि हो ना हो यही हव्वा है! बस दिल्ली आते ही बोले कि मैंने हव्वा देखा था। हव्वे का डर भी देखा था। पसीने भी पोछते जा रहे थे और डर भी रहे थे कि अब क्या होगा? हव्वा समाप्त तो डर समाप्त और डर समाप्त तो खेल समाप्त! 70 साल से जो पाकिस्तान और गाँधी-नेहरू खानदान मिलकर हव्वा-हव्वा खेल रहे थे, उस खेल का ऐसे बेदर्दी से अन्त पच नहीं रहा है। पाकिस्तान के पास तो इस खेल के अलावा और दूसरा खेल ही नहीं है, सभी लोग बस एक ही खेल रात-दिन खेले जा रहे थे। लेकिन अब?

हव्वा तो उड़ गया लेकिन उसके डर को ये लोग ढूंढ रहे हैं, भागते चोर की लँगोटी की तरह! हव्वा तो अब कश्मीर में वापस आएगा नहीं, उसका डर  भी भाग ही जाएगा लेकिन डर इनके अन्दर घुस गया है वह जाता नहीं। बे फालतू घूम रहे हैं और हव्वे को ढूंढ रहे हैं। अपने साथ झाड़-फूंक वालों को भी लेकर घूम रहे हैं कि हव्वा ना सही डर को तो अभी स्थापित कर ही दें लेकिन डर कश्मीर की जगह इनके दिलों को डरा रहा है कि अब क्या होगा? लगे रहो, तुम्हारा डर ही आमजन के डर को निकालकर बाहर करेगा। तुम अब धूणी रमाओ और कश्मीर को खुली हवा में साँस लेने दो। राम-राम भजने का समय आ गया है तो राम-राम भजो।

भागते रहो

Written By: AjitGupta - Aug• 22•19

कल एक पुराने मित्र घर आए, ताज्जुब भी हुआ कि इतने दिनों बाद! लेकिन मित्र कब बिना बात नाराज हो जाते हैं और कब रास्ता भटककर वापस आ जाते हैं, कौन बता सकता है! खैर मेरी पोस्ट का तात्पर्य और कुछ है तो उसी बिन्दू पर चलते हैं। कहने लगे कि फला व्यक्ति पर मुझे तरस आता है। मैंने पूछा कि क्या हुआ? वे कहने लगे कि अभी दो दिन पहले उन से बात हुई है, कह रहे थे कि इतना पैसा कमा लिया है कि इस पैसे को कहाँ रखें, समझ नहीं आता! सारे घर भर गये हैं, जगह नहीं है लेकिन पैसा तो आ ही रहा है। उनके लिये पैसा समस्या बन चुका है लेकिन स्रोत बन्द नहीं किये जाते। 
जितना जनता से खेंच सको खेंच लो, जितना सरकार से बचा सको बचा लो, बस यही बात हर पैसे वाले के दिमाग में रहती है। पैसा काला होता रहता है, काले पैसे को छिपाने के लिये राजनीति का सहारा लिया जाता है। फिर उस पैसे को शादी समारोह में फूंकने की कोशिश की जाती है। लेकिन जनता से खेंचना और सरकार से बचाना बन्द नहीं होता। यह हमारे स्वभाव में आ जाता है। किसी दिन पाप की गठरी भर जाती है और फिर ऐसे लोग विजय माल्या बन जाते हैं। सुबह मित्र इस गम्भीर समस्या को बता रहे थे और शाम को यह समस्या चिदम्बरम के भागने से और बड़ी होकर सामने आ गयी। 
शरीर में हम जब बहुत ज्यादा शर्करा एकत्र कर लेते हैं तब हम शक्कर से ही भागने लगते हैं, ऐसे ही पैसे का खेल है। अत्यधिक पैसा एकत्र करो और फिर पैसे से ही भागो! अपनी जान बचाने को भागो! पैसे से क्या खरीदना चाहते हो? सम्मान? प्रतिष्ठा? सत्ता? लेकिन क्या मिल पाती है? कुछ दिन मिल जाती है लेकिन फिर सारा सम्मान, सारी प्रतिष्ठा और सारी सत्ता धूल में मिल जाती है। पैसा किसी काम नहीं आता। चिदम्बरम भाग रहा है, कल प्रफुल्ल पटेल भी भागेगा। हो सकता है गाँधी परिवार भी भागे! भारत में भागने की पंचवर्षीय योजना लागू हो चुकी है। यह पाँच वर्ष भ्रष्टाचारियों भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम रहेंगे। 
मुझे इतिहास को टटोलने का थोड़ा सा शौक है, एक पुस्तक हाथ लगी, लेखक का नाम तो याद नहीं है लेकिन था बड़ा नाम। वे लिखते हैं कि जब गाँधी राजेन्द्र बाबू से मिले तब राजेन्द्र बाबू वकालात करते थे और उस समय उनकी एक पेशी की फीस दस हजार रूपये थी। लेकिन बाद में राजेन्द्र बाबू ने सबकुछ त्याग दिया। सरदार पटेल की भी यही स्थिति थी, उनने भी सबकुछ त्याग दिया। उस काल में न जाने कितने लोगों ने सम्पूर्ण समर्पण किया था। वह काल ईमानदारी को अपनाने का था लेकिन आजादी के बाद बेईमानी को अपनाने का काल प्रारम्भ हुआ। बेईमानी बिना जीवन की कल्पना ही नहीं हो सकती, यह सिद्धान्त गढ़ लिया गया। हम सब बेईमानी से धन एकत्र करने में जुट गये। राजनीति तो मानो खदान थी, जितना चाहो धन निकाल लो और अपने खाते में डाल लो। 
लेकिन मोदी ने 65 साल के देश के जीवन का बदलाव किया, बेईमानी की जगह ईमानदारी को स्थापित करने का प्रारम्भ किया। लोग कसमसाने लगे, गाली देने लगे लेकिन धीरे-धीरे यह बात देश में जड़े जमाने लगी कि ईमानदारी से भी आसानी से जी सकते हैं। आज बेईमानी सरदर्द बन गयी है, बेईमानी से कमाया पैसा संकट बन गया है। लोग भाग रहे हैं, चिदम्बरम जैसा व्यक्ति भाग रहा है! पैसे को कहाँ छिपाएं, स्थान खोज रहे हैं! 
अब ईमानदारी की रोटी की इज्जत होने की उम्मीद जगी है। बेईमानी की रोटी जहर बनती जा रही है। जिस दिन लोग पैसे और सुख में अन्तर कर लेंगे उस दिन शायद देश सुखी हो जाएगा और जो हम सुख के इण्डेक्स में बहुत नीचे चल रहे हैं, उसमें भी ऊपर आ जाएंगे। लेकिन अभी तो भागमभाग देखने के दिन शुरू हो चुके हैं। देखते हैं कि कितने भागते हैं और कितने बचते हैं! आज का बड़ा सवाल उपस्थित हो गया है कि क्या इस देश में ईमानदारी स्थापित होगी? क्या इस देश से बेईमानी अपनी जड़े उखाड़ लेगी? पहले चौकीदार कहता था – जागते रहो, अब चोर कह रहे हैं – भागते रहो। चिदम्बरम भाग रहा है, पहले दुनिया को अपनी झोली में भरने को भाग रहा था और अब खुद को बचाने को भाग रहा है, बस भाग रहा है।