अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

जीवन के अन्‍तरालों को खोजने की चाहत

Written By: AjitGupta - Jul• 22•15

हम रोज अपने अन्‍दर कुछ न कुछ तलाशते हैं, हम कौन हैं, हमें क्‍या अच्‍छा लगता है, हमें क्‍या करना चाहिए। रोज अपनी आदतों को खोजते हैं, रोज अपनी चाहतों को खोजते हैं और रोज अपने पाने को खोजते हैं। अपने आपके अलावा हम इंसानों को भी खोजते हैं, कौन अपना सा है? कौन है जिससे घण्‍टों बाते की जा सकती हैं? कौन है वह जिससे मन की बात की जा सकती है? अपनी आत्‍मा के अन्‍दर खोजने की चिन्‍ता ही तो आध्‍यात्‍म है। जीवन कितने पड़ाव से होकर गुजरता है! बचपन और बचपन का घर, यौवन और वहाँ का परिवेश, बुढ़ापा और उसका अवसान। हम हर बार बदल जाते हैं। कभी अकस्‍मात ही बचपन हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है। कंधे पर थपकी देकर पूछता है कि पहचाना नहीं? हम गौर से देखने लगते हैं, अरे यह तो वही है जिसके साथ हर सुख-दुख की बात सांझा किया करते थे। हमने भला इसे कब और क्‍यों बिसरा दिया? इतना प्‍यारा सा आत्‍मीय कैसे दूर हो गया? सोच में पड़ जाती हूँ कि अब क्‍या बात करूँ? बाते तो बदल गयी हैं, हमारा परिवेश बदल गया है। अपनी आत्‍मा के अन्‍दर झांक-झांककर हमने अपने नए मार्ग खोज लिये हैं। यह तो मेरे पुराने जीवन से ही वाकिफ है, उसे कैसे बताऊँ की मेरा नया पथ तो कुछ और ही है, उसकी बाते भी अलग है। मित्रता के सामने असहाय सी हो जाती हूँ।

फिर खोजने में जुट जाता है मन कि यह दूरी क्‍यों हुई? हम अपने अतीत से कैसे कट गए? कभी माँ याद आती है तो कभी पिताजी। जब रिश्‍तों की परिभाषा अपने संदर्भ में ढूंढने निकलती हूँ तो सोचने लगती हूँ कि क्‍या हमने उनके साथ न्‍याय किया था? मित्रता के बीच भी एक लम्‍बा अन्‍तराल और माता-पिता जैसे रिश्‍तों के बीच भी एक लम्‍बा अन्‍तराल दिखायी देता है। एक निश्चित सा काल, कहीं खो गया प्रतीत होता है। इस उलझन को जब एक स्‍त्री की नजर से देखती हूँ तो कहीं धागे सुलझने लगते हैं। हर स्‍त्री के पास दो जीवन जो होते हैं, एक बचपन का जो मित्रता से भरा है, माता-पिता की छांव में बीता है और दूसरा यौवन का। जहाँ परिवार-निर्माण का दायित्‍व है। एक स्‍त्री जब अपने परिवार का नीड़ बुन रही होती है तब पुराने नीड़ को बिसरा भी रही होती है। बस यही काल-अवधि कभी हमें पश्‍चाताप कराती है तो कभी बहुत कुछ खो देने का अनुभव दे जाती है। लेकिन इन दोनों कालों के बाद जब बुढ़ापा आने  लगता है और अपना नीड़ बन चुका होता है तब बचपन भी आकर मिल जाता है और यौवन की यादे कहीं पीछे छूट जाती हैं। बस तब सोच ही रह जाती है कि काश अपने बचपन के मित्रों के साथ ऐसी दूरियां नहीं बनी होती, काश अपने माता-पिता को हम ज्‍यादा समय दे पाते। लेकिन यदि दे पाते तो अपने नीड़ की नींव इतनी मजबूत होती क्‍या? किसी एक के साथ न्‍याय करते हुए दूसरे की दूरी तो निश्चित ही है। यदि हम अपने अतीत में ही जीना चाहते हैं तो वर्तमान सुखद नहीं होगा।

कितने प्रश्‍नों में उलझ जाता है मन? पहले आत्‍मा की चाहतों को समझने में उलझा रहा मन और अब जब अपनी चाहतों को समझ लिया तो मन भटकने लगता है जिन रास्‍तों को हम पीछे छोड़ आए थे, उन्‍हें वापस पाने के लिए। मन और आत्‍मा का संघर्ष शायद कालजयी है, यह समाप्‍त होता ही नहीं। मन शायद वर्तमान से प्रभावित होता है लेकिन आत्‍मा तो न जाने कब से आपके व्‍यक्तित्‍व को मुकाम देने में जुटी है। हर युग में वह ही आपके लिए कर्म निधौरित करती है और मन उसे सहर्ष स्‍वीकार कर गतिमान होता है। कई बार लगता है मन और आत्‍मा दो नहीं है, यह एक ही है। लेकिन जब हर मोड़ पर मन को फिसलते देखते हैं और आत्‍मा स्थिर खड़ी दिखायी देती है तब लगता है कि नहीं ये तो अलग-अलग ही हैं। बहुत कठिन है इनका विश्‍लेषण। लेकिन ज्ञानी-ध्‍यानी लोग तो कभी कठिन शब्‍दों में तो कभी सरलता से विश्‍लेषण कर ही लेते हैं। हम तो बस अपने अनुभवों से ही जान पाते हैं इनके भेद को।

आप ढूंढिये स्‍वयं को तो पायेंगे कि हमारे सभी के जीवन में एक ऐसा काल था जो हमसे बिछुड़ गया था। लेकिन वह काल वापस लौटकर जरूर आता है, लेकिन बहुत ही अनजाना बनकर। कभी पहचान ही नहीं पाते और कभी पहचान लेते हैं तो स्‍वयं को जोड़ ही नहीं पाते। मित्रता में कभी आप कृष्‍ण बन जाते हैं और कभी सुदामा। दोनों के परिवेश भिन्‍न हो जाते हैं, और जो बाते बचपन में की होती हैं, उनका कोई सिरा वर्तमान में पकड़ नहीं आता। उसे पकड़ने के लिए समय चाहिए होता है लेकिन समय तो हमें आगे धकेलता रहता है। बस मन आत्‍मग्‍लानी से भरा होता है कि हमने इन रिश्‍तों को कैसे बिसरा दिया था? अरे ये तो हमारे अपने थे। लेकिन जीवन चलता रहता है, हमारा भी और दूसरों का भी। वे भी अपने नीड़ बनाने में व्‍यस्‍त रहते हैं और हम भी। इसलिए हमारे सामने कल आकर खड़ा भले ही हो जाये लेकिन बहुत कुछ स्‍लेट का लिखा मिटा देता है। कहीं धुंधलका छाता ही है, चाहे कितना ही कर लें अपने निर्माण के काल में विगत तो पीछे छूट ही जाता है। इसलिए ही तो कहा है कि आगे बढ़ोगे तो पीछे का छूटेगा ही। इस जीवन का अच्‍छा है, यहाँ संवाद के साधन असीमित हैं, बहुत कुछ समेटकर जीवन की इस छोटी सी चिप में सहेजा जा सकता है। हमने तो बहुत कुछ खो दिया लेकिन अब भी जो लोग खो रहे हैं, वे भी जब अपने बचपन को खोजेंगे तो हमसे ज्‍यादा निराश होंगे कि हम तो उन क्षणों को सहेज सकते थे लेकिन हाय! लेकिन यही जीवन है, और बुढ़ापे में यही सुख है कि जीवन के दो सिरे एकसाथ मिलने का प्रयास करते हैं। जो बिसरा दिया था, उसे याद करने का समय पास जो होता है। बस सारा जीवन, सारे रिश्‍ते सामने होते हैं, कुछ अपने से लगते हैं और कुछ पराये से लगने लगते हैं। लेकिन सारी ही कड़ियां जोड़ने में आनन्‍द आने लगता है। हम भी यही कर रहे हैं और शायद तुम भी यही करोंगे। जीवन के हर घुमाव में पीछे की सड़क दिखना बन्‍द हो ही जाती है, उसके लिए तो वापस लौटना ही होता है। बस यह मन इन्‍हीं छूटे पड़ावों को तलाशता रहता है, उनमें बसी चिर-गंध को अपने नथुनों पर ढूंढता रहता है और मौन हो चली उन सारी ही बातों को अपने अन्‍दर समेटकर प्रफुल्लित होता रहता है। शायद यही जीवन है।

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