अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

नेहरू और पाकिस्तान का हव्वा-हव्वा का खेल

Written By: AjitGupta - Aug• 26•19

यह जो डर होता है ना, वह हमें चैन से रहने नहीं देता। डर ही है जो हमें ऐसे-ऐसे काम कराता है जिसकी हम कल्पना तक नहीं करते। बच्चे को हम डराते हैं कि चुप हो जा, नहीं तो हव्वा आ जाएगा! हव्वे का डर बच्चे के दीमाग में बैठ जाता है और बड़ो को आराम हो जाता है। जब भी कोई समस्या आए तो बड़े हव्वा को बाहर निकाल लाते  हैं! लेकिन सोचो यदि यह हव्वा समाप्त हो जाए, इसका अस्तित्व ही मिट जाए तो बच्चे आजाद हो जाएंगे। बड़ों के पास डराने को कुछ नहीं रहेगा!

ऐसा ही कश्मीर में हुआ, 370 रूपी हव्वा से हम देश को और कश्मीर को डराते रहे। मोदीजी ने  370 को एक झटके में समाप्त कर दिया और 70 साल के हव्वे का नामोनिशान मिटा दिया। डर समाप्त हो गया तो लोकतंत्र आ गया। लेकिन कुछ लोगों को यह रास नहीं आया, डर तो आखिर डर है ना! यह हमेशा रहना ही चाहिये! इसके समाप्त होने से तो कुछ लोगों की मनमर्जी चल नहीं सकती।

हमारे लोकप्रिय नेता राहुल गाँधी ने एक कुनबा खड़ा किया, सारे ही लोकप्रिय नेताओं को शामिल किया और चल पड़े मुहिम पर हव्वे को स्थापित करने। कश्मीर के लोगों को बताने निकल पड़े कि हव्वा था और हमेशा रहेगा, तुम इससे मुक्त नहीं हो सकते। तुम्हारी भलाई हव्वे के अस्तित्व के साथ ही जुड़ी है। भला वो बच्चा ही क्या जो हव्वे से ना डरे, यह तो ऐसा ही हुआ कि बच्चे से उसका बचपन छीन लो, उसे यकायक बड़ा बना दो। नहीं ऐसा नहीं चलेगा। राहुल गांधी ने कहा कि अभी मेरा बचपन ही अक्षुण्ण है तो कश्मीरियों का भी रहना चाहिये, डर जरूरी है।

एक टोली बनाकर हवाई-जहाज में  बैठ गये कि कुछ भी हो जाए, हव्वे को जीवित करके ही दम लेंगे। अब मोदीजी ने क्या कर दिया की हव्वे को वेंटीलेटर तक पर नहीं रखा, सीधे ही राम नाम सत्य कर दिया! सारे क्रिया-कर्म भी कर दिये। राख में से वापस हव्वे को जीवित करने हमारे जुझारू नेता निकल पड़े। कश्मीर के हवाई-अड्डे पर जा पहुँचे। लेकिन वहाँ जाकर कहा गया कि आप जिस हव्वे की तलाश में आए हो वह तो नाम मात्र का भी यहाँ नहीं है, उसके नाम का डर  भी समाप्त हो रहा है। लोग घर के दरवाजे खुले रखकर आराम से घूम रहे हैं और उन्हे दूर-दूर तक हव्वा दिखायी नहीं दे रहा है। लेकिन यदि आप लोग यहाँ से  बाहर गये तो लोग आपके कपड़े जरूर फाड़ डालेंगे। पूछेंगे कि बता हव्वा कहाँ था? इसलिये भलाई इसी में है कि आप लोग वापस जहाज में बैठ जाओ। जहाज का पंछी पुन: जहाज में आवे, वाली बात कर लो। खैर राहुल जी वापस आ गये, उनके सारे ही शागीर्द भी वापस आ गये लेकिन आकर बोले कि मैंने देखा था कि दूर झाड़ियों के पीछे हव्वा था। आपने कितनी दूर तक देख लिया था? लोग पूछ रहे थे।

असल में वहाँ एक दर्पण लगा था, उस दर्पण में दूर से धुंधली सी तस्वीर खुद की ही दिख रही थी, इन्हें ऐसा लगा कि हो ना हो यही हव्वा है! बस दिल्ली आते ही बोले कि मैंने हव्वा देखा था। हव्वे का डर भी देखा था। पसीने भी पोछते जा रहे थे और डर भी रहे थे कि अब क्या होगा? हव्वा समाप्त तो डर समाप्त और डर समाप्त तो खेल समाप्त! 70 साल से जो पाकिस्तान और गाँधी-नेहरू खानदान मिलकर हव्वा-हव्वा खेल रहे थे, उस खेल का ऐसे बेदर्दी से अन्त पच नहीं रहा है। पाकिस्तान के पास तो इस खेल के अलावा और दूसरा खेल ही नहीं है, सभी लोग बस एक ही खेल रात-दिन खेले जा रहे थे। लेकिन अब?

हव्वा तो उड़ गया लेकिन उसके डर को ये लोग ढूंढ रहे हैं, भागते चोर की लँगोटी की तरह! हव्वा तो अब कश्मीर में वापस आएगा नहीं, उसका डर  भी भाग ही जाएगा लेकिन डर इनके अन्दर घुस गया है वह जाता नहीं। बे फालतू घूम रहे हैं और हव्वे को ढूंढ रहे हैं। अपने साथ झाड़-फूंक वालों को भी लेकर घूम रहे हैं कि हव्वा ना सही डर को तो अभी स्थापित कर ही दें लेकिन डर कश्मीर की जगह इनके दिलों को डरा रहा है कि अब क्या होगा? लगे रहो, तुम्हारा डर ही आमजन के डर को निकालकर बाहर करेगा। तुम अब धूणी रमाओ और कश्मीर को खुली हवा में साँस लेने दो। राम-राम भजने का समय आ गया है तो राम-राम भजो।

भागते रहो

Written By: AjitGupta - Aug• 22•19

कल एक पुराने मित्र घर आए, ताज्जुब भी हुआ कि इतने दिनों बाद! लेकिन मित्र कब बिना बात नाराज हो जाते हैं और कब रास्ता भटककर वापस आ जाते हैं, कौन बता सकता है! खैर मेरी पोस्ट का तात्पर्य और कुछ है तो उसी बिन्दू पर चलते हैं। कहने लगे कि फला व्यक्ति पर मुझे तरस आता है। मैंने पूछा कि क्या हुआ? वे कहने लगे कि अभी दो दिन पहले उन से बात हुई है, कह रहे थे कि इतना पैसा कमा लिया है कि इस पैसे को कहाँ रखें, समझ नहीं आता! सारे घर भर गये हैं, जगह नहीं है लेकिन पैसा तो आ ही रहा है। उनके लिये पैसा समस्या बन चुका है लेकिन स्रोत बन्द नहीं किये जाते। 
जितना जनता से खेंच सको खेंच लो, जितना सरकार से बचा सको बचा लो, बस यही बात हर पैसे वाले के दिमाग में रहती है। पैसा काला होता रहता है, काले पैसे को छिपाने के लिये राजनीति का सहारा लिया जाता है। फिर उस पैसे को शादी समारोह में फूंकने की कोशिश की जाती है। लेकिन जनता से खेंचना और सरकार से बचाना बन्द नहीं होता। यह हमारे स्वभाव में आ जाता है। किसी दिन पाप की गठरी भर जाती है और फिर ऐसे लोग विजय माल्या बन जाते हैं। सुबह मित्र इस गम्भीर समस्या को बता रहे थे और शाम को यह समस्या चिदम्बरम के भागने से और बड़ी होकर सामने आ गयी। 
शरीर में हम जब बहुत ज्यादा शर्करा एकत्र कर लेते हैं तब हम शक्कर से ही भागने लगते हैं, ऐसे ही पैसे का खेल है। अत्यधिक पैसा एकत्र करो और फिर पैसे से ही भागो! अपनी जान बचाने को भागो! पैसे से क्या खरीदना चाहते हो? सम्मान? प्रतिष्ठा? सत्ता? लेकिन क्या मिल पाती है? कुछ दिन मिल जाती है लेकिन फिर सारा सम्मान, सारी प्रतिष्ठा और सारी सत्ता धूल में मिल जाती है। पैसा किसी काम नहीं आता। चिदम्बरम भाग रहा है, कल प्रफुल्ल पटेल भी भागेगा। हो सकता है गाँधी परिवार भी भागे! भारत में भागने की पंचवर्षीय योजना लागू हो चुकी है। यह पाँच वर्ष भ्रष्टाचारियों भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम रहेंगे। 
मुझे इतिहास को टटोलने का थोड़ा सा शौक है, एक पुस्तक हाथ लगी, लेखक का नाम तो याद नहीं है लेकिन था बड़ा नाम। वे लिखते हैं कि जब गाँधी राजेन्द्र बाबू से मिले तब राजेन्द्र बाबू वकालात करते थे और उस समय उनकी एक पेशी की फीस दस हजार रूपये थी। लेकिन बाद में राजेन्द्र बाबू ने सबकुछ त्याग दिया। सरदार पटेल की भी यही स्थिति थी, उनने भी सबकुछ त्याग दिया। उस काल में न जाने कितने लोगों ने सम्पूर्ण समर्पण किया था। वह काल ईमानदारी को अपनाने का था लेकिन आजादी के बाद बेईमानी को अपनाने का काल प्रारम्भ हुआ। बेईमानी बिना जीवन की कल्पना ही नहीं हो सकती, यह सिद्धान्त गढ़ लिया गया। हम सब बेईमानी से धन एकत्र करने में जुट गये। राजनीति तो मानो खदान थी, जितना चाहो धन निकाल लो और अपने खाते में डाल लो। 
लेकिन मोदी ने 65 साल के देश के जीवन का बदलाव किया, बेईमानी की जगह ईमानदारी को स्थापित करने का प्रारम्भ किया। लोग कसमसाने लगे, गाली देने लगे लेकिन धीरे-धीरे यह बात देश में जड़े जमाने लगी कि ईमानदारी से भी आसानी से जी सकते हैं। आज बेईमानी सरदर्द बन गयी है, बेईमानी से कमाया पैसा संकट बन गया है। लोग भाग रहे हैं, चिदम्बरम जैसा व्यक्ति भाग रहा है! पैसे को कहाँ छिपाएं, स्थान खोज रहे हैं! 
अब ईमानदारी की रोटी की इज्जत होने की उम्मीद जगी है। बेईमानी की रोटी जहर बनती जा रही है। जिस दिन लोग पैसे और सुख में अन्तर कर लेंगे उस दिन शायद देश सुखी हो जाएगा और जो हम सुख के इण्डेक्स में बहुत नीचे चल रहे हैं, उसमें भी ऊपर आ जाएंगे। लेकिन अभी तो भागमभाग देखने के दिन शुरू हो चुके हैं। देखते हैं कि कितने भागते हैं और कितने बचते हैं! आज का बड़ा सवाल उपस्थित हो गया है कि क्या इस देश में ईमानदारी स्थापित होगी? क्या इस देश से बेईमानी अपनी जड़े उखाड़ लेगी? पहले चौकीदार कहता था – जागते रहो, अब चोर कह रहे हैं – भागते रहो। चिदम्बरम भाग रहा है, पहले दुनिया को अपनी झोली में भरने को भाग रहा था और अब खुद को बचाने को भाग रहा है, बस भाग रहा है। 

आज स्यापा या खामोशी?

Written By: AjitGupta - Aug• 12•19

एक झटके में देश कितना बदल गया है! अभी दस-बारह दिन भी नहीं बीते हैं जब देश में स्यापा हो रहा था। मोदीजी की डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म – मेन्स / वाइल्ड का ट्रेलर आया था और चारों तरफ शोर मच गया था। गैर जिम्मेदार मीडिया और उनके समर्थक लगे पड़े थे मोदीजी के साहस को कम करने में। मैंने भी एक पोस्ट लिखी थी लेकिन किसी कारण से पोस्ट नहीं हो पायी और तारीख बदल गयी। इतिहास बदल गया। लोगों की सोच बदल गयी। कश्मीर विवाद के घेरे से निकाल लिया गया और साफ-सुथरा सा कश्मीर देश को सौंप दिया गया। मोदीजी क्या कर सकते हैं यह सारी दुनिया ने देखा और समझा। देश से डर निकलने लगा लेकिन विद्रोहियों के मन में घर करने लगा।

आज 12 अगस्त है, मोदी जी की फिल्म डिस्कवरी पर दिखायी जाएगी लेकिन कोई छिछालेदारी नहीं है। वे समझ गये हैं कि इस व्यक्ति में कितना दम है। माननीय न्यायालय पूछ रहा है कि राम का वंशज कौन है? साक्षात मोदी खड़े हैं। राम विष्णु के अवतार थे, उनके हाथ में तीर-धनुष था, फिर कृष्ण का अवतार हुआ और उनके हाथ में सुदर्शन चक्र आ गया लोकिन अब कोई अवतार नहीं, बस कुछ लोगों ने ठान लिया कि हम स्वयं ही इस देश को पाप से मुक्त करेंगे। मोदी के हाथ में कोई हथियार नहीं है, बस वह अभय का मन्त्र देता है और देश भयमुक्त होने लगता है। मोदी ने बिखरी गोटियों का चौसर पर जमा दिया है, किस को कहाँ होना चाहिये यह  बात बता दी है। बस सारी गोटियाँ अपने खाने में रहकर चलना सीख रही हैं।

एक प्रदेश से तीन क्षेत्र जुड़े थे, कश्मीर, जम्मू और लद्दाख। तीनों ही अलग मानसिकता के पोषक थे। तीनों को अपने-अपने अधिकार और कर्तव्य बता दिये गये हैं। जम्मू और लद्दाख दीवाली मना रहे हैं और कश्मीर ईद मना रहा है। कश्मीर ने खामोशी ओढ़ी है, देखना है वे अब देश के लिये कुर्बानी कैसे देते हैं! कल तक उनके हाथ में पत्थर थे, वे भगा रहे थे भारतीय सैनिकों को। आज पत्थर गायब हो चुके हैं, अब राखी हाथ में देने का दिन आ गया है। किसी को हलाल मत करो अपितु रक्षा करो, यह संदेश देने का समय आ गया है।

मोदी ने देश के हर मोहरे को सही स्थान पर बिठा दिया है। कहीं एक परिवार की मनमर्जी चल रही थी तो कहीं दो परिवारों की! सारे देश में ऐसे कितने ही परिवार पनप गये थे लेकिन अब परिवारों की जड़ों में मट्ठा डालने का समय आ गया है। देश समझने लगा है कि लोकतंत्र में परिवार की नहीं जनता-जनार्दन की जय-जयकार होती है।

केरम-बोर्ड के खेल में बोर्ड पर रखी सारी गोटियां चार गड्डों में डाली जाती है, यही देश का हाल हो रहा था। सबकुछ चार गड्डों में डाल दो और जनता के पास कुछ ना रहे। इन दो-चार परिवारों के पास अकूत सम्पदा रहे और सम्पूर्ण शक्ति रहे, यही खेल देश में हो रहा था। कभी काली गोटी और कभी सफेद गोटी, बस हमारी चाल में यही बदलता रहता था।

शासन में कैसे सबकुछ बदलता है, यह मोदीजी ने सिखाया। कल तक जिस बात की कल्पना तक कोई नहीं कर सकता था वह मोदीजी ने चुटकी बजाकर करके दिखाया। बस सोच का अन्तर है, दिशा देने का अन्तर है। कोई दूसरों को कत्ल करके कुर्बानी कहता है और हम राजपाट त्याग कर वन में जाने को भी आज्ञा पालन कहते हैं। इसी अन्तर को मोदीजी ने समझाया है और  देश को इसी दिशा की ओर मोड़ा है। आज डिस्कवरी देखने का दिन है, मोदीजी के साहस से अधिक धैर्य की बात सामने आने वाली है और जो धैर्यवान है बस वही विजेता है। साथ में यह भी देखना है कि गैर जिम्मेदार मीडिया कितनी छिछालेदारी करता है या खामोश रहता है। बस देखना है आज धैर्य कैसे व्यक्ति को महान बनाता है! आज स्यापा होगा या खामोशी?

आप डरना बन्द करिये

Written By: AjitGupta - Aug• 12•19

हम डरे हुए लोग हैं! क्यों डर रहे हैं! यह बात किसी को नहीं पता, पर डर रहे हैं। कल जम्मू कश्मीर के राज्यपाल का डर निकलकर बाहर आया। हरियाणा के मुख्यमंत्री का बयान विवादित भी माना गया और धमकाने के लिये पर्याप्त भी बना। आखिर ऐसी क्या नौबत आ गयी कि बिना जाँचे-परखे, सीधे ही धमकी दे दी गयी कि प्रधानमंत्री से शिकायत करूंगा! इसका कारण है हमारी रगों में बहता हुआ डर। हमारी बहन-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ हुआ, कोई नहीं बोला। किसी को लगा भी नहीं कि यह क्या हो रहा है। आज भी दर्द नहीं होता। लेकिन जरा सी मजाक क्या हो गयी लोग सहिष्णु बन गये। नहीं कोई मजाक भी नहीं। यह डर है जो हमें एक कौम के प्रति सिखाया गया है। जिन्ना डायरेक्ट एक्शन लेकर लाखों का कत्लेआम करता है, विभाजन के समय लाखों का फिर कत्लेआम होता है। डर पैदा करने की भरपूर कोशिश की जाती है। पुराने इतिहास में भी कत्लेआम के अतिरिक्त कुछ नहीं है, मन्दिरों की एक-एक मूर्ति को तोड़ने का इतिहास है। चेहरे से ही क्रूरता टपकनी चाहिये, जिससे दुनिया डरकर रहे, इसके लिये दाढ़ी बढ़ायी गयी, मूंछे भी काट डाली जिससे डरावनापन ज्यादा उभरकर आए। सिख कौम भी इसी डर को समाप्त करने के लिये अस्तित्व में आयी। 
घर में भी देखा होगा, कभी नयी बहु आती है, आते ही तूफान मचा देती है, सब डरने लगते हैं। जब भी उस बहु की बात आए लोग डर जाएं और कहें कि करने दो जो करती है। शरीफ व्यक्ति को कहा जाए कि डरकर रहो, कहीं नाराज ना हो जाए। दामाद भी यही करते रहते थे पहले, डर का वातावरण बनाकर चलते थे ससुराल में। सास-ससुर भी डर का वातावरण बनाकर चलते थे। हमारे देश में एक कौम ने डर का वातावरण बना दिया है। यह डर आज का नहीं है, यह शुरूआती ही है। कोई भी आक्रांता आया इसी डर को साथ लाया और स्थापित करके गया। हमारी देश की माटी में कभी भी किसी ने डर को नहीं उपजाया। हमेशा अभय की बात की। जीवदया की बात की। अनेकान्त की बात कही। स्यादवाद की बात कही। लेकिन इसके विपरीत प्रभु से भी डरने की बात विदेशियों ने की, जबकि हमने कहा कि प्रभु आपसे प्रेम करते हैं, इनसे डरिये मत। हमने मानव के रूप में उन्हें अवतरित किया और कभी बाल रूप में प्रेम किया तो कभी युवा रूप में तो कभी माँ स्वरूप में। बस प्रभु से प्रेम करना सिखाया। 
मोदीजी ने इसी डर पर वार किया है। पहले तीन तलाक के रूप में फिर 370 धारा के रूप में। कश्मीर में डरने की जरूरत नहीं है, डर को बाहर करिये। कश्मीर के लोग हमारे ही हैं और जो हमारे होते हैं हम उनसे मजाक भी करते हैं उन्हें छेड़ते भी हैं। आपस में हँसी-मजाक का वातावरण बनाइए ना कि छोटी-छोटी बातों से डर को अपने अन्दर महसूस करने की। हम डराने वाले लोग नहीं हैं लेकिन अब डर को भी बाहर निकाल दीजिये और ना ही हम भोगवादी समाज हैं जो महिला का सम्मान नहीं करेंगे। साथ रहकर कुछ लोगों में भोगवाद घर कर गया है लेकिन हमारा समाज त्याग को ही महत्व देता है। इसलिये सभी को निश्चिंत रहने की जरूरत है, हमारे देश का मूल समाज प्रत्येक महिला के अन्दर अपनी बहन-बेटी और माँ का ही रूप देखता है। डरिये मत, डर को दूर करने का समय आ गया है। जितना आप डरेंगे उतना ही कुछ लोग आपको डराने का प्रयास करेंगे। सहज बनकर रहिये। प्रेम सिखाइये। वे सब अपने हैं, प्रेम सीख जाएंगे, बस आप डरना बन्द करिये। 

नमन है तुझको कवि!

Written By: AjitGupta - Aug• 10•19

धारा 370 क्या समाप्त हुई, कवि की कविता ही समाप्त हो गयी! कल एक चैनल पर हरिओम  पँवार ने कहा। वे बोले की मैं चालीस साल से कश्मीर पर कविता कह रहा था लेकिन आज मुझे खुशी है कि अब मेरी कविता भी समाप्त हो गयी है। न जाने कितने कवियों ने कश्मीर पर कविता लिखी, सारे देश में कविता-पाठ किया और हर भारतवासी के दिल में कश्मीर के प्रति भाव जगा दिया। उसी भाव का परिणाम है कि आज धारा 370 हटने के बाद देश में अमन-चैन है। हरिओम पँवार कहते हैं कि मैंने आज तक किसी भी सरकार की प्रशंसा में कविता नहीं लिखी लेकिन आज मजबूर हो गया हूँ कि मोदी और अमित शाह के लिए लिखूं।

मैं अक्सर कहती हूँ कि पहले साहित्यकार सपने देखता है फिर वैज्ञानिक उसे  पूरा करते हैं। चाँद का सपना पहले कवि ने ही देखा था, वैज्ञानिक उनकी कल्पना से ही चाँद तक पहुँचने की सोच को धरती  पर उतार सके। कवि कहता है कि मेरे देश में मुझे यह चाहिये और राजनेता उसे पूरा करते हैं। किसी कवि ने कभी यह कल्पना नहीं की थी कि देश के दो टुकड़े होंगे, देश में कश्मीर समस्या बनेगी! लेकिन यह हुआ, और जो बिना कवि की कल्पना के हो वह दुर्घटना ही होती है।

जो राजनेता देश के सपनों को पंख नहीं देता अपितु दुर्घटना में भागीदार बनता है, उसे देश कभी दिल में नहीं बिठाता। कुछ राजनेताओं ने एक मायाजाल बुना और उसमें केवल अपना नाम लिखा। यह अच्छा ही हुआ। कल तक हम कहते थे कि केवल एक परिवार का नाम! आज कह रहे हैं कि अच्छा किया जो एक परिवार का ही नाम लिखा। तुम ही उत्तरदायी हो, केवल तुम ही। तुमने देश को दो टुकड़ों में बाँटकर, कश्मीर को समस्या बनाकर कवि की कल्पना में विष घोल दिया था, उसके उत्तरदायी तुम अकेले ही हो।

जब देश में आजादी की बयार बह रही थी उस समय कवि ने कितने सपने संजोये होंगे! लेकिन उन सपनों पर तुषारापात कर डाला नेहरू-गाँधी ने। जिन्ना ने डराया और गाँधी डर गया! जिन्ना ने कहा कि हमें पाकिस्तान दो नहीं तो मैं सीधी कार्यवाही करूंगा और गाँधी डर गया! जिन्ना ने सीधी कार्यवाही की और तीन लाख लोगों का बंगाल में कत्लेआम करा दिया और गाँधी डर गया! गाँधी नोआखाली में घूमता रहा, डर कर देश को बचाने आगे नहीं आया लेकिन सोहरावर्दी को बचाने नोआखाली में घूमता रहा!

नेहरू-गाँधी डरते रहे और देश बँटता रहा, समस्याओं से लदता रहा, कवि की कल्पना मरती रही। आज कवि ने कहा कि मेरा दर्द सिमट गया, अब फिर नए सपने बुनूंगा और देश की आँखों में भरूँगा। कवि के शब्दों में बहुत बल होता है, वह बूंद-बूंद से घड़ा भरता है और जब घड़ा भरता है तब चारों ओर पानी ही पानी होता है। सत्तर साल से कवि घड़े को भर रहा था, सारा देश पानी ही पानी हो रहा था लेकिन मोदी ने कहा कि कवि थम जा, अपनी लेखनी की शक्ति को अब विश्राम दे, मैं तेरा दर्द समझ गया हूँ और उसने एक छोटी सी गाँठ को खोल दिया, सभी को आजाद कर दिया।

देश पूर्ण बन गया, देशवासियों के सपने पूरे हो गये और विद्रोहियों के सपने चकनाचूर हो गये। अब कवि को विश्राम मिला है। कवि निहार रहा है अब अपने ही देश को, जो कभी उसे सोने नहीं देता था लेकिन आज वह जागकर देश को निहार रहा है। मैं उन सभी कवियों को नमन करती हूँ कि जिनने देश के दिलों को जगाए रखा, सपने को मरने नहीं दिया और आशा को टूटने नहीं दिया। कवि जानता था कि कोई तो आएगा जो हिम्मत जुटा लेगा और कवि को निराश नहीं करेगा। अब कवि नए जोश के साथ देश को सपने दिखाएगा और अपनी आजादी को कैसे बचाकर रखा जाता है उसके लिये भी हमारे अन्दर जोश भरता रहेगा। नमन है तुझको कवि!