अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

जहरीला धुआँ फैल रहा है

Written By: AjitGupta - Sep• 13•18

कंटीले तारों से बनी सीमा, इस पार सैनिक तो दूसरी पार महिलाएं। महिलाएं हाथों में किसी पुरुष की फोटो लिये हैं और वे मौन फरियाद कर रही हैं सैनिकों से कि हमारे घर का यह शख्स कहीं खो गया है, आपने देखा है क्या? सैनिक फोटो हाथ में लेते हैं और ना मैं सर हिला देते हैं। महिलाओं की आशा रोज ही बंध जाती है और सड़क की उस पार कंटीले तारों की बाड़े बन्दी तक उनको ले जाती है। यह उस जन्नत के एक गाँव की कहानी है, जिसे कवि ने बड़े गर्व से कहा था कि दुनिया में कहीं जन्नत है तो यहीं है। उजड़े मकान, घर-घर में केवल महिलाएं, मैदान में आवारा से खेलते बच्चे, पूरे गाँव में सैना की उपस्थिति। यह एक फिल्म का दृश्य है, जो कल टीवी पर दिखायी जा रही थी। यह गाँव कश्मीर का नहीं लग रहा था अपितु सीरिया या मौसुल का लग रहा था। एक व्यापारी है, जो लोगों की आम जरूरतों की चीजों को खच्चर और गधों पर लादकर एक गाँव से दूसरे गाँव पहुँचा रहा है। नदी बह रही है और उस नदी पर बर्फ जम रही है, पहाड़ों पर भी बर्फ जमा है, घने जंगल हैं और इन जंगलों में आतंकवादी छिपे हैं। युवा आतंकवादी, किशोर आतंकवादी और उन्हें तलाश है बालकों की जिनकी मासूमियत के सहारे वे आतंक को अंजाम दे सकें। मैदान में बच्चे गोलीबारी का खेल खेल रहे हैं और आतंकवादी उन्हें चुन रहे हैं।
एक कवि जब जन्नत की कल्पना करता है तो उसके मन के अन्दर भी जन्नत होती है, जन्नत जितनी ही पवित्रता होती है, तभी वह जन्नत की कल्पना को शब्द दे पाता है लेकिन आतंकवादी ने कैसी जन्नत बनायी है, इस फिल्म में दिखायी देती है। “यह पहाड़, यह नदी, यह जंगल, बताओ किसके हैं” यह प्रश्न फिल्म में कई बार पूछा गया। वहाँ का बाशिन्दा कहता है कि ऊपर वाले का है, ये पहाड़ हजारों साल से यहीं खड़े हैं, नदी यूं ही बह रही है। आतंकवादी कहता है कि यह पहाड़ तुम्हारा है, इसे तुम्हें लेना है। गरीबी से लड़ती महिलाएं, मनमानी करता साहूकार, शिक्षा से वंचित बचपन सब ऐसे ही दौड़ रहे हैं। मन बार-बार सवाल कर रहा था कि क्या यही कवि की जन्नत है? इसी जन्नत को देखने सैलानी दौड़े जा रहे हैं? क्या हम सैना के बलबूते सीमा पार के इस आतंक से लोगों को राहत दे पाएंगे? विचारों की इस जहरीली हवा को रोक पाएंगे? जो बच्चे आतंक का खेल खेल रहे हों, क्या उन्हें आतंक से दूर रख पाएंगे? सवाल ढेर सारे हैं लेकिन उत्तर कहीं नहीं है! समस्या एक क्षेत्र की भी नहीं है, इस समस्या का जहर हवाओं में घुल रहा है और भारत के सारे आकाश को अपनी आगोश में ले रहा है। क्या सबसे प्राचीन सभ्यता भारत इस जहरीले धुएं के नीचे दम तोड़ देगी? कश्मीर के इस गाँव की कहानी, क्या भारत के हर गाँव की कहानी बन जाएगी? फिल्म के बालक को पता ही नहीं कि उसके हाथ में जो बम्म रखा है, वह कितना घातक है, उसे छोटे से लालच ने फंसा लिया है। फिल्म के बालक को तो समझ आ गया था कि यह शायद घातक है, लेकिन हम किस-किस बच्चे को समझा पाएंगे कि तुम्हारे हाथ में बम्म रख दिया गया है। जो बच्चे बंदूक हाथ में लेकर गोलीबारी का खेल खेल रहे हैं, उन्हें कौन सभ्य नागरिक बनाएंगा? वे तो आतंक की ही खेती हैं ना! जितने भी बच्चे, अकेले अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वे अपराध की शरण में जाने को मजबूर कर दिये जाते हैं। जिन कच्ची बस्तियों में, जिन गाँवों में, जिन कस्बों में ऐसे बच्चे घूम रहे हों, उनकी सुध समाज को लेनी चाहिये नहीं तो सीमा पार से किसी आतंकवादी को आने की जरूरत नहीं होगी, उनके लिये यहीं उपलब्धता रहेगी। फिल्में तो आपको इशारा कर रही हैं, सम्भल जाओ, अभी भी समय है, नहीं तो हर शहर सीरिया में तब्दील हो जाएगा। तुम मोदी-मोदी खेलते रह जाओगे और वे तुम्हें अपना शिकार बना लेंगे।

नरम नेता चुनो और गुलामी का आनन्द लो

Written By: AjitGupta - Sep• 11•18

घर में पिताजी सख्त हों और माताजी नरम तो पिताजी नापसन्द और माताजी पसन्द। स्कूल में जो भी अध्यापक सख्त हो वह नापसन्द और जो नरम हो वह पसन्द। ऑफिस में जो बॉस सख्त हो वह नापसन्द और जो हो नरम वह पसन्द। जो राजनेता सख्त हो वह नापसन्द और जो नरम हो वह पसन्द। जीवन के हर क्षेत्र में जो भी सख्त है, उसे कोई पसन्द नहीं करता इसके विपरीत जो नरम है उसे अधिकतर पसन्द किया जाता है। सख्त मतलब दो-टूक कहने वाला और नरम मतलब तेरे मुँह पर तेरी और मेरे मुँह पर मेरी। जिस किसी का भी घर सुधरा हुआ दिखायी देता है, वहाँ कोई ना कोई सख्त व्यक्ति का शासन होता है और जो घर बिगड़ा दिखायी देता है, वहाँ किसी नरम व्यक्ति का शासन रहता है। सख्त व्यक्ति दो-टप्पे की बात करता है, यह करना है और यह नहीं करना, बस। इस रास्ते पर चलना है और इसपर नहीं। दुनिया उसे समझने लगती है कि यह व्यक्ति यह काम तो करेगा और यह नहीं करेगा जबकि नरम व्यक्ति को कोई समझ नहीं पाता कि यह क्या तो करेगा और क्या नहीं करेगा। घर, सख्त व्यक्ति ही बनाता है लेकिन सबकी नाराजी का केन्द्र बिन्दू रहता है जबकि नरम व्यक्ति घर बिगाड़ता है लेकिन सबका चहेता रहता है। इसलिये कई बार लोग गुस्से में बोल भी देते हैं कि मैं ही क्यों बुरा बनू? घर जाए भाड़ में। लेकिन सब जानते हैं कि हम सब अपनी-अपनी आदतों से मजबूर हैं, हम चाहकर भी विपरीत कार्य कर ही नहीं सकते।
कुछ लोग मोदीजी से नाराज हैं क्योंकी मोदीजी सख्त है। वे नरम लोगों को ढूंढ रहे हैं और खोज-खोजकर उनका नाम उछाल रहे हैं। देश का नेता सख्त है वह देश बनाने में लगा है लेकिन आपको नरम नेता चाहिये! क्यों चाहिये नरम नेता? जिस राजनीति में मैं दूर-दूर तक भी भागीदार नहीं हूँ, तो मुझे क्यों चाहिये नरम नेता? मुझे तो बनते देश को देखकर खुश होना चाहिये लेकिन नहीं! इसी नहीं पर हर जगह पेच अटक जाता है। चाहे वह घर हो या देश। आपने अपने पिता के जमाने की शादी देखी होगी, शादी में केवल पिता का आदेश चलता था, सारे काम व्यवस्थित होते थे लेकिन तभी किसी एक बेटे को लगता था कि मेरी भी पूछ होनी चाहिये। वह छोटे भाई-बहनों को कभी नये कपड़ों के लिये तो कभी किसी और के लिये उकसा देता था। पिताजी का अनुशासन बिगड़ जाता था और लोग कहने लगते थे कि बच्चों की खुशी का भी ध्यान रखना चाहिये। शादी व्यवस्थित हो रही है, इस बात से ध्यान हटकर, बेटे की बात पर केन्द्रित हो जाता है। सभी को लगने लगता है कि यदि पिताजी की जगह बेटे के हाथ में शादी का प्रबन्ध होता तो हम सब मजे करते। आज ऐसा ही देश में हो रहा है, मोदी जी का कोई साथी लोगों को उकसा रहा है कि इनकी सख्ती के कारण तुम मजे नहीं कर पा रहे हो। तुम्हारे घर में शादी हो रही है और तुम्हीं मजे नहीं कर पा रहे हो तो फिर क्या फायदा घर की शादी का। जो हर जगह मजे लेने की फिराक में रहते हैं वे आज कह रहे हैं कि ऐसी सख्ती ठीक नहीं, हम मजे नहीं ले पा रहे हैं। मोदीजी की जगह नरम नेता को लाओ जो हमें मजे करा सके। अब या तो मजे ही करा दो या फिर देश को ऊँचा उठा दो। हमने वोट दिया और हम ही विशेष नहीं बने, भला यह भी कोई बात है! हमने इनके पक्ष में इतना लिखा, इतना कहा, फिर भी हम विशेष नहीं, यह भी कोई बात है! बस मोदी जी जैसे सख्त नेता नहीं चाहिये, नरम नेता को आगे लाओ। मजे की चाहत वाले लोग अब नरम नेता की खोज में लगे हैं। बस एक बात याद आ गयी, उसे लिखकर बात खत्म करती हूँ। एक व्यक्ति मेरे पास आया कि फला काम करना है, मैंने काम देखा और कहा कि यह सम्भव ही नहीं है। मेरी बात मेरा बॉस सुन रहा था, उसने इशारे से उसे अपने पास बुलाया और पूछा कि क्या काम है? अब नरम बॉस ने कहा कि ठीक है, मैं देखूंगा। मैं क्या देखती हूँ कि वह व्यक्ति बॉस का गुलाम बनकर रह गया, हमेशा अटेची उठाकर पीछे चलने वाला। काम तो होना नहीं था लेकिन उसने कई साल ऐसे ही निकाल दिये, गुलामी कर-कर के। तो भाई मजे की चाहत रखने वाले लोगों, नरम नेता तो कांग्रेसी बहुत थे, पूरा देश सालों से गुलाम की तरह उनको तोक रहा था, तुमको भी वही गुलामी की आदत पड़ चुकी है, तुम भी फिर से नरम नेता चुनो और गुलामी का आनन्द लो।

डायनिंग टेबल पर फीड-बैक रजिस्टर

Written By: AjitGupta - Sep• 08•18

मेरा मन कर रहा है कि मैं भी अपनी डायनिंग टेबल पर एक फीड-बैक रजिस्टर रख लूं। जब भी कोई मेहमान आए, झट मैं उसे आगे कर दूँ, कहूँ – फीड बैक प्लीज। दुनिया में सबसे बड़ी सेवा क्या है? किसी का पेट भरना ही ना! हम तो रोज भरते हैं अपनों का भी और कभी परायों का भी। इस बेशकामती सेवा के लिये कभी फीड-बैक मांगा ही नहीं, जबकि हर आदमी पैसा भी लेता है और फीड-बैक भी मांग लेता है। होटल में खाना खाने जाओ तो फीड-बैक, घर में कुछ भी काम कराओ तो फीड-बैक, होटल में रूक जाओ तो फीड-बैक! अब देखिये जैसे ही मेहमान आने की सूचना मिलती है, हम फटाफट शुरू हो जाते हैं। दीमाग के घोड़े दौड़ने लगते हैं कि भोजन में क्या खास होगा। पतिदेव भी आसपास चक्कर लगाने लगते हैं कि आज क्या खास बनने वाला है। जैसे ही मेनू फिक्स होता है, घर पर नजर पड़ती है, अरे बाबा, कमरे की चादर तो बदली ही नहीं! झट से चादर बदली जाती है, बैठकखाने को करीने से सजाया जाता है। ना जाने कितने जतन करने पड़ते हैं। मेहमान आते हैं, हम लजीज सा खाना परोसते हैं और वे खाकर चले जाते हैं। कभी कोई तहजीब वाला हुआ तो कह देता है कि भोजन अच्छा था। लेकिन कई तो ऐसे ही खिसक लेते हैं। छककर भोजन करेंगे फिर कहेंगे कि अरे भाभीजी पान-सुपारी नहीं है क्या? हम भी झूठी हँसी हँस देंगे कि जी अभी लायी। लेकिन क्या मजाल जो बन्दा भोजन की तारीफ कर दे।
दो दिन पहले सोफे की धुलाई कराई थी, कल सोफे वाले का मेसेज आ गया कि प्लीज फीड-बैक दें। अब बताओ कि सोफे की धुलाई में क्या फीड-बैक होगा! तब मैंने सोचा कि हम तो ढेर सारा खाना बना-बनाकर मरे जा रहे हैं, कभी फीड-बैक नहीं मांगा और ये देखो, जरा सा सोफा क्या धो दिया, फीड-बैक चाहिये। बस हमारे भी दीमाग में जंच गयी कि हम भी रजिस्टर रखेंगे। यह भी बताएंगे कि अभी तक कौन-कौन लोग आकर खाना खाकर गये हैं। उनने क्या-क्या लिखा है इस रजिस्टर में। सोच रही हूँ कि कुछ शुरुआत खुद ही कर दूँ जिससे लगेगा कि यह काम पहले से ही चालू है, नहीं तो किसी को लगेगा कि हमी से शुरुआत की है क्या! मन तो यह भी करता है कि मेहमान का ईमेल भी ले लिया जाए और फिर उसे ईमेल द्वारा बताया जाए कि आपने आज कितने पैसे बचाए! खैर छोड़िये, मन तो पता नहीं क्या-क्या करता है लेकिन सभी करने लगे तो हंगामा खड़ा हो जाएगा। मुझे तो आजकल कोर्ट का भी डर सताने लगा है कि कहीं कोई मेहमान कोर्ट में चला गया और कहा कि हमारा अधिकार बनता है इनके हाथ का बना खाना खाने का और कोर्ट के माननीयों ने आदेश दे दिया कि हमारी परम्परा रही है – अतिथि देवोभव:, इसका पालन करना ही होगा, तो हम क्या करेंगे? अब आप मित्रगण बताएं कि हमें फीड-बैक रजिस्टर रखना चाहिये या नहीं। जब अतिथि देव ही हैं तो वीआईपी हुए ना, और वीआईपी के हस्ताक्षर लेने का हक तो हमें मिलना ही चाहिये। हम आपका उत्तर पाते ही तुरन्त बाजार के लिये निकल पड़ेंगे एक सुन्दर सा फीड-बैक रजिस्टर खरीदने के लिये। बस आपके हाँ की देर है।

मिश्र के पिरामिड ना बन जाए हमारी वेबसाइट?

Written By: AjitGupta - Sep• 03•18

रोज खबरें आती है कि फलाना चल बसा और ढिकाना चल बसा, कम आयु का भी चल बसा और ज्यादा आयु वाले को तो जाना ही था! हमें भी एक दिन फुर्र होना ही है। लेकिन हम जो यहाँ फेसबुक पर दाने डाल रहे हैं, अपनी वेबसाइट पर बगीचा उगा रहे हैं और ब्लाग पर खेत लगा रहे हैं, उस बगीचे और उस फसल का मालिक कौन होगा? हम तो आग को समर्पित हो जाएंगे लेकिन यह जो हमारी धरोहर है उसका कौन मालिक होगा या फिर यह भी स्विस अकाउण्ट की तरह गुमनामी में रहकर किसी लोकर जैसे ही दफन हो जाएगी। अभी तो हम इसमें से एक फूल नहीं तोड़ने देते, कोई तोड़ लेता है तो हम गुर्राने लगते हैं कि हमारा फूल कैसे तोड़ा? फिर क्या होगा? या तो कोई समूचा बगीचा ही हथिया लेगा या फिर उसे अंधेरे में उजड़ने को छोड़ देगा! मिश्र के पिरामिड जैसी हो जाएंगी हमारी वेबसाइट, रात के अंधेरे में चोर घुसेंगे और सोना-चाँदी लूटकर ले जाएंगे। अब आप कहेंगे कि खाक सोना-चाँदी होगा, गोबर भरा होगा, लेकिन इस गोबर की भी तो खाद बन जाएगी ना! एक विज्ञापन में तो यही आ रहा है कि खाद ही सोना है, तो वैसा सोना नहीं तो ऐसा सोना तो होगा ही ना!
अभी हमारा खजाना सभी के लिये खुला है, शायद ही कोई चोरी करता हो लेकिन जैसे ही हम बन्द करेंगे तो शायद लालच बढ़ने की सम्भावना जागृत हो जाए! हम सरलता से सबके लिये उपलब्ध हैं तो हमारी कीमत कोई नहीं लगाता सब घर की मुर्गी दाल बराबर मानता है लेकिन यदि हम भी चारों तरफ तालों में बन्द होकर अपना विज्ञापन करने लगें कि हमारे पास कस्तूरी है तो कुछ ना कुछ लालच तो हम चोरों के लिये छोड़ ही सकते हैं! लेकिन अपना विज्ञापन करना बड़ा कठिन काम है, हम जैसे लोग तो इस काम में नौसिखिया भी नहीं है। एक कहानी याद आ रही है, एक साहित्यकार था, शिमला गया और एक होटल में जाकर ठहर गया। देखता क्या है कि उसके नाम के इश्तहार तो पहले से ही वहाँ लगे हैं। उसे उत्सुकता हुई सत्य जानने की। उसने देखा कि एक आदमी उसी के नाम से होटल में ठहरा है और भीड़ से घिरा है। उसकी रचनाओं का पाठ करके वाह-वाही लूट रहा है और ठाठ से रह रहा है। उसने नकली व्यक्ति से मिलने की ठान ली, वह मिला और अपना परिचय दिया। नकली व्यक्ति भी उससे मिलकर खुश हुआ और बोला कि देखिये आप तो अपना प्रचार करते नहीं, लेकिन मैं आपका ही प्रचार कर रहा हूँ, बस चेहरा ही तो अलग है, प्रचार तो आपका ही हो रहा है। फिर बोला कि मुझे इसमें कितना खर्चा करना पड़ता है, आप नहीं जानते इसलिये मुझे कुछ पैसे दीजिये। उस साहित्यकार को वह भ्रमित कर चुका था और उसकी जेब से पैसे भी निकलवा चुका था। अब वे दोनों उस होटल में रह रहे थे। असली चुप था और नकली फसल काट रहा था। लेकिन असली भी खुश था कि उसी के नाम की फसल कट रही है। फसल के पैसे नकली ले रहा था और असली, बीज के पैसे भी जेब से भर रहा था।
तो बहनों और भाइयों, इस समस्या का हल है किसी के पास? हमारे बैंक को कोई गोद लेने की सोच रखता है क्या? या हमारा वारिस ही कोई बन जाए। कारू का खजाना ना मिलेगा लेकिन टूटे-फूटे बर्तनों में भी इतिहास तो मिल ही जाएगा। लोग कहते हैं कि खानदानी धंधा ही करना चाहिये, जिससे आपके धंधे को आगे ले जाने वाले हमेशा बने रहते हैं लेकिन हमने तो ऐसा काम किया कि हमारी ना तो पिछली पुश्तों में और ना आगे की पुश्तों में कोई धोले पर काला करता है। इसलिये इस लिखे हुए का कोई मौल भी नहीं जानता, उनके लिये तो यह ऐसा कचरा है जिसकी खाद भी नहीं बनती। कोई मुझे बताए कि कभी किसी मन की कीमत लगायी गयी है? कीमत तो शरीर की ही लगी है। लेखन तो मन है, यदि यह किसी सुन्दर शरीर में रहता है तो फिर भी कीमत लग जाती है नहीं तो तिजौरी में पड़ा रहता है। लेखन की तिजौरी अब वेबसाइट हो गयी है, इसका भी गोपनीय पासवर्ड है, यदि किसी ने पासवर्ड को जान लिया तो सरेआम हो जाएगी नहीं तो किसी गुमनाम जंगल के किसी कोने में पड़ी रहेगी। न जाने कितना समय बीतेगा, कभी तिजौरी पर ध्यान जाएगा तब शायद कोई कहे कि इसमें भी कुछ है और फिर मिश्र के पिरामिड की तरह परते उखाड़ी जाएंगी। हमारे पिरामिड में भी शायद कुछ मिल जाए और हम भी इतिहास की चीज बन जाए। तथास्तु।

शायद यही परिवर्तन है!

Written By: AjitGupta - Sep• 02•18

आजकल टीवी के लिये फिल्म बनाने की कवायद जोर-शोर से चल रही है इनमें से अधिकतर फिल्म आधुनिक सोच को लिये होती है। वे युवा मानसिकता को हवा देती हैं और एक सुगम और सरस मार्ग दिखाती हैं। हर कोई इनसे प्रभावित होता है। क्यों प्रभावित होता है? क्योंकि ऐसे जीवन में अनुशासन नहीं होता, पूर्ण स्वतंत्रता की मानसिकता को दर्शाने का प्रयास रहता है और जहाँ कोई भी अनुशासन नहीं हो भला वह सोच किसे नहीं पसन्द होगी! मैं नवीन पीढ़ी की सोच से रूबरू होना चाहती हूँ इसलिये जब भी मौका मिलता है इन फिल्मों को टीवी पर देख लेती हूँ। मेरी संतान के मन में भी क्या चल रहा है, मुझे भान हो जाता है और मैं सतर्क हो जाती हूँ। एक बात मैंने नोटिस की है, शायद यह पहले से ही होती रही हो लेकिन जब से जेएनयू का नाम रोशन हुआ है तब से मैंने नोटिस किया कि फिल्मों में जेएनयू का नाम खुलकर लिया जाता है और फिल्म का कोई भी करेक्टर यह जरूर कहता है कि मैं जेएनयू में पढ़ा हूँ। खैर बाते तो बहुत हैं लेकिन कल की ही बात करती हूँ, कल टीवी पर एक फिल्म आ रही थी, आधी-अधूरी ही देखी गयी, उसे दोबारा अवश्य देखूंगी। एक माँ है और उसकी एक युवा बेटी है, दोनो आधुनिक तरीके से रहती हैं। एक दिन माँ बेटी से कहती है कि मैं जेएनयू मैं पढ़ती थी और मुझे एक लड़के से प्यार हो गया और मैं उसके साथ भाग गयी। बेटी उसे प्रश्नचिह्न लगाकर देखती है लेकिन माँ आगे बोलती है कि तुम्हारे जो पापा है वे दूसरे हैं। मेरे भागने के दो साल बाद मुझे ये मिले और मुझे इतने पसन्द आये कि मैं फिर भाग गयी। बेटी एक क्षण के लिये ठिठकती है लेकिन अगले ही क्षण ठहाका मारकर हँस देती है कि वाह माँ। कहानी सोशल मीडिया पर आधारित है, कैसे लोग लिख रहे हैं और विचार को वायरल कर रहे हैं। कह रहे हैं कि हमारा नाम कहीं नहीं आता लेकिन हमारे विचार तो वायरल होते हैं, यही सुख देता है।
एक प्यारी नज्म है लेकिन सोशल मीडिया ने उसे तोड़-मरोडकर चुटकुला बना दिया है, नज्म लिखने वाले को पहले गुस्सा आता है लेकिन फिर वह देखता है कि लोग आनन्द ले रहे हैं तो मान जाता है। फिल्म में कहा जाता है कि सभी कुछ परिवर्तनशील है, जिसमें लोग आनन्द लें वही अच्छा है। नया जमाना है, जहाँ और जिससे सुख मिले बस वही करो। खुलकर अपनी बात कहो, कोई दुराव नहीं कोई छिपाव नहीं। सब कुछ सुन्दर हो, सजा-धजा हो जरूरी नहीं। मन को पसन्द है तो साथी अच्छा है। कई प्रयोग करने में भी कोई बुराई नहीं। माँ अपनी बात खुलकर कह रही है और साहस के साथ कह रही है, बेटी अपने मन की कर रही है, कोई रोक-टोक नहीं है। सोशल मीडिया के द्वारा जीवन को बदला जा रहा है। ये लोग किसी अनुशासन को नहीं मानते, संविधान को नहीं मानते। इनका संविधान है इनका मन। जो मन करे वह करो। ऐसी फिल्में गुडी-गुडी होती है मतलब अच्छी-अच्छी। कोई कठिनाई नहीं, कोई लड़ाई नहीं। जेएनयू के लिये बनी इन फिल्मों का सार है कि केवल अपने मन का सुख।
लेकिन इस संसार में केवल अपने मन की कब चली है? किसी भी प्राणी की ऐसी स्थिति नहीं है कि वह अपना मनमाना करे। सभी के कुछ ना कुछ अनुशासन है, मेरे घर की मुंडेर पर बैठे कबूतर को जोड़े को जब चोंच मिलाते देखती हूँ तब यह नहीं सोच लेती हूँ कि यह हर किसी कबूतर या कबूतरी से चोंच मिलाने को स्वतंत्र है। लेकिन कुछ लोग सोच लेते हैं कि सारी प्रकृति स्वतंत्र है तो हम भी स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता किसे अच्छी नहीं लगती, मुझे भी लगती है और आप सभी को भी लगती होगी लेकिन जब कभी इस स्वतंत्रता को खुली आँखों से देखने का प्रयास करती हूँ तो ताकतवर का कमजोर के प्रति शोषण ही दिखायी देता है। शायद मकसद भी यही हो कि हम स्वतंत्रता का खेल दिखाकर लोगों को घर-समाज और देश के अनुशासन से बाहर निकाल दें और फिर बाज की तरह इनपर टूट पड़ें। दुनिया में बढ़ रहे महिलाओं के प्रति अपराध इस ओर ही इंगित करते हैं। पहले क्लब के बहाने महिलाओं को पाने का प्रयास किया गया और अब जेएनयू की सभ्यता दिखाकर की सभी साथ रह रहे हैं, साथ सो रहे हैं। पहले रजामंदी से फिर जोर-जबरदस्ती से शोषण होगा। शोषण में पुरुष और स्त्री दोनों ही शामिल हैं। बस जो कमजोर है वह शोषित होगा। ये फिल्में बनती रहेंगी, हमें लुभाती रहेंगी और हमारा जीवन बदलती रहेंगी। क्योंकि हम कहते रहेंगे कि जीवन परिवर्तनशील है, सुन्दर हो, सजा-धजा हो यह आवश्यक नहीं, बस सुख देने वाला हो। भाषा बदल जाएगी, वेशभूषा बदल जाएगी, जिस सभ्यता को हमने संस्कृति के सहारे उच्च स्थान दिया था हम उसे प्रकृति के नाम पर विकृति की ओर ले जाते रहेंगे, शायद यही परिवर्तन है।