अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

भागते रहो

Written By: AjitGupta - Aug• 22•19

कल एक पुराने मित्र घर आए, ताज्जुब भी हुआ कि इतने दिनों बाद! लेकिन मित्र कब बिना बात नाराज हो जाते हैं और कब रास्ता भटककर वापस आ जाते हैं, कौन बता सकता है! खैर मेरी पोस्ट का तात्पर्य और कुछ है तो उसी बिन्दू पर चलते हैं। कहने लगे कि फला व्यक्ति पर मुझे तरस आता है। मैंने पूछा कि क्या हुआ? वे कहने लगे कि अभी दो दिन पहले उन से बात हुई है, कह रहे थे कि इतना पैसा कमा लिया है कि इस पैसे को कहाँ रखें, समझ नहीं आता! सारे घर भर गये हैं, जगह नहीं है लेकिन पैसा तो आ ही रहा है। उनके लिये पैसा समस्या बन चुका है लेकिन स्रोत बन्द नहीं किये जाते। 
जितना जनता से खेंच सको खेंच लो, जितना सरकार से बचा सको बचा लो, बस यही बात हर पैसे वाले के दिमाग में रहती है। पैसा काला होता रहता है, काले पैसे को छिपाने के लिये राजनीति का सहारा लिया जाता है। फिर उस पैसे को शादी समारोह में फूंकने की कोशिश की जाती है। लेकिन जनता से खेंचना और सरकार से बचाना बन्द नहीं होता। यह हमारे स्वभाव में आ जाता है। किसी दिन पाप की गठरी भर जाती है और फिर ऐसे लोग विजय माल्या बन जाते हैं। सुबह मित्र इस गम्भीर समस्या को बता रहे थे और शाम को यह समस्या चिदम्बरम के भागने से और बड़ी होकर सामने आ गयी। 
शरीर में हम जब बहुत ज्यादा शर्करा एकत्र कर लेते हैं तब हम शक्कर से ही भागने लगते हैं, ऐसे ही पैसे का खेल है। अत्यधिक पैसा एकत्र करो और फिर पैसे से ही भागो! अपनी जान बचाने को भागो! पैसे से क्या खरीदना चाहते हो? सम्मान? प्रतिष्ठा? सत्ता? लेकिन क्या मिल पाती है? कुछ दिन मिल जाती है लेकिन फिर सारा सम्मान, सारी प्रतिष्ठा और सारी सत्ता धूल में मिल जाती है। पैसा किसी काम नहीं आता। चिदम्बरम भाग रहा है, कल प्रफुल्ल पटेल भी भागेगा। हो सकता है गाँधी परिवार भी भागे! भारत में भागने की पंचवर्षीय योजना लागू हो चुकी है। यह पाँच वर्ष भ्रष्टाचारियों भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम रहेंगे। 
मुझे इतिहास को टटोलने का थोड़ा सा शौक है, एक पुस्तक हाथ लगी, लेखक का नाम तो याद नहीं है लेकिन था बड़ा नाम। वे लिखते हैं कि जब गाँधी राजेन्द्र बाबू से मिले तब राजेन्द्र बाबू वकालात करते थे और उस समय उनकी एक पेशी की फीस दस हजार रूपये थी। लेकिन बाद में राजेन्द्र बाबू ने सबकुछ त्याग दिया। सरदार पटेल की भी यही स्थिति थी, उनने भी सबकुछ त्याग दिया। उस काल में न जाने कितने लोगों ने सम्पूर्ण समर्पण किया था। वह काल ईमानदारी को अपनाने का था लेकिन आजादी के बाद बेईमानी को अपनाने का काल प्रारम्भ हुआ। बेईमानी बिना जीवन की कल्पना ही नहीं हो सकती, यह सिद्धान्त गढ़ लिया गया। हम सब बेईमानी से धन एकत्र करने में जुट गये। राजनीति तो मानो खदान थी, जितना चाहो धन निकाल लो और अपने खाते में डाल लो। 
लेकिन मोदी ने 65 साल के देश के जीवन का बदलाव किया, बेईमानी की जगह ईमानदारी को स्थापित करने का प्रारम्भ किया। लोग कसमसाने लगे, गाली देने लगे लेकिन धीरे-धीरे यह बात देश में जड़े जमाने लगी कि ईमानदारी से भी आसानी से जी सकते हैं। आज बेईमानी सरदर्द बन गयी है, बेईमानी से कमाया पैसा संकट बन गया है। लोग भाग रहे हैं, चिदम्बरम जैसा व्यक्ति भाग रहा है! पैसे को कहाँ छिपाएं, स्थान खोज रहे हैं! 
अब ईमानदारी की रोटी की इज्जत होने की उम्मीद जगी है। बेईमानी की रोटी जहर बनती जा रही है। जिस दिन लोग पैसे और सुख में अन्तर कर लेंगे उस दिन शायद देश सुखी हो जाएगा और जो हम सुख के इण्डेक्स में बहुत नीचे चल रहे हैं, उसमें भी ऊपर आ जाएंगे। लेकिन अभी तो भागमभाग देखने के दिन शुरू हो चुके हैं। देखते हैं कि कितने भागते हैं और कितने बचते हैं! आज का बड़ा सवाल उपस्थित हो गया है कि क्या इस देश में ईमानदारी स्थापित होगी? क्या इस देश से बेईमानी अपनी जड़े उखाड़ लेगी? पहले चौकीदार कहता था – जागते रहो, अब चोर कह रहे हैं – भागते रहो। चिदम्बरम भाग रहा है, पहले दुनिया को अपनी झोली में भरने को भाग रहा था और अब खुद को बचाने को भाग रहा है, बस भाग रहा है। 

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