अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

अपनी रोटी से ही तृप्ति

Written By: AjitGupta - Mar• 11•18

अपनी रोटी से ही तृप्ति
कभी मन हुआ करता था कि दुनिया की हर बात जाने लेकिन आज कुछ और जानने का मन नहीं करता! लगने लगा है कि यह जानना, देखना बहुत हो गया अब तो बहुत कुछ भूलने का मन करता है। तृप्त सी हो गयी मन की चाहत। शायद एक उम्र आने के बाद सभी के साथ ऐसा होता हो और शायद नहीं भी होता हो! दौलत के ढेर पर बैठने के बाद दौलत कमाने की चाहत बन्द होनी ही चाहिये और दुनिया को समझने के बाद और अधिक समझने की चाहत भी बन्द होनी चाहिये। लेकिन इस चाहत पर अपना जोर नहीं है, जब तक मन चाहत की मांग करता है, हम कुछ नहीं कर पाते लेकिन यदि मन तृप्त हो गया है तब उसे स्वीकार कर लेना चाहिये। रोज ही कोई ना कोई फोन आ धमकता है, यहाँ आ जाओ, वहाँ आ जाओ लेकिन मन कहता है कि भीड़ में जाकर क्या होगा, कहीं ऐसा ना हो कि ढूंढने निकले थे मन का सुकून और गँवा बैठे खुद का ही चैन। अक्सर देखती हूँ कि अधिकतर लोग कोई ना कोई कुण्ठा लेकर बैठे हैं, वही कुण्ठा उनके जीवन का उद्देश्य बन जाती है। आप उनके सामने कितनी ही अच्छी बाते परोस दें लेकिन उनकी सोच अपनी कुण्ठा से बाहर निकल ही नहीं पाती। हम यहाँ भी लिखते हैं तो हर व्यक्ति आपकी हर बात नहीं पढ़ पाता है, बस जो मन माफिक हो वही पढ़ी जाती है। लेकिन लिखना हमारा उद्देश्य बन बैठा है तो स्वयं को प्रकट करना मन की चाहत बन गयी है और जब स्वयं को प्रकट करना ही चाहत बन जाए तब दुनिया की हर बात को जानना अनावश्यक सा लगता है। मैं अपने मन को हरदम कुरदेती रहती हूँ और ईमानदारी से सबको अवगत भी कराती रहती हूँ।
कभी हम भी थोड़ा बहुत राजनीति पर लिख लेते थे लेकिन अब लगने लगा है कि जब हर व्यक्ति सत्ता की तलवार लेकर निकल पड़ा है तो मेरी आवाज तो नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाएगी। सामाजिक मुद्दे भी राजनीति की भेंट चढ़ते जा रहे हैं इसलिये खुद में डूबकर केवल अकेले व्यक्ति की बात करने से ही शायद बीज में ही सृष्टि समायी है का समाधान हो जाएगा। दुनिया का हर आदमी सुख चाहता है लेकिन उसके सुख अलग-अलग रास्ते में खड़े हैं। मेरा रास्ता कहाँ से जाता है और कहाँ तक जाता है, बस यही बात हम समझ नहीं पा रहे हैं, हम कभी किसी रास्ते पर जाकर भटक जाते हैं और कभी किसी रास्ते पर जाकर लेकिन मेरा रास्ता मेरे अंदर से ही होकर जाता है यह जान नहीं पाते। हम दूसरों के सहारे से सुख ढूंढते हैं, जो कभी नहीं मिलता। यदि हम खुद के सहारे से सुख ढूंढे तो पल भर में सुख मिल जाएंगा, बस मैं यही करने का प्रयास कर रही हूँ। आज मेरा कथन भाषण जैसा हो गया है लेकिन जो शब्द लिखे जा रहे हैं उनपर मेरा जोर नहीं, मैं क्या लिखने बैठती हूँ और क्या लिख बैठती हूँ ये मेरे शब्द ही तय करते हैं, आज यही सही। मैं बीते पाँच-सात दिनों में कई लोगों से मिली, सभी लोग दूसरों के माध्यम से सुखी होना चाहते थे, कोई परिवार से धन चाहता था तो कुछ सरकार से रोजगार, कोई समाज से सम्मान चाहता था तो कोई पुरस्कार। सबकी शिकायते और आशाएं थी लेकिन कोई यह नहीं कह रहा था कि मेरा सुख मैं खुद अर्जित करूंगा! मुझे केवल अपनी बात कहने में सुख मिलता है और इसके लिये मैं दूसरों का माध्यम नहीं चुनती। मेरे सुख से भला दूसरों का क्या लाभ! दूसरे मेरे सुख के लिये क्यों चिंतित हों! मुझे सुखी होना है तो मेरा मार्ग मुझे ही ढूंढना है। मैं केवल सुख की तलाश में खुद तक सीमित रहती हूँ, इस बात से दुखी नहीं होती कि मुझे कौन पढ़ रहा है और कौन नहीं। बस मैं लिख रही हूँ और सुखी हो रही हूँ। आप भी अपने अन्दर झांककर देखिये, आपका सुख भी आपका इंतजार कर रहा होगा। दूसरों के हाथों सुखी होने की जगह खुद से सुखी होना ही अन्तिम सत्य है। जैसे अपनी रसोई की रोटी खाने से ही तृप्ति होती है ना कि दूसरे की रसोई की रोटी खाने पर। खुद की रोटी थेपिये और खाकर आनन्दित हो जाइए। तब जरूरत ही नहीं पड़ेगी दूसरे के छप्पन भोग को देखने की। इसलिये दुनिया का आनन्द उठाने का मन अब नहीं करता बस खुद का आनन्द ही सच्चा लगता है।

गमले में सिमटी माँ बौन्जाई बनाती है, वटवृक्ष नहीं

Written By: AjitGupta - Mar• 08•18

आपने कभी वटवृक्ष देखा है, कितना विशाल होता है! उसे जितनी धरती का आँचल मिलता है, वह उतना ही विशाल होता जाता है। लेकिन कुछ आधुनिक लोग आजकल वटवृक्ष को भी गमलों में रोपने लगे हैं और आपने देखा होगा कि उनका आकार सीमित हो जाता है, वे लगते तो वटवृक्ष ही हैं लेकिन उनकी विशालता सीमित हो जाती है। धरती ही उन्हें विशाल बनाती है और धरती ही उन्हें बौना बना देती है। धरती का जितना आकार होता है उतना ही वटवृक्ष का विस्तार होता है, ऐसे ही महिला भी है जो धरती समान है और पुरुष बीज समान है। महिला की सोच जितनी विशाल होती जाती है उतनी ही व्यापकता से वह पुरुष का व्यकित्व बनाती है, यदि वटवृक्ष को गमले में सीमित किया गया है तो वह बौना बन जाएगा और उसे यदि प्रचुर धरती दी है तो वह कभी ना रुकने वाला वटवृक्ष बन जाएगा। महिला हर आयु में माँ स्वरूप रहती है, वह हमेशा पुरुष को विकसित करने का काम करती है, कभी वह गर्भ में धारण कर उस बीज को पौधे का आकार देती है तो कभी पत्नी बनकर उसे पुष्पित-पल्लवित करती है, बहन के रूप में प्रेम रूपी रक्त का संचार करती है तो पुत्री बनकर पुरुष को भी ममता से ओतप्रोत करती है। वह जब भी पुरुष के समक्ष होती है, हर रूप में स्निग्धता भरती है। इसलिये पुरुष को वटवृक्ष के समान विशाल बनना है तो महिला के व्यक्तित्व को व्यापक बनाना ही होगा, यदि महिला को हमने संकुचित सोच में ढाल दिया तब वह गमला बन जाएगी और पुरुष को भी बौन्जाई बना देगी।
हमारे जमाने में बालिका को जन्म के साथ ही दीक्षित किया जाता था, उसे माँ बनने के लिये प्रति पल शिक्षित किया जाता था। पुरुष महिला के साये में पलता था और बड़ा होता था, उसे कभी संकट का सामना नहीं करना पड़ता था, एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी, धरती बीज को धारण करती थी और वही धरती बीज को वृक्ष में बदल देती थी लेकिन आजकल परिवर्तन होने लगे हैं। महिला ने स्वयं को गमले तक सीमित कर लिया है और वह पुरुष को भी बौना बना रही है। महिला ने उस बीज को खुला आसमान देना बन्द कर दिया है, उस के स्थान पर गमले को कमरे की चारदीवारी में कैद कर दिया है। घर-घर में गमलों का चलन बढ़ गया है, न जाने कितने बौन्जाई गमलों में बन रहे हैं और अपने सीमित आकार में गमले की शोभा बढ़ा रहे हैं। आज महिला दिवस है, हम अपनी व्यापकता के बारे में विचार करे, हम में कितनी संभावनाएं है, उन्हें टटोलें, हम पुरुष को कितना विशाल व्यक्तित्व बना सकते हैं, इस पर विचार करें। जब भी कोई महिला माँ बन रही हो, तब उसे ध्यान में रहे कि अपनी पुत्री को गमले में परिवर्तित नहीं करना है अपितु उसकी सोच का दायरा उस खेत के समान करना है जहाँ विशाल वटवृक्ष की सम्भावना बन सके। जब भी हम गमलों में परिवर्तित होंगे तब पुरुष अपने आपको विस्तार देने के लिये गमलों की चारदीवारी को तोड़ने का प्रयास करता रहेगा, इसलिये उसे विस्तार देने में स्वयं की व्यापकता निर्धारित करें। अपने मातृ-स्वरूप को पहचाने और वह पुरुष की विशालता के लिये खुद को विशाल बनाए। याद रखिये कि राम जब धरती पर अवतार लेते हैं उससे पहले कौशल्या मातृ-स्वरूप में उपस्थित होती है, कृष्ण के लिये देविका का आगमन होता है, शिवाजी के लिये जीजा बाई होती है। हर विशाल व्यक्तित्व के पीछे एक माँ खड़ी होती है, उसका विशाल आँचल होता है। किसी भी गमले में सिमटी माँ ने कभी भी विशाल व्यक्तित्व को जन्म नहीं दिया है, इसलिये महिला की विशालता में ही पुरुष की विशालता निहित है। महिला दिवस पर सभी माताओं और सभी पुत्रों को बधाई।

अपने जीवन को जीने का मौका दें

Written By: AjitGupta - Mar• 03•18

“क्लब 60” यह फिल्म का नाम है, जो कल हमने टीवी पर देखी। जो लोग भी 60 की उम्र पार कर गये हैं उनके लिये अच्छी फिल्म है। इस फिल्म में अधिकतर पुरुष थे और उनकी संवेदनाओं पर ही आधारित थी लेकिन मैंने अपने शहर में महिलाओं के ऐसे ही समूह देखे हैं, जो अकेली हैं लेकिन अपने जीवन को जिंदादिली से जी रही हैं। मेरे घर में कुछ गुलाब के फूलों की झाड़ियां हैं, उसमें जैसे ही फूल खिलखिलाने लगते हैं, उन्हें देखकर मन खुश हो जाता है। मैं बार-बार उन्हें देखती हूँ, ऐसे ही जब कोई बुजुर्ग हँसता है तो मन को सुकून मिलता है और लगता है कि कांटों के बीच भी फूल खिलखिला रहे हैं। हमने अपने जीवन को एक दूसरे के साथ बाँध लिया है, बंधना अच्छी बात है लेकिन फूल के गुच्छे का भी अस्तित्व है तो एक फूल का भी है। फिल्म में एक संदेश था कि आपके साथ अब बच्चों की यादें भर हैं, चाहे वे इस दुनिया में हैं या नहीं हैं। यदि दुर्भाग्य से नहीं हैं तो भी उनकों याद कीजिये और हर पल को जिन्दादिली से जीएं और यदि होकर भी आपसे दूर हैं तो भी जिंदादिली से जीवन बिताएं। क्योंकि दोनों ही स्थितियों में बच्चे आपके साथ नहीं हैं, बस उनके साथ बिताए पल हैं। अकेले रहना गुनाह नहीं है, जिसे सजा के तौर पर काटा जाए। आज भारत में कितनी बड़ी संख्या में बुजुर्ग अकेले रहते हैं और कितनी बड़ी संख्या में महिला या पुरुष अकेले रहते हैं, यदि ये स्वयं में खुश नहीं होंगे तो समाज पर बोझ बन जाएंगे। इसलिये खुश रहिये। अकेले व्यक्ति का खुश रहना बहुत जरूरी है और समाज को भी उन्हें खुश होने का अधिकार देना चाहिये ना कि उनपर किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाना चाहिए।
महिला से तो बहुत सारे अधिकार छीन लिये जाते हैं, लेकिन अब दुनिया बदल रही है। महिला ने भी जीना सीख लिया है और बुजुर्गों ने भी जीना सीख लिया है। हम संतान के बड़ा करते हैं, अपना सुख-दुख भूल जाते हैं लेकिन जब संतान हम से दूर चले जाती है तब तो कम से कम अपने जीवन का मौल समझ लें। इसी प्रकार महिला को तो संतान के साथ-साथ पति की जिम्मेदारी भी उठानी होती है और वह तो अपने बारे में कभी सोच ही नहीं पाती, इसलिये जब अकेलेपन का शिकार हो जाएं तो उसमें भी अपना जीवन तलाश करें। भगवान कहता है कि कभी अपना जीवन भी अकेले गुजारकर देखो और अपने संघर्षों को खुशी-खुशी स्वीकार करो। दुनिया की सोच बदल रही है और वह अकेलेपन की ओर बढ़ रही है, हमें अकेलेपन को भी हँसकर जीना है और सभी के साथ भी हँसकर जीना है। परिवार का स्थान दोस्ती ने ले लिया है, तो हम सब भी दोस्ती की राह पर चलें। साथी हाथ बढ़ाना साथी रे, गाने का अर्थ व्यापक कर दें। लाफिंग क्लब से नकली हँसी को दूर कर दें और असली हँसी को जीवन में जगह दें दे। बस अपने जीवन को जीने का मौका दें और देश के खुशी का इंडेक्स ऊपर कर दें। कभी मौका लगे तो फिल्म जरूर देख लें, अच्छी और प्रेरणादायी फिल्म है।

मृत्यु संस्कार है – कौतुहल का विषय नहीं

Written By: AjitGupta - Feb• 26•18

बहुत दिनों से मन की कलम चली नहीं, मन में चिंतन चलता रहा कि लेखन क्यों? लेखन स्वयं की वेदना के लिये या दूसरों की वेदना को अपनी संवेदना बनाने के लिये। मेरी वेदना के लेखन का औचित्य ही क्या है लेकिन यदि कोई ऐसी वेदना समाज की हो या देश की हो तब वह वेदना लेखक की संवेदना बन जाए और उसकी कलम से शब्द बनकर बह निकले तभी लेखन सार्थक है। कई बार हम अपनी वेदनाओं में घिर जाते हैं, लगता है सारे संसार का दुख हम ही में समा गया है लेकिन जैसे ही समाज के किसी अन्य सदस्य का दुख दिखायी देता है तब उसके समक्ष हमारा दुख गौण हो जाता है, बस तभी लेखन का औचित्य है। जन्म-मृत्यु, सुख-दुख हमारे जीवन के अंग हैं, लेकिन ऐसे दुख जो समाज की बेबसी को दर्शाए या समाज के मौन को सार्वजनिक करे तब लेखन का औचित्य बनता है। मैं अपने आप में उलझी थी इसलिये चुप थी लेकिन जब मैं उलझी थी तो दुनिया तो चलायमान थी और घटना-दर-घटना भी घटित होती रही। कई परिचितों के घर मृत्यु ने दस्तक भी दे दी और मैं उस वेदना को अपने अन्दर अनुभव भी करती रही लेकिन साक्षात सांत्वना देने में असमर्थ रही। कल मृत्यु का प्रचार और वैभव भी देखा, तब ध्यान आया कि मृत्यु तो हमारे यहाँ एक संस्कार है। हम 12 दिन तक परिवार सहित मृतक का स्मरण करते हैं और उसकी सद्गति के लिये प्रार्थना करते हैं। लेकिन किसी की मृत्यु भी प्रचार का साधन बन जाए और समाज को वशीकरण मंत्र के आगोश में लेने का रात-दिन काम किया जाए तो कलम चलने का औचित्य समझ आने लगता है।
जो लोग अपने पैतृक गाँव से जुड़े हैं और मृत्यु के समय अपनी ही मिट्टी में विलीन होना चाहते हैं, वे वास्तव में मृत्यु को संस्कार के रूप में मानते हैं। अपने वैभव के प्रदर्शन से दूर, केवल परिवारजनों के साथ मृत्यु संस्कार को साकार करने वाले लोग समाज को मार्ग दिखाते हैं और तब लेखन का औचित्य मुझे समझ आता है। मेरे आत्मीय परिसर में ऐसी ही एक मृत्यु हुई, गाँव की मिट्टी में ही पंच तत्व को विलीन किया गया और पूरे 12 दिन गाँव में रहकर ही सारे संस्कार किये गये। समाज को एक संदेश गया कि मृत्यु प्रचार का साधन नहीं है अपितु साधना है, हमारे लिये एक संस्कार है। कल से मृत्यु का प्रचार भी देखने को मिल रहा है, भावनाएं भुनाने का प्रयास भी हो रहा है, होड़ सी मची है, लोग पता नहीं क्या-क्या जानना चाहते हैं और लोगों को क्या-क्या बताना है, इस बात की होड़ लगी है। मृत्यु किसी की भी हो, परिवार के लिये दुखद होती है लेकिन किसी प्रसिद्ध व्यक्तित्व की मृत्यु समाज के लिये दुखद कम और कौतुहल का साधन अधिक बन जाती है, इसी कौतुहल को मीडिया प्रचार का साधन बना देता है और दुकानदारी सजा देता है। तब मृत्यु, संस्कार नहीं रह जाती अपितु उसमें भी व्यापार दिखने लगता है। भारत में मृत्यु एक संस्कार है और इसका स्वरूप बना रहना चाहिये। सारा देश किसी की मृत्यु से दुखी है तो उन्हें भी सूतक का पालन करना चाहिये और शोक रखना चाहिये ना कि उस मृत्यु को कौतुहल का विषय बनाकर अपनी दुकानें सजानी चाहिये।
मेरा सभी को नमन।

कुछ नहीं होने का सुख

Written By: AjitGupta - Feb• 09•18

जिन्दगी भर लगे रहे कि कुछ बन जाए, अपना भी नाम हो, सम्मान हो। लेकिन अब पूरी शिद्दत से मन कर रहा है कि हम कुछ नहीं है का सुख भोगें। जितने पंख हमने अपने शरीर पर चिपका या उगा लिये हैं, उन्हें एक-एक कर उखाड़ने और कतरने का मन है। कभी पढ़ाई की, कभी नौकरी की, कभी सामाजिक कार्य किये, कभी लेखन किया और सभी से लेकर न जाने कितने पंख अपने शरीर में लगा लिये। हम यह है और वह हैं, हमारी पहुँच यहाँ तक है और वहाँ तक है! परत दर परत हम पर चढ़ती गयी और हम हमारे वास्तविक स्वरूप से दूर होते गये। हमारे अंदर का प्रेम न जाने कहाँ और कब रीत गया, बस हमें दूसरों से सम्मान मिले यही चाहत बसकर रह गयी। लेकिन अब समझ आने लगा है कि यह सम्मान कल्पना है जैसे हमने स्वर्ग और नरक की कल्पना कर ली है वैसे ही ये सम्मान भी होते हैं, बस एक छलावा और कुछ नहीं। हम खुद से दूर होते चले जाते हैं, हमारे अन्दर कितना कुछ है, खुद को देने के लिये यह भूल जाते हैं और बस दूसरों से पाना ही चाहत बन जाती है। मैं अपने आपको खोद रही हूँ और न जाने कितनी संवेदनाएं अन्दर छिपी हैं उनसे साक्षात्कार हो रहा है। कभी यूरोप में प्रतिदिन स्नान का चलन नहीं था, सर्दी जो थी लेकिन शरीर चाहिये था खुशबूदार तो वहाँ परफ्यूम का चलन बन गया। कितने परफ्यूम आए पेरिस से बनकर और हम सबने उपयोग किये लेकिन किसी ने अपने शरीर की वास्तविक गंध को नहीं जाना, मैं उसी वास्तविक गंध को पाने की कोशिश कर रही हूँ। कभी जेवर से कभी कपड़ों से शरीर को सुसज्जित करते हैं लेकिन शरीर की सुन्दरता कितनी है यह देखने का अवसर ही नहीं मिलता बस जेवर पहनकर आइने के सामने देखते हैं कि जेवर में हमारा शरीर कैसा लग रहा है!
हमारे मन में क्या है, इसे हमने लाख तालों में बन्द कर लिया है, ऊपर इतने आवरण है कि हम जान ही नहीं पा रहे हैं कि हमारे मन में क्या है? तालाब के पानी में इतना कचरा डाल दिया है कि अन्दर का निर्मल जल ऊपर से दिखायी ही नहीं दे रहा है। कभी कचरे को हटाने का मन होता भी है तो मुठ्ठीभर कचरा हटाते हैं और फिर प्रमाद आकर घेर लेता है। जब हमारे अन्दर की आत्मीयता कुन्द होने लगती है तब प्रेम की ज्योति कहीं बुझ जाती है और तब मन में संवेदना जन्म लेती है। यह संवेदना दिखती नहीं है लेकिन जैसे ही परिस्थिति या किसी दृश्य का निर्माण होता है, संवेदना जागृत होती है और आँखों के रास्ते बह निकलती है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग बात-बात में रो देते हैं, हम कहते हैं कि भावुक व्यक्ति है। लेकिन भावुकता के और अन्दर जाइए, कहीं न कहीं रिश्तों में आत्मीयता की कमी और मन के ऊपर आवरणों की भरमार होगी। फिल्म या सीरीयल देखते हुए हमें किस बात पर रोना आता है, पड़ताल कीजिए, हमारा बिछोह वहीं है। जानिये उस दर्द को और उस आत्मीयता को वापस पाने की कोशिश कीजिए, अपार संतुष्टि मिलेगी लेकिन अक्सर यह सम्भव होता नहीं है। क्योंकि आत्मीयता अकेले से नहीं होती यह दोनों पक्षों का मामला है, लेकिन यदि हमें अपने मन का पता लग गया तो कहीं न कहीं रास्ते भी निकल ही आएंगे। एक रास्ता ना मिला तो दूसरा कोई मार्ग जरूर दिखायी देगा। इसलिये मन को जरूर उजला करने का प्रयास करना चाहिये।
हमारा मन किन तत्वों से बना है, हम क्या चाहते हैं, यह कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया बस दुनिया में किसे सम्मान मिलता है, वही बनने का प्रयास करते रहे। अपने मन की चाहत को पीछे धकेल दिया और दुनिया की चाहत को आगे कर लिया। यदि मन की की होती तो आज मन को खोजना नहीं पड़ता, पहले तो मन को दूसरों की चाहत के नीचे दबा दिया और अब उसे खोजने का प्रयास कर रही हूँ। आप भी झांक लें, यदि मौका मिल जाए तो कि क्या बनना हमारे जीवन का सत्य था और हम क्या बन गये हैं। एक खोखला जीवन जी रहे हैं, जिसमें कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, कोई सत्ता के पीछे और कोई सम्मान के पीछे। काम कोई नहीं कर रहा है, बस खुद को काम की आड़ में कुछ पाने का जरिया बना लिया है। यदि कुछ पाने का नजरिया बदल जाएगा तो काम में आनन्द आ जाएगा, हर चीज में नफा-नुक्सान ढूंढने पर काम ही बोझ बन गया है। इसलिये मैं प्रयास कर रही हूँ कि मेरा अस्तित्व ही विलीन हो जाए और मैं अपने मन की थाह पा जाऊँ। बस कुछ नहीं होने का सुख पा जाऊँ। अपनी आत्मीयता वापस पा जाऊँ और अपनी संवेदना को जान पाऊँ।