अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

पति को पूजनीय बनाना या चौथ माता का व्रत करना?

Written By: AjitGupta - Oct• 09•17

पति को पूजनीय बनाना या चौथ माता का व्रत करना?
कल घर में गहमागहमी थी, करवा चौथ जो थी। लेकिन करवा चौथ में नहीं मनाती, कारण यह नहीं है कि मैं प्रगतिशील हूँ इसलिये नहीं मनाती, लेकिन हमारे यहाँ रिवाज नहीं था तो नहीं मनाया, बस। जब विवाह हुआ था तो सास से पूछा कि करवा चौथ करनी है क्या? वे बोलीं कि अपने यहाँ रिवाज नहीं है, करना चाहो तो कर लो। अब रिवाज नहीं है तो मैं अनावश्यक किसी भी कर्मकाण्ड में क्यों उलझू और मैंने तत्काल छूट का लाभ ले लिया। लेकिन यह क्या, देखा वे करवा चौथ पर व्रत कर रही हैं! मैंने पूछा कि आप तो कर रही हैं फिर! उन्होंने बताया कि हम सारी ही चौथ करते हैं, इसलिये यह व्रत है, करवा चौथ नहीं है। धार्मिक पेचीदगी में उलझने की जगह, मिली छूट का लाभ लेना ही उचित समझा।
खैर, कल भतीजी और ननद दोनों ही आ गयी थी और उनका करवा चौथ अच्छे से हो जाए इसलिये सारे ही जतन मैं कर रही थी। रात को पूजा भी पड़ोस में की गयी और कहानी भी सुनी। कहानी सुनते हुए और अपनी सास की बात का अर्थ समझते हुए एक बात समझ में आयी कि करवा चौथ का व्रत, चौथ माता के लिये किया जाता है, माता तो एक ही है – पार्वती। बस अलग-अलग नाम से हम उनकी पूजा करते हैं। इस व्रत में पति की लम्बी आयु की बात और केवल पति के लिये ही इस व्रत को मान लेना मेरे गले नहीं उतरा। महिलाएं जितने भी व्रत करती हैं, सभी में सुहाग की लम्बी उम्र की बात होती ही है, क्योंकि महिला का जीवन पति के साथ ही जुड़ा है, वरना उसे तो ना अच्छा खाने का हक है और ना ही अच्छा पहनने का। अब जो व्रत चौथ माता के लिये था, वह कब से पति के लिये हो गया, मुझे समझ नहीं आ रहा था।
हम बचपन से ही भाभियों को व्रत करते देखते थे, रात को चाँद देखकर, उसको अर्घ चढ़ाकर सभी अपना व्रत खोल लेती थी। पति तो वहाँ होता ही नहीं था। लेकिन आज पति को ही पूजनीय बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पति के लिये या अपने सुहागन रहने के लिये यह व्रत है जो चौथ माता को पूजकर किया जाता है ना कि पति को परमेश्वर बनाने के लिये है। हमारे व्रतों को असल स्वरूप को हमें समझना होगा और उनका अर्थ सम्यक हो, इस बात का भी ध्यान रखना होगा। यह चौथ माता का व्रत है, उसे साल में एक बार पूजो चा हर चौथ पर पूजो, लेकिन व्रत माता का ही है। इसलिये पूजा के बाद बायणा देने की परम्परा है जो अपनी सास को दिया जाता है। महिला सुहागन रहने के लिये ही चोथमाता का व्रत करती है, साथ में पति को भी माता को पूजना चाहिये कि मेरी गृहस्थी ठीक से चले। बस यह शुद्ध रूप से महिलाओं का व्रत है, इसे पति को परमेश्वर बनाने की प्रक्रिया का अन्त होना चाहिये।

बैलों की चरम-चूं, चरम-चूं

Written By: AjitGupta - Oct• 01•17

मैंने कई बार न्यूसेंस वेल्यू के लिये लिखा है। आज फिर लिखती हूँ। यह जो राज ठाकरे है, उसका अस्तित्व किस पर टिका है? कहते हैं कि मुम्बई में वही शान से रह सकता है जिसकी न्यूसेंस वेल्यू हो। फिल्मों का डॉन यहीं रहता है। चम्बल के डाकू बीहड़ों में रहते हैं, इसलिये उनका आतंक या न्यूसेंस वेल्यू बीहड़ों से लगे गाँवों तक सीमित है लेकिन मुम्बई के डॉन की वेल्यू सभी जगह लगायी जाती है। राज ठाकरे भी उन में से ही एक हैं। उनकी सोशल वेल्यू तो लगभग जीरो है, इसकारण वे पूरी निष्ठा से न्यूसेंस वेल्यू बढ़ाने में लगे हैं। जैसै आपको हर सामाजिक मौके पर अपनी सोशल वेल्यू बढ़ानी होती है, वैसे ही राज ठाकरे जैसों के लिये अपनी न्यूसेंस वेल्यू बढ़ाने का मौका दुर्घटनाओं के समय मिलता है।
कहीं भगदड़ मचती है, शायद मुम्बई में रोज की ही मारामारी है, तो इन जैसों को अपनी वेल्यू बढ़ाने का अवसर समझ आता है। कारखाने में काम करते समय यदि किसी मजदूर की तबियत खराब हो जाए तो ऐसे लीडर दौड़कर मालिक का कॉलर पकड़ लेते हैं। बेचारा मालिक कुछ पैसा देकर अपनी जान छुड़ाता है। मजदूर को कुछ मिले या नहीं लेकिन उस लीडर की न्यूसेंस वेल्यू बढ़ जाती है और उसकी कमाई चल पड़ती है। मुम्बई में पुल नहीं टूटता है, भगदड़ है लेकिन राज ठाकरे दौड़ पड़ते हैं कि बुलेट ट्रेन नहीं आने दूंगा। मुझे चाहिये हफ्ता। आज ही अहमद नगर में एयर पोर्ट का उद्घाटन है, रोक देना चाहिये उसे भी। राज ठाकरे सरीखे लोगों को कसम खा लेनी चाहिये कि जब तक देश में ऐसी भगदड़ रहेंगी, वायुयान का प्रयोग नहीं करेंगे।
समाज को सभ्य बनाने की ओर कदम किसी का नहीं है, बस हर व्यक्ति लगा है अपनी दादागिरी छांटने में। मुम्बई के आंकड़े बताते हैं कि रोज ही न जाने कितने लोग ट्रेनों में लटकते हुये यात्रा करते हैं और मरते भी हैं। तो रोक दो सारे ही विकास की धारा। क्यों नहीं रोका जा रहा है मुम्बई में बड़ी कम्पनियों को आने से। जिन कम्पनियों के भी 10000 से ज्यादा कर्मचारी हैं, उन्हें अपनी टाउनशिप बनानी चाहिये। लेकिन रोकने की कवायद हो रही है बुलेट ट्रेन को। ऐसा लग रहा है जैसे बुलेट ट्रेन के कारण ही इनका वोट बैंक धड़ाम हो जाएगा! भाई राजनीति में हो तो राजनीति जैसी बात करो, गुण्डे-मवालियों जैसी बात तो मत करो, इससे ना न्यूसेंस वेल्यू बढ़ती है और आपकी सोशल वेल्यू तो पहले से ही जीरो है, तो वह तो कैसे बढ़ेगी। भीड़ को रोको ना कि तीव्रता को। तुम्हारी लीडरी तीव्रता से ही परवान चढ़ेगी ना कि बैलों की चरम-चूं, चरम-चूं से।

महिला की हँसी उसकी चूंदड़ जैसी

Written By: AjitGupta - Sep• 23•17

जब भी किसी महिला को खिलखिलाकर हँसते देखती हूँ तो मन करता है, बस उसे देखती ही रहूँ। बच्चे की पावन हँसी से भी ज्यादा आकर्षक लगती है मुझे किसी महिला की हँसी। क्योंकि बच्चा तो मासूम है, उसके पास दर्द नहीं है, वह अपनी स्वाभाविक हँसी हँसता ही है लेकिन महिला यदि हँसती हैं तो वह मेरे लिये स्वर्ग से भी ज्यादा सुन्दर दृश्य होता है। फेसबुक पर कुछ महिलाएं अपनी हँसी डालती हैं. उनके जीवन को भी मैंने जाना है और अब जब उनकी हँसी देखती हूँ तो लगता है कि जीवन सार्थक हो रहा है। कहाँ हँस पाती है महिला? पल दो पल यदि किसी प्रसंग पर हँस लें तो कैसे उसे हँसना मान लेंगे?
बचपन में एक लड़की हँस रही थी, माता-पिता ने टोक दिया, ज्यादा हँसों मत, लड़कियों के लिये हँसना ठीक नहीं है। बेचारी लड़की समझ ही नहीं पायी कि हँसने में क्या हानि है? आते-जाते जब सभी ने टोका तो उसकी हँसी कहीं छिप गयी। सोचा जब अपना घर बसाऊंगी तो जी भर कर हँसूंगी लेकिन किसी पराये घर को अपना कहने में हँसी फंसकर रह गयी। दूसरों को हँसाने का साधन जो बनना था उसे, तो भला वह वहाँ भी कैसे हँसती? वार त्योहार जैसे चूंदड़ पहनकर अपनी पुरानी साड़ी को छिपाती आयी हैं महिलाएं, वैसे ही कभी हँसी को ओढ़ने का मौका मिल जाता है उन्हें। जब त्योंहार गया तो चूंदड़ को समेटकर पेटी में रख दिया बस।
बड़ा होने की बाट जोहती रही महिला, कब बेटा बड़ा हो और माँ का शासन चले तो जी भरकर हँसे। लेकिन तब तो पल दो पल की हँसी भी दुबक कर बैठ गयी। दिखने को लगता है कि किसने रोकी है हँसी? लेकिन महिला जानती है कि उसकी हँसी किसी पुरुष के अहम् को ठेस पहुँचाने का पाप कर देती है। शायद दुनिया का सबसे बड़ा पाप यही है। कोई काले लिबास में कैद है तो कोई सफेद लिबास में कैद है, उसका स्वतंत्र अस्तित्व कहीं है ही नहीं। हँसने पर आज्ञा-पत्र लेना होता है या किसी का साथ जरूरी होता है। महिलाएं इसलिये ही इतना रोती हैं कि उन्हें हँसने की आजादी नहीं है, वे रो-कर ही हँसने की कमी को पूरा करती हैं। इसलिये जब भी किसी महिला को रोते देखो तो समझ लेना कि यह हँसने की कमी पूरा कर रही है। मैं तो रोती भी नहीं हूँ बस किसी महिला को हँसते देख लेती हूँ तो मान लेती हूँ की मैं ही हँस रही हूँ।

झूठी शान से मुक्त होता पुरुष

Written By: AjitGupta - Sep• 22•17

झूठी शान से मुक्त होता पुरुष
कुछ लोग अलग मिट्टी से बने होते हैं, उनकी एक छोटी सी सोच उन्हें सबसे अलग बना देती है। कल केबीसी के सेट पर खिलाड़ी थी – अनुराधा, लेकिन मैं आज बात अनुराधा की नहीं कर रही हूँ। मेरी बात का नायक है अनुराधा का पति – दिनेश। कुछ लोग जीवन में एक उद्देश्य लेकर आगे बढ़ते हैं, स्वयं को बीज की तरह धरती में रोप देते हैं। उनका सारा ध्यान इस बात पर होता है कि मेरे इस बीज के त्याग से श्रेष्ठ बीजों का निर्माण हो सके। दिनेश का बचपन अशिक्षा की रात के साथ बीता, उसके दिल और दीमाग में एक ही बात घर कर गयी कि मेरी संतान आगे पढ़ेगी। लेकिन यह कैसे सम्भव होगा? बारह भाई-बहनों के गरीब परिवार में उम्मीद की किरण कहीं नहीं थी। शिक्षित युवती से विवाह का सपना तो सब कोई देख लेते हैं लेकिन उसके लिये खुद को होम देने की बात कितने कर पाते हैं? दिनेश ने पोलियों से ग्रस्त एक शिक्षित युवती – अनुराधा से विवाह किया और उसकी बैसाखी बन गया। अब अनुराधा पढ़ाई भी करती और नौकरी भी करती और घर सम्भालता दिनेश। रोटी बनाने से लेकर सारे ही काम दिनेश करता। धीरे-धीरे शिक्षिका अनुराधा डिप्टी-कलेक्टर बन गयी और कल केबीसी में हॉट-सीट पर थी।
जो पुरुष पत्नी के प्रमोशन होने पर भी शराब के अड्डे पर गम गलत करता दिख जाता है, वहीं दिनेश पूरे घर को मनोयोग से सम्भाल रहा है। दोनों पैरों से अपाहिज लड़की से विवाह करना, फिर घर की जिम्मेदारी वहन करना साहस का काम है। अपाहिज होने के बाद भी अनुराधा का आत्मविश्वास देखने लायक था। अक्सर पतियों के सपनों को पूरा करने में पत्नी खुद को झौंक देती है, अपने सपने के बारे में रत्ती भर नहीं सोचती है और बदले में सुनती है कि तुम करती ही क्या हो? किसी के भी सपने किसी दूसरे के सपनों को जमींदोज करके ही पूरे होते हैं। किसी भी सफल व्यक्तित्व के पीछे उसके साथी का हाथ होता है और हमारे देश में अक्सर यह हाथ महिला का होता है लेकिन कल दिनेश ने सिद्ध कर दिया कि पुरुष भी अपने झूठे अभिमान को त्याग दे तो एक सुखद जीवन और सुखी परिवार का निर्माता बन सकता है। ऐसे न जाने कितने दिनेश होंगे, बस उन्हें समाज जीवन में उदाहरण बनकर सामने आना है, तब झूठी शान से पुरुष मुक्त हो सकेगा और अपने अंकुरण से श्रेष्ठ संतान को जन्म देगा।

ब्राह्मण की पोथी लुटी और बणिये का धन लुटा

Written By: AjitGupta - Sep• 15•17

हम बनिये-ब्राह्मण उस सुन्दर लड़की की तरह हैं जिसे हर घर अपनी दुल्हन बनाना चाहता है। पहले का जमाना याद कीजिए, सुन्दर राजकुमारियों के दरवाजे दो-दो बारातें खड़ी हो जाती थी और तलवार के जोर पर ही फैसला होता था कि कौन दुल्हन को ले जाएगा? तभी से तो तोरण मारने का रिवाज पैदा हुआ था। हिन्दू समाज में बणिये और ब्राह्मण की स्थिति आज ऐसी ही है। ये भी हमारे समाज के सुन्दर और समृद्ध चेहरे हैं, इन पर ही आक्रान्ताओं की नजर सदैव से रहती है। युद्ध के बाद हमेशा ये ही लुटते हैं। इनके पास ही वैभव एकत्र है और इनके पास ही सुन्दरता है और ये ही समाज की दुर्बल कड़ी भी है। इन पर सारी दुनिया की नजर रहती है। बस इन्हें अपने समाज में मिला लो, हमारा समाज समृद्ध हो जाएगा, यही सोच सभी की रहती है। आसान शिकार भी यही हैं, जब असम में लूट मचती है तो सेठों को ही लूटा जाता है। जितने भी युद्ध हुए हैं उसमें बणिये-ब्राह्मण ही लुटे है। बाकी के पास तो लुटने के लिये था ही क्या और यदि था भी तो साथ में उनके पास तलवार भी थी अपनी रक्षा के लिये। युद्ध किसने लड़े? क्षत्रियों ने लड़े। सैनिक कौन बने? राजपूत, जाट, गुर्जर, आदिवासी आदि। युद्ध में कोई भी जीते या हारे, लड़ते हमेशा क्षत्रीय थे लेकिन लुटते हमेशा ही बणिये-ब्राह्मण थे।
छठी शताब्दी में सिन्ध पर मोहम्मद बिन कासिम का आक्रमण हुआ, उसने किसका कत्लेआम किया? ब्राह्मणों का। एक-एक को चुन-चुनकर मारा, लाखों का कत्लेआम किया। आज जो सिन्धी दिखायी देते है ना, वे सब ब्राह्मण थे। सिकन्दर ने किसे लूटा? गजनी ने किसे लूटा? बाबर ने किसे लूटा? अकबर ने किसे लूटा? औरंगजेब ने किसे लूटा? विभाजन में कौन लुटा? कश्मीर में कौन लुटा? आज भी जब दंगे होते हैं तो कौन लुटता है? ब्राह्मण की पोथी लुटी और बणिये का धन लुटा। सदियों से यही हो रहा है। इतिहास में क्या दर्ज है? इतने मण जनेऊ जली और इतने दिन पुस्तकालय जले। इतने मण सोना-चाँदी लूटे गये और इतने मण हीरे-जवाहरात लूटे गये। राजवंश कटे-मरे लेकिन लूट बणिये-ब्राह्मणों की हुई।
इसलिये सुरक्षा के लिये विचार किसे करना चाहिये? आज सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करने की जरूरत आन पड़ी है, सामाजिक सुरक्षा समाज का ही उत्तरदायित्व है। जिस समाज के पास हथियार की ताकत नहीं है, उन समाजों को दूसरों को अपनी ताकत बनाना होता है। हमें भी आज समाज के उन योद्धाओं को जो हमारी सुरक्षा में सक्षम है, ताकतवर और सुविधा सम्पन्न बनाना होगा। उनसे आत्मीयता बढ़ानी होगा। समाज के बिखराव को दूर करना हमारा ही उत्तरदायित्व है, इसी में हमारा बचाव है। जो लोग हिन्दू समाज पर घात लगाए बैठे हैं, वे इन जातियों के हमसे दूर करना चाहते हैं, जिससे हम एकदम कमजोर हो जाएं। पैसे और ज्ञान के बलबूते हम सुरक्षित नहीं रह सकते, सुरक्षा के लिये योद्धा जातियों को अपने साथ रखना ही होगा। अब तय आप को करना है कि बणिये-ब्राह्मण इन जातियों से दूरी बनाकर रखे या अपना रक्षक मानते हुए इन्हे सम्मान दें।