अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

अटकलें ही शेष हैं

Written By: AjitGupta - Mar• 04•20

हमें आखिर इतनी जल्दी क्या है? दूध को समय दीजिये तभी दही जमेगा। जल्दबाजी में या बार-बार अंगुली करने से दही नहीं जमने वाला! लेकिन हमें हथेली पर सरसों बोने की आदत पड़ गयी है। समय देना तो हम भूल ही गये हैं! हमें आखिर जल्दी किस बात की है? नहीं हमें जल्दी भी नहीं है, बस हम फालतू टाइप के लोग हैं। समय बिताने के लिये गॉसिप करते हैं हम। मोदीजी के कहा कि मैं एक दिन के लिये रविवार को सोशल मीडिया एकाउंट छोड़ूगा तो अटकलों का बाजार गर्म हो गया। जितनी सनसनी फैला सकते थे, जितने कयास लगा सकते थे, सारे ही कयास और सनसनी फैलाकर देख ली। फिर आया मोदी जी का जवाब कि एक दिन महिलाओं के नाम रहेगा उनका सोशल मीडिया! अब! चारों तरफ निराशा! लोग कह रहे हैं कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया!

घर के चूल्हे पर दूध चढ़ा है, सड़क पर बारात निकल रही है, बस कृष्ण की बांसुरी सुनकर जैसे गोपियाँ सुध-बुध खो जाती थी वैसे ही रसोई से निकलकर गृहिणी दौड़ पड़ी बारात देखने और दूध उबल-उबल कर नीचे गिरता रहा, पतीला जलता रहा लेकिन होश किसे! दुनिया में कितनी खबरे हैं, कितना कुछ हो रहा है, उधर कोरोना वायरस ही कहर मचा रहा है लेकिन मीडिया को और सोशल मीडिया को मोदीजी की खबर की अटकलें लगानी है! आज मोदी नाम सबसे बड़ी खबर की दुकान हो गया है! खिलाड़ी छूट गये, अभिनेता छूट गये सारे ही सेलेब्रिटी छूट गये बस मोदी की खबर होनी चाहिये। मोदी की खबर से शेयर बाजार उछलने लगता है या टूटने लगता है। हमारे पास मुद्दे ही नहीं है, बस अटकलें ही शेष हैं। ऐसा होता तो कैसा होता और ऐसा नहीं होता तो कैसा होता? सारा देश फालतू हुआ बैठा है, बस एक मोदी के सहारे सारे ही बैठे हैं। दिल्ली में बिल्ली ने खूनी पंजे गड़ा दिये हैं लेकिन हम अटकलें-अटकलें खेल रहे हैं। कोई भी संगठन समाज को बचाने के लिये आगे नहीं आ रहा है, किसी ने भी रक्षा दल नहीं बनाया है। हम सदियों से अटकलों के सहारे जी रहे हैं, कभी गुलाम बन जाते हैं, लुट जाते हैं फिर कोई मोदी जैसा आ जाता है, वापस स्वतंत्र हो जाते हैं और फिर अटकलों में जीने लगते हैं। शायद हमारी जिन्दगी ही अटकलों की मोहताज  हो गयी है। जितनी जल्दी हम अटकलों से जूझते हैं उतनी ही जल्दी यदि हम समस्या से जूझने लगे तो हम सुरक्षित हो सकेंगे। लेकिन हम नहीं कर सकेंगे! अटकलों में हम माहिर है लेकिन समस्या का सामना करने में हम बहुत पीछे हैं। समाज को एकजुट कर लो नहीं तो अटकलें लगाने के लायक भी नहीं रहोगे!

कोने की धूप

Written By: AjitGupta - Feb• 25•20

कल तक जिन आँखों में उदासी थी, आक्रोश भी उन्हीं आँखों से फूट पड़ता था, झुंझलाकर पति-पत्नी दोनों ही कह उठते थे कि नहीं अब बेटे से आस नहीं रखनी, वह पराया हो गया है! लेकिन कल उन आँखों में मुझे चमक दिखायी दे गयी। पति-पत्नी दोनों झील किनारे टहल रहे थे, पत्नी अलग टहल रही थी और पति अलग। पति ने पत्नी के पास आकर कहा कि चलो घर चलते हैं। बेटे का फोन आया है, कहीं बाहर गया था, रात आठ बजे तक बहु और पोते को लेकर लौटेगा। मैंने उससे कह दिया कि घर पर ही भोजन करना, रास्ते का खाना ठीक नहीं होता। बच्चे के लिये दलिया-खिचड़ी बन जाएगी। फिर पत्नी की ओर देखकर बोले की तुम ऐसा करना कि दलिया ही बना लेना उसमें गाजर मटर भी डाल देना, पोते को अच्छा लगेगा। आज उन्हे जाने की जल्दी थी, शीघ्रता से ही ड्राइवर को आदेश दे दिया कि गाड़ी निकालो। मैं उनकी आँखों की चमक को देख रही थी, कल तक ये ही आँखे उदास थी लेकिन आज ममता टपक रही थी। एक ही बेटा है, कल भी वही था और आज भी वही है!
सर्दियों की जाती धूप में हम एक कोने में सिमटी धूप को तलाशते हैं और गर्मी में किसी पेड़ के नीचे मुठ्ठी भर छाँव को। बस एक कोने में धूप मिल जाए और किसी छज्जे के नीचे छाँव मिल जाए तो जीवन में आस बँधी रहती है। सारे दिन की सर्दी की गलन या धूप की तपन से मुक्ति मिल जाती है और यह क्षणिक मुक्ति का सुख सारे दिन की और कभी-कभी ढेर सारे दिनों की पूंजी बन जाती है। माता-पिता शिकायत कर रहे हैं कि बेटा-बहु साथ नहीं रहते, हमें धमकाते भी हैं, बुढ़ापे में जीवन दूभर लग रहा है, क्या करें? निराश दम्पत्ती अपने बीते दिनों की परछाई ढूंढ रहे हैं, सुख के क्षणों को ओने-कोने में तलाश रहे हैं। बेटा-बहु ने साथ रहने से साफ इंकार कर दिया है, सारे ही सम्बन्धों को धता बता दी है। लेकिन एक सम्बन्ध शायद अभी टिमटिमा रहा है! माँ-बाप की रसोई में आज ऐसा कुछ बना है, जिसे बेटा कभी बड़े चाव से खाता था, तो फोन पर अंगुलियाँ मचल ही जाती हैं। बेटा कहता है कि ठीक है, मैं आ रहा हूँ। पत्नी को समझाता है कि माँ ने भोजन बनाया है, बुला रही है। देखो तुम्हें आज भोजन की किट-किट नहीं करनी होगी। पत्नी तैयार हो जाती है और चल देते हैं दोनों। माँ-बाप की ममता निहाल हो जाती है और संतान को भोजन मिल जाता है, बस यही सम्बन्ध टिमटिमाता रहता है। माँ उस बाती में तैल डालती रहती है और दीपक टिमटिमाने लगता है।
यह ममता भी एक तरफा होती है, केवल माता-पिता के दिल को ही घर बनाती है। संतान तो केवल उस झरने में नहाती ही है। झरना तो बहता ही रहता है, नहाने वाली संतान को उस झरने की कब परवाह होती है। यह ममता हमें हर माँ-बाप की आँखों में दिखायी दे जाती है और बेपरवाही की झलक संतानों में। जब संतान बिल्कुल ही मुँह फेर ले तब मुठ्ठी भर छाँव को तलाशने में ही माँ-बाप लगे रहते हैं। जब वह मुठ्ठी भर छाँव माता-पिता की आँखों में दिखायी देती है, तब एक नयी आशा जन्म लेती है और इसी आशा के सहारे रोज ही माता-पिता कभी किसी कोने धूप तलाश लेते हैं और कभी छाँव पा जाते हैं।

जन्मतारीख का गड़बड़झाला!

Written By: AjitGupta - Sep• 29•19

हमारा जमाना भी क्या जमाना था! बचपन में पाँच साल तक घर में ही धमाचौकड़ी करो और फिर कहीं स्कूल की बात माता-पिता को याद आती थी। स्कूल भी सरकारी होते थे और बस घर में कोई भी जाकर प्रवेश करा देता था। हमारे साथ भी यही हुआ और हमारी उम्र के सभी लोगों के साथ कमोबेश यही हुआ है। पिताजी ने एक भाई को कह दिया कि इसका भी स्कूल में नाम लिखा दो, भाई की अंगुली पकड़कर हम चल दिये स्कूल। हेडमास्टर/मास्टरनी ने कहा कि फार्म भरो। फार्म में पूछा गया कि जन्मतारीख क्या है? अब भाई को कहाँ याद की जन्मतारीख क्या है! पहले की तरह हैपी बर्थडे का रिवाज तो था नहीं बस माँ ने बताया कि फला तिथि पर हुई थी। भाई को जो याद आया वह लिखा दिया गया। तारीख भी और वर्ष भी। आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा! हमारी पढ़ाई शुरू हो गयी, एक जन्म तारीख हमारी भी लिख दी गयी, कागजों पर। लेकिन जब दसवीं कक्षा में पहुँचे तब पता लगा कि हम दसवीं की परीक्षा नहीं दे सकते क्योंकि उम्र कम है। पिताजी पढ़ाई के प्रति जागरूक थे तो आनन-फानन में नए कागजात मय जन्मपत्री बनाई गयी और अब हमारी जन्म तारीख बदल गयी।

माँ कहती कि तुम्हारा जन्म देव उठनी ग्यारस को हुआ है और स्कूल कहता कि सितम्बर में हुआ है। जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे थे, जन्मदिन मनाने की प्रथा भी बड़ी हो रही थी। हमें लगता कि हम तो माँ ने जो बताया है उसे ही जन्मदिन मानेंगे लेकिन स्कूल में जो दर्ज था लोग उसी दिन बधाई दे देते। इतना ही नहीं तिथि तो अपनी गति से आती और अंग्रेजी कलेण्डर से आगे-पीछे हो जाती, अब तिथि और तारीख में भी झगड़ा होने लगा! हमने फिर पंचांग को सहारा लिया और असली तारीख ढूंढ ही डाली। वास्तविक जन्मपत्री भी मिल गयी तो तारीख पक्की हो गयी।

लेकिन कठिनाई यह है कि सरकारी कागजों में जन्म तारीख कुछ और है और हमारे मन में कुछ और! सरकारी कागजों की तारीख याद रहती भी नहीं, लेकिन कभी-कभी अचानक से कोई कह देता है कि जन्मदिन की बधाई! तो हम बगलें झांकने लगते हैं कि आज? आपके साथ भी होता ही होगा। कल ऐसा ही हुआ, चुनाव आयोग का बीएलओ आया, उसने कहा कि मतदाता सूची आनलाइन हो रही है तो आप बदलाव कराने हो वे करा सकती हैं, जन्म तारीख की जब बात आयी तो ध्यान आया कि यहाँ तो सरकारी ही लिखवानी है। मैंने बताया कि 30 सितम्बर तो वह युवा एकदम से बोल उठा कि अभी से जन्मदिन की बधाई दे देता हूँ। मैं चौंकी, लेकिन मुझे ध्यान आ गया और उसकी बधाई स्वीकार की।

ऐसी ही एक  बार अमेरिका के इमिग्रेशन ऑफिसर के सामने हुआ। उसने आने का कारण पूछा, मैंने कहा कि बेटे से मिलने आयी हूँ। फिर वह बोला कि ओह आपका जन्मदिन सेलीब्रेट होने वाला है, मैं एक बार तो चौंकी लेकिन दूसरे क्षण ही मुझे ध्यान आ गया और उसकी हाँ में हाँ मिलाकर आ गयी। यदि मुझे तारीख का पता नहीं होता तो शायद वह मुझे वापस भेज देता कि कागजों में गड़बड़ है।

लेकिन ठाट भी हैं कि मैं जब चाहे बधाई स्वीकार कर लेती हूँ, ज्यादा सोचने का नहीं। कौन से जन्मदिन पर तीर मारने हैं! ना तो हम अनोखे लाल हैं जो हमने धरती पर आकर किसी पर अहसान किया है और ना ही हमारे जाने से धरती खाली हो जाएगी! लेकिन जन्मदिन मनाते समय एहसास जन्म लेता है कि चलो एक दिन ही सही, कोई हमें विशेष होने का अवसर तो देता है। नहीं तो हमारे आने की सूचना थाली बजाकर भी नहीं दी गयी थी और ना ही किन्नर आए थे नाचने। लेकिन माँ बहुत खुश थी, पिताजी भी खुश थे। हम उन्हीं की खुशी लेकर बड़े होते रहे और अब अपने जमाने की रीत के कारण दो-तीन जन्मदिन मना लेते हैं। सोच लेते हैं कि क्या कुछ अच्छा कर पाए या यूँ ही बोझ बढ़ाते रहे। अभी बधाई मत देना, अभी जन्मदिन दूर है।

बात इतनी सी है

Written By: AjitGupta - Sep• 22•19

हमारे राजस्थान का बाड़मेर क्षेत्र बेटियों के लिये संवेदनशील नहीं रहा था, यहाँ रेगिस्तान में अनेक कहानियों ने जन्म लिया था। बेटियों को पैदा होते ही मार दिया गया, या फिर ढोर-डंगर की तरह ही पाला गया। जैसे-तैसे बड़े हो जाओ और शादी करके चूल्हे-चौके में घुस जाओ। ना कोई शिक्षा और ना ही कोई ज्ञान। रेगिस्तान का जीवन दुरूह था तो नाजुक जीवों के लिये संघर्ष कठिन था, इसलिये ये घर की चारदीवारी में ही रहीं और पुरुष बाहर संघर्ष करता रहा। लेकिन आज परिस्थिति बदल गयी है। महिला ने संघर्ष करना सीख लिया है और वे भी शान से अपना वजूद लिये खड़ी हैं। एक ऐसी ही महिला की कहानी अभी केबीसी में देखने को मिली – रूमा देवी की कहानी। चार जमात पढ़कर, 17 साल की उम्र में विवाह करके बाड़मेर में घूंघट की आड़ में जीवन काट रही थी लेकिन उसके आत्मविश्वास ने कहा कि मुझे कुछ करना है और आज फैशन जगत का चमकदार सितारा बनकर खड़ी है और अपने साथ 22 हजार महिलाओं के जीवन को भी रोशन कर दिया है।

20 सितम्बर को केबीसी में जो हुआ उसे दुनिया ने देखा। रूमा देवी कम पढ़ी-लिखी थी, उसके जीवन में ज्ञान नहीं था। रेगिस्तान में बेटियां जैसे बड़ी होती हैं, वैसे ही वह भी बड़ी हुई थी अर्थात शिक्षा और अल्प ज्ञान के साथ। बस दादी का सिखाया हुनर हाथ में था – कसीदाकारी। कसीदाकारी को आधार बनाकर उसने कार्यक्षेत्र में प्रवेश किया और संघर्षों के बाद सफलता अर्जित की। केबीसी में जाने का अवसर मिला लेकिन आवश्यक ज्ञान नहीं था। केबीसी ने उनके सहयोग के लिये एक सेलिब्रिटी को चुना जो ज्ञानवान भी हो। लेकिन बस यहीं पोल खुल गयी, हमारे फिल्मी सेलिब्रिटी की। खूब आलोचना हुई की रामायण के सम्बन्धित सरल सा प्रश्न भी उसे नहीं आया! प्रश्न यह नहीं है कि उत्तर क्यों नहीं आया, प्रश्न यह है कि रूमा देवी और सोनाक्षी सिन्हा में अन्तर क्या है? एक के पास हुनर था, शिक्षा नहीं थी और ज्ञान भी नहीं था लेकिन कठिन  परिस्थितियों में  भी जीवन की राह बना ली, मतलब बुद्धिमत्ता के कारण यह सम्भव हुआ।

सोनाक्षी सिन्हा को शिक्षा भी मिली, ज्ञान भी मिला और दुनिया को देखने समझने का व्यावहारिक अवसर भी मिला। आम जनता ने और यहाँ तक की सोनी टीवी ने भी उन्हे ज्ञानवान मानकर रूमा देवी का सहयोगी बना दिया। लेकिन पहले प्रश्न से लेकर अन्तिम प्रश्न तक सोनाक्षी बगलें ही झांकती रही। ज्ञान-शून्य सोनाक्षी। केवल पिता के नाम के सहारे से फिल्म जगत में नाम बनाने वाली सोनाक्षी क्या रूमा देवी की पासंग भी हैं? रूमा देवी को भी रामायण से सम्बन्धित प्रश्न आना ही चाहिये था लेकिन जैसे मैंने कहा कि बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी ईलाकों में बेटियों को भी ढोर-डंगर की तरह ही पाला जाता था। रूमा देवी सुन नहीं पायी रामायण और ना ही दुनिया का ज्ञान ले पायी। सोनाक्षी ने तो दुनिया देखी है फिर इतनी ज्ञान-शून्यता?

देश बदल रहा है, कल तक जो मापदण्ड थे वे भरभरा कर बिखर गये हैं। 5 साल पहले मोदी जी अमेरिका जाते हैं, टीवी एंकर जनता से पूछ रहे हैं कि आप मोदी को कैसे देखते हैं? क्या वे शाहरूख से भी ज्यादा लोकप्रिय हैं? जनता एंकर की मट्टी पलीद कर देती है। आज भी मोदी अमेरिका में हैं और उनकी सभा में ट्रम्प तक बैठे रहेंगे। यह है परिवर्तन! देश में अभिनेताओं को, खिलाड़ियों को भगवान बना दिया गया था! वे ज्ञान शून्य थे लेकिन सुनहरी पर्दे  पर दिखने के कारण वे सर्वस्व बने हुए थे। चुनावों में तो यह स्थिति थी कि किसी भी टुच्चे से अभिनेता या खिलाड़ी को खड़ा कर दो, सामने कितना ही विद्वान राजनेता हो, जनता उसे हरा देगी! लेकिन अब स्थिति बदल गयी है। इस  बार भी चुनाव में कई अभिनेता और कई खिलाड़ी जीते हैं लेकिन उनका महिमा मंडन अब नहीं हो रहा है। वे चुपचाप संसद आते हैं और काम करते हैं। धीरे-धीरे चुनाव जीतना उनकी योग्यता पर निर्भर करेगा।

इसलिये बात इतनी सी है कि ये ग्लेमर के मारे लोग केवल कागजी फूल हैं, इनमें खुशबू मत ढूंढिये। इनकी योग्यता को देखकर ही इनकी मूल्यांकन कीजिये। कल की घटना से सोनी टीवी और अन्य टीवी भी समझ गये  होंगे कि इनकी बुद्धि का पैमाना क्या है और इनकों कितना सम्मान देना है! हम  भी इस बात को समझे कि इनकी चकाचौंध से खुद को बचाएं और वास्तविक ज्ञान को महत्व  दें। काश रूमा देवी का सहयोगी किसी शिक्षिका को ही बना दिया होता! ऐसी फजीहत तो नहीं होती! लेकिन जो हुआ अच्छा ही हुआ, देश को पता लगा कि ये सेलिब्रिटी कितने ज्ञान शून्य होते हैं।

महिला से हटकर पुरुष की अभिव्यक्ति

Written By: AjitGupta - Sep• 20•19

मेरा मन करता है कि मैं दुनिया को पुरुषों की नजर से देखूं लेकिन देख नहीं पाती हूँ! क्यों नहीं देख पाती क्योंकि मेरे पास पुरुष की सोच नहीं है और ना ही पुरुष की सोच क्या है, यह किसा किताब से अनुभव मिला है! पुरुष स्वयं को कम ही अभिव्यक्त करते हैं, उनके दर्द क्या है, उनकी सोच क्या है, उनकी चाहतें क्या हैं, पता नहीं चल पाती हैं! उनकी बातें दुनिया जहाँ पर होती हैं लेकिन कभी खुद के बारे में नहीं होती हैं! वे महिला का दर्द खूब उकेर लेते हैं लेकिन पुरुष का असली दर्द कभी नहीं उकेरते। बस अपने हाथ पर लिख देते हैं कि मर्द को दर्द नहीं होता।

यदि मर्द को दर्द नहीं होता तो दुनिया में इतना दर्द किसका है! कोई भी पुरुष जब किसी को दर्द देता है तो उससे पहले वह दर्द लेता है। उसके सीने में दर्द पैदा होता है और उस दर्द को पाटने के लिये दूसरों को दर्द देता है। मैं वही जानना चाहती हूँ कि आखिर यह दर्द क्या है? आखिर वह दर्द क्या है जो एलेक्जेण्डर को सुदूर मेसिडोनिया से लेकर आता है? क्या सत्ता पाना उसका सबसे बड़ा दर्द है? वह कौन सा दर्द है जो चर्च का पादरी महिलाओं को मुक्त नहीं होने देता हैं, तो क्या पुरुष का दर्द यौन पिपासा है? ( महिला मुक्ति आंदोलन चर्च से मुक्ति का था ) वह कौन सा दर्द है जो पुरुष को मृत्यु के बाद भी जन्नत की कल्पना में हूरों की चाहत पैदा करता है!

मैंने कभी किसी पुरुष को नहीं पढ़ा जिसने लिखा हो कि हम तड़प रहे हैं, हम पीड़ित हैं। बस पढ़ा है तो महिला की पीड़ा को शब्द देते पुरुषों को पढ़ा है, मानो वे कह रहे हों कि हम पीड़ा रहित हैं लेकिन बेचारी महिला पीड़ा से मरी जा रही है। जो पीड़ा रहित है वह तो साक्षात ईश्वर ही है ना! बस पुरुष ईश्वर का ही रूप बताने में जुटा रहता है, कभी सत्ता के लिये तलवार लेकर निकल पड़ता है तो कभी भोग को लिये महिला को चंगुल में फांसने की जुगत बिठाता है और कभी जन्नत में भी हूरों के लिये पृथ्वी को रक्तरंजित करता रहता है!

मैं घर के पुरुषों को देखती हूँ, अपने मन को कभी अभिव्यक्त नहीं करते। बाहर की दुनिया के पुरुषों को भी खूब देखा है लेकिन वे भी खुद को अभिव्यक्त नहीं करते और ना ही सोशल मीडिया पर देखा है किसी को अभिव्यक्त होते हुए। वे केवल चुटकुलों में मजाक उड़ाते हुए दिखायी देते हैं, गम्भीर बात कभी नहीं करते। वे समाज के चिकत्सक बने घूमते हैं लेकिन समाज के प्रमुख अंग पुरुष का ही निदान नहीं करते तो समाज को क्या खाक ठीक करेंगे!

दुनिया में मनोरोग बढ़ते जा रहे हैं! स्मृति-भ्रंश भी प्रमुख समस्या बन गयी है। आखिर क्यों बढ़ रहे हैं ये रोग! हम खुद को अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। हमने अपनी दुनिया अलग बसा ली है। पुरुष सामाजिक प्राणी है लेकिन धीरे-धीरे समाज से कट रहे हैं, परिवार से भी कटने लगे हैं और परिवार में भी अक्सर दिखता है कि पुरुषों की दुनिया अलग ही बन गयी है। न जाने कितने घर हैं जहाँ शाम ढलते ही पुरुष गिलास और चबेना लेकर अकेला या दोस्तों के साथ बैठ जाता है या किसी क्लब में या फिर अकेले ही सैर को चल देता है। कभी पुस्तकालय में भी अकेले बैठे मिल जाते हैं लेकिन उम्र के पड़ाव में बहुत ही कम लोग हैं जो परिवार के साथ गप्पे मारते दिखते हैं।

पुरुष शायद सोचता है कि यदि मैंने अपना दर्द बता दिया तो मेरा मूल्यांकन कम हो जाएगा। मैं एक सामान्य आदमी बनकर रह जाऊंगा। अब मैं तो इस बारे में लिख नहीं सकती, बस महिला की नजर से जो समझ पड़ता है उसे लिख रही हूँ। हो सकता है कि पुरुष का नजरियां कुछ और हो! लेकिन जब तक वे महिला को अभिव्यक्त करने के स्थान पर पुरुष को याने की खुद को अभिव्यक्त करना नहीं शुरू करेंगे तब तक समाज का वास्तविक स्वरूप निकलकर बाहर नहीं आएगा। यह पोस्ट आप सभी के दिल  पर लगेगी, आक्रोश भी खूब होगा कि एक महिला की हिम्मत कैसे हो गयी कि पुरुष के बार में लिख सके, लेकिन मैंने लिख दिया है। महिला की अभिव्यक्ति तो हजार तरह से रोज ही होती है लेकिन कभी पुरुष की अभिव्यक्ति भी हो ही जाए! क्या कुछ बुरा किया क्या?