अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

खाई को कम करिये

Written By: AjitGupta - Dec• 09•18

लो जी चुनाव निपट गये, एक्जिट पोल भी आने लगे हैं। भाजपा के कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवीयों की नाराजगी फिर से उभरने लगी है। लोग कहने लगे हैं कि इतना काम करने के बाद भी चुनाव में हार क्यों हो जाती है? चुनाव में हार या जीत जनता से अधिक कार्यकर्ता या दल के समर्थक दिलाते हैं। इस मामले में कांग्रेस की प्रशंसा करूंगी कि उन्होंने ऐसी व्यवस्था खड़ी की कि कार्यकर्ता-समर्थक और नेता के बीच में खाई ना बने। नेता को यदि सत्ता के कारण सम्मान मिलता है तो बुद्धिजीवी को भी विषय-विशेष के लिये समाज में सम्मान भी मिले और स्थान  भी मिले, तभी यह खाई पट सकेगी। बस भाजपा और उनके प्रमुख संगठन संघ की यही बड़ी चूक है कि वह कार्यकर्ता को सम्मान नहीं दे पाती। दो मित्र एक साथ राजनैतिक क्षेत्र में आते हैं, एक नेता बन जाता है और दूसरा कार्यकर्ता रह जाता है। नेता बना मित्र, अपने ही मित्र से आशा रखता है कि वह उसके दरबार में आए और उसके कदम चूमे। बस यही प्रबुद्ध कार्यकर्ता का सम्मान आहत हो जाता है और वह ना देश देखता है, ना समाज देखता है, बस उसे यही दिखता है कि मैं सबसे पहले इसे गद्दी से कैसे उतारूं! फेसबुक पर सैकड़ों ऐसे लोग थे जिनका सम्मान आहत हुआ था, वे भी कांग्रेस के कार्यकर्ता की तरह समाज में अपना स्थान चाहते थे लेकिन उन्हें नहीं मिला और वे अपमानित सा अनुभव करते हुए, विरोध में आकर खड़े हो गये।

कांग्रेस जब से सत्ता में आयी है, तभी से उसने कार्यकर्ता और प्रबुद्ध लोगों को समाज में स्थापित करने के लिये देश भर में लाखों पद सृजित किये और हजारों पुरस्कार व सम्मानों का सृजन किया। एक पर्यावरणविद, समाज शास्त्री, साहित्यकार आदि का नाम शहर में सम्मान से लिया जाता है, उन्हें हर बड़े समारोह में विशिष्ट स्थान पर बैठाया जाता है। मंच पर राजनेता होता है और अग्रिम पंक्ति में सम्मानित अतिथि। दोनों के सम्मान में समाज झुकता है, बस एक समर्थक को और क्या चाहिये! मैंने संघ के निकटस्थ ऐसे प्रबुद्ध नागरिक भी देखें हैं, जिनने अद्भुत कार्य किया लेकिन उन्हें सीढ़ी दर सीढ़ी उतारकर जमीन पर पटक दिया गया। ऐसे ही हजारों नहीं लाखों कार्यकर्ताओं और समर्थकों की कहानी है। व्यक्ति देश की उन्नति के लिये आकर जुड़ता है लेकिन जब उसे लगता है कि उसे सम्मान नहीं मिल रहा अपितु ऐसी जाजम पर बैठना पड़ रहा है, जहाँ उसके साथ उसी के विभाग का चतुर्थ श्रेणी योग्यता के लिये नहीं अपितु उस विभाग में है, के कारण बैठा है। तब उसे कोफ्त होती है, वह नाराज होता है और अपमानित होकर घर बैठ जाता है। कुछ विरोध में खड़े हो जाते हैं और कुछ मौन हो जाते हैं।

यहाँ सोशल मीडिया पर इन चुनावों को लेकर बहुत रायता फैलाया गया था। सभी चाह रहे थे कि मुख्यमंत्री बदलें, क्योंकि उनका सम्मान अधिक था लेकिन कार्यकर्ता को सम्मान नहीं था। वे कांग्रेस की तरह स्लीपर सेल जैसी व्यवस्था चाहे ना चाहते हों लेकिन सम्मान अवश्य चाहते थे। एक्जिट पोल नतीजे नहीं हैं और मुझे अभी  भी लगता है कि जनता खुश थी, नाराजी थी तो कार्यकर्ताओं की ही थी इसलिये चुनाव में जीत होगी, परन्तु जहाँ भी हार होगी वहाँ केवल कार्यकर्ताओं के कारण होगी। 70 प्रतिशत से ज्यादा पोलिंग भाजपा के पक्ष में है लेकिन इससे कम इनके विरोध में है। एक प्रतिशत का अन्तर ही भाजपा को डुबा सकता है और यह एक प्रतिशत कार्यकर्ताओं का रौष ही है।

लेकिन यदि जीत जाते हैं तो संगठन को सम्मान के इस मार्ग को भाजपा के लिये भी तैयार करना होगा। लोगों को उनकी पहचान देनी होगी, तभी वे सम्मानित महसूस करेंगे और आपके साथ जुड़े रहेगे। बिना सम्मान गुलामी में जीने के समान है और समर्थक ऐसे में परायों की गुलामी स्वीकार कर लेते हैं, अपनों के खिलाफ। इसलिये संघ जैसे संगठनों को चाहिये कि कार्यकर्ता और समर्थकों की प्रबुद्धता को सम्मान दे और उनकी और नेता की दूरी को कम करे। जितनी खाई बढ़ेगी उतनी ही दिक्कतें बढ़ेंगी। यदि इस बार जीत भी गये तो क्या, अगली बार यही समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी। हर विषय-विशेषज्ञ की सूची होनी चाहिये और उन्हें उसी के अनुरूप सम्मान मिलना चाहिये। सूची में गधे और घोड़ों को एक करने की प्रथा को समाप्त करना होगा नहीं तो गधे ही चरते रह जाएंगे और घोड़े आपकी तरफ झांकेंगे भी नहीं।

कालपात्र की तरह खानदान को उखाड़ने का समय

Written By: AjitGupta - Nov• 26•18

फिल्म 102 नॉट ऑउट का एक डायलॉग – चन्द्रिका को तो एलजाइमर था इसलिये वह सारे परिवार को भूल गयी लेकिन उसका बेटा अमोल बिना अलजाइमर के ही सभी को भूल गया!
मोदी को अलजाइमर नहीं है, वे अपने नाम के साथ अपने पिता का नाम भी लगाते हैं, राजीव गांधी को भी अलजाइमर नहीं था, फिर वे अपने पिता का नाम अपने साथ क्यों नहीं लगाते थे? राहुल गाँधी अपनी दादी का नाम खूब भुनाते हैं लेकिन दादा का नाम कभी भूले से भी नहीं लेते!
यह देश लोकतंत्र की ओर जैसे ही बढ़ने लगता है, वैसे ही इसे राजतंत्र की ओर मोड़ने का प्रयास किया जाता है। बाप-दादों के नाम का हवाला दिया जाता है, देख मेरे बाप का नाम यह था, बता तेरे बाप का नाम क्या था? ऐसे प्रश्न किये जाते हैं। लेकिन प्रश्न करने वाले कभी खुद ही उलझ जाते हैं, बाप का नाम तो है, नाम प्रसिद्ध भी है लेकिन लेने पर खानदान की पोल खुलती है तो नहीं लेते। कहावत है ना कि दूसरों की तरफ एक अंगुली करने पर चार अपनी तरफ ही उठ जाती हैं। तुम्हारा नामधारी बाप भी तुम्हें चुप रहने पर मजबूर करता है और किसी का अनजाना सा बाप का नाम भी गौरव बढ़ा देता है कि देखो इस बाप ने कैसे संस्कार दिये कि बेटा कहाँ से कहाँ पहुंच गया! जिस बेटे को अपने बाप का नाम बताने में डर सताने लगे, जिसे उधार का उपनाम लेना पड़े, समझो वह लोगों की आँखों में धूल झोंक रहा है। जिस दिन इस खानदान का मकसद पूरा होगा, उस दिन ये सारे ही खानदान के नामों और उपनामों के साथ खड़े होंगे।
इन्दिराजी ने आपातकाल में एक काल-पात्र जमीन में गाड़ा था, मंशा यह थी कि जब कभी इतिहास को जमीन के नीचे से खोदा जाएगा तब हमारे खानदान को स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। लेकिन उनकी यह मंशा पूरी नहीं हुई और कालपात्र को जमीन से निकाल लिया गया। ऐसे ही इस खानदान की यह मंशा भी पूरी नहीं होगी कि आज तो नाम राहुल गाँधी है लेकिन जब हिन्दुस्थान को पाकिस्तान में तब्दील करने में सफल होंगे तब नाम कुछ और हो जाएगा। तब गाँधी नहीं रहेगा, तब राहुल भी नहीं रहेगा। तब इन्दिरा का परिवर्तित नाम फिरोज खान के साथ शान से लिया जाएगा।
यह बाप के नाम का खेल एक सम्प्रदाय विशेष को बताने के लिये ही है कि हमारा नेता तुम्हारे खानदान से ही है, इसलिये हम कैसा भी स्वांग भरेंगे लेकिन वास्तव में हम तुम्हीं में से हैं, यह भूलना नहीं। हमें कभी भी एलजाइमर नहीं होगा। हम उसी बेटे की तरह हैं जो अपने स्वार्थ के लिये बिना एलजाइमर के भी पूरे परिवार को भूल जाता है लेकिन अपना स्वार्थ नहीं भूलता है। इसलिये उस फिल्म की तरह ही अपने बेटों को सिखाओ की जो अपने खानदान को भूल जाए, उसे लात मारना ही अच्छा है, ऐसी आशा से निराशा ही अच्छी है। वे खुद को खानदानी बताना चाह रहे हैं और दूसरों को बे-खानदानी। इसी खानदान में वे अपना भविष्य ढूंढ रहे हैं। सावधान रहना देश वालों, ये हमारे ही लोगों के हाथों में खानदान की तलवार देकर हमें ही मारना चाहते हैं। देश लोकतंत्र को मजबूत करने में लगा है और ये राजतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं, इनकी बातों के रहस्य को समझ लेना और अपने देश के लोकतंत्र की रक्षा करना। इन्दिरा जी का कालपात्र तो जनता सरकार ने खोदकर बाहर फेंक दिया था लेकिन इनके खानदानी कालपात्र को भी नेस्तनाबूद करने का समय है।

सावधान पार्थ! सर संधान करो

Written By: AjitGupta - Nov• 23•18

ऐसी कई कहावतें हैं जिनके प्रयोग पर मुझे हमेशा से आपत्ति रही है, उनमें से एक है – निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। विद्वान कहने लगे हैं कि अपने निन्दक को अपने पास रखो, उसके लिये आंगन में कुटी बना दो। लेकिन मैं कहती हूँ कि अपने निन्दक को नहीं जो अपने दुश्मन की निंदा कर सके, उसे अपने पास रखो। एक गाँव में एक संन्यासी बहुत अच्छा काम कर रहा था, उस गाँव के जमींदार का बड़ा नुक्सान हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस संन्यासी का तोड़ क्या निकालूं, तभी उसे यह कहावत याद आयी और उसने तत्काल गाँव के सबसे खतरनाक निन्दक को बुलाया। निन्दक ने एक उपाय बताया और दूसरे दिन ही आश्चर्य हो गया, गाँव वाले संन्यासी पर पत्थर फेंक रहे थे। निन्दक ने कुछ नहीं किया बस रात को एक महिला को संन्यासी की कुटिया के पास से निकाल दिया और गाँव वालों को चतुरता से दिखा दिया। चुनाव हो रहे हैं, अब निन्दक की भरपूर मांग रहेगी, सारे ही सज्ज हो जाओ। ताश के बावन पत्ते से तो नेताजी खेल खेलेंगे लेकिन आपको पपलू से विरोधी को मात देनी है।
कांग्रेसी इस कहावत को समझे बैठे हैं लेकिन अभी तक गदाधारी भीम रूपी भाजपा को यह थ्योरी समझ नहीं आती है, हमारे उदयपुर में गुलाब जी भाईसाहब सीधी कार्यवाही में विश्वास रखते हैं जबकि गिरिजा जी की तरफ से निन्दा के बाण पहले दिन ही चल गये। अब तो सीपी जोशी ने भी खुद को केन्द्र का प्रतिनिधि मानते हुए केन्द्र पर बाण छोड़ दिया है। गिरिजा जी मानसिक चिकित्सा की सलाह दे रही हैं तो सीपी जोशी छोटी जात और बड़ी जात का प्रश्न उठाकर खुद को सर्वोच्च जाति का बताने में देर नहीं कर रहे हैं। इन दोनों के बाण कहाँ जाकर लगें हैं इसका अभी पता नहीं चला है लेकिन दूसरी तरफ से उछल-कूद हो रही है कि हम शिकायत करेंगे। कह रहे थे कि निन्दक को पास रखो, तब तो सुनी नहीं, अब शिकायत से क्या होगा? हम तो अब भी कह रहे हैं कि देर नहीं हुई है, अपने लोगों को ही मना लो। ये अभी तक तुम्हारी ही लपेटने में लगे थे, कुछ अण्टी ढीली करो और उन्हें अपने आंगन में जगह दे दो। कई अचूक बाणबाज हैं तुम्हारे आसपास भी, उन्हें जरा सम्मान दो और फिर देखों उनके तरकस से कैसे तीर निकलते हैं? हम भी आप लोगों की मदद कर सकते थे लेकिन हम तो फेसबुक के आंगन में कुटिया छानकर बैठ गये हैं। संजय की भूमिका में आ गये हैं।
तुम देखते रहियो, गिरिजाजी मुख्यमंत्री बनेंगी, आखिर इतने दिन उदयपुर की जगह दिल्ली में डेरा डाले ऐसे ही पड़ी थीं! तुम लोग महिलाओं को हमेशा कम आंकते हो, तुमने प्रतिभा पाटिल को भी कम आंका था। राजस्थान की राज्यपाल थी और तुम उनकी परवाह नहीं करते थे, वे एक ही झटके में राष्ट्रपति बन गयी। लो कर लो बात। देखना गिरिजा जी भी मुख्यमंत्री बनेंगी। जोशीजी की उच्च जाति का बयान उन्हें ही घेर लेगा, गहलोत को तो पायलेट ने चक्करघन्नी पहले ही बना रखा है। पायलेट को तो बाहरी आसानी से बता देंगे, मैदान गिरिजाजी के लिये खाली है ना! चेत जाओ, गुलाबजी! कहीं ऐसा ना हो कि बूढ़ी शेरनी आपको मात दे जाए? आपके लोगों को आगाह करो कि निकलो अपनी मांद से और अपनी मुख्यमंत्री को नहीं दूसरे दल की मुख्यमंत्री के लिये शब्द-बाण चलाएं। अपनी को तो बाद में भी देख लेना, अभी तो दूसरी का मामला है। सावधान पार्थ! सर संधान करो।

इस पाले की – उस पाले की या नोटा की भेड़ें

Written By: AjitGupta - Nov• 21•18

चुनाव भी क्या तमाशा है, अपनी-अपनी भेड़ों को हांकने का त्योहार लगता है। एक खेत में कई लोग डण्डा गाड़कर बैठ जाते हैं और भेड़ों को अपनी-अपनी तरफ हांकने लगते हैं। भेड़ें भी जानती हैं कि उन्हें किधर मुँह करके बैठना है। आजकल कुछ भेड़ें कहने लगी है कि मैं किसी मालिक को नहीं मानती, मैं किसी के पाले में जाकर नहीं बैठूंगी। एक बार एक बड़ा सा भेड़ों का झुण्ड रात को एक खेत में बसेरा किये बैठा था, मैंने खेत के मालिक से पूछ लिया कि तुम्हारें खेत में ये भेड़ें बैठी हैं तो तुम्हारे खेत का तो बहुत नुक्सान होता होगा? खेत मालिक बोला कि नहीं, इन भेड़ों से तो हमें बहुत फायदा है, रात भर में जितनी मेंगनी करती हैं, वो हमारे खेत के लिये भरपूर खाद हो जाता है, हम इसकी भारी कीमत भेड़ के मालिक को चुकाते हैं। भेड़ की मेंगनी से लाखों के वारे-न्यारे होते हैं तो भला ऊन से तो कितनी कमायी होती होगी? इसलिये भेड़ों को अपनी तरफ किया जाता है। अब जो भेड़ें किसी भी खेत में बैठने को तैयार नहीं, वे कहीं तो मेंगनी करेंगी ही ना! वे समझ रही हैं कि हमारी मेंगनी का फायदा किसी को नहीं होना चाहिये लेकिन कोई ना कोई तो फायदा उठा ही रहा है! आज चुनाव के माध्यम से मेंगनियों का व्यापार हो रहा है। भेड़ों को समझाया जा रहा है कि तुम स्वतंत्र रहो, किसी के खेत पर मेंगनी करने की जरूरत नहीं। भेड़ें तो भेड़े ही रहने वाली हैं, वे सोच रही हैं कि हम अपनी मर्जी के मालिक बन गये लेकिन उन्हें पता नहीं कि वे सदा से भेड़ थी और भेड़ ही रहेंगी। उनको बेमौल कोई ना कोई मूंड ही रहा है।
भेड़ की ऊन का कोट कौन पहनेगा, बस सवाल इतना सा है। कुछ लोगों को मेंगनी भी चाहिये, ऊन भी चाहिये और भेड़ की खाल भी चाहिये। कुछ कहते हैं कि हमें केवल मेंगनी और ऊन ही चाहिये। भेड़ें तय नहीं कर पाती कि हमारी खाल खेंचने वाले के पाले में जाएं तो क्योंकर जाएं लेकिन जाती हैं! एक भेड़ ने पूछ भी लिया कि मेरी खाल तो नहीं उतारोगे? मालिक बोला कि पगला गयी है क्या? तुझे पता नहीं तू कुर्बानी की भेड़ है, तेरी किस्मत कितनी बड़ी है कि तू कुर्बान होगी और फिर भेड़ हंसती-हंसती पाले में चले जाती है। दूसरे पाले वाला चिल्लाता रहता है कि देख मैं तेरी खाल नहीं खेचूंगा लेकिन भेड़ को समझ आ चुका है कि वह भी कुर्बान हो सकती है। चुनाव में जिधर देखो उधर ऐसे ही मजमा लगा है। भेड़ें भी मिमिया रही हैं, गले में घण्टी बंध गयी है, रंग-रोगन भी हो गया है। जिसके पाले में ज्यादा भेड़ें होंगी वे ही सारी भेड़ों का मालिक बन जाएगा फिर किसी भी खेत में ना बैठने वाली भेड़ें भी उसी मालिक से मूंड़ी जाएंगी। तेरी भेड़ और मेरी भेड़ अलग-अलग दिखती हैं लेकिन ऊन और मेंगनी सभी ने देनी है, मालिक के लिये सभी बराबर है। लेकिन चुनाव के समय देख तू भेड़ा है और तू भेड़ है, तू इस प्रदेश की भेड़ है और तू इस प्रदेश की है, तू श्रेष्ठ है और तू निकृष्ठ है का भाव बता दिया जाता है। ब्राह्मण भेड़ दलित भेड़ से भिड़ जाती है, दलित महा दलित से भिड़ जाती है, गुत्थम-गुत्था हो रही है और मालिक खुश है कि अलग हो-होकर सारी हमारे पास आ रही हैं। यह खेल चलता ही रहता है, भेड़ें भी खुश रहती हैं कि उनकी मेंगनी के भी दाम लग रहे हैं और मालिक भी खुश रहता है और जिसके खेत में बैठती हैं वह भी खुश रहता है। चारों तरफ खुशी ही खुशी छायी रहती है, लगता है कि वसन्त खिल गया है। कहीं से घण्टियों का शोर सुनायी देता है तो कहीं से में-में की आवाजें दिल को सुकून देती हैं, कि भेड़ें आ रही हैं। कोई सीधे चलकर पाले में बैठ रही हैं और कोई टेड़ी चाल से बाद में आकर बैठेंगी, बैठेंगी दोनों ही। चुनाव के बाद बड़ी मात्रा में ऊन एकत्र होगी, इधर के पाले की भी और उधर के पाले की भी और नोटा वाले की भी। फिर सब केवल भेड़े रह जाएंगी, मुंड़ी हुई भेड़ें। चुनाव का डण्डा फिर कहीं गड़ जाएगा और दूसरी जगह की भेड़ें मुंड़ने के लिये तैयार हो जाएंगी।

कहाँ सरक गया रेगिस्तान!

Written By: AjitGupta - Nov• 15•18

बचपन में रेत के टीले हमारे खेल के मैदान हुआ करते थे, चारों तरफ रेत ही रेत थी जीवन में। हम सोते भी थे तो सुबह रेत हमें जगा रही होती थी, खाते भी थे तो रेत अपना वजूद बता देती थी, पैर में छाले ना पड़ जाएं तो दौड़ाती भी थी और रात को ठण्डी चादर की तरह सहलाती भी थी। लेकिन समय बीतता रहा और रेत हमारे जीवन से खिसक गयी, हमने मुठ्ठी में बांधकर रखी थी कुछ रेत लेकिन वह ना जाने कब हथेली को रिक्त कर चले गयी। लेकिन हमें ललचाती जरूर रही और जब भी बालू-रेत के टीले निमंत्रण देते, हम दौड़कर चले जाते। इस बार टीलों ने हमारे जन्मदिन पर निमंत्रण दिया, लगा की बचपन को साकार कर लेंगे और दौड़ पड़े हम परिवार सहित जैसलमेर के धौरों के निमंत्रण पर। काली चमचमाती सड़क पर हमारी गाड़ी दौड़ रही थी लेकिन हम सड़क के बाजुओं में टीलों को खोज रहे थे जो कभी हठीले से बनकर सड़क पर आ धमकते थे। निगाहें बराबर टिकी थी लेकिन रेत ने सड़क को हथियाया नहीं। हम आगे बढ़े और जैसलमेर के सम तक जा पहुंचे, फटाफट अपने टेण्ट में सामान रखा और एक खुली जीप में ऊंट सी चाल में टीलों के बीच जा पहुंचे। बच्चे लोग ऊंट का आनन्द लेकर पहुंचे। जीप वाला बोला कि लो आ गया सम, याने जैसलमेर का जहाँ रेगिस्तान है। हैं! हमें आश्चर्य ने घेर लिया! तीस साल पहले आए थे तो रेत का समुद्र हुआ करता था और आज तो तालाब सा भी नहीं है! हम बावले से हो गये, हर आदमी से पूछने लगे कि कहाँ गया रेगिस्तान! होटल का वेटर बोला की यही तो है रेगिस्तान! अरे नहीं, हम तीस साल पहले आए थे तब दूर-दूर तक बस वही था। वह हँस दिया और बोला कि मेरी उम्र भी इतनी नहीं है तो मैं कैसे बताऊं कि तब क्या था! हम पूछे जा रहे थे और लोग टुकड़े-टुकड़ों में बता रहे थे कि नहर आ गयी, बरसात आ गयी और रेत माफिया सक्रीय हो गये। रेत के टीले अब खेत में बदल गये, हरियाली छा गयी और रेगिस्तान 100 किमी. दूर जा पहुंचा। हमारा मन उचट गया, कहाँ समुद्र देखने का ख्वाब पाले थे और कहाँ तालाब के किनारे ही बैठकर खुश होने का स्वांग कर रहे हैं। कभी धोरों पर गायकी होती थी और अब रिसोर्ट पर होने लगी है। कुदरत की जगह कृत्रिम सा वातावरण बना दिया गया है। सुन्दर से टैण्ट आ गये हैं, रेत के धोरों वाला नरम बिस्तरा नहीं है, टीलों पर चढ़ना और फिसलना नहीं है, बस एक परिधि है उसमें ही सारे आनन्द लेने हैं। रात को नींद तो आयी लेकिन सुबह फिर तारों भरे आकाश को देखने के लिये नींद विदा हो गयी। तारे चमचमा रहे थे और हमें सुकून दे रहे थे, मैं वहीं कुर्सी डालकर बैठ गयी कि इन तारों के सहारे ही रेगिस्तान तक संदेश पहुंचा देती हूँ कि तुम बहुत प्यारे थे। दूर जा बैठे हो, अब क्या पता जब कभी आना हो तो तुम हमारे देश की सीमा में भी रहो या नहीं। लेकिन खैर, तुम दूर चले गये हो, कोई बात नहीं, यहाँ के लोग खुश हैं। जिन बच्चों के कभी बरसात के मतलब बताने में पसीने छूटते थे अब वे हर साल आती बरसात से परिचित हैं। केर-सांगरी का खाना अब फैशन बन गया है, अब तो ढेर सारी हरी सब्जियां उपलब्ध है। रेगिस्तान दूर जा बैठा लेकिन पर्यटक बाढ़ की तरह बढ़े जा रहे हैं। कहीं तिल धरने को भी जगह नहीं। जैसलमेर के किले पर जाना असम्भव हो गया आखिर हारकर बेटी-दामाद से कहा कि तुम ऑटो लेकर किले पर जाओ। वे भी जैसे-तैसे भीड़ को चीरते हुए आधा-अधूरा सा किला देखकर आए और मन की प्यास अधूरी ही छोड़ आए। शहर में हमारी गाडी घूमती रही लेकिन कहीं जाने का मार्ग उपलब्ध नहीं, रेस्ट्रा भी सारे भीड़ से पटे हुए, आखिर वापस होटल की शऱण ली और वहीं खाने का ऑर्डर किया। हमने तो रेगिस्तान को मुठ्ठी भर रेत में तब्दील होते देखा, किले की विशालता को दूर से ही नमन कर लिया और पटुओं की हवेली तो पुरानी यादों से निकालकर ताजा कर लिया।
लेकिन एक गांव देखा – कुलधरा गाँव। उजड़ा हुआ लेकिन अपने में इतिहास समेटे हुए। पालीवाल ब्राह्मणों का गाँव जो रातों-रात उजड़ गया। कोई कहता है कि एक मुस्लिम मंत्री के कारण रातों-रात पलायन हो गया, कोई कहता है कि भूकम्प आ गया। लेकिन अब लोग भूत-प्रेत तलाश रहे हैं। राजस्थान सरकार ने पर्यटन स्थल का दर्जा देने के कारण यहाँ पर्यटक बड़ी संख्या में आने लगे हैं। लेकिन लग रहा था कि लोग इतिहास को जानने नहीं बस भूत देखने आ रहे थे!
जैसलमेर में एक अद्भुत और रोमांचित करने वाला वार-म्यूजियम भी है और इसी के साथ रात को होने वाला प्रकाश और ध्वनि कार्यक्रम भी अनूठा है। लोंगेवाला का युद्ध साकार हो उठता है और हमारे वीर सैनिक, बोर्डर फिल्म की कहानी के पात्रों के माध्यम से जीवित हो उठते हैं। पर्यटकों को इसे अवश्य देखना चाहिये। जैसलमेर की कहानी लम्बी है लेकिन अभी यही विराम।