अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

तेरे लिये मैं क्या कर सकता हूँ?

Written By: AjitGupta - Jul• 31•17

बादल गरज रहे हैं, बरस रहे हैं। नदियां उफन रही हैं, सृष्टि की प्यास बुझा रही हैं। वृक्ष बीज दे रहे हैं और धरती उन्हें अंकुरित कर रही है। प्रकृति नवीन सृजन कर रही है। सृष्टि का गुबार शान्त हो गया है। कहीं-कहीं मनुष्य ने बाधा पहुंचाने का काम किया है, वहीं बादलों ने ताण्डव मचा दिया है, नदियों में बाढ़ आ गयी है और जल अपने सहस्त्रों हाथों से बाधाओं को दूर करने में लगा है। कहीं मनुष्य की हठधर्मिता विनाश लिये खड़ी है तो कहीं बादलों का रौद्र रूप हठधर्मिता को सबक सिखाने को तैयार खड़ा है। प्रकृति और पुरुष, नदियाँ और बादल सृष्टि का नवीन श्रृंगार करने को तत्पर हैं लेकिन धरती के एक प्राणी की मनमर्जी उन्हें मंजूर नहीं। वे अपने कार्य में किसी को बाधक नहीं बनने देंगे, जो भी उनका मार्ग रोकेगा, वे ताण्डव करेंगे और उनका रौद्र रूप मनुष्य को त्राही माम् त्राही माम् करने पर मजबूर करेगा। इन्हें विसंगति नहीं चाहिये, संतुलन चाहिये। प्रत्येक प्राणी में संतुलन, प्रत्येक जीवन में संतुलन, प्रत्येक तत्व में संतुलन। ये जो वर्षा ऋतु है, इसी संतुलन की ओर संकेत करती है। हमें बता देती है कि हमने कहाँ प्रकृति को बाधित किया है। उसके एक्स-रे में कुछ नहीं छिपा है, सारा चित्र सामने आ जाता है। बाधा को तोड़ने बादल बरस उठते हैं, कहीं-कहीं अति होने पर बादल फट भी जाते हैं लेकिन बाधा को इंगित कर ही देते हैं। वे अपनी सहयोगिनी नदियों को आह्वान करते हैं कि प्रबल वेग से बह जाओ और बाधाओं को दूर कर दो।
मनुष्य ने धरती को बाधित कर दिया है, उसकी स्वतंत्रता को छीन लिया है। चारों तरफ पहरे हैं, नदियों से कहा जा रहा है कि हम बताएंगे कि तुम्हें किस मार्ग से बहना है। समुद्र को भी कहा जा रहा है कि हम तुम्हारे सीने पर भी अपना साम्राज्य स्थापित कर सकते हैं। पहाड़ जो धरती के रक्षक थे, उन्हें भी प्रहरी बनने से रोका जा रहा है, उन्हें नष्ट करके रक्षक की भूमिका से वंचित किया जा रहा है। रोज ही न जाने कितनी प्रजातियों को नष्ट किया जा रहा है। मनुष्य अपने विलास के लिये सृष्टि को लील रहा है। इसलिये वर्षा ऋतु में मनुष्य और प्रकृति का संघर्ष होता है। मनुष्य अपनी जिद पर अड़ा है, प्रकृति हर बार संदेश देती है लेकिन मनुष्य ठीट बन गया है। वह प्रकृति का सम्मान करना ही नहीं चाहता तो कब तक प्रकृति उसे क्षमा करती रहेगी? इस विशाल सृष्टि पर प्रकृति ने अनेक सम्भावनाएं प्रदत्त की हैं, मनुष्य सहित प्रत्येक जीवन को जीने की स्वतंत्रता दी है सब कुछ संतुलित है। संतुलन बिगाड़ने के उपक्रम में ही विनाश है। इसे रोकने लिये सुदृढ़ प्रशासन चाहिये। अनुशासन हमारे जीवन का आधार होना चाहिये। कम से कम हम अपने स्वार्थ के लिये धरती को बाधित करने का प्रयास ना करें, सृष्टि के संतुलन को बिगाड़ने का कार्य ना करे। यदि हमनें स्वयं को अनुशासित कर लिया तो फिर ऋतु आने पर बादल नहीं फटेंगे, नदियाँ सैलाबी नहीं बनेंगी और तटबंध तोड़कर जल, प्रलय को नहीं न्योता दे बैठेगा। इस वर्षा ऋतु को आनन्दमयी बनाइये, धरती को पुष्पित और पल्लवित होने दीजिये। सावन जाने में है और भादवा आने में है, बस इस सुन्दर धरती को निहारिये और इससे पूछते रहिये कि बता तेरे लिये मैं क्या कर सकता हूँ?

देखी तेरी चतुराई

Written By: AjitGupta - Jul• 29•17

कल राजस्थान के जोधपुर में एक हादसा होते-होते बचा। हवाई-जहाज से पक्षी टकराया, विमान लड़खड़ाया लेकिन पायलेट ने अपनी सूझ-बूझ से स्थिति को सम्भाल लिया। यह खबर है सभी के लिये लेकिन इस खबर के अन्दर जो खबर है, वह हमारा गौरव और विश्वास बढ़ाती है। महिला पायलेट ने जैसे ही पक्षी के टकराने पर हुआ विस्फोट सुना, उसने तत्क्षण जहाज को ऊपर उड़ा दिया और इंजन बन्द करके जहाज को उतार लिया। सभी यात्री सुरक्षित उतर गये। महिला पायलेट के नाम से मन थोड़ा तो घबराता था ही, क्योंकि रात-दिन एक ही बात सुनी जाती है कि महिला में विश्वास और हौंसलों की कमी होती है। हम इस झूठ को प्रतिपल सुनते हैं और अब तो सोशल मीडिया ने सहूलियत भी कर दी है और रात-दिन एक ही बात सुनी जाती है। सभी को रात-दिन सुनी जाने वाली बात पर पक्का यकीन हो जाता है तो हमें भी यकीन हो गया था कि महिला में आत्मविश्वास, सूझ-बूझ कि कमी होती है लेकिन कल महिला पायलेट की सूझ-बूझ ने नया आत्मविश्वास जगा दिया।
कल ही क्रिकेट की महिला कप्तान मिताली राज सहित सम्पूर्ण टीम का साक्षात्कार जी न्यूज दिखा रहा था। एक पुराने प्रश्न के उत्तर पर सभी पत्रकार आश्चर्य चकित थे। सुधीर चौधरी ने फिर पूछा कि आपसे जब यह पूछा गया था कि क्रिकेट में आपका पसंदीदा पुरुष खिलाड़ी कौन है? तब आपने उत्तर दिया कि क्या आपने कभी यही प्रश्न किसी पुरुष खिलाड़ी से किया है? इस उत्तर का कारण क्या था? तब मिताली राज का उत्तर दिल को खुश करने वाला था। मिताली ने कहा कि यह प्रश्न कहीं दूसरे समय किया जाता तो ठीक था लेकिन उस समय जब हम फाइनल खेलने की तैयारी कर रहे हों, तब ऐसा लगा कि हमारा खेल मायने नहीं रखता। मिताली के उत्तर के बहुत गहरे मायने थे। यह ऐसा ही प्रश्न था जैसे मोदीजी की अमेरिका यात्रा के समय एक पत्रकार ने लोगों से पूछा था कि क्या आप का क्रेज मोदीजी को लेकर शाहरूख खान जैसा है? लोगों ने पत्रकार को झिड़क दिया था। लोगों ने कहा कि आप मोदीजी की तुलना शाररूख से करना चाहते हैं? असल में पत्रकार की सोच में केवल ग्लेमर बसता है, वे इससे आगे दुनिया देख ही नहीं पाते। यही कारण है कि वे मिताली से पूछ लेते हैं कि आपका पसंदीदा पुरुष खिलाड़ी कौन है? यह प्रश्न किसी को भी दोयम दर्जा देने में सक्षम है और कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति दोयम दर्जा नहीं पसन्द करता है।
महिला और पुरुष दोनों में ही असीम शक्ति है, किसे अवसर कितने मिले और किसे कितने, बस इसी बात पर सब कुछ निर्भर करता है। जब हम महिला को दोयम दर्जा दे देते हैं तब कुछ महिलाएं तो हैं जो जिद पर आ जाती हैं कि हम दोयम नहीं हैं और वे ऐसे क्षेत्र चुनती हैं जो पुरुष क्षेत्र कहलाते हैं। महिला अपनी यात्रा में चल पड़ी हैं, वे हमारे समाज को बता रही हैं कि अब दोयम दर्जे के दिन लद गये। सभी जगहों से महिला की उपस्थिति की आवाज आ रही है। एक महिला जहाज के यात्रियों को बचा लेती है और न जाने कितनी महिलाएं आत्मविश्वास से भर जाती हैं? कितनों के हौंसले बुलन्द हो जाते हैं! हम जैसे लिख्खाड़ भी उमंग से भर जाते हैं कि हौंसले गाली देने में नहीं है, हौंसले तो मन के है। पुरुष गाली देकर अपने बुलन्द इरादों को बताता है, लोग कहते हैं कि जो जितना गाली देता है, वह उतना ही बहादुर होता है। जबकि मेरी नजर में गाली देना अपनी बुजदिली छिपाने की निशानी है। हम जब विचलित होते हैं तो चिवन्गम खाकर अपनी परेशानी को छिपाते हैं, ऐसे ही गाली देकर भी अपनी बुजदिली को छिपाते हैं। महिला अपने हौंसलों से, सभ्यता के साथ प्रथम दर्जा पाने में सफल हो रही हैं, मन अब महिला पर विश्वास कायम करने लगा है। मन खुशी से नाच उठता है और गाने लगता है – देखी तेरी चतुराई।

गुटर गूं के अतिरिक्त नहीं है जीवन

Written By: AjitGupta - Jul• 25•17

मसूरी में देखे थे देवदार के वृक्ष, लम्बे इतने की मानो आकाश को छूने की होड़ लगी हो और गहरे इतने की जमीन तलाशनी पड़े। पेड़ जहाँ उगते हैं, वे वहाँ तक सीमित नहीं रहते, आकाश-पाताल की तलाश करते ही रहते हैं। हम मनुष्य भी सारा जहाँ देखना चाहते हैं, सात समुद्र के पार तक सब कुछ देखना चाहते हैं। पहाड़ों के ऊपर जहाँ और भी है, उसे भी तलाशना चाहते हैं। मैं एक नन्हीं चिड़िया कैसे उड़ती है, उसे देखना चाहती हूँ, एक छोटी सी मछली विशाल समुद्र में कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है, उसे देखना चाहती हूँ। रेत के टीलों पर कैसे एक केक्टस में फूल खिलता है. उसे महसूस करना चाहती हूँ। मैं वो सब देखना और छूना चाहती हूँ जो इस धरती पर प्रकृति की देन है। मनुष्य ने क्या बनाया है, यह देखना मेरी चाहत नहीं है। बस प्रकृति कैसी है, यही देखने की चाहना है। लेकिन क्या मन की चाह पूरी होती है? कभी समुद्र की एक बूंद से ही सातों समुद्र नापने का संतोष करना पड़ता है तो कभी एक बीज से ही सारे देवदार और सारे ही अरण्य देखने का सुख तलाश लेती हूँ।
कभी महसूस होता है कि हम जंजीरों से जकड़े हैं, बेड़ियां पड़ी हैं हमारे पैरों में। यायावर की तरह जीवन गुजारना चाहते हैं लेकिन जीवन ऐसा नहीं करने देता। हम एक गृहस्थी बसा लेते हैं और उस बसावट में ऐसी भूलभुलैय्या में फंस जाते हैं कि निकलने का मार्ग ही नहीं सूझता। प्रकृति हँसना सिखाती है लेकिन गृहस्थी रोने का पाठ बखूबी पढ़ा देती है। रोते-रोते जीवन कब प्रकृति से दूर चले गया पता ही नहीं चलता। बरसात में सारी गर्द झड़ जाती है, लेकिन समय मन पर ऐसी गर्द चढ़ा देता है कि कितना ही खुरचो, मन की उजास दिखायी ही नहीं देती। कैसी उजली सी है प्रकृति, लेकिन मन न जाने कहाँ खो गया है! उसे छूने का, उसे महसूस करने का मन ही नहीं होता। हिरण अपनी जिन्दगी जी लेता है, वह कूदता है, फलांग लगाता है, मौर नाच लेता है, कोयल कुहूं-कुहूं बोल लेती है, चिड़िया भी मुंडेर पर आकर चींची कर लेती है, लेकिन मन न जाने किसे खोजता रहता है!
सारी प्रकृति जोड़ों से बंधी है, मोर तभी नाचता है जब उसे मोरनी के साथ होती है, चिड़िया की चींची भी साथी के बिना अधूरी है। प्रकृति कुछ भी नहीं है, बस जोड़ों की कहानी है। हँसना, फुदकना, चहचहाना सभी कुछ एक-दूसरे के लिये है। लेकिन मनुष्य की बात जुदा है, वह हमेशा दिखाना चाहता है कि मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ, मेरी खुशी अकेले में भी सम्भव है। मैं अकेले में भी चहचहा सकता हूँ। लेकिन यह उसका भ्रम है। जिन्दगी के आखिरी पड़ाव में भी जो एक-दूजे में खुशी ढूंढते हैं, वे ही खुश रहते हैं। जो खुद की ही खुशी ढूंढते हैं, वे खुश नहीं रह सकते। मनुष्य अकेला चल पड़ता है, उसे लगता है कि वह यायावर बनकर अकेला ही चल सकेगा लेकिन यदि वह भी कबूतर के जोड़े की तरह रहे या उन पक्षियों की तरह रहे जो अपने जोड़ो के साथ सात समुद्र पार करके भी भारत चले आते हैं और यहाँ नया जीवन बसाते हैं, फिर उड़ जाते हैं। उदयपुर का फतेहसागर सफेद और काले पक्षियों का डेरा है, बड़े-बड़े पंख फैलाते ये पक्षी जीवन को अपने पास बुलाते हैं। हम मनुष्यों को जीवन क्या है, पाठ पढ़ाते रहते हैं। मैं रोज शाम को इनको देखने फतेहसागर चले जाती हूँ, लगता है कि यही जीवन है। यही यायावरी है, ये जब चाहे आकाश में उड़कर उसे नाप लेते हैं और जब चाहें पानी में तैरकर उसकी थाह ले लेते हैं। हम तो बस किनारे से देखने वाले लोग हैं, प्रकृति को आत्मसात नहीं कर पाते, बस दूर से ही देखते हैं और दूर से भी कहाँ देख पाते हैं? यहाँ कितने हैं जिनके जोड़े एक दूसरे के पूरक है? शायद कोई नहीं या शायद मुठ्ठीभर। कभी लगता है कि मनुष्य ने कितने किले खड़े कर लिये लेकिन अपने साथी का हाथ नहीं पकड़ पाया। मनुष्य ने पानी में भी दुनिया बसा ली लेकिन साथी का साथ नहीं रख पाया। बिना साथी सबकुछ बेकार है, यह प्रकृति है ही नहीं, यह तो विकृति है और इस विकृति को जीने के लिये मनुष्य कितना अहंकारी बन बैठा है? काश हम भी कबूतर के जोड़े के समान ही होते! गुटर गूं के अतिरिक्त कुछ नहीं है जीवन।

पहल करो – खेल तुम्हारा होगा

Written By: AjitGupta - Jul• 24•17

आओ आज खेल की ही बात करें। हम भी अजीब रहे हैं, अपने आप में। कुछ हमारा डिफेक्ट और कुछ हमारी परिस्थितियों का या भाग्य का। हम बस वही करते रहे जो दुनिया में अमूमन नहीं होता था। हमारा भाग्य भी हमें उसी ओर धकेलता रहा है। हमारी लड़की बने रहने की चाहत लम्बे समय तक चल ही नहीं पाती थी, आज पूरी कोशिश में लगी हूँ कि महिला होने के सारे सुख अपनी झोली में डाल लूँ। बचपन में सभी खेलते हैं, तो हम भी खूब खेलते थे, उसमें नया कुछ नहीं था, बस नया इतना ही था कि गुड़िया की शादी कभी नहीं करायी, रसोई-रसोई का खेल कभी नहीं खेला। इसके उलट कंचे खेले, गिल्ली-डण्डा खेला। पहलदूज, रस्सीकूद, गुट्टे यह सब तो रोज का और बारहमासी खेल था। लेकिन जैसे ही क्रिकेट का खेल रेडियो पर सुनायी देने लगा, हम रेडियो से चिपक जाते और जब बेट और बॉल से खेलने लायक हुए तो अपना मैदान तैयार कर लिया। एक टीम भी बना डाली जिसमें लड़के और लड़कियाँ सभी थे। बाकायदा पिच भी बनायी गयी और लोगों के घरों की खिड़की तक गेंद भी पहुंचायी गयी। हमारे घर के परिसर में ही मैदान था तो हमने बना डाला खेल का मैदान। वहाँ क्रिकेट भी होता, बेडमिंटन भी और रिंग भी। खाली जमीन धीरे-धीरे मुनाफे की ओर मुड़ गयी और वहाँ बसावट होने लगी। शुरू में एक ही घर बसा, लेकिन ना वे खुश और ना हम खुश। राजी-नाराजी के बाद भी खेल चलता रहा। तो क्रिकेट खूब खेला, स्कूल में नहीं था, नहीं तो वहाँ भी हम ही होते। वहाँ खो-खो था तो हम थे। खेल के मैदान पर बालीबॉल खिलाड़ी की कमी पड़ी तो हम थे। दो-दो टूर्नामेंट में भी भाग लिया, स्कूल में भी और कॉलेज में भी।
हमने घर पर कोई भी खेल खेला हो, उसमें लड़के और लड़कियां साथ ही रही। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी ऐसा हुआ हो कि हम हारते हों और लड़के जीतते हों। पता नहीं हमारे साथ कैसे फिसड्डी लड़के खेल खेलते थे! लेकिन कल महिला क्रिकेट देखते हुए लगा कि खेल में महिला और पुरुष कुछ नहीं होता। युद्ध भूमि पर भी नहीं होता, बस हौंसले चाहिये। हमारे घर के पास ही जयपुर का प्रसिद्ध तीर्थ गलता जी है, हम बचपन से ही रोज वहाँ जाते रहे हैं। गलताजी के दरवाजे पर ही एक अखाड़ा बना हुआ था, पहलवान कुश्ती लड़ते थे और हमारे पिताजी हमें भी उतार देते थे। कबड्डी तो हमारा प्रिय खेल था, रेत के टीलों पर कबड्डी खेलने का आनन्द ही कुछ और था। पतंग तो सभी उड़ा लेते हैं लेकिन लड़कों की तरह पतंग लूटना भी खूब किया। खेल के लिये कभी पिताजी ने मना नहीं किया, ना कभी कहा कि यह लड़कों के लिये है और तुम्हारे लिये नहीं हैं। हमने यह अन्तर जाना ही नहीं। पहली बार टूर्नामेंट में जाने का अवसर मिला जब हम सातवीं में पढ़ते थे, दूसरे शहर जाना था, पता नहीं पिताजी का क्या उत्तर हो? लेकिन उन्होंने मना नहीं किया। कॉलेज में भी गये और वहाँ भी राजी-राजी आज्ञा मिली। क्रिकेट का बेट खरीदना हो या बेडमिंटन का रेकेट, पिताजी से पैसे मिल ही जाते थे, लेकिन कभी चूड़ी-बिन्दी के लिये पैसे नहीं मिले। हम हाथों में मेहंदी लगे हाथ, चूड़ी और बिन्दी से सजी लड़की को देखकर मुग्ध हो जाते थे, सोचते थे कि काश हमें भी अवसर मिलता। लड़कों की तरह जीवन जीने के हिमायती रहे हमारे पिताजी तो हमें भी वहीं जीवन जीने का अवसर मिला। वे कहते थे कि स्वेटर बुनने में क्या रखा है? बाजार में खूब मिलेंगे, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार में नहीं मिलेगा। इसलिये कहते थे कि खेलो और पढ़ो। हमने खूब खेला, आज भी बेट देखते ही मन मचल उठता है कि एकाध हाथ तो जमा ही दें। फिर अपनी उम्र का तकाजा देखकर महिला बनने की ओर मुड़ने लगती हूँ। खेल नहीं सकते तो क्या, क्रिकेट और दूसरे खेल देख तो सकते ही हैं, खूब देखते हैं। हमने तो उस पल को भी बहुत गर्व के साथ जीया था जब एशियन गेम्स में भारत प्रथम स्थान पर रहा था। खेलो खूब खेलो, कभी मत सोचो की यह लड़कियों का खेल है या लड़कों का, सारे ही खेल सभी के हैं, बस पहल करो तो खेल तुम्हारा होगा।

मैं इस बात से आहत हूँ

Written By: AjitGupta - Jul• 21•17

#संजयसिन्हा की एक कहानी पर बात करते हैं। वे लिखते हैं कि मैंने एक बगीचा लगाया, पत्नी बांस के पौधों को पास-पास रखने के लिये कहती है और बताती है कि पास रखने से पौधा सूखता नहीं। वे लिखते हैं कि मुझे आश्चर्य होता है कि क्या ऐसा भी होता है? उनकी कहानियों में माँ प्रधान हैं, हमारे देश में माँ ही प्रधान है और संस्कृति के संरक्षण की जब बात आती है तो आज भी स्त्री की तरफ ही देश देखता है। पौधों की नजदीकियों से लेकर इंसानों की नजदीकियों की सम्भाल हमारे देश में अधिक है। इसलिये जब लेखक अपने दायरे में सत्य को देखता है और सत्य को ही लिखता है तब उसकी कहानी अंधेरे में भी अपने देश और समाज का परिदृश्य खड़ा करती है। आजतक हम इन कहानियों के माध्यम से ही अपने समाज को समझ सके हैं। लेकिन जब कोई इस कहानी को चुराता है और समझदारी का श्रेय लेने के चक्कर में या पुरुषत्व के हावी होने पर स्त्री के स्थान पर पुरुष को बिठा देता है तब कहानी की आत्मा मर जाती है, देश और समाज की बात से परे कहानी नकली लगती है। पत्नी जब कहती है कि पौधों को पास रखने से वे बढ़ते हैं तो यह समाज का सच उजागर करते हैं लेकिन जब पत्नी के स्थान पर लेखक स्वयं विराजमान हो जाता है तब कहानी, कहानी नहीं रहती। कहानी चोरी भी करते हो और देश के साथ खिलवाड़ भी, ऐसा नहीं चलेगा।
हम बौद्धिक सम्पदा की चोरी करते हैं, कीजिये आपका हक है। क्योंकि यह विचार भी हम समाज से ही लेते हैं तो इन पर आपका भी हक बन ही जाता है लेकिन कम से कम तारीफ का हक तो उसे दे दो जिसने इन विचारों को एक लड़ी में पिरोया है। अभी #संजयसिन्हा ने दर्द उकेरा था कि मेरी कहानियाँ चोरी होती हैं, सभी की हो रही हैं, खुलेआम हो रही हैं। आज भी उनकी एक कहानी को तोड़-मरोड़कर यहाँ परोसा गया, अपना बनाने के चक्कर में मूल भाव में भी परिवर्तन कर दिया गया, मन बहुत दुखी हुआ। आप किसी की कहानी उठा लें लेकिन उसके मूल भाव में तो परिवर्तन ना करें और जब लोग आपकी सोच की तारीफ कर रहे हों तब शर्म खाकर सच लिख ही दें कि यह मेरी कहानी नहीं है।
हम फेसबुक और सोशल मिडिया पर बने रहने के लिए रोज चोरी कर रहे हैं, रचनाओं के मूल भाव को कचरा कर रहे हैं। आप सोच रहे हैं कि मैं बहुत अच्छा कर रहा हूँ लेकिन आप समाज और देश के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। आप कहानी के मर्म को बदल रहे हैं, स्त्री पात्र के स्थान पर पुरुष पात्र को और पुरुष के स्थान पर स्त्री को रखकर समाज और देश की संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे हैं। आप विदेश की कहानी को भारत के संदर्भ में बना देते हैं, आप देश से खिलवाड़ करते हैं। यह साहित्य ही तो हैं, जिसे पढ़कर हम अपने समाज और देश की मनस्थिति का पता लगाते हैं, लेकिन हमने चोरी करने के चक्कर में सब गुड़-गोबर कर दिया है। हम एक सांसद को गाली देते हैं कि वह हमारे धर्म का अपमान करता है, उसे सजा मिलनी चाहिये लेकिन हम अपने आप में झांककर नहीं देखते कि हम क्या कर रहे हैं? हमारा कसूर भी उससे कम नहीं है। आप चोरी करें मुझे आपत्ति नहीं है, क्योंकि यदि आप चोरी को जायज मानते हैं तो करें लेकिन रचना के मूल स्वरूप में बदलाव अक्षम्य अपराध है। क्योंकि इससे लेखक आहत होता है, ऐसा नहीं है, लेकिन देश और समाज आहत होता है, मैं इस बात से आहत हूँ।