अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

बड़प्पन की चादर उतार दीजिए ना

Written By: AjitGupta - Jul• 30•18

लोग अंहकार की चादर ओढ़कर खुशियाँ ढूंढ रहे हैं, हमने भी कभी यही किया था लेकिन जैसे ही चादर को उठाकर फेंका, खुशियाँ झोली में आकर गिर पड़ीं। जैसे ही चादर भूले-भटके हमारे शरीर पर आ जाती है, खुशियाँ न जाने कहाँ चले जाती हैं! अहंकार भी किसका! बड़प्पन का। हम बड़े हैं तो हमें सम्मान मिलना ही चाहिये! मेरी दोहिती है 9 साल की, जब मैं उसके साथ होती हूँ और मैं कहती हूँ कि मिहू मेरे पास आकर बैठ, वह कहती है कि आप मेरे साथ खेलोगी? यदि मेरा उत्तर ना हो तो वह कहती है कि मैं चली खेलने। लेकिन जब मैं कहती हूँ कि हाँ खेलूंगी तो उसकी पसन्द का खेल खेलना होता है। वह कैरम निकाल लाती है, मुझसे पूछती है कि आपको आता है खेलना? मैं कहती हूँ कि हाँ तो खुश हो जाती है और जब मैं उसे जीतकर बताती हूँ तब उसकी आँखों में सम्मान आ जाता है। अब तो मम्मी-पापा को भी खेलने का निमंत्रण दे दिया जाता है और कहा जाता है कि मेरी टीम में नानी रहेंगी। एक दिन कहने लगी कि नानी चलो मेरे कमरे में चलो। मेरा हाथ पकड़कर ले गयी। मुझे कहा कि बैठो, आज मैं टीचर हूँ और आप स्टूडेंट हैं। अब क्लास शुरू हो चुकी थी। मेरे हाथ में कॉपी-पेंसिल थमा दी गयी थी। पहले मेथ्स की क्लास है, टीचर ने कहा। वह बोर्ड पर सवाल लिख रही थी और मुझे वैसा ही करने को कह रही थी। सारे ही प्लस-माइनस के सवाल कराने के बाद कॉपी चेक की गयी और वेरी गुड के साथ पीरियड समाप्त हुआ। लेकिन अभी दूसरा पीरियड बाकी था, जिसमें कठिनाई आने वाली थी। टीचर ने कहा कि अब साइन्स की क्लास है, कॉपी में लिखिये। लाइट और शेडो के बारे में बताया जाएगा। किन वस्तुओं में लाइट होती है और किन में नहीं, परछाई कैसे बनती है, सभी कुछ पढ़ा दिया गया। हमनें हमारे जमाने में विज्ञान को इतने विस्तार से नहीं पढ़ा था। लगने लगा कि 9 साल की दोहिती हमसे ज्यादा ज्ञानवान है। खैर जैसे-तैसे करके हमने अपना सम्मान बचाया और वेरी गुड तो नहीं, कई हिदायतों के बाद गुड तो पा ही लिया। इसकी पीढ़ी हमारी पीढ़ी से न जाने किस-किस में आगे निकल गयी है, हम बात-बात में उनका सहारा लेते हैं। कभी मोबाइल में अटक जाते हैं तो कभी कम्प्यूटर में, फिर कहते हैं कि हमारे बड़प्पन का सम्मान होना चाहिये।
मैं बरसों से लिख रही हूँ, हमारी पीढ़ी पढ़ लेती है लेकिन नयी पीढ़ी को कुछ लेना-देना नहीं। अब मुझे तय करना है कि मैं अपने लेखन को लेकर किसी कमरे में कैद हो जाऊँ या इस पीढ़ी के साथ बैठकर कैरम खेलने लगूँ। वे मेरे पास नहीं आएंगे, मुझे ही उनके पास जाना होगा। मेरा पोता है 11 साल का। पोता है तो आउट-डोर गेम में ज्यादा रुचि होगी ही! मैं जब उसके पास होती हूँ तो वह मेरे पास नहीं बैठता, या तो कम्प्यूटर के बारे में कुछ पूछ लो तो बैठेगा या फिर बाहर घूमने चलो। एक दिन छुट्टी के दिन अपने स्कूल ले गया, वह बास्केट-बॉल खेलता है, मुझे कहा कि आप बैठो मैं प्रेक्टिस करता हूँ। मुझे लगा कि इसके करीब आना है तो इसके साथ खेलना होगा। लेकिन बास्केट-बॉल की बॉल भी कभी पकड़ी नहीं थी, तो? लेकिन मैं मैदान में आ गयी, उसे बॉल लाकर देने लगी, अब उसे खेल में ज्यादा मजा आने लगा क्योंकि अब उसे टीचर बनने का अवसर मिलने वाला था। कुछ समय बाद वह मुझे बास्केट में बॉल डालना सिखाने लगा और मैंने सफलता हासिल की। जो काम बेहद कठिन लग रहा था उसमें मैं एक कदम रख चुकी थी। पोता टीचर बन चुका था और खुश था, वह खुश था तो मुझे भी खुशी मिल चुकी थी।
हमारी खुशियाँ ऐसी ही हैं, हमें झुककर उन्हें पकड़ना होगा। अब बड़प्पन के सहारे जिन्दगी में कुछ नहीं पाया जा सकता है। हम बड़े होने को ज्ञान का भण्डार मान बैठे हैं, नयी पीढ़ी को सम्मान करने का आदेश देते हैं और अगले ही पल अपना मोबाइल उनके पास ले जाकर पूछ लेते हैं कि यह फेसबुक क्या होती है? नयी पीढ़ी हमारे बड़प्पन की परवाह नहीं करती, वे बराबरी का व्यवहार चाहती है। आप उनके साथ कैरम खेलते हुए जीतने का माद्दा रखते हैं तो वे आपको पार्टनर बना लेंगे नहीं तो आपको खारिज कर देंगे। टॉफी-चाकलेट का लालच भी ज्यादा दिन तक उनको डिगा नहीं पाता है, बस उनके साथ उनके बराबर का ज्ञान रखो तो वे आपको साथी मानेंगे ना की बड़ा। एक आयु आने के बाद हम खुशियाँ तलाशते हैं, नयी पीढ़ी हमें धकेलकर आगे निकल जाना चाहती है। हम अकेले पड़ते जाते हैं और धीरे-धीरे अपने कमरे में सिमटने लगते हैं। ऐसे ही पल यदि हम अपने बड़प्पन की चादर को उठाकर फेंक दें और तीसरी पीढ़ी के साथ सामंजस्य बिठा लें तो जीवन आसान हो जाता है। लेकिन तीसरी पीढ़ी हमारे साथ नहीं हैं, तब क्या करें? कोई साथ है या नहीं लेकिन अहंकार की चादर का सहारा तो बिल्कुल ना लें। जो भी मिल जाए, उसमें ही खुशियाँ ढूंढ लें और भूलकर भी वह मौका हाथ से जाने ना दें। जितना ज्यादा छोटों के साथ झुकोंगे उतनी ही ज्यादा खुशियाँ तलाश लोंगे। वास्तविक दुनिया ना सही, यह वर्चुअल दुनिया ही सही, खुशियाँ तलाशने में देरी ना करें। नयी पीढ़ी की दुनिया उस बगिया की तरह है जहाँ नाना प्रकार के फूल खिले हैं, हमें वहाँ जाना ही है और खुशबू का आनन्द तो लेना ही है। यदि वे टीचर बनना चाहते हैं तो मैं शिष्य बनने में परहेज नहीं करती, बस मुझे चन्द पल की खुशियाँ चाहिये। साहित्यकार के पास यह चादर बहुत बड़ी है, इसका उतारना सरल नहीं हैं लेकिन कठिन काम करना ही तो खुशियाँ देता है।

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