अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

पाकिस्तान की ये सुन्दर लड़कियां क्या संदेश दे रही हैं?

Written By: AjitGupta - Sep• 24•18

अभी एशिया कप क्रिकेट हो रहा है, स्थान है संयुक्त अरब अमीरात। दुबई के प्रसिद्ध स्टेडियम पर मैच चल रहा है, कैमरामैन रह-रहकर पाकिस्तानी सुन्दर लड़कियों पर सभी का ध्यान खींचता है। लोग सी-सी कर उठते हैं, कोई कह रहा है कि ये हमारे मुल्क में क्यों नहीं हुई, कोई कह रहा है कि काश देश का विभाजन नहीं हुआ होता। मेरी भी दृष्टि गयी, लेकिन मेरी नजर सुन्दरता के साथ उनके पहनावे पर भी गयी। पाकिस्तानी लड़कियों में एक भी बुर्का पहने नहीं दिखायी दी अपितु आधुनिक वेश में ही वे थीं। लग ही नहीं रहा था कि हम दुबई जैसे शहर को देख रहे हैं, क्योंकि हमने तो सुना था कि लड़कियां यहाँ बुर्के में रहती हैं। खैर मुद्दा यह भी नहीं हैं मेरा। मुद्दा यह है कि पाकिस्तान, हिन्दुस्थान की मुस्लिम महिलाओं के लिये भी कानून बताता है और यहाँ के मुल्ला-मौलवी यह कहकर उसे स्वीकारते हैं कि ऐसा मुस्लिम धर्म में कहा है। कश्मीर में हम देखते हैं कि अलगाववादी नेताओं के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं और कश्मीर के स्कूलों में उनके द्वारा ताले लगा दिये गये हैं। एक तरफ मुस्लिम समुदाय का वह वर्ग है जो सम्पूर्ण आधुनिकता के साथ रहता है, उनकी महिलाओं को सम्पूर्ण आजादी है, उनके बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं और दूसरी तरफ वह वर्ग है जिसे किसी भी प्रकार की आजादी नहीं है, उनके बच्चों की शिक्षा का अधिकार भी धर्म के नाम पर छीन लिया गया है। यदि इनका प्रतिशत निकालें तो शायद 10 और 90 प्रतिशत होगा।
ये 10 प्रतिशत शानोशौकत से रहने वाले लोग किसी धार्मिक बातों से बंधे हुए नहीं हैं, वे मानो स्वयं धर्म हैं लेकिन शेष 90 प्रतिशत लोगों के लिये सारी बंदिशें हैं। ऐसा नहीं है कि यह मुस्लिम समाज में ही हो रहा है, यह सभी वर्गों में हो रहा है। जो सम्पन्न हैं उनके लिये धर्म की कोई भी बंदिशें नहीं है लेकिन जो विपन्न है, उनके लिये सारी ही बंदिशें हैं। धर्म के पैरोकार इस तबके को डराकर रखता है, दोजख का वास्ता देता है और धर्म की आड़ में शोषण करता है। विपन्न वर्ग में भी अनजाना डर समाया हुआ है, वह भी डर की आड़ में शोषण का आदि हो गया है। अभी 150 साल पहले तक यूरोप में महिला चर्च से मुक्त नहीं थी, पादरी उसकी देह का शोषण करते थे इसलिये यूरोप में महिला मुक्ति का आन्दोलन चला। हालात यहाँ तक थी कि यदि कोई महिला चर्च के शोषण के खिलाफ आवाज उठाती थी तो उसे डायन घोषित कर दिया जाता था। यह डायन प्रथा हमारे देश में भी वहीं से आयी है। यूरोप में महिला संघर्ष को जीत मिली और महिला चर्च के शोषण से मुक्त हुई। अभी हाल ही में केरल में हुई ननों के साथ बलात्कार की घटना इस ओर इशारा करती है कि आज भी पादरी ननों को अपना शिकार बना रहे हैं और इसे धार्मिक कृत्य बताने की कोशिश कर रहे हैं।
सारी दुनिया में यह खेल चल रहा है, 10 प्रतिशत लोग निरंकुश हैं लेकिन शेष 90 प्रतिशत लोग धार्मिक गुलाम हैं। ये ही 10 प्रतिशत लोग दुनिया पर राज कर रहे हैं। वे पूर्ण स्वतंत्र लोग हैं इनपर दुनिया के किसी भी धर्म का कोई कानून लागू नहीं होता है, यह स्वयं कानून हैं। इसलिये इन लोगों को देखकर जनता को मुक्त होने की ओर कदम बढ़ाना चाहिये। जब पाकिस्तान की उन आधुनिक लड़कियों को पूर्ण स्वतंत्रता है तो शेष लड़कियों को क्यों नहीं? ये प्रश्न सभी को करना चाहिये। हम भी इन कर्मकाण्डों और आडम्बरों से जितना मुक्त होने की कोशिश करेंगे उतने ही उन्नत होते जाएंगे। हिम्मत जुटाइए और मुक्ति की ओर कदम बढ़ाइए। इस दुनिया के हर फूल को खिलने का अधिकार है तो दुनिया की हर लड़की को भी खिलने का अधिकार है, इसे पर्दे में रखकर अत्याचार करने का हमें कोई हक नहीं है।

मोगली को मनुष्य बताने में गलत क्या है?

Written By: AjitGupta - Sep• 22•18

मोगली की कहानी तो आपको याद ही होगी, क्या कहा, ध्यान नहीं है! जंगल-जंगल पता चला है, चड्डी पहनके फूल खिला है, याद आ गयी ना। तो एक कहानी थी कि एक मनुष्य परिवार का बच्चा जंगल में गुम हो गया। भेड़ियों के झुण्ड को वह बच्चा मिलता है और वे उसे पालने का निश्यच करते हैं। बच्चा भेड़ियों के बीच बड़ा होने लगता है और बच्चा खुद को भी भेड़िया ही समझने लगता है। जंगल के शेर आदि दूसरे प्राणी जानते हैं कि यह मनुष्य का बच्चा है और हमेशा इस ताक में रहते हैं कि कब अवसर मिले और हम इसका शिकार कर लें लेकिन मोगली नहीं समझता की मैं मनुष्य का बच्चा हूँ। मोगली की भेड़िया माँ भी जानती है कि मोगली मनुष्य का बच्चा है लेकिन वह भी उसे नहीं बताती। एक दिन जंगल में एक मनुष्य जा पहुँचा, उसने मोगली को देखा और कहा कि अरे तुम मनुष्य के बच्चे हो और यहाँ भेड़ियों के बीच क्या कर रहे हो! मोगली कहता है कि नहीं मैं तो भेड़िया ही हूँ। मनुष्य उसे समझाने की कोशिश करता है कि देख तेरे दो हाथ और दो पैर हैं, मेरे जैसे। तू बोल सकता है, मेरे जैसे। मनुष्य उसे सबकुछ बताता है, लेकिन मोगली नहीं मानता। तभी भेड़िये भी आ जाते हैं और मोगली को समझने नहीं देते। मनुष्य कहता है कि देख मैं तुझे बता रहा हूँ कि तू मेरे जैसा है, तेरे पिता और मैं एक जैसे ही हैं। तू हिंसक नहीं है, इन भेड़ियों की तरह शिकार नहीं कर सकता। तू मेरे साथ शहर में चल। मोगली कहता है कि नहीं, मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगा क्योंकि मुझे पता है कि मनुष्य बहुत खतरनाक होता है और तुम मुझे भी मार दोगे। मनुष्य उसे फिर समझाने की कोशिश करता है कि मैं यदि तुझे मार दूंगा याने मनुष्य होकर मनुष्य को मार दूंगा तो मैं मनुष्य कैसे रहूंगा? मैं भी फिर भेड़िया ही बन जाऊंगा ना!
मोगली ने उसकी बात ध्यान से सुनी और भेड़ियों की तरफ देखा, भेड़ियों ने कहा कि तू इसकी बात में मत आ, यह मनुष्य बहुत खतरनाक होते हैं। तुझे अवश्य मार देंगे। हम सब मिलकर इन्हें मारेंगे और सबके डर को समाप्त करेंगे, तू हमारे साथ ही रह। जब मोगली भेड़ियों के साथ जाने लगा तो मनुष्य ने कहा कि देख मैं तुझे फिर कह रहा हूँ कि तू मनुष्य है यदि तूने मेरी बात नहीं मानी और इन भेड़ियों के साथ मिलकर मनुष्यों को समाप्त करने के सपने देंखे तो फिर मैं इन भेड़ियों को तो समाप्त करूंगा तुझे फिर समझ आएगा कि तू वास्तव में क्या है। यह कहकर मनुष्य शहर में लौट गया। जंगल में सन्नाटा छा गया, मोगली क्या शहर लौट जाएगा? यह प्रश्न हर प्राणी की जुबान पर था। शहर में भी हलचल मच गयी कि मोगली को यह मनुष्य अपने जैसा कहकर आया है, जबकि अब वह हमारे जैसा रहा ही नहीं। लोगों में डर बैठ गया, चारों तरफ चर्चा होने लगी कि आखिर मोगली हमारे जैसे कैसे है! कैसे मनुष्य ने कहा कि इसको मारने से मनुष्यत्व समाप्त हो जाएगा। यह तो हम मनुष्यों के साथ सरासर अन्याय है। हम बरसों से भेड़ियों का आतंक झेलते रहे हैं और अब यह मनुष्य मोगली को कहकर आया है कि तुम हमारे जैसे हो! नहीं यह हो नहीं सकता, हम मनुष्य को ऐसा नहीं करने देंगे। जंगल में चर्चा थी कि यदि मोगली चले गया तो हम भेड़ियों का यह दावा खारिज हो जाएगा कि मनुष्य सब पर अत्याचार करता है इसलिये हम इसका शिकार करते हैं। उधर शहर में यह चिंता थी कि मोगली यहाँ आ गया तो वह हमारे साथ रहकर हमें मारेगा, आखिर वह भेड़िया ही तो है।
आज यदि हम कहें कि ऐसे लोग जिनके और हमारे पूर्वज एक थे, साथ आ जाओ और देश को सुंदर बनाने में सहयोगी बन जाओ तो क्या गलत है? यदि कोई भेड़ियों के साथ रह रहे मोगली को कहे कि तुम हमारे जैसे ही मनुष्य हो तो क्या गलत है? भेड़ियों ने मोगली को कहा कि तुम हमारे जैसे हो इसलिये इंसान का खून करो लेकिन यदि मनुष्य कह रहा है कि नहीं मोगली तुम मेरे जैसे हो तो क्या गलत है? शहर के सभ्य लोगों समझों उस मनुष्य की बात जो मोगली को मनुष्य बताकर उसकी हिंसा समाप्त करना चाहता है, उसे देश निर्माण में भागीदार बनाना चाहता है। हमेशा की हिंसा और रक्तपात को मिटाना चाहता है तो गलत क्या है?

स्वयंसेवक स्वयंभू संघ बन गया

Written By: AjitGupta - Sep• 20•18

एक युग पहले हम सुना करते थे कि आचार्य रजनीश ने स्वयं को भगवान माना। सदी बदल गयी तो हमारे लिये युग बदल गया। फिर भगवान घोषित होने और करने का सिलसिला शुरू हो गया। कहीं खुद भगवान बन जाते तो कहीं शिष्य भगवान घोषित कर देते। आखिर भगवान क्यों बनना? हमने सर्व गुण सम्पन्न भगवान को माना है, यह चमत्कारी भी है, कुछ भी कर सकता है। इसलिये जब किसी को समाज में प्रतिष्ठित करना होता है तब हम उसे भगवान घोषित कर देते हैं, याने इससे ऊपर कोई नहीं, यह श्रद्धा का केन्द्र है। भगवान घोषित होते ही उनकी सारी बाते सर्वमान्य होने लगती हैं और उनकी शिष्य परम्परा में तेजी से वृद्धि होती है। तीन दिन से चली आ रही व्याख्यानमाला को सुनने के बाद, जिज्ञासा समाधान को भी सुनने के बाद और माननीय भागवत जी के समापन उद्बोधन सुनने के बाद मैं एक नतीजे पर पहुँची हूँ कि जैसे समाज में किसी को भी भगवान घोषित करने की परम्परा है वैसे ही समाज ने या स्वयं ने, संघ के किसी भी स्वयंसेवक को संघ घोषित करने की परम्परा है। संघ में एक कार्यकर्ता है जो उनका डिग्री कोर्स करता है और उनके ही विश्वविद्यालय में शिक्षक बन जाता है, उसे प्रचारक कहते हैं। एक कार्यकर्ता है जो वहाँ से शिक्षा लेता है और स्वयं का अधिष्ठान खोल लेता है, उसे उसी विश्वविद्यालय का अंग मानते हुए सम्पूर्ण स्वतंत्रता मिलती है। एक अन्य कार्यकर्ता है जो कभी शाखा में जाता है, कभी ड्राप आउट हो जाता है, लेकिन स्वयं को स्वयंसेवक कहता है।
हमारे समाज की परम्परा अनुसार हम इन्हें भगवान तो नहीं कहते लेकिन इन्हें संघ कह देते हैं। जब भी कोई बात आती है, हम कहते हैं कि संघ की यह इच्छा है। जब प्रश्न किया जाता है कि कौन है संघ, तो इन प्रभावशाली व्यक्तियों पर इशारा कर दिया जाता है। समाज इन्हें साक्षात संघ मान लेता है। जैसा की माननीय भागवत जी ने कहा कि संघ की विचारधारा समय के अनुरूप परिवर्तनशील है लेकिन उसका मूल बिन्दू राष्ट्रहित ही है। राष्ट्रहित में अनेक बार हिन्दुत्व में बदलाव किया गया है तो हम भी बदलाव करते हैं। अत: जब किसी भी व्यक्ति विशेष को संघ कह दिया जाता है तब उसकी प्रत्येक बात संघ की बात घोषित हो जाती है। उसका आचरण संघ का आचरण बन जाता है। हम अक्सर समाज में सुनते हैं कि संघ के लोग ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं। जब एक प्रकार का विचार और आचरण प्रमुखता से परिलक्षित होने लगे तो मान्यता प्रगाढ़ हो जाती है। आज समाज में जो भ्रम और शंका की स्थिति बनी है वह इसी कारण से बनी है। संघ का ड्राप आउट स्वयंसेवक भी जब स्वयं को संघ कहने लगे तो स्थिति विकराल होने लगती है। यह स्थिति गम्भीर इसकारण भी हो गयी कि सोशलमिडिया की स्लेट हमें मिल गयी। जिस किसी के मन में आया उसने वह बात लिख दी। उसका खंडन करने वाला कोई नहीं तो वह बात भी संघ की मान ली गयी। जिन स्वयंसेवकों के विभिन्न क्षेत्रों में अधिष्ठान चल रहे हैं वे भी अपने अधिष्ठान की बढ़ोतरी के लिये स्वयं को संघ कहने लगे। वे नियंत्रण में रहें इसके लिये संघ ने संगठन मंत्री भी दिये लेकिन उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला, क्योंकि उन संगठन मंत्री को भी स्वयं को संघ कहलाने में आनन्द आने लगा। समाज में भ्रम बढ़ते गये और संघ के विरोधी इन भ्रमों को हवा देते रहे और स्वयं को संघ घोषित किये हुए लोग वास्तविकता से दूर बने रहे। आज विकट स्थिति बन गयी है क्योंकि स्वयंभू घोषित संघ ने मनमाने प्रतिमान गढ़ लिये, उनके शिष्यों ने भी पत्थर की लकीर मानकर उनका अनुसरण किया लेकिन जब आज स्वयं माननीय भागवत जी ने कहा कि हम सब केवल स्वयंसेवक हैं और संघ विचार हिन्दुत्व की तरह परिवर्तनशील है, तब सामान्य व्यक्ति बगले झांकने लगा है। हम किसको सच माने, वह पूछ रहा है? राजनीति क्षेत्र की तो हालत ही पतली कर दी गयी, किसी भी राजनेता के खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया कि यह संघ की मर्जी है। कार्यकर्ता दो भागों में बंट गये, एक सरेआम शोर मचाने लगे कि हटाओ-हटाओ और दूसरा कहने लगा कि यह अन्याय है। ऐसा ही वातावरण प्रत्येक अधिष्ठान में होने लगा, किसी को भी जब मन में आया निकालकर बाहर कर दिया गया, संघ की इच्छा के विरोध में भला कौन बोले? इसलिये यह तीन दिन की व्याख्यानमाला समाज के लिये हितकारी रही। स्वयं में संघ बने व्यक्तियों से संघ को कैसे बचाया जाए, अब यह प्रश्न विचारणीय होना चाहिये।

हमारे मन में बसा है राजतंत्र

Written By: AjitGupta - Sep• 18•18

वाह रे लोकतंत्र! तू कहने को तो जनता के मन में बसता है लेकिन आज भी जनता तुझे अपना नहीं मानती! उसके दिल में तो आज भी रह-रहकर राजतंत्र हिलोरे मारता है। मेरे सामने एक विद्वान खड़े हैं, उनके बचपन को मैंने देखा है, मेरे मुँह से तत्काल निकलेगा कि अरे तू! तू कैसे बन गया बे विद्वान! तू तो बचपन में नाक पौछता रहता था। यह है आम आदमी की कहानी। लेकिन यदि मेरे समक्ष कोई खास आदमी लकदक करता खड़ा हो तो उसे कभी नहीं कहेंगे कि तू बचपन में कैसा था। बचपन में नाक उसके भी बहती होगी लेकिन वह खास था तो खास बनने के लिये ही पैदा हुआ है। हाँ ऐसा जरूर हुआ होगा कि कोई अध-पगला सा बच्चा आपके सामने बड़ा हुआ हो और जवानी में किसी उच्च पद पर होकर जब आपके सामने आ खड़ा हो, और सब उसे स्वीकार भी कर रहे हों! यह है हमारे मन में बसा राजतंत्र। मुझसे तो यह प्रश्न न जाने कितनी बार किया गया है कि तुम भला लेखक कैसे! ना कोई अपना और ना ही कोई पराया मानने का तैयार है! क्योंकि मैं खानदानी नहीं! लेकिन इसके विपरीत जो विरासत में लेखक की संतान है वह चाहे कखग नहीं लिख सकें लेकिन उनसे कोई प्रश्न नहीं होता!
इसलिये मैं कहती हूँ कि लोकतंत्र को जड़े जमाने में बहुत समय लगेगा। अभी राजतंत्र की जड़े अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। 90 प्रतिशत आम जनता को कोई मानने को ही तैयार नहीं है, बस हमारे मन में तो 10 प्रतिशत खास लोग ही बिराजे हैं। लोकतंत्र जिनके लिये हैं वे भी राजतंत्र से ग्रसित हैं, वे भी कहते हैं कि इसका बचपन तो हम देखी रहे। इसलिये आज लोकतंत्र को भी राजतंत्र का चोला पहनना पड़ता है। जैसे ही आम आदमी खास हुआ नहीं कि वह हमारे गले उतर जाता है। लालू यादव, मुलायम सिंह, मायावती इसी लोकतंत्र का चेहरा रहे हैं लेकिन जब इनने राजतंत्र का चोला पहना तो गरीब-गुरबा को कोई आपत्ति नहीं हुई अपितु अब वे सर्वमान्य हो गये। इनका भ्रष्टाचार इनके राजतंत्र में शामिल हो गया। राजीव गांधी से लेकर राहुल तक आज सर्वमान्य बने हुए हैं क्योंकि वे राजतंत्र का चेहरा हैं। उनके किसी कृतित्व पर कोई चिन्तन या बहस नहीं होती, वे सर्वमान्य हैं लेकिन लोकतंत्र की जड़ों से उपजे मोदी पर बहस होती है। क्या मोदी राजपुरुष की तरह सर्वगुण सम्पन्न हैं? उनकी छोटी से छोटी बात पर भी प्रश्न खड़े होते हैं। आज लोग उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि यह कैसा लोकतंत्र है आपका, जो हमें कानून के दायरे में रखता है! हम सदियों से कभी कानून के दायरे में नहीं रहे! हमारा हर शब्द ही कानून था। चारों तरफ कोलाहल है, कोई कह रहा है कि स्त्री को पैर की जूती समझना हमारा अधिकार है, आप कैसे कानून ला सकते हैं कि हम किसको रखे और किसको छोड़े! कोई कह रहा है कि हम उच्च कुलीन हैं, हम किसी को भी दुत्कारें, यह सदियों से हमारा अधिकार रहा है, हमें कानून के दायरे में कैसे रखा जा सकता है! कोई कह रहा है कि हम क्षत्रीय हैं, हमें राजकाज से कैसे दूर किया जा सकता है। लोग कह रहे हैं कि यह सारे कानून पहले से ही थे तो आज प्रश्न क्यों? पहले जब कानून बने थे तब राजतंत्र के व्यक्ति ने बनाये थे लेकिन आज इस लोकतंत्र के व्यक्ति की हिम्मत कैसे हो गयी जो हमारे खिलाफ कानून को समर्थन दे डाला।
ये है हमारे दिल और दीमाग की कहानी, जिसमें आज भी राजा और रानी ही हैं। उनका अधपगले बेटे को हम राजा मानते हैं लेकिन तैनाली राम जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति को हमारा मन नेता मानता ही नहीं। मेरे तैनाली राम लिखने से भी प्रश्न खड़े हो जाएंगे, आपने तैनाली राम से तुलना कैसे कर दी? किसी भी लोकतंत्र से निकले व्यक्ति की तुलना नहीं, बस उदारहण के रूप में किसी महापुरुष से कर दो, फिर देखो, कैसा बवाल मचता है! उन्हें यह पता नहीं कि वह महापुरुष भी जरूरी नहीं कि किसी राजतंत्र का हिस्सा ही हों। लेकिन बेचारे साधारण परिवार से आए व्यक्ति को किसी उदाहरण में भी जगह नहीं है। इसलिये मोदीजी कह देते हैं कि वे नामदार है और हम कामदार हैं। हे! खास वर्ग के लोगों, जागो, लोकतंत्र आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, आपको भी इसी लोकतंत्र का हिस्सा बनना ही होगा अब दुनिया से राजतंत्र विदा लेने लगा है तो आपके मन से भी कर दो नहीं तो कठिनाई आपको ही होगी। लोकतंत्र में हम जैसे लोग तो लेखक भी बन जाएंगे और मोदी जैसे लोग प्रधानमंत्री भी बनेंगे, आपके घर की महिला अब पैर की जूती नहीं रहेगी और ना ही आपके घर का चाकर आपके चरणों की धूल बनकर रहेगा। जिन भी देशों ने राजतंत्र को अपने दिलों से विदा किया है, वे आज सर्वाधिक विकसित हैं। अमेरिका इसका उदाहरण है। तो आप भी विदा कर दो इस राजतंत्र को।

कहीं दीप जलेंगे – कही दिल

Written By: AjitGupta - Sep• 15•18

साँप-छछून्दर की दशा, मुहावरा तो आपने सुना ही होगा। एक साँप ने छछून्दर पकड़ लिया, अब यदि साँप छछून्दर को निगल लेता है तो वह अंधा हो जाता है और उगलना उसके वश में नहीं। मैंने इस मुहावरे का उल्लेख क्यों किया है, यह बताती हूँ। परसो मोदी जी अपने कार्यकर्ताओं से बात कर रहे थे। एक महिला कार्यकर्ता ने पूछा कि 17 सितम्बर को आपका जन्मदिन है, इसे हम कैसे मनाएं? मोदी जी ने कहा कि जब मैं मुख्यमंत्री बना था, उससे पहले तक मुझे मेरे जन्मदिन का पता भी नहीं था, फिर लोगों ने मनाना शुरू किया, अब चूंकि मैं बड़े पद पर हूँ तो सभी यह प्रश्न करते हैं। मैं एक काम करने को कहता हूँ, क्या आप करेंगे? आप 17 तारीख को आपके गाँव में जो भी बच्चा पैदा हो रहा है, उसके पास जाएं, उसो आशीर्वाद दें और बताएं कि यदि आप परिश्रम करेंगे तो आप भी मोदी जैसे बड़े व्यक्ति बन सकते हैं। दिखने में बहुत ही सुन्दर और स्वस्थ विचार है। किसी भी नवजात के कान में यह मंत्र फूंकना की तुम महान हो क्योंकि आज के दिन तुमने जन्म लिया है, और तुम्हारी भी मोदी जैसे बड़े बनने की सम्भावना है। मेरे बेटे का जन्म 14 मार्च 1979 को हुआ और 100 साल पहले उसी दिन आइन्सटीन का जन्म हुआ था। हम सब इस गौरव से भरे रहते हैं कि जन्म तारीख एक है। तो 17 सितम्बर को जन्में बच्चों में यह गौरव नहीं होगा! जरूर होगा और वे गाहे-बगाहे इसका जिक्र भी करेंगे। लेकिन यदि बच्चे का परिवार कांग्रेसी हुआ तो! मोदी जी ने अपने कार्यकर्ताओं को मंत्र दे दिया है, वे घर-घर में जाएंगे भी। अब देखिए – एक घर में बच्चा पैदा हुआ है, लोग खुशियों में डूबे हैं, तभी बीजेपी के लोग मिठाई लेकर पहुंचते हैं। परिवारजन खुश होते हैं, पिता के मुँह में मिठाई का निवाला अभी गया भी नहीं था कि एक कार्यकर्ता कहता है कि भाग्यशाली है आपकी संतान जो मोदी जी के जन्मदिन पर जन्म लिया है, आगे जाकर यह भी मोदीजी जैसा बने, प्रभु से यही प्रार्थना है। बच्चे के कान में भी यही मंत्र फूंक दिया है। मिठाई का निवाला साँप की तरह गले में अटक गया। मिठाई ना हो गयी, छछूंदर हो गया। खाएंगे तो संतान के मोदी बनने की खुशी मनाएंगे और फिर पार्टी क्या हाल करेगी, उन्हें साफ दिखायी दे रहा है! नहीं खाते तो संतान की खुशी नहीं, मुँह में गया टुकड़ा उगले भी तो कैसे?
अब संतान ना हो गयी, सारी जिन्दगी का क्लेश हो गया! सोते-जागते यही चिन्ता, कहीं मोदी के प्रभाव में ना आ जाए। स्कूल जाएगा और तारीख जब अन्य बच्चे देखेंगे और यदि किसी ने कह दिया कि अरे तेरा जन्मदिन तो बड़े पवित्र दिन हुआ है तो? मोदीजी का छोटा सा फूल का उपहार भी घाव कर देगा! उन्होंने तो सहजता से कह दिया कि मेरा पीछा छोड़ो और नये बच्चों का जन्मदिन मनाओ लेकिन यहाँ तो कठिनाई खड़ी होने वाली है। न जाने संजय निरूपम जैसे कितने ही कंस, कहाँ हैं कृष्ण- कहाँ है कृष्ण, कहकर इस दिन जन्में बच्चों का वध करने नहीं निकल पड़े। मुझे तो 17 तारीख का इंतजार है, भाजपा के कार्यकर्ताओं का इंतजार है, जब वे घर-घर जाकर बच्चों को आशीर्वाद देंगे। कुछ परिवारजन फूलकर कुप्पा हो जाएंगे और कुछ की स्थिति साँप-छछून्दर जैसी होने वाली है। कुछ ने तो आज ही चिकित्सकों से सलाह लेना शुरू कर दिया होगा कि कुछ भी करो लेकिन इस 17 तारीख को टालो। कुछ ऐसे भी होंगे जो कहेंगे कि डॉक्टर, चाहे सिजेरियन कर दो, लेकिन तारीख 17 ही होनी चाहिये। कहीं दीप जलेंगे और कहीं दिल। देखते रहिये 17 को क्या होता है?