अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

नाम शबाना

Written By: AjitGupta - Jul• 14•17

अभी दो दिन पहले एक फिल्म देखी – नाम शबाना। शायद आप लोगों ने देखी होगी और हो सकता है कि नहीं भी देखी होगी, क्योंकि इस फिल्म की चर्चा अधिक नहीं हुई थी। फिल्म बेबी की चर्चा खूब थी, यह उसी फिल्म का पहला भाग था, लेकिन शायद बना बाद में था। खैर छोड़िये इन बातों को, मूल विषय पर आते हैं। एक लड़की है – शबाना, उसकी माँ रोज ही अपने पति से पिटती है। एक दिन माँ चिल्ला उठी – शबाना – शबाना-शबाना। अब शबाना ने एक रोड उठायी और अब्बा के सर पर दे मारी, अब्बा वहीं ढेर हो गये। नाबालिग शबाना को पुलिस ले जाती है और तभी एक फोटो क्लिक होती है – खचाक। नाबालिग होने से शबाना छूट जाती है और कॉलेज में प्रवेश लेती है, वहाँ कराटे क्लास में जाती है – फोटो खिंचती है – खचाक। उसके हर तेवर की फोटो खिंचती है। एक दिन रात को अपने मित्र के साथ आ रही थी कि कुछ गुण्डे घेर लेते हैं, मित्र कुछ नहीं करने की सलाह देता है लेकिन वह नहीं मानती और गुण्डों को मारती है, लेकिन तभी एक गुण्डा उसके मित्र को सर पर वार करता है और वह वहीं मर जाता है। गुण्डे भाग जाते हैं, पुलिस आती है। तीन माह तक वह पुलिस के चक्कर काटती है लेकिन केस आगे नहीं बढ़ता। वह फिर तेवर दिखाती है और पुलिस कहती है कि अब यहाँ मत आना। तभी उसके पास फोन आता है कि तुम इस केस में क्या चाहती हो? वह कहती है कि मैं उस लड़के को मारना चाहती हूँ। सामने से आवाज आती है कि ठीक, हम तुम्हारी सहायता करेंगे लेकिन बदले में तुम्हें हमारे लिये काम करना होगा। हम भी सरकार की गुप्त पुलिस हैं। हमारे पास वर्दी नहीं होती, हमें गुमनामी में ही जीना होता है और गुमनामी में ही मरना होता है। शबाना उनका प्रस्ताव मानती है और वह शामिल हो जाती है, इस गुमनाम पुलिस में। बेबी फिल्म में भी शबाना थी।
फिल्म में बताया गया है कि प्रधानमंत्री की देखरेख में ऐसी स्पेशल सेल का गठन किया गया है, जो अपराधियों को चुपचाप समाप्त करे। काश यह फिल्म ही ना हो लेकिन सच्चाई भी हो। वैसै ऐसे दल हमेशा से सरकारों के काम के हिस्से रहे हैं, लेकिन कई सालों से ये निष्क्रीय हो गये थे, अब शायद वजूद में आए हैं। वर्तमान परिस्थितियों के देखते हुए, जहाँ राजनीति देश में आग लगाने कि परिस्थितियां पैदा करती है, ऐसे विकल्पों पर काम होना ही चाहिये। जो युवा कानून हाथ में लेने का हरदम प्रयास करते हैं, उनको ऐसी सेवाएं देनी ही चाहिये। शबाना का चयन भी हजारों लोगों में से हुआ था, उसके तेवरों को देखकर उसकी फोटो खेंची जा रही थी और समय आने पर उसका चयन किया गया था। जो लोग जोश खाते रहते हैं, उन्हें अपनी सेवाएं देने के लिये सरकार से निवेदन करना चाहिये और इसके लिये वैसा ही प्रशिक्षण भी लेना चाहिये। आज हजारों नहीं लाखों युवाओं की जरूरत है जो देश और समाज की रक्षा के लिये आगे आएं। एक शबाना से काम नहीं चलेगा, आप सभी को आगे आना होगा, जैसे इजरायल में लोग आगे आए हुए हैं। जब विनाश के लिये युवा आगे आ रहे हैं तो बचाव के लिये भी आगे आना ही होगा।
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इस बार सेकुलरवाद की चादर है

Written By: AjitGupta - Jul• 11•17

हम सबके पास एक-एक भ्रम हैं, उस भ्रम की चादर ओढ़कर हम चैन की नींद सोते हैं। जैसे ही भ्रम की चादर हम ओढ़ते हैं, हमारा सम्बन्ध शेष दुनिया से कट जाता है, तब ना हमारे लिये देश रहता है, ना समाज रहता है और ना ही परिस्थिति। याद कीजिए जब सिकन्दर आया था, तब हमारे पास कौन सी चादर थी? ज्ञान की चादर ओढ़कर हम बैठे थे, देश लुट रहा था, कत्लेआम हो रहा था लेकिन हम ज्ञान की चादर की छांव में आराम से बैठे थे। लूट लो जितना लूटना हो इस देश को, हमारा ज्ञान तो नहीं लूट पाओंगे। कभी गजनी आया और कभी बाबर आया, हमने फिर नये भ्रम की चादर ओढ़ ली। हम मोक्ष पाने के मार्ग पर आरूढ़ थे और गजनी और बाबर हमारी आस्था के स्थानों को विध्वंश कर रहे थे। हमने चादर नहीं उतारी। औरंगजेब ने एक-एक मन्दिर की एक-एक मूर्ति को खण्डित कर दिया लेकिन हमारी चादर नहीं उतरी। अंग्रेज आये, उन्होंने चादर ही खींच डाली, सारे मुखौटे भरभराकर गिर गये। उन्होंने कहा कि इस देश को चादर ओढ़कर रहने का बड़ा शौक है, ऐसा करते हैं कि इनकी चादर ही बदल देते हैं, उन्होंने अपनी चादर ओढ़ा दी, हम फिर भी खुश थे। अब नयी चादर ओढ़कर खुश थे, ज्ञान की नयी चादर पाकर हम बेहद खुश हो गये, हमें अपनी ही पुरानी चादर बेकार लगने लगी। खण्डित मूर्तियों के स्थान पर उन्होंने ईसा की मूर्ति पकड़ा दी, हम और खुश हो गये। हमारा इतिहास बदल दिया, हमारी खुशी जारी रही।
लेकिन कुछ लोग थे, ये कुछ लोग इतिहास में हमेशा रहते हैं, कभी ये सफल हो जाते हैं और कभी असफल। सफल तब हो पाते हैं, जब चादर ओढ़े लोगों की चादर उतारने में सफल होते हैं, जब ये लोगों की चादर नहीं उतार पाते तो ये कुछ लोग असफल हो जाते हैं। इन लोगों ने सिकन्दर के जमाने में भी प्रयास किये थे, देश को बचा तो लिया था लेकिन अधिक देर तक चादर को समेट कर नहीं रख पाए। हमने तब मोक्ष की चादर तगड़ी ओढ़ ली थी, हमें इस देश से क्या, हम तो मोक्ष के अधिकारी बनेंगे, बस चादर ओढ़कर बैठ गये। अंग्रेजों के अत्याचारों ने इनकी चादर में छेद कर दिये और ये उन कुछ लोगों का साथ देने लगे। एक दिन हम नये देश के साथ जीने के लिये आजाद हो गये थे। जैसे ही आजाद हुए, हमें चादर की फिर याद आ गयी। अब तो हमारे पास दो चादर थी, एक अंग्रेजियत की और दूसरी अपनी वही पुरानी वाली। चादर के कई स्वरूप हो गये, किसी के पास धर्म की चादर, किसी के पास साहित्य की चादर, किसी के पास पत्रकारिता की चादर, किसी के पास समाज सेवा की चादर। बस चादरे ही चादरे दिखायी देने लगी, देश इन चादरों की भीड़ में कहीं छिप गया। सभी कहते थे कि हमारी चादर से बड़ा देश नहीं हो सकता। ये कुछ लोग सावचेत करने में लगे हैं कि खतरा मंडरा रहा है, देखो और समझो, लेकिन कोई नहीं सुन रहा। सभी इसी भ्रम में हैं कि भला हमें क्या खतरा है? खतरा होने पर जरूरी हुआ तो चादर बदल लेंगे लेकिन अपना भ्रम नहीं तोड़ेंगे।
कल मोसुल शहर इराक के सैनिकों ने आतंकियों से वापस जीत लिया, लेकिन किसे जीत लिया! खण्डित शहर को! आबादी को पहले ही मौत के घाट उतार दिया गया था। मोसुल शहर के वासी तो अपने धर्म की चादर ओढ़े ही बैठे थे फिर क्यों समाप्त हो गये वे सब? कश्मीर में अब मौसुल जैसा ही खेल खेला जा रहा है, कश्मीरियों के हाथों में पत्थर पकड़ा दिये गये हैं, कुछ हथियार भी दे दिये हैं, चलाओ और मरो या मारो। किसी दिन कश्मीर भी कब्रिस्तान बन जाएगा तब कश्मीर वालों की चादर उतरेगी या अन्तिम चादर चढ़ जाएगी? बंगाल में भी नरसंहार की तैयारी कर ली गयी है, यहाँ का तो पुराना इतिहास है, लेकिन इतिहास कौन पढ़ता है? मनोरंजन के इतने साधन हैं, उन से तो फुर्सत मिलती नहीं, आप इतिहास पढ़ने की बात करते हैं? अब हमने बड़ी मुश्किल से तो मनोरंजन की चादर ओढ़ी है, ओढ़े रहने दीजिये। इतिहास के वे कुछ लोग समझा रहे हैं कि अपनी चादर उतार फेंको लेकिन इस बार कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कह रहे हैं कि नहीं चादर मत उतारना, भ्रम की यह चादर बनी रहनी चाहिये। कट जाना लेकिन भ्रम बनाये रखना कि हम सेकुलर हैं। न जाने कितने मौसुल, कितने कश्मीर और कितने बंगाल बिल्ली की नजरों में हैं, लेकिन हम चादर ओढ़े खरगोश हैं। इस बार सेकुलरवाद की चादर है।

कम्यूनिज्म जीतता है या फिर बौद्धिज्म

Written By: AjitGupta - Jul• 09•17

मोदीजी! यह नहीं चलेगा। हम कितनी मेहनत करके एक कहानी बनाते हैं, चीख-चीखकर दुनिया को सुनाते हैं। लोगों में विश्वास भर देते हैं कि हम जो कह रहे हैं, ऐसा ही होने जा रहा है। अब कल की ही बात ले लीजिए, हम मीडिया के लोगों ने चीन से युद्ध तक की स्थिति बना दी थी। लगा था कि बस अब युद्ध होकर ही रहेगा। जनता भी दो खेमों में बंट गयी थी, एक खेमा कह रहा था कि युद्ध हो ही जाने दीजिये तो दूसरा कह रहा था कि युद्ध हुआ तो हमें नुक्सान होगा। ताबड़तोड़ चैनल चल रहे थे, मेप बना-बनाकर समझाया जा रहा था लेकिन कल आपने सारा खेल बिगाड़ दिया। आप चीन के राष्ट्रपति से हँस-हँसकर मिल रहे थे, खबर यह भी आ रही थी कि चीन ने छोटी मीटिंग के लिये निवेदन भी किया है। और तो और चीन ने भी आपके रूख की तारीफ कर डाली। अब फिर चिल्ल-पों मचेगी कि क्या चीन आतंक के खिलाफ खड़ा होगा?
हम जब भी अमेरिका जाते हैं तो हमसे पूछा जाता है कि साथ में कोई बीज तो नहीं है? यदि किसी प्रकार का बीज साथ होगा तो आप उसे अमेरिका में उगा लेंगे और वह अमेरिका के हित में नहीं होगा। चीन भी आतंक की खेती नहीं करता, वह किसी बीज को अंकुरित होने की वजह ही नहीं देता। हम आतंक को खाद-पानी सभी देते हैं फिर आतंक को खत्म करने के लिये चिन्तित होते हैं लेकिन चीन ने सारे ही खाद-पानी बन्द कर दिये हैं। वह आतंक का साथ नहीं दे रहा अपितु पाकिस्तान का साथ दे रहा है। एक मूर्ख देश यदि कुछ टुकड़े डालने पर ही दुम हिलाता रहे तो क्या बुराई है?
दो उभरते हुए पहलवान अपने-अपने दमखम को बढ़ा रहे हैं, मुझे कोई बुराई नहीं दिखायी देती। जिस देश की अधिकांश जनसंख्या बौद्ध हो, वह हमारे नजदीक ही आएगा। मोदीजी इसी भाव को बार-बार उकेरते हैं और इसी भाव के साथ हाथ मिलाते हैं। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि देश में ही ऐसे बहुत सारे तत्व हैं जो इस भाव को पीछे धकेलते रहते हैं। हम सब बौद्ध आयाम को भुला देते हैं और बस याद रहता है तो कम्युनिज्म। जब भी कोई हमारी संस्कृति याद दिलाता है तो मन में हिलोर उठती ही है। एक बार मैंने एक वरिष्ठ प्रचारक से कहा कि आप लोग हमेशा यह बताते हैं कि यह खतरा है और वह खतरा है। लेकिन कभी यह नहीं बताते कि इन खतरों को कम करने के लिए हमारे क्या प्रयास हैं? तब उन्होंने विस्तार से समझाया था कि हम चीन समेत विश्व के सारे बौद्धों को एक करने में लगे हैं। यदि हम सफल होते हैं तब भारत की ताकत सबसे अधिक होगी। मोदीजी का इसी सांस्कृतिक एकता पर बल है। इस एकता की पहल कभी गुजरात में झूला झूलते हुए होती है तो कभी चीन में जिनपिंग के शहर और मोदी को शहर का इतिहास टटोलते हुए होती है तो कभी मानसरोवर की यात्रा प्रारम्भ करते हुए होती है।
ऐसे सेकुलर जो “भारत तेरे टुकड़े होंगे” बोलने वालों के साथ खड़े रहते हैं, जो पाकिस्तान और चीन को एक होते देखते हैं, जो मोदी से इतनी नफरत करते हैं कि उन्हें गुलामी मंजूर है लेकिन मोदी नहीं। इसलिये ये देश को डराते रहते हैं कि मोदी के कारण चीन युद्ध कर देगा। मित्रों मैं तो मोदी पर विश्वास करती हूँ और इसलिये दावे से कहती हूँ कि बाजीराव की चाल पर और मोदी की सोच पर कोई शक नहीं। वे चीन को तुरप के इक्के से साध लेंगे। बौद्ध और हिन्दू सांस्कृतिक दृष्टि से एक हैं, इन्हें साथ आना ही होगा। अब देखना है कि कम्यूनिज्म जीतता है या फिर बौद्धिज्म। मोदीजी देश को ऐसे ही हैरत में डालते रहेंगे, हम भक्तगण खुश होते रहेंगे और सेकुलर बिरादरी हाय-हाय करती रहेगी। देखते रहिये, दुनिया करवट ले रही है, अभी बहुत कुछ देखना और समझना शेष है।

चक्कर देता साहित्य

Written By: AjitGupta - Jul• 07•17

जब मैं नौकरी में थी तब का एक वाकया सुनाती हूँ। कॉपियों का बण्डल सामने था और उन्हें जाँचकर भेजना भी था। लेकिन कहीं से भी आशा की किरण दिखायी नहीं दे रही थी। अब कितनों को फैल करेंगे? आखिर बेमन से जाँच होने लगी, लेकिन यह क्या! एक कॉपी पर कुछ वाक्य पढ़े गये, वही वाक्य बार-बार दोहराए जा रहे थे। लगा कि कुछ ठहरना ही पड़ेगा। छात्र की चालाकी देखिये कि उसने 3-4 वाक्य अनर्गल से ले लिये थे और उन्हें वह बार-बार लिख रहा था। पूरी कॉपी इसी से भरी थी। सच मानिये कि आधा पेज पढ़ते ही चक्कर आने लगे जैसे घुमावदार रास्ते पर चलते हुए आपको चक्कर आने लगते हैं। ऐसा ही कुछ सोशल मीडिया पर हो रहा है। आप एक-एक शब्द को अच्छी तरह से पढ़ लीजिये लेकिन क्या मजाल जो आपको समझ आ जाए कि बन्दा/बन्दी कहना क्या चाह रही है। आप उसके मन की थाह पकड़ ही नहीं सकते। मैं सारा दिन पेज पलटती हूँ लेकिन बस कुछ लोग ही समझ आते हैं। मैं गैंहू में से कंकर नहीं अपितु कंकर में से गैहूँ निकालती हूँ।
ब्लाग पर वापस आओ कि राम-धुन चल रही है, मैं वहाँ पहले भी जाती थी और अब भी जा रही हूँ लेकिन गोल-गोल घुमावदार पहाड़ियों से ही सामना होता है। कुछ लोग अभी भी असहिष्णुता के दौर में ही चल रहे हैं और अब गोल-गोल घूमकर अपनी बात कह रहे हैं। इस गोलाई के कारण कोई सिरा पकड़ में ही नहीं आता। साहित्य के जितने आयाम है, उनका उपयोग सभी करते हैं, लेकिन जो सबसे जरूरी वस्तु है, बस वही गायब है। साहित्य में यदि सामाजिक सरोकार ना हो तो वह कुछ भी नहीं है। लेकिन यहाँ का लेखक सबसे अधिक समाज से ही भाग रहा है, वह लिखना ही नहीं चाह रहा है, समाज का सच। उसने कपोल-कल्पित कहानियां गढ़ ली हैं, जो शायद ही किसी समाज की हो, उसे थोपने को ही साहित्य समझ बैठा है। प्रेम तो ऐसे टपक रहा है जैसे इस संसार में नर-मादा के प्रेम के अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं। नर-मादा का प्रेम नहीं होता यह तो प्रकृति जन्य है, प्रेम तो हमारे अन्दर का वह भाव है जो प्राणी मात्र के लिये होता है। यहाँ एक हिंसक व्यक्ति या हिंसक समूह को भी इंगित नहीं किया जाता अपितु कहा जा रहा है कि तू ही हिंसक नहीं है, देख हम सब भी हिंसक है।
ऐसा साहित्य जो लोगों को दिशा ना दे सके, ऐसा साहित्य जो केवल भ्रमित करे, ऐसा साहित्य जो पाप और पुण्य को एक तराजू पर तौले, उसे कैसे साहित्य कह सकेंगे? मनोरंजन के लिये भी साहित्य होता है और उसमें भी समाज की मनोदशा झलकती है। लेकिन यहाँ तो उसे भी घुमावदार रास्तों का खेल बना दिया गया है। जो बात पुरुष पर लागू होती है वह स्त्री पर लागू कर दी गयी है और जो स्त्री पर लागू होती है, वह पुरुष पर। सोशल मीडिया ना हुआ, आजादी हो गयी। हर कोई नारे लगा रहा है – हमें चाहिये आजादी। सारा दिन इन गलियों में घूमकर केवल खाक छानी जा रही है, भूसे से सुई ना कल मिली थी और ना आज मिल रही है। क्या इस भीड़ को भी कोई नियन्त्रित कर सकता है? क्या यहाँ भी कोई समीक्षक पैदा हो सकते हैं? या फिर वाह-वाह के समूहों में ही सिमटकर रह जाएगा, सोशल मीडिया का लेखन।

मोदी का मोशा से क्या रिश्ता है?

Written By: AjitGupta - Jul• 05•17

मोदी बनना सरल नहीं है। जो लोग मोदी को राजनैतिक चश्मे से देखते हैं, वे मोदी के लिये जौहरी नहीं हो सकते। मोदी की राजनीति, अव्यवस्था पर प्रहार करती है, मोदी की राजनीति, अकर्मण्यता पर प्रहार करती है, मोदी की राजनीति, आतंक पर प्रहार करती है। मोदी व्यवस्था को सुचारू करना चाहते हैं, मोदी आम और खास को कर्तव्य का पाठ पढ़ाना चाहते हैं, मोदी देश को सुरक्षित करना चाहते हैं। मोदी के हिस्से हजारों काम है, मोदी हजार प्रकार से सोचते हैं, मोदी हजार प्रकार से काम करते हैं। उनकी कार्यशैली को कोई नहीं समझ पाया है। वे एक जगह रहते हुए भी हजार जगह होते हैं। लेकिन उनके हर काम में मुझे एक बात समान दिखायी देती है और यही बात उन्हें सभी से अलग करती है। राजनेता अनेक हुए हैं, एक से एक कूटनीतिज्ञ भी हुए हैं। दुनिया ने उनका लोहा माना है, ऐसे भी अनेक हुए हैं। लेकिन एक खास बात है – मोदी में, जो शायद ही किसी में हो। मैं हमेशा उनके उसी पक्ष को देखती हूँ और अभिभूत हो जाती हूँ। शायद उनके विरोधी इस पक्ष को ना देख पाते हों, फिर उन्हें यह पक्ष एक ढोंग लगता हो। लेकिन मुझे नहीं लगता, क्योंकि व्यक्ति एक बार ढोंग कर सकता है, दो बार कर सकता है लेकिन हर बार नहीं कर सकता। फिर ढोंग करने के लिये भी तो सोच होनी चाहिये। कहाँ ढोंग करना है, इसका विवेक भी तो होना चाहिये।
मोदी इजरायल जाते हैं, अनेक कार्यक्रम में उलझे हैं। 70 साल से प्रतीक्षित रिश्तों के कई ताने-बाने बुनने हैं। लेकिन मेरे लिये एक बात खास बन जाती है। सीधे दिल पर आकर लगती है। एंकर बता रहा है कि वे मोशा से मिलेंगे। मेरी उत्सुकता बढ़ती है कि मोशा कौन है! शायद कोई होनहार बच्चा होगा! लेकिन एंकर बता रहा है कि मोशा वह बच्चा है जो 26/11 के मुम्बई हमले में अपने माता-पिता को खो देता है। माता-पिता यहूदी हैं और उनका यही सबसे बड़ा जुर्म है कि वे यहूदी हैं। आतंक के सहारे सम्प्रदाय का विस्तार करने वाले, मोशा के सारे परिवार को मौत के घाट उतार देते हैं। नन्हा दो साल का मोशा अपनी हिन्दुस्तानी आया की दूरदर्शिता से बच जाता है। आज वह अपने दादा-दादी के पास इजरायल में है। अब वह 10 साल का हो गया है। भारत का यह अनोखा प्रधानमंत्री मोशा से मिलने जा रहा है, साथ ही उस आया से भी मिलने जा रहा है। मोदी अपने रिश्ते परिवार की भावना से जोड़ते हैं, वे राजनीति को भी परिवार से ही साधते हैं। तभी तो नवाज शरीफ की माँ के लिये भी शॉल लेकर जाते हैं और उनके चरणों में प्रणाम भी करते हैं। मोदी बता देना चाहते हैं दुनिया को कि भारत में वसुधैव कुटुम्बकम् की बात केवल राजनीति के लिये नहीं कही थी, वे दिल से सभी को परिवार मानते हैं, तभी एक नन्हें बच्चे से जाकर मिलते हैं। क्योंकि वे मानते हैं कि उनके देश में ही इस बच्चे का संसार उजड़ा था और इसके साथ दर्द का रिश्ता जोड़ लेते हैं। वे मानते हैं कि माँ हमेशा वन्दनीय होती है फिर चाहे शत्रुता निभा रहे पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री की ही माँ क्यों ना हो।
बस मोदी इन्हीं बातों से दिल में जगह बना लेते हैं। उनका भावुक होना ही उन्हें महान बनाता है। आप इसे कुछ भी नाम दें लेकिन मेरे लिये मोदी संवेदनशीलता का नाम है। ऐसी संवेदनशीलता जो परिवारों के रक्त सम्बन्धों में दौड़ती है, ऐसी संवेदनशीलता जो अपनी जाति और देश के लिये दौड़ती है, ऐसी संवेदनशीलता जो सम्पूर्ण प्राणी मात्र के लिये दौड़ती है। मैं इसी संवेदनशीलता के कारण उन्हें प्रणाम करती हूँ।