अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है

Written By: AjitGupta - Aug• 19•17

मैं कहीं अटक गयी हूँ, मुझे जीवन का छोर दिखायी नहीं दे रहा है। मैं उस पेड़ को निहार रही हूँ जहाँ पक्षी आ रहे हैं, बसेरा बना रहे हैं। कहाँ से आ रहे हैं ये पक्षी? मन में प्रश्न था। शायद ये कहीं दूर से आए हैं और इनने अपना ठिकाना कुछ दिनों के लिये यहाँ बसा लिया है। पहले तो इन पक्षियों को कभी यहाँ नहीं देखा, बस दो-चार साल से ही दिखायी पड़ रहे हैं। सफेद और काले पक्षी, बड़े-बड़े पंखों वाले पक्षी। उड़ते हैं तो आकाश नाप लेते हैं और जब जल में उतर जाते हैं तो किस तरह इठलाते हुए तैरते हैं। इनका उड़ना, इनका लहराकर पेड़ पर बैठना कितना आकर्षक है! मेरे रोज का क्रम हो गया है इन पक्षियों को देखने का। मन करता है कि यहाँ से नजर हटे ही ना। इन बड़े पक्षियों के साथ नन्हीं चिड़ियाओं की दुनिया भी यहाँ बसती है। सैकड़ों की तादाद में आती हैं और इन्हीं तीन-चार पेड़ों पर अपना ठिकाना बना लेती हैं। शाम पड़ते ही इनका काफिला फतेहसागर की ओर चल पड़ता है, चहचहाट पूरे वातावरण को संगीतमय बना देती है। ये चिड़िया भी अपनी गौरैया नहीं है, कोई विदेशी नस्ल की ही दिखायी देती हैं। रात होने को है और अब चिड़ियाएं धीरे से उड़कर पेड़ के नीचे के हिस्से में चले गयी हैं, वहाँ सुरक्षित जो हैं। ये पेड़ मानों इन पक्षियों की हवेली है जिसमें नीचे की मंजिल में नन्हीं चिड़िया रहती हैं और ऊपर बड़े पक्षी।
गर्मी के दिनों में नन्हीं चिड़ियाएं दिखायी नहीं दे रही थी, शायद वे भी ननिहाल गयी होंगी! लेकिन जैसे ही मौसम सुहावना हुआ, ये लौट आयी हैं। बड़े पक्षी अपने देश नहीं लौटे और इनने अपना पक्का ठिकाना यहाँ पर ही बना लिया है। तभी आकाश में हवाईजहाज गरजने लगता है, न जाने कितने पक्षी दूसरे देश में बसेरा ढूंढने निकल पड़े होंगे! मेरी इस खूबसूरत झील में दुनिया जहान के पक्षी आए हैं अपना सुकून ढूंढने, ये लौटकर नहीं जा रहे हैं और इस जहाज में लदकर न जाने कितने बाशिंदे दूसरे देश में सुकून ढूंढ रहे हैं। तभी लगता है कि जीवन रीतने लगा है, इस पेड़ पर बड़े पक्षी हैं तो नन्हें पक्षी भी है। ये आपस में बतियाते तो होंगे, सारा वातावरण तो गूंज रहा है इनकी बातों से। लेकिन मन खामोश है, न जाने कितने घर खामोश हैं और शहर खामोश हैं। इन घरों की बाते रीत गयी हैं, यहाँ कोई बतियाने नहीं आता। घरों के पक्षियों ने दूसरे देश में सुकून ढूंढ लिया है। बूढ़े होते माँ-बाप पूछ रहे हैं कि किस पेड़ पर जीवन मिलेगा? क्या हमें भी अपना बसेरा उजाड़ना पड़ेगा? क्या हमें भी सात समन्दर पार जाना पड़ेगा? ये पक्षी तो मेरे शहर में आ बसे हैं लेकिन शायद मुझे इनका साथ छोड़ना पड़ेगा।
मनुष्य क्यों यायावर बन गया है, ये पक्षी शायद इन्हें यायावरी सिखा रहे हैं। अब मुझे क्रोध आने लगा है इन पर, तुम क्यों चले आये अपने देश से? तुमने ही तो सिखाया है मनुष्य को दूसरे देशों में बसना। तुम्हारा जीवन तो सरल है लेकिन हमारा जीवन सरल नहीं है, तुम्हारें पास लोभ नहीं है, संग्रह नहीं है, तुम छोड़कर कुछ नहीं आते। लेकिन हमें तो जीवन का हिसाब करना होता है। किस-किस माँ को क्या-क्या जवाब दूं कि परिंदों सा जीवन नहीं हैं हमारा। परिंदे जब उड़ते हैं तो आजादी तलाशते हैं, वे किसी झील को अपना मुकाम बना लेते हैं, जहाँ जीवन में सब कुछ पाना हो जाता है। ये परिंदे भी सबकुछ अपने पीछे छोड़कर आए हैं, इनके पीछे कोई नहीं आया। सभी के पेड़ निर्धारित हैं, सभी की झीलें निर्धारित हैं। कोई इस देश की झील में बसेरा करता है तो कोई पराये देश की झील में बसेरा करता है। मनुष्य कब तक स्वयं को दूसरों से अलग मानता रहेगा? घुलना-मिलना ही होगा हमें इन पक्षियों के साथ। इनके जीवन की तरह अकेले रहकर ही बनाना होगा अपना आशियाना। जब ये पक्षी अकेले ही जीवन जीते हैं तो हम क्यों नहीं! हमने घौंसला बनाया, परिंदों को पाला, लेकिन अब वे उड़ गये हैं। उन्हें उड़ने दो, अपना संसार बसा लेने दो। उनकी गर्मी-सर्दी उनकी है, हम किस-किस को अपनी छत देंगे? कब तक देंगे और कब तक देने की स्थिति में रहेंगे? वे भी हमें कब तक आश्वासन देंगे? यहाँ फतेहसागर की झील में कितने ही पक्षियों का बसेरा है, हम भी हमारे ही देश में इन परिन्दों की तरह बसे रहेंगे। पेड़ बन जाएंगे जहाँ पक्षी अपना बसेरा बना सके। इन जहाजों में जाने दो युवाओं को, उनको दूर देश की झील ने मोह लिया है लेकिन हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है।

पहाड़ों के बीच बसा अलसीगढ़

Written By: AjitGupta - Aug• 16•17

मनुष्य प्रकृति की गोद खोजता है, नन्हा शिशु भी माँ की गोद खोजता है। शिशु को माँ की गोद में जीवन मिलता है, उसे अमृत मिलता है और मिलती है सुरक्षा। बस इंसान भी इसी खोज में आजीवन जुटा रहता है। बचपन छूट जाता है लेकिन जहाँ जीवन मिले, जहाँ अमृत मिले और जहाँ सुरक्षा मिले, उस माँ समान गोद की तलाश जारी रखता है। प्रकृति की ऐसी गोद जब उसे मिलती है तो वह कह उठता है यह मेरी माँ ही तो है। कभी साहित्याकर की भाषा में जन्नत कह उठता है। मनुष्य कितनी ही भौतिक उन्नति कर ले लेकिन प्रकृति को आत्मसात करने की उसकी फितरत कभी नहीं जाती। वह कभी बर्फिली पहाड़ियों पर पहुंचता है तो अनायास ही कह देता है कि धरती पर यही जन्नत है, कभी मेरे जैसा व्यक्ति हरियाली से लदे पहाड़ों से मध्य जा पहुंचता है तो कह देता है कि अरे इसके अतिरिक्त जन्नत और क्या होगी? हमने तो धरती की इसी जन्नत को बार-बार देखा है, इसी में जीवन को खोजा है, इसी में अमृत ढूंढा है और इसी धरती को सुरक्षित माँ की गोद माना है। इसलिये इसे ही नमन करते हैं, इसी का वन्दन करते हैं।
कल निकल पड़े थे इसी जन्नत की ओर, उदयपुर के जनजाति गाँव की सैर पर। घर से मात्र 20 किमी की दूरी थी लेकिन वहाँ पहुंचने में 40 मिनट का समय लग गया। हमारी गाडी सर्पिली सड़कों पर गुजरती हुई पहाड़ियों को लांघ रही थी, कभी पहाड़ सामने ही आ खड़ा होता था तो कुछ दूर चलने पर ही रास्ता बना देता था। पहाड़ पेड़ों से और हरी घास से लदे थे, बीच-बीच में इनमें जीवन भी दिखायी दे जाता था। कहीं छोटी सी पहाड़ी थी तो उसमें एक झोपड़ी थी, बकरी थी और बच्चे थे। महिला और पुरुष खेतों सें दिखायी दे जाते थे। खेत भी तो पहाड़ी के तलहटी में ही छोटे आकार के थे। चारो तरफ मक्की की खेती लहलहा रही थी। कब 40 मिनट बीत गये, पता ही नहीं चला और गाँव अलसीगढ़ आ गया। हमारे एक मित्र का वहाँ छोटा सा ठिकाना था हमने वहीं अपना सामान रखा और अलसीगढ़ के डेम की ओर चलने को तैयार हो गए। हमारे ठिकाने की महिला चौकीदार से पूछा कि डेम कितनी दूर है, वह बोली पास ही है। हमने कहा फिर पैदल ही चलते हैं फिर युवाओं से पूछा तो बोले की नहीं चार किमी है, गाडी से जाइये, सीधी सड़क वहीं तक जा रही है। हम गाडी उठाकर चल पड़े। कुछ दूर जाकर पूछ लिया कि कहाँ है डेम? अरे वह तो पीछे छूट गया। अब वापस पीछे, कच्चे रास्ते में गाडियां उतार दी, लेकिन कुछ दूर चले थे कि पता लग गया कि गाडी ले जाना सम्भव नहीं है। वापस लौटे, फिर सड़क पर चलते रहे, पता लगा कि फिर काफी दूर निकल आये हैं। वापस लौटे और दूसरे रास्ते पर गाडी उतारी, लेकिन रास्ता फिर भी नहीं मिला। पानी दिख रहा है लेकिन पहाड़ को लांघने का रास्ता नहीं मिल रहा। फिर वापस, अब की बार जवान को साथ लिया और उसने रास्ता दिखाया। गाडियों को खड़ा करके पहाड़ों को लांघना था। पहाड़ के पीछे बांध का पानी था। पहले पहाड़ पर चढ़ना फिर उतरना, तब कहीं जाकर पानी को हाथ लगा सकते थे। हमें पानी में उतरने को भी मना कर दिया गया था, बताया था कि पानी गहरा है, खतरा मत मोल लेना।
चारों तरफ पहाड़े थे और पहाड़ों के बीच में पानी को रोक रखा था, नदी भी थी। कभी सोचो, दिन की चहल-पहल के बाद जब रात ढलती होगी तब प्रकृति क्या बात करती होगी? आकाश में चाँद और तारे झिलमिलाते होंगे और धरती पर पहाड़ों के मध्य बसा यह पानी कभी किसी मछली की छपाक के साथ खामोशी तोड़ता होगा। पहाड़ मद्धिम रोशनी में जगमगाते होंगे, हरी दूब पर शबनम की बूंदे जब तैरती होंगी तो हीरे जगमगाते होंगे! उस अलौकिक सौन्दर्य को पता नहीं किसने देखा होगा या यह सब हमारा ही है, कभी ध्यान नहीं दिया होगा! सुबह पंक्षियों की चहचहाट से होती होगी और खेतों में किसान जब अपने बैलों को ले जाते होंगे तो कैसा समा होगा! लेकिन इतना ही तो नहीं है गाँव! इसके आगे भी बहुत कुछ है, इस जन्नत में लोग रहते हैं लेकिन प्रकृति से आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं। गाँव तक स्कूल जा पहुंचा लेकिन बच्चे पढ़ने के शौकीन नहीं, उनका मन लगता ही नहीं। शिक्षा को उन पर थोप दिया गया है। यदि शिक्षा से उन्हें मुक्त कर दिया जाए और जीवन को वहीं के साधनों से सम्पन्न बना दिया जाए तो शिक्षा को अपना लेंगे। थोपी हुई कोई चीज किसी को भी पसन्द नहीं आती, हर व्यक्ति स्वतंत्र रहना चाहता है, अपने तरीके से जीना चाहता है। हम क्यों उन्हें अपना सा बनाना चाहते हैं? उनकी कुटिया को स्वच्छ और सुन्दर बना दीजिये, ग्रामीण पर्यटन शुरू कर दीजिये, वे सम्पन्न हो जाएंगे और शिक्षा की ओर भी मुड़ जाएंगे। तरीके उनकी पहल के होने चाहिये फिर हमारा सुझाव होना चाहिये, ऐसा कर लिया तो वे अपनी तरह से आगे बढ़ेंगे और फिर हमें जा पकड़ेंगे। प्रकृति के पुत्रों को प्रकृति ही रास आती है और प्रकृति स्वतंत्र होती है।

जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है

Written By: AjitGupta - Aug• 15•17

आधा-आधा जीवन जीते हैं हम, आधे-आधे विकसित होते हैं हम और आधे-आधे व्यक्तित्व को लेकर जिन्दगी गुजारते हैं हम। खिलौने का एक हिस्सा एक घर में बनता है और दूसरा हिस्सा दूसरे घर में। दोनों को जोड़ते हैं, तो ही पूरा खिलौना बनता है। यदि दोनों हिस्सों में कोई भी त्रुटी रह जाए तो जुड़ना असम्भव हो जाता है। हम भी खिलौना बना दिये गए हैं, हमने भी अपनी संतान को खिलौने जैसे संस्कारित किया है। एक हिस्सा किसी घर में तो दूसरा हिस्सा किसी घर में संस्कारित होता है। शरीर सम्पूर्ण मिला है लेकिन हमने कार्य विभाजन करके उसे आधा ही विकसित होने दिया है। एक को शक्तिशाली तो दूसरे को कोमल, एक को अर्थतंत्र में प्रवीण तो दूसरे को गृहविज्ञान में निपुण बनाने में हम सभी जुट गये हैं। हम इसी सभ्यता को लेकर अभी तक संस्कारित हुए हैं। इसीकारण एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इन दो खिलौनों को जोड़ने के लिये एक सी परवरिश चाहिये, दोनों को एक दूसरे के पूरक के रूप में ही संस्कारित होने की जरूरत है। सारी बात का मूल यह है कि हम युगल रूप में संस्कारित होते हैं, हमारा जीवन एकाकी रूप में संस्कारित नहीं है। इसके विपरीत यदि अमेरिका, यूरोप आदि देशों का जीवन एकाकी रूप में संस्कारित होता है, वहाँ युगल रूप से संतान को संस्कारित करने का रिवाज नहीं है।
एक दादी माँ थीं, उनसे एक कहावत सुनी थी। जब कोई बेटा रोता था तो वे कहती थीं कि – बेटा तू क्यों रो रहा है? आने वाली आएगी, तेरे लिए रोटी पकाती जाएगी और रोती जाएगी। ऐसे ही जब बेटी रोती थी तो कहती थीं – बेटी तू क्यों रो रही है? आने वाला आएगा, कमाता जाएगा और रोता जाएगा। याने रोना दोनों को है। हँसने के लिये दोनों को एक दूसरे का साथ चाहिए। आज परिवार का मूल झगड़ा भी यही है, हम एक दूसरे पर निर्भर हो गये हैं। हमारी खुशी दूसरे पर है, आपकी पत्नी का यदि आपकी माँ से झगड़ा होता है तो आप उसका समाधान नहीं दे पाते क्योंकि आपके व्यक्तित्व में परिवार के समाधान का संस्कार ही नहीं है। पुरुष महिलाओं के झगड़े में क्यों पड़े, बस पुरुष को यही सिखाया गया है। वह घर की समस्या में उलझना भी चाहता है और समाधान भी उसके पास नहीं है। जो बाहरी दुनिया में सफल है, कलेक्टर है याने पूरे जिले का रखवाला है वह अपने घर को समाधान नहीं दे पाता और आत्महत्या कर लेता है। उधर महिला को जीवन से जूझने के लिये सबकुछ सिखाया जा रहा है, वह सक्षम होती जा रही है, स्वयं को पूर्ण विकसित करती जा रही है। अब वह कार्यविभाजन के सिद्धान्त को मानने के लिये तैयार नहीं है। वह पति पर निर्भर होने के बावजूद भी कार्य विभाजन के सिद्धान्त को पूरी तरह से नहीं मानती है और इस सिद्धान्त को तो कतई नहीं मानती कि सम्पूर्ण परिवार का बोझ उस पर हो। और यदि वह भी कामकाजी है तो फिर इस सिद्धान्त को मानना उसकी कतई मजबूरी नहीं है।
भारतीय समाज इसी उहापोह में जीवन जी रहा है, वह आज भी समझ नहीं पा रहा है कि हमें हमारी संतान को पूर्ण रूप से संस्कारित करना होगा, तेरा काम और मेरा काम करके दिये गये संस्कार किसी युग में चल गये लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आज के युग में भी चल जाएंगे। ना लड़की को निर्भर रहने के संस्कार दीजिये और ना लड़के को। दोनों का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से विकसित कीजिये। आज के समय की यही आवश्यकता है। मुझे अपनी बुआ के घर की बात हमेशा अच्छी लगती थी, जब भी वहाँ जाती थी, बुआ को भी और भाभी को भी बराबर काम करते देखती थी। बुआ सभी के कपड़े धोती थी, यह नहीं की बहु के कपड़ अलग निकाल दें। मैंने उनके बीच में हमेशा प्रेम देखा। परिवार को चलाना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है, सभी को सारे काम के लिये तैयार कीजिये। जब लड़के घर में रोटी बनाते दिखायी देंगे तब कोई झगड़ा सर नहीं उठा पाएगा। फिर किसी कलेक्टर को आत्महत्या नहीं करनी पड़ेगी। युग बदलता है तो सभ्यता में भी परिवर्तन होता है। हम कहाँ से कहाँ पहुंच गये लेकिन परिवार में वहीं अटके हैं। परिवार में भी आगे बढ़िये, एक दूसरे पर निर्भर मत बनिए। यह निर्भरता ही आपको तोड़ रही है, कभी आशा साहनी मर रही है तो कभी सिंघानिया बेघर हो रहा है और कभी कलेक्टर आत्महत्या कर रहा है। अपनी परम्पराओं से चिपके नहीं, इन्हें बदलते रहें। रूकी हुई जिन्दगी सड़ने लगती हैं, जीवन्त जीवन ही खिलखिलाता है।

दिल इतना बड़ा कीजिये कि दुनिया समा जाये

Written By: AjitGupta - Aug• 09•17

मन का दोगलापन देखिये, कभी मन कहता है कि अकेलापन चाहिये और कभी कहता है कि अकेलापन नहीं चाहिये। कभी कहता है कि अकेलापन तो चाहिये लेकिन केवल अपनी चाहत के साथ का अकेलापन चाहिये। हम अपनी पसन्द का साथ चाहते हैं, बस उसी के लिये सारी मारा-मारी करते हैं। दुनिया भरी पड़ी है लेकिन हम भरी दुनिया में अकेले रह जाते हैं। समारोह में जाते हैं और साथी का साथ छूट जाये तो कह देते हैं कि तुम मुझे अकेला छोड़कर चले गये। अरे कहाँ थे तुम अकेले! समारोह में इतने लोग तो थे! लेकिन बस जो अपना है, जो अपने दिल के करीब है या जो हमारा आत्मीय है, बस उसी का साथ चाहिये। बचपन में माँ अपनी होती है, लोकिन यौवन आते ही मन संगी का साथ ढूंढने लगता है और माँ विस्मृत हो जाती है। माँ अपने पुत्र के बिना अकेलापन अनुभव करती है और पुत्र को यौन आकांक्षा की पूर्ति करने वाली संगी के साथ का अकेलापन चाहिये। अकेलापन दोनो को ही चाहिये, दोनो की ही शर्तें हैं। अपना इच्छित साथी दोनों को ही चाहिये। माँ दुखी है क्योंकि पुत्र अब उसके पास नहीं है लेकिन पुत्र सुखी है क्योंकि जीवन संगनी उसके साथ है। माँ कहती है कि पुत्र मैं अकेली हूँ और पुत्र कहता है कि मुझे अकेला छोड़ दो। ऐसा ही कुछ हमारे जीवन में होता है। कभी कहानी बन जाती है और कभी बिना कहानी के ही जीवन बीत जाता है। मुम्बई की आशा साहनी की कहानी बन गयी। उसके अकेलेपन की घटना समाज के अस्तित्व की कहानी बन गयी।
मन के धागे आत्मीयता से बंधते हैं, प्रेम भी आत्मीय भाव से ही उपजता है। सम्बन्धों को आत्मीयता की अनुभूति हर पल करानी होती है, कभी त्याग भी करना पड़ता है तो कभी प्यार भी देना पड़ता है। आशा साहनी की कहानी में आत्मीयता के धागे उलझ गये थे। जब पुत्र को प्यार की जरूरत थी तो माँ ने त्याग नहीं किया और जब माँ को प्यार की जरूरत थी तो पुत्र की आत्मीयता दूर चले गयी थी। किसे दोष दें? यह मन का ही दोष है कि हम केवल मनचाहे से ही बंधना चाहते हैं। अपने रिश्तों को विस्तार नहीं देते। पत्नी की मृत्यु होने पर पति को दूसरी पत्नी का साथ चाहिये ही तो पति की मृत्यु होने पर पत्नी को भी दूसरा साथी चाहिये। हमें दूसरा साथी तो चाहिये लेकिन हम अपनी संतान के साथ के बारे में भूल जाते हैं। तब हमें संतान के रहते अकेलापन लगता है और अपनी संतान के अकेलेपन को भूल जाते हैं। अक्सर सौतले रिश्तों में प्रेम पनपता नहीं है। आशा साहनी के मामले में भी यही हुआ। आशा साहनी ने दूसरी शादी की और पुत्र का प्रेम दूसरे पिता के साथ नहीं पनपा। पुत्र अकेला हो गया और जब माँ दोबारा अकेली हुई तो पुत्र की आत्मीयता जागृत नहीं हुई। दोनो के सम्बन्धों में दूरी आ गयी। छटे-चौमासे बात होने लगी। माँ पुत्र के आलावा अकेलेपन को कहीं बांट नहीं पायी और अकेलापन उसका काल बन गया। रिश्ते जब दुराव के रास्ते चल पड़ते हैं तब समय कितना निकल गया यह रिश्ते याद नहीं रखते। अनबोलापन पसर जाता है और रह जाता है अकेलापन। लेकिन हम सभी को अपने रिश्तों को विस्तार देना होगा, केवल खून के रिश्तों को जिद से नहीं बांध सकते और ना किसी अधिकार से बांधकर रखा जा सकता है। यह हम सब की विडम्बना है कि आज हम अकेले हैं लेकिन हम अकेले केवल संतान से है, बाकि रिश्ते तो हमारे साथ हैं। आत्मीयता का विस्तार करते रहिये, फिर सब अपने से लगेंगे। अपने मन को खोलना सीखिये, फिर देखिये कैसे दूसरे भी अपने ही बन जाते हैं। आशा साहनी की कहानी को मत दोहराइये, मत जिद करिये इच्छित के साथ की। बस दुनिया बहुत बड़ी है और अपना दिल भी इतना बड़ा कर लीजिये कि इसमे दुनिया समा जाये।

तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है

Written By: AjitGupta - Aug• 06•17

ओह! आज मित्रता दिवस है! मित्र याने मीत, अपने मन का गीत। मन रोज भर जाता है, उसे रीतना ही होता है, लेकिन रीते कैसे? रीतने के लिये कोई मीत तो चाहिये। मन जहाँ अपने आप बिना संकोच रीत जाए वही तो मीत होता है। मन को अभिव्यक्त करने के लिये मीत का साथ चाहिये और जिसे यह साथ मिल जाए वह सबसे धनवान बन जाता है। पता नहीं किसे मीत मिला और किसे नहीं लेकिन मेरा मीत तो मेरी लेखनी बन गयी है। यह फेसबुक यह ब्लाग और यह वेबसाइट मेरे मीत बनकर मेरे साथ हर पल खड़े हैं। यह मुझे नकारते नहीं है, मैं जो चाहे वो लिख सकती हूँ, जैसे चाहे अपने मन की परते खोल सकती हूँ। इससे कुछ भी नहीं छिपा है। मन को अभिव्यक्त होने का मार्ग मिल गया है। इसलिये हमारा सबसे प्यारा मित्र यह सोशल मीडिया बन गया है। ना केवल यह मेरी सुनता है अपितु मुझे सम्भालकर भी रखता है, मेरी बातों को सहेजकर रखता है। इतना तो किसी ने नहीं सुना जितना यह सुन लेता है। इसलिये मित्रता दिवस पर आज इसी परम मित्र को अपनी बाहों में भर लेती हूँ। यह नहीं होता तो मेरा वजूद भी बिखर गया होता, इसी के सहारे मेरा स्वाभिमान जिन्दा है।
लेखक मन को अभिव्यक्त करता है, इसके सहारे समाज के मन को भी अभिव्यक्त कर देता है लेकिन सम्पादक आप पर पहरे बिठा देता है। लोग आपको मंच से धकेल देते हैं। दो ही बाते होती हैं आपके सामने या तो अपनी अभिव्यक्ति बन्द कर दो या फिर अपना स्वाभिमान बेच दो। किसी समूह का हिस्सा बनकर गुलामी का जीवन और दूसरों की इच्छित अभिव्यक्ति आपका नसीब बन जाता है। पुरस्कार भी मिल जाते हैं, प्रसिद्धि भी मिल जाती है लेकिन मन में जो द्वंद्व हैं वे प्रकट नहीं होते, स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। जीवन नकली बन जाता है। आपको कुछ पैर दिखायी देते रहते हैं, जिन्हें पूजना आपकी नियति बन जाती है। लेकिन की-बोर्ड पर जब अंगुली थिरकती है और मॉनीटर पर शब्द दिखायी देने लगते हैं तब सारे की प्रतिबंध दूर हो जाते हैं। अपनी वेबसाइट पर बिना ताले-कुंजी के अपनी सम्पत्ती को रखने का आनन्द ही कुछ और है। मेरे मित्र के घर से भी कुछ लोग सेंध लगा देते हैं लेकिन दूध है तो बिल्ली पीयेगी ही, बस यह सोचकर बिसरा देती हूँ।
लेकिन दुनिया में अपने मन की सुनने वाले और भी हैं। कल एक माँ से बात हो रही थी, मैंने पूछा कि कितने बच्चे हैं? वे बोली कि दो हैं, दोनों ही बेटे हैं। बिटिया नहीं है, इस बात से दुखी थीं। मैंने पूछा कि मन किसके साथ सांझा करती हो? वे बोली कि इसी बात का गम है। बताने लगी कि कल तक बेटी ना होने का गम नहीं था लेकिन अब जब बेटे बड़े हो गये हैं, घर सूना लग रहा है। मन बात करने को तरस रहा है। मन तो हमेशा ही अभिव्यक्त होना चाहता है। बचपन में भी चाहता था लेकिन माँ को इतनी फुर्सत नहीं थी लेकिन बहन थी और शायद ऐसी कोई ही बात होगी जो अभिव्यक्त ना होती हो। वह मित्रता गहरी थी, मन से मन का जुड़ाव था। जहाँ भी छिपाव है वहाँ मित्रता दूर चले जाती है। अब बेटी है, मन को अभिव्यक्त करने के लिये। लेकिन जहाँ बहन नहीं है और बेटी नहीं है, उनसे पूछो कि मन को कहाँ हलका करते हो? शायद वे अभिव्यक्ति के मायने ही भूल गये हैं। सच्ची मित्रता बस यहीं बसी है। आज इस फेसबुक को भी, यहाँ के मित्रों को भी और बहन को भी और प्यारी बिटिया को भी मित्रता दिवस पर अपना सा प्रेम। तुम लड़ भी लोगे तो भी अभिव्यक्त ही हो जाओगे, तुम अपने से रहोगे तो भी अभिव्यक्त हो जाओगे. इसी मन की अभिव्यक्ति को तो मित्रता कहते हैं और तुम मेरे साथ हो बस यही मेरा है।