अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

दे थप्पड़ और दे थप्पड़

Written By: AjitGupta - Apr• 12•18

राष्ट्रमण्डल खेलों का जुनून सर चढ़कर बोल रहा है और लिखने के लिये समय नहीं निकाल पा रही हूँ, लगता है बस खेलों की यह चाँदनी चार दिन की है तो जी लो, फिर तो उसी अकेली अँधेरी रात की तरह जिन्दगी है। कल शूटिंग के मुकाबले चल रहे थे, महिला शूटिंग में श्रेयसी सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। स्वर्ण पदक मिलता इससे पहले ही खेल बराबरी पर थम गया और अब बारी आयी शूट-ऑफ की। इस समय किसी भी खिलाड़ी के दिल की धड़कने बढ़ ही जाती है लेकिन कौन अपने दीमाग को संतुलित रख पाता है, बस वही जीतता है। आखिर श्रेयसी अपने आप को संतुलित रखने में सफल हो गयी और स्वर्ण पदक पर कब्जा कर लिया। दूसरा गेम पुरुषों के बीच था, भारत के दो खिलाड़ी आगे चल रहे थे लेकिन जैसे-जैसे वे पदक के नजदीक आ रहे थे उनका धैर्य चुकता जा रहा था और मित्तल तो आखिरी क्षणों में संतुलन ही खो बैठे और कांस्य से समझौता करना पड़ा। अधिकतर खेलों में दीमाग का संतुलन रखने में महिला खिलाड़ी पुरुषों से अधिक सफल रहीं।
आम जीवन में हम सुनते आये हैं कि महिला जल्दी धैर्य खो देती हैं जबकि पुरुष हिम्मत बनाए रखता है। लेकिन इन खेलों को देखकर तो ऐसा नहीं लग रहा है। महिला ज्यादा सशक्त दिखायी दे रही हैं। जैसै-जैसे महिलाएं दुनिया के समक्ष आता जाएंगी, उनके बारे में बनायी धारणाएं बालू के ढेर की तरह बिखरती जाएंगी। यहाँ भी तुम्हें धैर्य नहीं खोना है, आधी दुनिया तुमने पार कर ली है बस अब बाकी की आधी दुनिया शीघ्र ही तुम पार कर लोगी फिर यह दुनिया वास्तविक दुनिया बनेगी।
मेरे कार्यस्थल के एक साथी थे, गुटका खा रहे थे तो मैंने टोका, वे बोले की पुरुष हूँ तो कोई ना कोई नशा तो करूंगा ही। कोई गुटका खा रहा है, कोई सिगरेट, कोई शराब तो कोई भांग और अब तो जहरीले नशे भी उपलब्ध हैं। नशा नहीं भी है तो गालियों का सहारा लेते हैं या हिंसा का। तुर्रा यह कि पुरुष हैं। लेकिन सारे ही नशे आपकी मानसिक स्थिति के परिचायक हैं। दुनिया में प्रतिशत देख लो, महिलाएं नशे के लिये कितना नशा करती हैं और पुरुष कितना? एक हास्य कलाकार हैं – अमित टंडन, वे किस्सा सुना रहे थे कि लड़का केवल पैदा होता है, घर वाले भी कहते हैं कि बस तू तो पैदा हो जा, इतना ही बहुत है। लेकिन लड़की को सिखाते हैं कि यह सीख ले और वह सीख ले नहीं तो पता नहीं सामने वाला कैसा मिलेगा! लड़के को कहते है कि देख कहना मान ले नहीं तो काला कुत्ता आ जाएगा। जब लड़का समझने लायक होता है और 7-8 साल का हो जाता है तब काले कुत्ते को देखता है और कहता है कि यह काला कुत्ता था, जिससे मुझे डराया जाता था कि काला कुत्ता आ जाएगा और दे थप्पड़ और दे थप्पड़, कुत्ते को मार देता है। जब लड़की की शादी होती है और 6 महिने निकल जाते हैं तो कहती है यह था वो सामने वाला कि यह सीख ले और वह सीख ले! फिर दे थप्पड़ और दे थप्पड़। दुनिया आँखे खोलो, नशे से बाहर आओ, महिलाओं के साथ रहना सीखो और इस दुनिया को सुन्दर बनाने में अपनी ऊर्जा लगाओ। जीवन को खेल की तरह लो और अपना संतुलन बनाए रखो।

द्वेष की आग कितना जलाएगी?

Written By: AjitGupta - Apr• 04•18

सोमनाथ का इतिहास पढ़ रही थी, सेनापति दौड़ रहा है, पड़ोसी राजा से सहायता लेने को तरस रहा है लेकिन सभी की शर्ते हैं। आखिर गजनी आता है और सोमनाथ को लूटकर चले जाता है। कोई “अपना” सहायता के लिये नहीं आता, सब बारी-बारी से लुटते हैं लेकिन किसी की कोई सहायता नहीं करता! इतना द्वेष हम भारतीयों में कहाँ से समाया है! हम एक दूसरे को नष्ट कर देना चाहते हैं, फिर इसके लिये हमें दूसरों की गुलामी ही क्यों ना करनी पड़े! हमारा इतिहास रामायण काल में हमें ले जाता है, मंथरा और कैकेयी का द्वेष दिखायी पड़ता है, महाभारत काल में तो सारा राष्ट्र ही दो भागों में विभक्त हो जाता है, चाणक्य काल में छोटे-छोटे राजा एक-दूसरे की सहायता करने को तैयार नहीं और सिक्न्दर आकर विजयी बनकर चले जाता है। चाणक्य कोशिश करते हैं और कुछ वर्षों तक एकता रहती है फिर वही ढाक के तीन पात! कल पोरस सीरियल देख रही थी, फारसी राजा कहता है कि तुम भारतीयों में वतन परस्ती नहीं है केवल अपनों से मोहब्बत करते हो, अपनों के कारण वतन को दाव पर लगा देते हो। मुझे लगता है कि मोहब्बत नहीं द्वेष कहना चाहिये था, हमारे अन्दर द्वेष भरा है और यह शायद हमारे खून में ही सम्म्लित है। द्वेष की आग हमारे अन्दर धूं-धूं जल रही है, किसी को भी कुछ प्राप्त हो जाए, हम सहन नहीं कर पाते। किसी अपने की या परिचित को सत्ता मिल जाये, यह तो कदापि नहीं। हम गुलामी में खुश रहते हैं। हम बार-बार गुलाम बनते हैं लेकिन हम सीखते कुछ नहीं हैं। हम टुकड़े-टुकड़े होते जा रहे हैं लेकिन बिखरना बन्द नहीं करते। हम अपने छोटे से लाभ के लिये किसी को भी भगवान मान लेते हैं, फिर अपनों को ही मारने निकल पड़ते हैं।
जंगल के जीवन पर आधारित फिल्म देख लीजिये, सभी अपना शिकार ढूंढते मिल जाएंगे। कल देखी थी ऐसी ही एक फिल्म, शेर शिकार के लिये निकला है, सामने बड़े सींग वाले जानवर थे, पार नहीं पड़ी। भूख लगी थी तो छोटे शिकार के लिये प्रस्थान किया और सदा के शिकार हिरण को दबोच लिया। हिरण में भी देखा गया कि कब कोई अपने झुण्ड से अलग हो और अकेले पाकर दबोच लिया जाए। मानवों में भी यही प्रकृति का कानून लागू है, शिकारी ताक में बैठे हैं कि कब कोई झुण्ड में अकेला हो और उसे दबोच लिया जाए। ऐसे ही नहीं बन गये अपनी-अपनी सम्प्रदाय के सैकड़ों देश और हम अपने प्राचीन देश को भी बचा नहीं पा रहे हैं। किस को समझाना? यहाँ तो सारे ही द्वेष की आग में जल रहे हैं, आज से नहीं हजारों साल से जल रहे हैं। द्वेष की आग समाप्त होती ही नहीं, हमारा सबसे बड़ा हथियार ही यह द्वेष बन गया है। हम एक-दूसरे को कुचल देना चाहते हैं, गरीब होने पर सम्पन्न को कुचल देना चाहते हैं और सम्पन्न होने पर गरीब को कुचल देना चाहते हैं। हम ना अमीर बनने पर द्वेष मुक्त होते हैं और ना ही गरीब रहने पर। हमारा पोर-पोर द्वेष से भरा है। हमारे देश में न जाने कितने महात्मा आये, सभी ने राग-द्वेष को अपने मन से निकालने की बात कही लेकिन जितने महात्मा हुए, उतना ही राग-द्वेष हम में बढ़ता चला गया। एक-एक महात्मा के साथ सम्प्रदाय जुड़ता चला गया और फिर अपने-अपने राग-द्वेष जुड़ते गये। दो महात्माओं ने एक ही बात कही लेकिन शिष्य अलग-अलग बन गये और फिर द्वेष ने जन्म ले लिया। वे पूरक नहीं बने अपितु विद्वेष के कारण बन गये। जबकि दुनिया में ऐसा नहीं हुआ, ना ज्यादा आए और ना ही ज्यादा ने अपना-अपना सम्प्रदाय अलग किया। वे शिकारी की भूमिका में रहे ना कि शिकार की। हम हमेशा शिकार ही बने रहे या अधिक से अधिक खुद के रक्षक बस। कैसे ठण्डे छींटे मारे जाएं, जो हमारे द्वेष की आग को समाप्त कर दे। हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे द्वेष का कारण क्या है, हम किस पर वार कर रहे हैं? एक गरीब व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है, उसके ही खिलाफ हम गरीबों में द्वेष भरते हैं और फिर लोकतंत्र को बन्दी बनाकर राजशाही को स्थापित कर देते हैं। सारे गरीब खुश हो जाते हैं। फिर कोई द्वेष नहीं, चारों तरफ अमन-चैन स्थापित हो जाता है। मन हमेशा पूछता है कि कब होंगे हम इस द्वेष से मुक्त लेकिन देश का चलन देखकर लगता है कि शायद कभी नहीं।

भ्रष्टाचार का प्रथम गुरु

Written By: AjitGupta - Apr• 02•18

बचपन की कुछ बाते हमारे अन्दर नींव के पत्थर की तरह जम जाती हैं, वे ही हमारे सारे व्यक्तित्व का ताना-बाना बुनती रहती हैं। जब हम बेहद छोटे थे तब हमारे मन्दिर में जब भी भगवान के कलश होते तो माला पहनने के लिये बोली लगती, मन्दिर की छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिये धन की आवश्यकता होती थी और इस माध्यम से धन एकत्र हो जाता था। उस समय 11 और 21 रूपए भी बड़ी रकम हो जाती थी लेकिन हमारे लिये तो यह भी दूर की कौड़ी हुआ करती थी। बोली लगती और कभी 11 में तो कभी 21 में किसी बच्चे को अवसर मिलता की वह माला पहने। माला पहनने के बाद उस बच्चे को सारी महिलाएं मन्दिर की स्कूल जैसी घण्टी बजाकर और गीत गाकर घर तक छोड़ती थी। हमें ऐसा सौभाग्य कभी नहीं मिला, हम कल्पना भी नहीं करते थे, क्योंकि हमारे पिताजी के तो आदर्श ही अलग थे। जैसे ही हमारे गाँव से, परिवार की किसी कन्या के विवाह का समाचार आता, पिताजी 5000 रू. का चेक भेज देते थे। उस समय उनका वेतन 500 रू. से अधिक नहीं रहा होगा लेकिन वे हमेशा 5000 रू. भेजते रहे। इस बात से परिवार में उनका सम्मान नहीं होता था अपितु विरोध होता था। इन दोनों ही घटनाओं का हमारे जीवन में प्रभाव पड़ना लाजिमी था। जैसे ही हम समर्थ हुए और किसी ने हमें भी चन्दा देने के योग्य समझा तो हम भी बचपन में जा पहुंचे और तत्काल चेक काट दिया। जितना हमारा सामर्थ्य होता हम चन्दा जरूर देते और परिवार के लिये भी जितना करना होता जरूर करते। लेकिन जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया हमें लगने लगा कि समाज और धार्मिक संस्थाओं को चन्दा उगाहने की बीमारी लग गयी है। जरूरत से कहीं अधिक और असीमित पैसा एकत्र किया जाने लगा है। जो जितना चन्दा दे, उसका उतना ही सम्मान हो, बाकि किसी भी श्रेष्ठ कार्य करने वाले का सम्मान तो असम्भव हो गया।
हमारे समाज जीवन में पैसे का मोह बढ़ने लगा, आवश्यकता से अधिक पैसा एकत्र करने की होड़ लग गयी, क्योंकि हमें समाज के मंचों पर बैठने की लत लग गयी थी। पैसा एकत्र करो, कैसा भी पैसा हो, बस एकत्र करो और धार्मिक से लेकर सामाजिक मंचों पर कब्जा कर लो। किसी भी संस्था ने श्रेष्ठ व्यक्ति को कभी सम्मानित नहीं किया, बस पैसा ही प्रमुख हो गया। मैंने बचपन में देखा था कि मन्दिर में 21 रू. देने पर गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकलता था और परिवार में 5000 रू. देने पर भी आलोचना सुनने को मिलती थी। समाज का दृष्टिकोण बदलने लगा और सारा ध्यान येन-केन-प्रकारेण धन संग्रह पर जाकर अटक गया। हर व्यक्ति समाज के सम्मुख दानवीर बनना चाहता है, समाज भी नहीं पूछता कि यह धन कैसे एकत्र किया? तो भ्रष्टाचार का प्रथम गुरु यह चन्दा है। चन्दे से प्राप्त यह सम्मान है। मैं हमेशा सामाजिक संस्थाओं में अनावश्यक पैसा एकत्र करने का विरोध करती रही, जब लगा कि यह एकत्रीकरण मिथ्या है तो हाथ रोक लिये। हमने हाथ रोके तो हमारे हाथ भी रोक दिये गये। आज समाज में व्यक्तित्व की चर्चा नहीं है ना ही कृतित्व की चर्चा है, बस पैसे की चर्चा है। मेरे परिवार का खर्चा हजारों में चल जाता है लेकिन मुझे जब गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकलने की याद आती है तब मैं लाखों कमाने की सोचने लगती हूँ और लाखों तो ऐसे ही नहीं आते! लोग करोड़ों रूपये चन्दे में देकर सम्मान खऱीद रहे हैं, समाज भी उन्हें ही सम्मानित कर रहा है, तो फिर भ्रष्टाचार से पैसा कमाने की होड़ तो लगेगी ही ना! आज संस्थाओं में होड़ लगी है – भव्यता की। मन्दिरों में होड़ लगी है – विशालता की और व्यक्तियों में होड़ लगी है – महानता की। ऐसे लगने लगा है कि ये संस्थाएं समाज को उन्नत नहीं कर रही हैं अपितु पैसा कमाने के मोह में उलझा रही हैं, पुण्य कमाने का मोह हम पर हावी कर दिया गया है, जैसे बासी रोटी को कुत्तों के सामने डालने को हम पुण्य समझने लगे हैं वैसे ही संस्थाओं में अनावश्यक चन्दा देकर हम समाज को लालची बना रहे हैं। यही कारण है कि समाज को सत्य दिखायी नहीं दे रहा है कि कैसे हम तलवार की नोक पर आखिरी सांसे गिन रहे हैं लेकिन टन-टन बजती घण्टी वाला जुलूस हमें ललचा रहा है। हम खुद को पैसे के भ्रष्टाचार में डुबो रहे हैं और देश को कमजोर कर रहे हैं। जिस भी देश का समाज लालची होगा, वह देश कभी भी गुलाम होने में समर्थ होगा। सामर्थ्यवान व्यक्ति आज घर में बैठे हैं और पैसे वाले समाज का आईना बन बैठे हैं, तब भला देश कैसे और कब तक स्वतंत्र रह पाएगा?

माँ से मिलती है बुद्धिमत्ता

Written By: AjitGupta - Mar• 31•18

माँ से मिलती है बुद्धिमत्ता
बहुत दिनों की ब्रेक विद बिटिया के बाद आज लेपटॉप को हाथ लगाया है, कहाँ से शुरुआत करूं अभी सोच ही रही थी कि बिटिया ने पढ़ाये एक आलेख का ध्यान आ गया। आलेख सेव नहीं हुआ लेकिन उसमें था कि हमारी बुद्धिमत्ता अधिकतर माँ से आती है। क्रोमोजोम की थ्योरी को इसके लिये जिम्मेदार बताया गया था। एक किस्सा जो बनार्ड शा के बारे में आता है और अभी इस देश की धरती पर देखें तो धीरू भाई अम्बानी और कोकिला बेन पर फिट बैठता है। बनार्ड शा को एक खूबसूरत महिला ने विवाह का प्रस्ताव रखा और कहा कि आपकी बुद्धि और मेरी खूबसूरती से मिलकर जो संतान होगी, वह सुन्दर और बुद्धिमान होगी। बनार्ड शा ने कहा कि यदि मेरी सूरत और तुम्हारी बुद्धि संतान को प्राप्त हो गयी तो? धीरू भाई अम्बानी ने यह प्रयोग कर लिया लेकिन विज्ञान ने अब सिद्ध कर दिया कि अधिकतर बुद्धिमत्ता माँ से ही आती है, एक्स क्रोमोजोम का जोड़ा ही इसके लिये उत्तरदायी होता है। मैंने जैसे ही आलेख देखा, मेरी माँ के प्रति मेरा आदर एकदम से बढ़ गया, क्योंकि हम तो आजतक यही मानते आये थे कि हमें बुद्धिमत्ता पिताजी से मिली है। माँ को कभी बुद्धिमत्ता दिखाने का अवसर ही नहीं मिला, तो हमने भी सोच लिया कि पिताजी ही अधिक बुद्धिमान थे लेकिन आज मैं तो बहुत खुश हूँ और शायद बहुत लोग इसे पढ़कर खुश हो जाएंगे कि बुद्धिमत्ता माँ से मिलती है।
एक कॉमेडी शो देख रही थी, उसमें आ रहा था कि लड़के का काम होता है केवल पैदा होना बस। उसे कोई काम नहीं सिखाया जाता जबकि लड़की को हर पल होशियार किया जाता है। अब तो यह मजाक की बात नहीं रही अपितु सत्य हो गयी कि वे माँ से बुद्धिमत्ता लेते हैं और अपने तक ही सीमित रखते हैं जबकि बेटियाँ अपनी संतानों को भी हिस्सा बांटती है। जो भी हमारे पास है वह माँ का दिया हुआ है, कोई बिरला ही होता है जो पिता से ले पाता है। इसलिये जितनी ज्यादा लड़कियां, उतनी अधिक बुद्धिमत्ता। परिवार में बुद्धिमान संतान चाहिये तो सुन्दरता के स्थान पर बुद्धिमान माँ की तलाश करो, बिटिया को अधिक से अधिक ज्ञानवान बनाने का प्रयास करो। स्वामी विवेकानन्द से जब भी कोई कहता था कि आप बहुत बुद्धिमान हैं तो वे हमेशा यही कहते थे कि मेरी माँ अधिक बुद्धिमान है। मोदीजी के बारे में भी मैं हमेशा कहती रही हूँ कि उन्होंने माँ की बुद्धि पायी है तभी वे आत्मविश्वास से पूर्ण है। अब अपने चारों ओर निगाह घुमाओ और जानो की सबकि बुद्धिमत्ता का राज क्या है? माँ की खामोशी पर मत जाओ, उसने खामोश रहकर भी तुम्हें बुद्धिमत्ता दी है और कोशिश करो कि तुम्हारी बेटी भी ज्ञानवान बने जिससे हमारी पीढ़ी उत्तम पीढ़ी बन सके। लड़कियों तुम भी अपना समय ब्यूटी-पार्लर की जगह पुस्तकालय में बिताओं जिससे जमाना तुम पर गर्व कर सके।

स्वार्थवाद का जेनेटिक परिवर्तन

Written By: AjitGupta - Mar• 16•18

कल मुझे एक नयी बात पता चली, आधुनिक विज्ञान की बात है तो मेरे लिये नयी ही है। लेकिन इस विज्ञान की बात से मैंने सामाजिक ज्ञान को जोड़ कर देखा और लिखने का मन बनाया। मेरा बेटा इंजीनियर है और उनकी कम्पनी ग्राफिक चिप बनाती है। कम्पनी की एक चिप का परीक्षण करना था और इसके लिये लन्दन स्थित प्रयोगशाला में परीक्षण होना था। मुझे कार्य की जानकारी लेने में हमेशा रुचि रहती है तो मैंने पूछा कि कैसे परीक्षण करते हो? उसका भी पहला ही परीक्षण था तो वह भी बहुत खुश था अपने सृजनात्मक काम को लेकर। उसने बताया कि हमारी चिप, कम्प्यूटर से लेकर गाडी और हवाईजहाज तक में लगती है तो इसकी रेडियोधर्मिता के लिये परीक्षण आवश्यक होता है। सृष्टि के वातावरण में रेडियोधर्मिता पायी जाती है इसलिये चिप को ऐसा डिजाइन करना पड़ता है जिससे उसके काम में बाधा ना आए और वह अटक ना जाए। चिप को एटामिक पावर से गुजरना पड़ता है और खुद की डिजाइन को सशक्त करना होता है। जहाँ भी परीक्षण के दौरान चिप में एरर आता है, वहीं उसके डिजाइन को ठीक किया जाता है। खैर यह तो हुई मोटो तौर पर विज्ञान की बात लेकिन अब आते है समाज शास्त्र पर। मनुष्य को भी जीवन में अनेक संकटों से जूझना पड़ता है और इस कारण बचपन से ही हमें उन परिस्थितियों का सामना करने के लिये संस्कारित किया जाता है।
हमारा बचपन बहुत ही कठोर अनुशासन में व्यतीत हुआ है, पिताजी अक्सर कहते थे कि सोने के तार को यदि जन्ती से नहीं निकालोगे तो वह सुदृढ़ नहीं बनेगा उसी भांति मनुष्य को भी कठिन परिस्थितियों से गुजरना ही चाहिये। वे हमें अखाड़े में भी उतार देते थे तो घर में चक्की पीसने को भी बाध्य करते थे। हम संस्कारित होते रहे और हमारे इरादे भी फौलादी बनते गये। हमारे सामने ऐसे पल कभी नहीं आये कि जब सुना हो कि यह लड़की है इसलिये यह काम यह नहीं कर सकती, हाँ यह बात रोज ही सुनी जाती थी कि स्त्रियोचित काम में समय बर्बाद मत करो, यह काम पैसे देकर तुम करवा सकोगी। काम आना जरूर चाहिये लेकिन जो काम आपको लोगों से अलग बनाते हैं, उनपर अधिक ध्यान देना चाहिये। ये संस्कार ही हैं जो हमें प्रकृति से लड़ने की ताकत देते हैं, कल एक डाक्यूमेंट्री देख रही थी, उसमें बताया गया कि 5000 वर्ष के पहले मनुष्य ने अपना जीवन बचाने के लिये पशुओं का दूध पीना प्रारम्भ किया था। अपनी माँ के अतिरिक्त किसी अन्य पशु के दूध को पचाने के लिये शरीर में आवश्यक तत्व नहीं होते हैं लेकिन हमने धीरे-धीरे शरीर को इस लायक बनाया और हमने जेनेटिक बदलाव किये लेकिन आज भी दुनिया की दो-तिहाई जनसंख्या दूध को पचा नहीं पाती है। इसलिये शरीर को सुदृढ़ करने के लिये मनुष्य भी अनेक प्रयोग आदिकाल से करता रहा है, बस उसे हम ज्ञान की संज्ञा देते हैं और आज विज्ञान के माध्यम से समझ पा रहे हैं।
हमारे अन्दर शरीर के अतिरिक्त मन भी होता है, शरीर को सुदृढ़ करने के साथ ही मन को भी सुदृढ़ करना होता है। हमें कितना प्रेम चाहिये और कितना नहीं, यह संस्कार भी हमें परिवार ही देता है। जिन परिवारों में प्रेम की भाषा नहीं पढ़ायी जाती, वहाँ भावनात्मक पहलू छिन्न-भिन्न से रहते हैं। हमारे युग में मानसिक दृढ़ता तो सिखायी जाती थी लेकिन भावनाओं के उतार-चढ़ाव से अनभिज्ञ ही रखा जाता था लेकिन आज इसका उलट है। अब हम अपनी संतान को भावनात्मक भाषा तो सिखा देते हैं लेकिन शारीरिक और मानसिक दृढ़ता नहीं सिखा पाते, परिणाम है अनिर्णय की स्थिति। हमारे शरीर की चिप इस भावनात्मक रेडियोधर्मिता की शिकार हो जाती है, कभी हम छोटी सी भावना में बहकर किसी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं और कभी अपनों के भी दुश्मन बन बैठते हैं। हमारी चिप आर्थिक पक्ष की सहिष्णु बनती जा रही है, जहाँ अर्थ देखा हमारा मन वहीं अटक जाता है। यही कारण है कि हम अपने अतिरिक्त ना परिवार की चिन्ता करते हैं और ना ही समाज और देश की। हमारे देश में परिवार समाप्त हो रहे हैं, जब परिवार ही नहीं बचे तो समाज कहाँ बचेंगे! देश की भी सोच छिन्न-भिन्न होती जा रही है इसलिये चाहे राजनीति हो या परिवारवाद, सभी में हमार स्वार्थ पहले हावी हो जाता है। हम धीरे-धीरे स्वार्थवाद से ग्रसित होते जा रहे हैं और इतिहास उठाकर देखें तो लगेगा कि हजारों सालों से हमने इसी स्वार्थवाद को पाला-पोसा है और हमारे जीन्स में भी जेनेटिक परिवर्तन आ गये हैं। कुछ सालों के परिवर्तन से इस जेनेटिक बीमारी को दूर नहीं किया जा सकता है। जब अन्य पशुओं का दूध पचाने योग्य शरीर भी बनने में 5000 साल से अधिक का समय लग गया और वह भी केवल एक-तिहाई जनसंख्या तक ही बदलाव आया है तो भारतीयों को स्वार्थवाद में परिवर्तन लाने के लिये अभी कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।