अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

कल के नरेन्द्र का मूर्त रूप

Written By: AjitGupta - Jul• 04•17

#हिन्दी_ब्लागिंग
नेकनामी और बदनामी, दोनों का चोली-दामन का साथ है। जैसे ही किसी व्यक्ति की कीर्ति फैलने लगती है, उसी के साथ उसको कलंकित करने वाले उपाय भी प्रारम्भ हो जाते हैं। दोनो में संघर्ष चलता है लेकिन जीत सत्य की ही होती है। आज 4 जुलाई को ऐसे ही सत्य का स्मरण हो रहा है। 11 सितम्बर 1893 को जब विवेकानन्द जी को अपने शिकागो भाषण के कारण नेकनामी मिली तो कुछ लोगों ने उनके प्रति दुष्प्रचार प्रारम्भ कर दिया। कलकत्ता के अखबार रंग दिये गये, उनका हर सम्भव प्रकार से चरित्र हनन किया गया। नेकनामी और बदनामी का संधर्ष चलता रहा लेकिन अन्त में सत्य सामने आ गया।
जब ऐतिहासिक नरेन्द्र को देखती हूँ तो वर्तमान नरेन्द्र इतिहास बनाते दिखायी देने लगते हैं। एक सी परिस्थितियाँ दिखायी देती हैं, एक से संघर्ष दिखायी देते हैं। अनेक लोग दिखायी दे रहे हैं इनके अपयश की कामना लिये। लेकिन जैसे विवेकानन्द नहीं रूके थे वैसे ही अभी के नरेन्द्र नहीं रूक रहे हैं। जितनी तेजी से वे आगे बढ़ते हैं लोग उतनी तेजी से प्रहार करना शुरू करते हैं, मानो उनकी जीत सुनिश्चित करने में अपना योगदान दे रहे हों। सोने को निरापद किया जा रहा है। जब हम धूप में चलते हैं तब हमारी काली छाया साथ चलती ही है। लेकिन जैसे ही संघर्ष रूपी धूप थमती है तब काली छाया का अवसान हो जाता है। नरेन्द्र भारत के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिये अनथक चल रहे हैं, वे अमर बेल को जड़ से उखाड़ रहे हैं। न जाने कितने पेड़ों को इन अमर बेलों ने अपना शिकार बनाया है, उन्हें चिह्नित करते जा रहे हैं। पेड़ों की सुरक्षा कर रहे हैं।
विवेकानन्द जी का आज निर्वाण दिवस है। उन्होंने सनातन धर्म रूपी सत्य की स्थापना की। उन्होंने व्यक्ति को अपना कर्तव्य पालन करने का संदेश दिया, केवल अपना। वे कहते थे कि केवल आप अपना कर्म कीजिये, दूसरों को बाध्य मत कीजिये। आपके कर्म से ही बदलाव आएगा। यदि दूसरों को बाध्य करेंगे तब केवल संघर्ष होगा। वर्तमान नरेन्द्र भी यही कर रहे हैं, वे स्वयं को बदलने के लिये कह रहे हैं, हम बदलेंगे तभी देश बदलेगा। हम यदि सुनिश्चित कर लें कि कोई भी अनैतिक कार्य जो देश हित में ना हो, हम नहीं करेंगे तो हम सनातन धर्म को पुन: स्थापित कर सकेंगे लेकिन यदि हम नहीं बदले और हमने दूसरों को बदलने के लिये ही शक्ति लगा दी तब कुछ नहीं बदलेगा। अपनी शक्ति का दुरुपयोग मत कीजिये, दूसरे पर शक्ति लगाने से वो और शक्तिशाली होता है, बस सनातन की बात मानिये। इस देश ने हमें विवेकानन्द जैसे अनेक सन्त दिये हैं, हमारे पास सृष्टि का सनातन ज्ञान है, उसे उपयोगी बनाइये और आज के दिन दोनों नरेन्द्र को स्मृति में रखिये, एक ने विश्व के समक्ष भारत को कल दैदिप्यमान किया था और एक आज कर रहा है। हमने कल के नरेन्द्र को तो नहीं देखा लेकिन हम आज के नरेन्द्र को देख रहे हैं। हमने कल के संघर्ष के भागीदार नहीं बने लेकिन आज अवसर आया है तो भागीदार अवश्य बनेंगे। कल का नरेन्द्र आज मूर्त रूप में उतर आया है, उनके संघर्ष में हम अपनी आहुति अवश्य देंगे।

बुजुर्ग हमारे इतिहास की किताब हैं

Written By: AjitGupta - Jul• 02•17

माँ हमारे बारे में हमें छोटी-छोटी कहानियां सुनाती थी, अब वही कहानियाँ हमारे अन्दर घुलमिल गयी हैं। हमारा इतिहास बन गयी हैं। जब वे सुनाती थी कि गाँव में तीन कोस पैदल जाकर पानी लाना होता था तब उस युग का इतिहास हमारे सामने होता था। माँ अंग्रेजों की बात नहीं करती थी, बस अपने परिवार के बारे में बताती थी और हम उसी ज्ञान को पाकर बड़े हुए हैं। हम जब भी उन प्रसंगों को याद करते हैं तो वे बातें इतिहास बनकर हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं। बचपन तक ही हम माँ से अपनी कहानियां सुन सके फिर तो हम स्याणे हो चुके थे और स्वयं को ज्ञानवान भी समझने लगे थे तो भला कौन उन घर-परिवार की बातों को सुने! जमाना तो दुनिया की जानकारी का था तो पिताजी बाहरी ज्ञान दे देते थे। उनके दिये ज्ञान की बदौलत हम कुछ जानकार हो गये थे। लेकिन जब हमें फुर्सत मिली तो महसूस हुआ कि बहुत कुछ छूट गया, फिर हम भाइयों से कहने लगे कि जब भी हम मायके आएं हमें परिवार के किस्से सुनाया करो। लेकिन हमारी इच्छा वे पूरी नहीं कर पाते हैं क्योंकि शायद उन्होंने माँ से वे किस्से सुने ही नहीं तो उन्हें पता ही नहीं कि इन किस्सों से ही इतिहास बनता है। वर्तमान ज्ञान तो सभी के पास है लेकिन विगत का ज्ञान तो बुजुर्गों के पास ही है।
बुजुर्ग व्यक्ति की क्या अहमियत होती है? हाथ-पैर हिलने लगते हैं, याददाश्त जाने लगती है, कानों से सुनायी नहीं देता, आदि-आदि। परिवार के युवा परेशान होने लगते हैं, वे उन्हें अपने आनन्द का बोझ समझने लगते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि बुजुर्ग व्यक्ति कितना ही बुजुर्ग हो जाए, वह हमारे लिये इतिहास के पन्ने बन जाता है। परिवार का इतिहास, समाज का इतिहास, देश का इतिहास, सारा ही उसके अन्दर होता है, बस हमें पन्नों को उलटने की जरूरत है। मैं जब भी बड़ों के बीच बैठती हूँ तो उनसे यही आग्रह रहता है कि वे कुछ विगत का कथानक सुनाएं। मैं भी कोशिश करती हूँ कि मैं भी बच्चों को उनके परिवार के इतिहास से जोड़ू। यदि हमने इस सत्य को समझ लिया कि बुजुर्ग हमारी किताब हैं, और इनके पास बैठने से हमें विगत का पता लगेगा तो फिर बुजुर्ग कभी बोझ नहीं बनेंगे।
जब मुझे सुनाया जाता है कि मेरा बचपन किस भाई के कंधों पर बैठकर बीता तो मैं प्रेम के धागे से स्वत: बंध जाती हूँ, जब मुझे बताया जाता है कि कैसे पिताजी हमारे लिये सोचते थे कि उनकी संतान डॉक्टर-इंजीनियर ही बने, तो हम गर्व से भर जाते हैं। मैं आजकल लिखकर या बोलकर कहानी सुनाने लगती हूँ, जिससे नयी पीढ़ी और हमारे बीच दूरियाँ कम हो। उन्हे पता होना ही चाहिये कि उनके माता-पिता जो आज समर्थ दिखायी दे रहे हैं, उसके पीछे किसका परिश्रम है। जब तक हम बुजुर्गों को घेरकर नहीं बैठेंगे तब तक पता नहीं लगेगा कि कैसे यह परिवार बना था! जिन बुजुर्गों को हम कबाड़ समझने लगे हैं, जब उनके माध्यम से इतिहास में झांकेंगे तब उनके प्रति श्रद्धा से भर जाएंगे। इसलिये इनका उपयोग लो, इन्हें घेरकर बैठो, जीवन के कितने पाठ अपने आप समझ आ जाएंगे। कैसे माली ने बीज बोया था, कैसे उसने खाद डाली थी, कब कोंपल फूटी थी और कब कली खिली थी? आज जो फूल बनकर झूम रहा है, वह उसी माली की मेहनत है, जिसे तुम अंधेरों में धकेल चुके हो। इसलिये बेकार मत करो इस धरोहर को, इसे यादों के पन्नों में इतिहास बनने दो। यह पीढ़ी दर पीढ़ी हमें हमारी जड़ों से जोड़ता रहेगा और घर में कभी कोई बुजुर्ग घूरे के ढेर में नहीं फेंका जाएगा।

सुना है तेरी महफिल में रतजगा है

Written By: AjitGupta - Jun• 29•17

अब जमींदारी नहीं रही, रतजगे नहीं होते। जमींदारों की हवेलियाँ होटलों में तब्दील हो गयी हैं। क्या दिन थे वे? हवेली में सुबह से ही चहल-पहल हो जाती, जमींदार भी चौकड़ी जमाने के लिये शतरंज बिछा देते। उनकी हवेली पर ही सारे सेठ-साहूकार एकत्र होते। जहाँ जमींदार शतरंज की बाजी से शह और मात का खेल खेलते वहीं छोटे जमींदार तीतर-बटेर को लड़ा देते। जनानी ड्योढ़ी में भी चहल-पहल रहती। सुबह से ही इत्र-फुलेल से लेकर सोने के गहनों का जिक्र हो जाता। नगर में किस घर में सास की चल रही है या बहु बाजी मार रही है, सुबह से चर्चा का बाजार गर्म रहता। कभी कोई किसी की शिकायत ले आता तो कभी कोई किसी को हवेली से ही धकिया देता। एकाध हवेली में तो यह भी हुआ कि तीतर-बटेर की लड़ाई लड़ते-लड़ते जमींदार ही आजीज आ गया और उसने हवेली के दरवाजे ही बन्द कर दिये। लोग जाएं तो कहाँ जाएं? कोई मन्दिर में जाकर बैठ गया तो कोई किसी दूसरी हवेली पर।
जमींदारों पर असली संकट तो तब आया जब जमींदारी ही खत्म हो गयी। नगर में क्रान्ति का बिगुल बज गया। एक समाज सुधारक आंधी की तरह आया और सभी को कहा कि आओ मेरे साथ आओ। अब युवा क्रान्ति के साथ जाने लगे और जमींदार से जुड़े लोग जमींदारी के फायदे बताने लगे लेकिन नुकसान तो हवेली का हो गया। धीरे-धीरे हवेली में सूनापन पसर गया। सभी किसी ने बताया कि अब छोटे फ्लेटों में भी नये-नये खेल होते हैं, वहाँ सोसायटी बनी होती हैं और आप जैसा चाहो वैसा खेल खेल सकते हो। बस फिर क्या था, लोग दौड़ पड़े। अब हवेली में बड़े-बूढ़े ही रह गये। एक दिन फ्लेट वालों ने कहा कि भाई चलो एक बार हवेली देख आएं। जहाँ नाल गड़ी हो, भला वहां की याद किसे नहीं आती, लोग तैयार हो गये, सभी ने कहा कि चलो एक तारीख को चलते हैं। अब एक तारीख को हवेली गुलजार होने वाली है, वापस से शतरंज को मोहरे अपनी बिसात पर बैठेंगे। तीतर-बटेर भी लड़ाए जाएंगे। नाच-गाना भी सारी रात चलेगा। हवेली के रंग रोगन के लिये विशेषज्ञों को भेज दिया गया है। हवेली के रास्ते में किसी ने अपनी दुकान तो नहीं लगा दी, इसके मौका-मुआयना के लिये भी टीम भेज दी गयी है। जमींदार को भी ढूंढा जा रहा है। जनानी ड्योढ़ी में क्या खास होगा, इसकी भी फुसफुसाहट है। मर्दों के बीच मल्ल युद्ध होगा या नहीं, कानाफूसी हो रही है। नये युवा जिन्होंने कभी हवेली का रतजगा नहीं देखा, वे भी ललचा रहे हैं। सारे ही बड़े-बूढ़े कह रहे हैं कि हवेली को चमका दो, फीका कर दो फ्लेट और सोसायटी का चलन। देखते हैं कि हवेली में कितना मन लगता है, क्योंकि आज तक तो यही कहानी है कि जो एक बार गाँव से गया वह वापस नहीं आया, बस शादी-ब्याह के मौके पर ही आना होता है। अपने गाँव में देखें कौन कितने दिन टिकता है, हमने तो खूंटे गाड़ ही रखे थे। अपने झोपड़े में रोज दिया जला देते थे। अब सुन रहे हैं कि हवेली पर रतजगा है तो हम भी खुश होकर गा रहे हैं – सुना है तेरी महफिल में रतजगा है।

#हिन्दी_ब्लागिंग

संताप से भरे पुत्र का पत्र

Written By: AjitGupta - Jun• 21•17

कल एक पुत्र का संताप से भरा पत्र पढ़ने को मिला। उसके साथ ऐसी भयंकर दुर्घटना हुई थी जिसका संताप उसे आजीवन भुगतना ही होगा। पिता आपने शहर में अकेले रहते थे, उन्हें शाम को गाड़ी पकड़नी थी पुत्र के शहर जाने के लिये। सारे ही रिश्तेदारों से लेकरआस-पड़ोस तक को सूचित कर दिया गया था कि मैं पुत्र के पास जा रहा हूँ। नौकरानी भी काम कर के चले गयी थी। अखबार वाले और दूध वाले को भी मना कर दिया गया था। अटेची पेक हो चुकी थी लेकिन तभी अचानक मौत का हमला हुआ, यमराज ने समय ही नहीं दिया और वे पलंग पर ही दम तोड़ बैठे। पुत्र ने फोन किया कि कब निकल रहे हो, लेकिन उत्तर कौन दे! पुत्र ने सोचा कहीं व्यस्त होंगे। रात को फोन किया कि गाड़ी में बैठ गये हैं क्या? लेकिन फिर उत्तर नहीं! सोचा नेटवर्क की समस्या होगी। 48 घण्टे निकल गये, पुत्र का सम्पर्क नहीं हुआ। आस-पड़ोस ने भी घर की तरफ नहीं झांका। तभी अचानक एक परिचित मिलने चले आये, घण्टी बजाई, उत्तर नहीं। पड़ोस में गया, पूछा कि कही गए हैं क्या? पड़ोसी ने कहा कि हाँ पुत्र के पास गए हैं। लेकिन तभी परिचित के दिमाग में कुछ कौंधा, बोला कि यदि बाहर गये हैं तो चैनल गेट कैसे खुला है। अब पड़ोसी को भी लगा कि देखें क्या माजरा है? खिड़की में से जब अन्दर झांका गया तब उस विभत्स दृश्य को देखकर सब विचलित हो गये। दो दिन में शरीर सड़ चुका था और लाखों मक्खियां उसे नोच रही थीं। सारा परिवार आनन-फानन में एकत्र हुआ लेकिन पुत्र का संताप कौन हरे? वह अपने पत्र में लिख रहा है कि बार-बार फोन करो, अकेले रह रहे पिता की चिन्ता करो, आदि-आदि।
जब इस घटना और पत्र के बारे में मेरी मित्र ने मुझे बताया तो मुझे एक घटना याद आ गयी। माँ होती है ना, उसका दिल धड़कने लगता है, जब भी उसकी संतान पर कोई संकट आता है। लेकिन संतान बिरली ही होती है जिसको माता-पिता पर आये संकट का आभास होता है। मेरे देवर दूर शहर में पढ़ रहे थे, उन दिनों फोन की उतनी सुविधा नहीं थी कि हर मिनट के समाचार पता रहे। हमारी महिने में एकाध बार बात होती होगी बस, जब मनी-आर्डर भेजना होता था और एकाध बार और। उन दिनों हमारी माताजी भी हमारे पास आयी हुईं थीं। हमारी नयी-नयी गृहस्थी थी और हमारे पास संसाधन ना के बराबर थे। एक थाली में ही हम सब साथ-साथ खाना खा लेते थे। मैंने देखा कि वे ढंग से खाना नहीं खा रही हैं। दूसरे दिन भी वे अनमनी सी रहीं। फिर मैंने पूछ ही लिया कि क्या बात है? वे बोली कि राजू की चिंता हो रही है। मैंने पतिदेव से कहा कि एक बार फोन कर लो, चिन्ता दूर हो जाएगी। फोन किया तो चिंता बढ़ गयी। मालूम पड़ा कि अस्पताल में भर्ती है। अब पतिदेव बिना विलम्ब किये रवाना हो गये। हमने माताजी को कुछ नहीं बताया बस कहा कि जाकर देख आते हैं। शहर भी दूर था, पहुंचने में 20-22 घण्टे लगते थे लेकिन एक माँ की चिन्ता के कारण विपत्ति टल गयी और समय रहते हम सावधान हो गये।
ये जो हमारे खून के रिश्ते हैं, हमें हमेशा सावचेत करते हैं, बस कभी हम इनकी आवाज सुन नहीं पाते और कभी ध्यान नहीं देते। यदि हमारे दिल का एक कोना केवल अपने रिश्तों के लिये ही खाली रखें तो सात समन्दर पार से भी हिचकी आ ही जाती है। इन धमनियों में जो रक्त बह रहा है, उसमें हमारे रिश्ते भी रहते हैं। धमनी की रुकावट का परीक्षण तो हम करवा लेते हैं लेकिन रिश्ते कहीं हमें आवाज नहीं दे रहे हैं, उनकी गति रुक गयी है, उसका परीक्षण हम नहीं करवाते हैं। जब ऐसी घटना घट जाती है तब जीवन भर का संताप हमें दे जाती हैं। माँ का तो दिल सूचना दे ही देता है लेकिन संतान का दिल भी सूचना दे, इसके लिये रिश्तों की कद्र करो। आज वह पुत्र पत्र लिख-लिख कर लोगों को सावचेत कर रहा है कि अपने पिता को अकेला मत छोड़ो, फोन नहीं उठाएं तो बार-बार फोन करो, आस-पास करो, लेकिन बेफिक्र होकर मत बैठ जाओ। जैसे एक पुत्र अपनी आग में जल रहा है, वैसे ही कहीं औरों को ना जलना पड़े, इसलिये अपने दिल को अपनों के लिये धड़कने दो।

अपने अस्तित्व के साथ मरना

Written By: AjitGupta - Jun• 17•17

बचपन में जब किताबों की लत लगी हो तब कोई भी किताब हो, उसे पढ़ ही लिया जाता था। किताबें ही तो सहारा थी उन दिनों, दुनिया को जानने का उन से अधिक साधन दूसरा नहीं था। एकाध किताबें ज्योतिष की भी हाथ लग गयी और हम हस्त-रेखाओं के नाम-पते जान गये। थोड़ी सी इज्जत बढ़ जाती थी, हर कोई हमारे सामने हाथ फैला देता था और उस समय एक ही प्रश्न ज्यादा होता था कि विदेश यात्रा वाली रेखा है क्या? सभी के हाथ में तलाश की जाती और निराशा हाथ लगती। फिर चुपके से अपने हाथ में भी देख लेते और यहाँ भी हथेली साफ-सुथरी ही दिखायी देती। बचपन का खेल बचपन तक ही सीमित हो गया और हम बड़े हो गये, घर-परिवार के चक्कर में सारी कल्पनाएं छू-मंतर हो गयी। बच्चे बड़े होने लगे और उनके हाथ से ज्यादा मन में विदेश की रेखाएं बन गयी। एक दिन ऐसा भी आया कि उनकी रेखा ने परिणाम दिखा दिये। हम फिर से अपने हाथ की रेखा को तलाशने लगे। सोचते रहते कि हमारे हाथ में तो रेखा है नहीं इसलिये कोई चिन्ता की बात नहीं है लेकिन एक मित्र ने कहा कि इन रेखाओं पर मत जाओ, ये तो कभी भी बन जाती हैं। हम चक्कर में पड़ गये। नियति आगे बढ़ती गयी और हमें हमारे हाथ में रेखा गहरी होती दिखने लगी।
मुझे एक घटना का स्मरण हो गया। वृन्दावन में एक महिला से मिलना हुआ, वो अपने पति के साथ वहाँ मकान बनाकर रह रही थीं। उम्र भी कोई ज्यादा नहीं थी, शायद 60 के आसपास रही हो। मैं सोचने लगी कि अभी इनके हाथ-पैर चल रहे हैं और ये यहाँ वृन्दावन में रह रहे हैं लेकिन जब इनके हाथ-पैर चलना बन्द हो जाएंगे तब ये अपनी संतान की सेवाएं लेंगी। संतान को तब ये बोझ लगेंगे। इस बारे में मेरा चिंतन आगे बढ़ता इससे पूर्व ही वे बोल उठीं कि आप यह सोच रही होंगी कि जब हमारे हाथ-पैर चल रहे हैं तब तो यहाँ हैं और जब नहीं चलेंगे तब संतान के पास जाएंगे। मेरे मन की बात को उन्होंने पढ़ लिया था या यूं कहूं कि यह प्रश्न उनके लिये आम रहा होगा। लेकिन उनका उत्तर मेरे लिये आम नहीं था, वे बोलीं कि हम तो यहाँ मरने के लिये ही पड़े हैं। मतलब? उन्होंने जो उत्तर दिया वह मेरे लिये नवीन था, वे बोली कि वृन्दावन की भूमि में मरना सबसे बड़ा पुण्य है। यह बात नहीं है कि हमारी संतान हमारी परवाह नहीं करती लेकिन हमारी यह इच्छा है कि हमारा अंत इसी धरती पर हो। फिर उन्होंने बताया कि अभी दो वर्ष पूर्व अपने घर गयी थी, अचानक दिल का दौरा पड़ा और बेहोश हो गयी। होश आते ही जिद पकड़ ली कि मुझे वृन्दावन ले चलो, मुझे वहीं मरना है।
अपनी धरती पर या पुण्य भूमि पर मरने का सुख भी होता है, मैंने तभी जाना। शायद अपने अस्तित्व की बात होती है, जब अपनी धरती पर मरते हैं तब हम मरते हैं और दूसरी धरती पर मरते हैं तब संतान के मात-पिता मरते हैं। मेरा जीवन समाप्त हो गया, यह दुनिया जान ले, शायद यही चाहना होगी। पुण्य भूमि में मरने की चाह तो मोक्ष की चाहना भी रखती है। आज हम अपने अस्तित्व के लिए जागरूक होने लगे हैं। हम दुनिया को बताते रहते हैं कि हम हैं। लेकिन नयी पीढ़ी हमारी उपेक्षा ऐसे करती है जैसे कबाड़ की कोई चीज हो। जो संघर्ष पहले कहीं नहीं था आज घर-घर में दिखायी दे रहा है, पुरानी पीढ़ी कह रही है कि हम हैं और नयी कह रही है कि तुम हमारे लिये कबाड़ के अतिरिक्त कुछ नहीं हो। हम एक पीढ़ी तक सिमेट दिये गये हैं और हमारी पीढ़ी कसमसाकर रह जाती है। लेकिन जब कभी ऐसे रीत गये रिश्तों में नन्हीं सी कोंपल फूट आए तो हाथ की ये रेखा चिन्तित नहीं करती हैं। कल ऐसे ही हुआ, फोन पर आवाज आयी – भुआ आप कैसी हैं, इस बार आपको मेरे यहाँ आना ही होगा। कभी हम खुद को और कभी हाथ की रेखाओं को देखते हैं। न जाने कहाँ मरना हो? चलो मैं भी निश्चिन्त हो गयी कि कहीं भी मरे हमारी पहचान – हमारे मायके का रिश्ता वहाँ भी होगा।