अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

नेहरू – शेख अब्दुल्ला और कश्मीर?

Written By: AjitGupta - Jun• 30•19

किताबों के पन्ने पलटने का खेल बहुत खतरनाक है, वह भी इतिहास की किताबें। अब इतिहास तो तुम्हारे पुरखे ही लिख गये थे, तुम्हारे अपने लोग ही बता गये कि उनके काल में क्या घटा था! बस तुमने कभी पढ़ा नहीं और आज ये पढ़कर आ गये। जैसे-जैसे इतिहास के पन्ने पलटते गये, संसद में मौन पसरता गया। बेचारा मनीष तिवारी, कभी मणिशंकर, दिग्गी चाचा से भी बड़ा नाम हुआ करता था, आज मायूसी से घिरा था। एक कोन में अपने अधीर बाबू भी चुप लगाए बैठे थे। गाय-बछड़ा तो शायद जगंल की सैर पर गये थे। वैसे भी उन्हें भारत के इतिहास का पता नहीं, वे तो गाली देकर ही काम चलाया करते हैं तो भला ऐसी गम्भीर चर्चा के समय उनका काम भी नहीं था! कश्मीर के इतिहास पर प्रकाश डाल रहे थे अपने अमित जी, साथ में थे जितेन्द्र जी। कश्मीर की बात आएगी तो नेहरू सबसे पहले आएंगे ही, शेख अबदुल्ला का नाम भी लिया ही जाएगा। कैसे नेहरू ने हरिसिंह के हस्ताक्षर के बाद भी कश्मीर को विवाद का विषय बना दिया, यह बात तो बढ़-चढ़कर आएगी ही! जिस शेख अब्दुल्ला को नेहरू ने 16 वर्ष तक कैद रखा, उसे पलक झपकते ही उनकी बेटी इन्दिरा ने कैद से मुक्त कर दिया और मुख्यमंत्री भी बना दिया! आज संसद में शोर मचा रहे थे कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव क्यों नहीं करवाते? ये सोचते हैं कि लोकतंत्र के मायने कांग्रेस की जेब है, जब जेब से पर्चा निकाला और कभी फाड़ दिया और कभी अभय दे दिया! 
हमारे अमित भाई शाह ने बताया कि तुम्हारे नेहरू ने क्योंकर युद्धविराम कराया था? तो हमारे नेता का नाम मत लो, नाम मत लो, का शोर मच गया। अभी दो दिन पहले ही शोर मचा था कि हमारे नेता का नाम क्यों नहीं लिया, क्यों नहीं लिया! भाई लोगों तय तो कर लो कि नेहरू का नाम लेना है या नहीं! देश का विभाजन नेहरू कराए, उसमें लाखों लोग का कत्ल हो जाए लेकिन नेहरू महान कहलाएं, यह तो अचम्भे की बात है! 563 रियासतों का भारत में विलीनीकरण सरदार पटेल कराए और कश्मीर नेहरू अपनी मुठ्ठी में रख ले फिर विवाद का विषय बना दे, लेकिन उनके वारिस कहें कि जिक्र मत करो, यह तो घोर अचम्भे की बात है! नेहरू की वंशावली का देश में जिक्र ना हो, हम विवाह भी करते हैं तो सप्तपदी के समय पण्डित जी सात पीढ़ियों का नाम पूछते हैं लेकिन यहाँ देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाता है और दो पीढ़ी का नाम भी पता नहीं! कैसे विश्वास कर लें हम की तुमने और तुम्हारे नेहरू ने आजादी के समय ही कश्मीर का सौदा भी नहीं किया हो! इतिहास के पन्नों की खुदाई होनी चाहिये, गम्भीरता से होनी चाहिये कि आखिर नेहरू कौन था और उसने क्या-क्या कारनामें किये थे? सुभाष बोस पर उनका व्यवहार संदेह के घेरे में हैं, आजादी के नाम पर बंटवारे का खेल संदेह के घेरे में है और कश्मीर का खेल संदेह के घेरे में है। ऐसे छोटे-मोटे अनेक खेल संदेह के घेरे में है। कैसे सरदार पटेल और राजेन्द्र बाबू जैसे विशाल व्यक्तित्व हमारे पास थे फिर भी नेहरू को देश सौंप दिया गया, इसकी गम्भीरता से पड़ताल होनी चाहिये। इन पाँच सालों में देश के सामने दूध का दूध और पानी का पानी होना ही चाहिये। नेहरू के नाम पर संसद में शोर मचाने वालों को मुँहतोड़ जवाब देना चाहिये। आज देश गम्भीर साम्प्रदायिक तनाव से गुजर रहा है और यह तनाव धर्म के आधार पर विभाजन से उपजा है, आज प्रत्येक भारतीय संकट में घिरा है। यदि इन प्रश्नों के उत्तर शीघ्र देश के सामने नहीं आए तो देश को एक ओर कुरुक्षेत्र के लिये तैयार होना होगा क्योंकि इस बार बँटवारा नहीं होगा अपितु विलीनीकरण होगा। संसद में शोर मचा लिया, कामकाज ठप कर दिया, इससे अब काम नहीं चलेगा। नेहरू का इतिहास समग्रता से सामने लाना ही होगा। खंगालनी पड़ेंगी फाइलें जिसमें दुरभिसंधियां चुपचाप पड़ी हैं क्योंकि प्रश्न केवल भारत को बचाने का नहीं है एक ऐसी संस्कृति को बचाने का है जिसने दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाया था। भारत कहाँ नहीं था, सम्पूर्ण दुनिया में इसके निशान मौजूद हैं अभी दो दिन पहले ही इरान में श्रीराम की मूर्ती निकली है। जब से हमने भारतीय संस्कृति को मिटाने का प्रयास किया है तभी से आतंक और हिंस का बोलबाला रहा है। इसलिये सच्चाई तो देश के सामने लानी ही होगी। इतिहास के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं, बस इन्हें देश के सामने लाने की जरूरत है।

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