अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

डर कम होना चाहिए

Written By: AjitGupta - May• 08•20

दो खबरे एक साथ आयी, एक भाई ने बहन के कोरोना होने पर छत से छलांग लगायी और एक पोते ने दादी के कोरोना पोजेटिव होने पर फाँसी का फन्दा लगा लिया! डर हमारे रोम-रोम में समा रहा है, यह डर मृत्यु से अधिक दुर्दशा का डर है। कल ही एक खबर और आयी कि कोरोना पोजेटिव की मृत्यु हो गयी। उसे सीधे ही श्मशान ले गये लेकिन उसके बेटे ने हाथ लगाने की हिम्मत नहीं जुटायी! मृत्यु का यह सत्य सभी को दिखायी देने लगा है, घर से निकलते समय व्यक्ति इतना डरा रहता है कि आधी जंग तो वह वहीं हार जाता है। प्रशासन को थोड़ा संयम दिखाना चाहिये और समाज यदि इस देश में कहीं किस कोने में दुबका है तो उसे धीरज बंधाने के लिये आगे आना चाहिये।
पूरे देश में जो अफरा-तफरी मची है, वह भी इसी डर से मची है कि कब कौन किस शहर में गुमनाम सी मौत मर जाएंगे! कम से कम अपने घर तो पहुँच जाएं! हिन्दू दर्शन में मृत्यु को संस्कार माना गया है, अन्तिम संस्कार। मृत्यु को भी हमने जीवन की तरह महत्व दिया है इसलिये सम्मानपूर्वक संस्कार का महत्व है। लेकिन समाज का कोई भी अंग ऐसे परिवारों को ढांढस बंधाने आगे नहीं आ रहा है! व्यक्ति का डर समाप्त होना चाहिये, कि वह गुमनाम सी जिन्दगी अस्पताल में जीने को और मरने को मजबूर ना हो। उसे लगना चाहिये कि उसका परिवार और उसका समाज उसके साथ खड़ा है। संक्रमण को देखते हुऐ चाहे रोगी को पास ना जाएं लेकिन रोगी को लगना चाहिये की उसके अपने उसके पास हैं। यह काल ऐसा है कि जब अपने भी दूसरे शहरों में या विदेश में हैं तब समाज को और अधिक ध्यान देने की जरूरत हैं। समाज के लोगों के, लोगों के पास संदेश पहुँचने चाहिये कि कुशलता नहीं होने पर सूचित करें, किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर सूचित करें। नागरिकों की सूची बनाकर कुशलक्षेम पूछना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को लगना चाहिये कि वह अकेला नहीं है, उसके साथ समाज और देश खड़ा है। भारत में सरकार तो आज विश्वास दिलाने में सफल हो रही है लेकिन समाज अभी आगे नहीं आया है। सामाजिक नेतृत्व को समाज का संरक्षक बनकर आगे आना ही होगा नहीं तो यह डर बढ़ता ही जाएगा। बस डर कम होना चाहिये।

दोनों जीवन देख लिये

Written By: AjitGupta - Apr• 20•20

पुराने जमाने में विलासिता का प्रदर्शन दो जगह होता था – एक राजमहल तो दूसरा किसी गणिका का कोठा। हर आदमी लालायित रहता था कि कैसे भी हो एक बार राजमहल देख लिया जाए! इसी प्रकार जैसे ही जवानी की दस्तक हुई नहीं कि मर्द सोचने लगता था कि इस गणिका के कोठे पर नृत्य देखने तो जाना है! वक्त बदला और विलासिता ने पैर पसारे। विलासिता के दर्शन सभी के लिये सुलभ होने लगे बस पैसे फेंको और तमाशा देखो।

एक जमाना था जब भोजन सादगी लिये होता था लेकिन भोजन में भी राजमहलों जैसी विलासिता ने घर करना शुरू किया। आम आदमी के पास करने को दो ही कार्य रह गये, विलासिता पूर्ण वैभव को देखना और ऐसे जीवन का उपभोग करना। पर्यटन इसका सबसे सुन्दर साधन बन गया। एक सामान्य व्यक्ति से मैंने एक बार  पूछ लिया कि बहुत दिनों से दिखायी नहीं दिये, कहाँ थे? वे बोले कि हम साल में दो बार विदेश यात्रा पर जाते हैं, एक लम्बी दूरी की और दूसरी छोटी दूरी की। हमने सारा संसार देख लिया है, अच्छे से अच्छे होटल देख लिये हैं और मंहगे से मंहगा खाना खा लिया है।

मैं अपने शहर के जीवन पर नजर घुमाने लगी, देखा कि शनिवार-रविवार को कोई भी सभागार और होटल-रेस्ट्रा खाली नहीं है, सभी में कुछ ना कुछ कार्यक्रम चल रहे हैं। वहाँ भी अच्छे भोजन के लिये जा रहे हैं और मंचों पर मिलने वाले फूलों के हार का भी लालच है। कहीं पिकनिक है, कहीं किट्टी है, कही जन्मदिन मन रहा है तो कहीं विवाह की वर्षगाँठ। शहर में विवाह समारोह की तो धूम मची है, औसतन आदमी साल में 30-40 दिन तो समारोह में चले ही जाता है। याने की हर व्यक्ति विलासिता में डूब जाना चाहता है।

ऐसे जीवन के चलते अचानक ही हो गया लॉकडाउन। सब कुछ बन्द। विलासिता के दर्शन बन्द, पकवानों की वजह बन्द! एक तरफ डर पसर रहा था, जीवन के आनन्द छिन रहे थे तो दूसरी तरफ नई रोशनी भी हो रही थी। घर की मुंडेर पर चिड़िया चहकने लगी थी, धूल से पटा आंगन साफ रहने लगा था। सड़क के पार वाले घर से भी आवाजें सुनायी दे रही थीं। घर-घर में सादगीपूर्ण भोजन बन रहा था, सभी के पेट स्वस्थ हो रहे थे। कपड़ों से अटी पड़ी अल्मारी की ओर सुध ही नहीं थी! पैसे भी कृपणता से घर छोड़ रहे थे। बच्चों का जिद करना भी कम से कम होता जा रहा था।

पहले हम भाग रहे थे, अब घर में शान्त से बैठे हैं। विलासिता देखते-देखते हमने घर को भी अजायबघर बना डाला था। सादी दाल-रोटी खाना पुरातनपंथी लगती थी और विदेशी खाना हमारे लिये फैशन बन गया था। दुनिया की दौड़ में हम शामिल होकर अपना चैन खो बैठे थे। बस दौड़ रहे थे, दौड़ रहे थे। अपना स्वाद भूल गये थे, पराये स्वाद के पीछे पागल हो रहे थे! शाम 5 बजे बाद अब घर बसने लगते हैं, मर्द घर में आने लगते हैं, रात 9 बजे तक सारे घरों में अंधेरा होने लगता है। सड़कें खामोश हो जाती हैं। झिंगुर की आवाज भी सुनायी दे जाती है। लगता है जीवन का परम सुख पा लिया हो।  

विलासिता इतनी भी नहीं पैर पसारे कि कोरोना जैसा विषाणु हमारे अन्दर ही प्रवेश कर लें और वहीं बस जाएं! हम दौड़ना भूलकर घर में कैद हो जाएं! जीवन ने करवट बदली है, दोनों जीवन हमने देख लिये हैं, बस कौन सा कितना अच्छा है, यह आकलन हमें करना है। विलासिता के लिये कितनी दौड़ लगानी है और अपने घर के लिये कितनी हद बनानी है, यह निर्णय हम सबका है।

आते रहा करो

Written By: AjitGupta - Apr• 17•20

निंदक टाइप के लोग बड़े कमाल के होते हैं, किसी की बाल की खाल निकालनी हो तो ये ही याद आते हैं। क्या मजाल ऐसे बन्दे किसी की तारीफ कर दें, कोई ना कोई अवगुण निकाल ही लेते हैं। आप कहेंगे कि इसमें क्या कमाल है, मैं कहती हूँ की कमाल ही कमाल है। तभी तो कवि ने भी कह दिया कि निंदक नियरे राखिय़े। आंगन में अच्छी सी कुटिया बनाकर इन्हें जगह देनी चाहिये। अब कल की ही बात ले लीजिए, बन्दा लाकडाउन के आंदोलन की निंदा करके चले गया। एण्टी वायरस बनाने में जितना दिमाग चाहिये उतना ही दिमाग निंदा करने में लगता है, ऐसे ही नहीं कपिल सिब्बल जैसे लोग रोज उग आते हैं और लोग इन्हें हाथों हाथ लेते हैं। किसी के परचक्खे उड़ता देख आनन्द आता है लोगों को।

लेकिन बन्दा सच्चा होना चाहिये, यह नहीं की किसी ने कागज पर लिख दिया, थोड़ी मशक्कत करा ली और बन्दा आकर बक गया। ऐसे नहीं निंदक बन जाओगे प्यारे लाल। खुद का दिमाग  होना चाहिये तब जाकर अंगद की तरह पैर जमा पाओंगे! माना कि तुम तुरप के पत्ते के समान बोल गये कि लोकडाउन दवा नहीं है, लेकिन दवा से कम भी नहीं है! छूत की बीमारी को संक्रमण से बचा लो तो दवा जैसा ही काम करती है! ढूंढ-ढूंढकर लाते तो बहुत हो लेकिन खुद का दिमाग नहीं होने से सारा गुड़-गोबर हो जाता है। मेरे हीरालाल खुद को खुरचो, तब जाकर हीरे में चमक आएगी। कब तक कॉपी-पेस्ट करके काम चलाते रहोंगे! नेता बनना है तो खुद का ही दिमाग चाहिये नहीं तो ना घोड़ा और ना गधा, कुछ नहीं बन पाओगे।

खुद को कभी कन्हैया लाल बना लेते हो, कभी कजरी जैसा तो कभी अहमद पटेल की नकल करते हो, लेकिन सारे ही जतन बेकार हो जाते हैं क्योंकि ऑरिजिनल नहीं हैं ना! तुम ने कभी भी सुना है कि कोई भी व्यक्ति यह कह रहा हो कि मैं गाँधी परिवार के कुल दीपक जैसा बनना चाहता हूँ! बस तुम ही लगे पड़े हो, लोगों के पीछे! कभी यह बन जाऊँ, कभी वह बन जाऊँ! जब तक ऑरिजनल निंदक नहीं बनोंगे तब तक तुम्हारा कुछ नहीं होने का। कुछ और कुटिल लोगों के साथ रहो, उनको अपना गुरु मानो और धार पैनी करो। नकल से तो कुछ नहीं मिलने वाला। प्रेस के सामने आओ और मनोरंजन करके चले जाओ, बस यही काम रह गया है तुम्हारा। अब तो तुम्हारे पास माँ का बेटा होने के अतिरिक्त कोई आधार-कार्ड भी नहीं है, फिर भी तुम मनोरंजन करने चले आते हों और हमारी  प्रतिभा को भी लिखने को उकसा जाते हो, इसके लिये तो आभार बनता ही है। कब से सोशल मीडिया खामोश सी थी, तुम्हारे आने से हलचल तो हुई। आते रहा करो। निंदक तो नहीं बन सकते, हाँ वैसे ही आ जाया करो, कुछ तो मसाला मिल ही जाता है।

बाहर आदमी है

Written By: AjitGupta - Apr• 16•20

न जाने कब से एक बात सुनी जा रही है – महिला को कहा जा रहा है कि अन्दर रहो, बाहर आदमी है! रात को बाहर मत आना क्योंकि बाहर आदमी है! दिन को भी मुँह छिपाकर आना क्योंकि बाहर आदमी है! अपने शरीर की अंगुली भी मत दिखाना क्योंकि बाहर आदमी है! चारों तरफ़ से कपड़े से लपेट दिया, घर में ताला लगा दिया क्योंकि बाहर आदमी है!
तभी अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि आदमी को कहा गया घर में रहें , बाहर वायरस है, ख़तरा है। आदमी बिलबिला गया। मैं आदमी, भला मुझे किसका ख़तरा! मैं कैसे रहूँ घर की चारदीवारी में क़ैद! आदमी से भी कहा गया कि छूना मत, किसी को भी नहीं! मुँह ढककर रहना, वायरस कैसे भी, कहीं से भी शरीर में घुस सकता है! आदमी का बिलबिलाना वाजिब था। आदमी कहने लगा कि मैं इस धरती का भगवान और मुझे घर के अन्दर क़ैद करने वाला कौन? वह रोज़ बहाने ढूँढने लगा, बाहर निकलने के। कैसे भी वह बताना चाहता था कि मैं आदमी हूँ!
सदियों से महिला को घर में क़ैद रखा हुआ है लेकिन अब आदमी से यह व्यवहार बर्दाश्त नहीं हो रहा! मरता हूँ तो मर जाऊँगा लेकिन मुझे मुक्ति चाहिये, मुझे लाचार बनकर नहीं रहना। कभी भीड़ बनाकर निकल पड़ता है, कभी तमाशबीन बनकर और कभी आतंकी बनकर।
आदमी कह रहा है कि मैंने घर महिला के लिये बनाया था, मैं तो बाहर का प्राणी हूँ। मैं घर में नहीं रह सकता! निकालो मुझे बाहर निकालो! महिला कह रही है, देख घर के आनन्द देख! देख पर्दे के पीछे का सुकून देख! कैसे कपड़े से चारों तरफ़ से लिपट कर रहा जाता है, ज़रा देख तो ले! कुछ दिन तो मेरा जीवन जी कर देख!

बच्चों सुनाती हूँ तुमको कहानी

Written By: AjitGupta - Mar• 27•20

जब भी प्रश्न सामने खड़े हो जाते हैं हम अक्सर भूतकाल में चले जाते हैं, सोचने लगते हैं कि हमने पहले क्या किया था! हमारे बचपन में ना टीवी था, ना बाहर घूमने की इतनी आजादी! बस था केवल स्कूल और घर या फिर मौहल्ला। स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते ही रहते थे लेकिन उनमें हिस्सा लेने की कूवत हम में नहीं थी। स्कूल में लड़कियाँ नाच रही होती और झूम-झूम कर गा रही होती कि म्हारी हथेलियाँ रे बीच छाला पड़ गया म्हारा मारूजी…… । हमारे मन में बस जाता वह गीत, कभी लड़कियाँ पेरोड़ी बनाकर कव्वाली करती तो कभी नाटक भी होता। हम सब देखते और हमारा मन भी कुलांचे मारने लगता। हम घर आते, मौहल्ले की सखी-सहेलियों से लेकर लडकों तक को एकत्र करते और फिर शुरू होता नृत्य, परोड़ी बनाना और नाटक खेलना। कभी सारे ही मौहल्ले को एकत्र कर लेते और फिर मंचन होता सारी ही कलाओं का।

हम देखते थे कि घर-घर में कहानियाँ सुनायी जाती थी, कहीं राजा-रानी थे, कहीं राम-सीता थे, कहीं श्रवण कुमार थे, कहीं चोर-सिपाही थे। ऐसे ही पौराणिक कथानकों से भरे होते थे सारे ही घर। महिलाएं भी हर बात में गीत गाती, मंगोड़ी बनानी हो तो सारा मौहल्ला एकत्र होता, पापड़ बनाने हो तो भी एकत्र होता और फिर गीत गाएं जाते। कभी भी घर से बाहर जाने का मन ही नहीं करता था, समय ही नहीं था कुछ और सोचने का। हमने कभी नहीं कहा कि हम बोर हो रहे हैं, शायद तब तक यह शब्द चलन में ही नहीं आया था!

दुनिया संकट के दौर में है, बच्चे घर में धमाचौकड़ी कर रहे हैं लेकिन उन्हें रास्ता कोई नहीं दिखा रहा है। मैं नातिन को कई  बार सिखाने की कोशिश करती हूँ कि तुम्हारी कहानी से नाटक तैयार करते हैं और तुम सब मिलकर नाटक खेलो, लेकिन लड़कियाँ रुचि नहीं लेती, पोता तो फिर कहाँ से रुचि लेगा। लेकिन अभी समय पर्याप्त है, हम उनमें रुचि जागृत कर सकते हैं। बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस चालू हो चुकी है, मैंने कहने की कोशिश की कि दोनों माता-पिता अलग-अलग विषय के टीचर बन जाओ, अलग-अलग क्लासरूम लो और अलग-अलग ड्रेस पहनकर फन तैयार करो, बच्चों का मन लगेगा। उनकी ही किताब से कहानी लेकर नाटक तैयार कराओ, फिर मंचन करो।

कभी बागवानी का पाठ पढ़ाओ तो कभी रसोई में जा पहुँचों। जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात से बच्चों को रूबरू कराओ। हर बात कौतुक जैसी होनी चाहिये, तभी बच्चे आनन्द लेंगे। जीवन का नया रूप या पुराना रूप वापस लाने की जरूरत है क्योंकि मोबाइल और टीवी की दुनिया से बाहर निकलकर बिना बोर हुए नया कुछ करने का समय है। अपने अन्दर के कलाकार को बाहर निकलने की जरूरत है फिर लगेगा कि घर ही सबसे प्यारा है। बचपन का यह पाठ और ये दिन हमेशा यादों में रहेंगे और फिर कभी उनके जमाने में कोई विपत्ति आयी तो वे अपने बच्चों से कहेंगे कि आओ हम बताते हैं कि कैसे दिन को आनन्ददायक बनाएं। तब बोर होने जैसे शब्द सुनायी नहीं देंगे।