अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

मन की किवड़िया खोल

Written By: AjitGupta - Mar• 15•15

आपका मन आपसे बाते करने को कितना मचलता है? कभी कर भी लेता है तो क्‍या संतुष्‍ट हो पाता है? नहीं ना। स्‍वयं से कितनी ही बातों कर लो लेकिन मन तो करता है कि ऐसा कोई अपना हो, आत्‍मीय हो, जिससे हम अपने मन की बातें कर सकें। बचपन में सबकुछ पारदर्शी था, किसी से कोई पर्दा नहीं था। आज जैसे मकान नहीं थे जो मन की तरह अपने दायरे में ही कैद हों। सबकुछ खुला था, उसमें सारे ही परिवार शामिल थे और पास-पड़ोस भी आसानी से झांक लेता था। रोने के लिए कंधा नहीं तलाशना पड़ता था, अनेक कंधे मिल जाया करते थे। लेकिन आज का जीवन बचपन से कहीं इतर है। घर अब खुले नहीं रह गए हैं, हमने अपने ऊपर एक आवरण बुन लिया है। यह ऐसा चमकीला सा आवरण है जिसकी चमक से लोग चुंधिया तो जाते हैं लेकिन शक की गुंजाइश जगह बना लेती है। सभी बस यह सोचते हैं कि चमक के पीछे क्‍या है? कुछ दिखायी क्‍यों नहीं दे रहा। जब स्‍पष्‍ट दिखायी ना पड़े तो उत्‍सुकता बन जाती है और जब सबकुछ चौड़-धाड़े हो तो सहजता बन जाती है। दूसरे हमें जानने में उत्‍सुक बन जाते हैं लेकिन सहज नहीं। उनकी उत्‍सुकता केवल सनसनी फैलाने मात्र की ही रहती है, आपसे आत्‍मीयता उत्‍पन्‍न करने की नहीं। बस दर बदर कहानियां बनती है और पीड़ा का रिसाव नहीं। मन तो अनकहा ही रह जाता है।

मन को अभिव्‍यक्‍त करना भी एक कला है, यह कला भी संस्‍कारों से ही आती है। जितने हम ज्ञानवान बनते जाते हैं, मन प्रभावित होने लगता है और उस ज्ञान के साथ स्‍वयं को जोड़ने लगता है। अपनी-अपनी धारणाएं बनती बिगड़ती हैं और उन धारणाओं को किसी से कहने का मन करता है। जो दिनभर में भोगा है उसे बांटने का मन करता है। लेकिन जिनके पास अभिव्‍यक्ति का ज्ञान ही नहीं है उनके पास कला भी कहाँ से होगी! इस दुनिया में करोड़ों ऐसे लोग हैं जिनके पास शायद मन ही नहीं है। वे केवल शरीर लेकर ही पैदा हुए हैं। बस शरीर की आवश्‍यकताओं की पूर्तिभर से ही खुश हो लेते हैं। शायद वे ज्‍यादा सुखी हैं। आप अपने आसपास झांकिए, कितने लोग आपको मिल जाएंगे जो एक यांत्रिक जीवन जीते हैं। बरसों बरस बस एक ही काम करते हैं और खुश हो लेते हैं। यदि उनके जीवन में ढूंढेंगे तो उनकी जुबान से शायद ही कोई लम्‍बी बात हुई होगी! उनका जीवन शायद एक सीडी में ही कैद हो जाए। एक फिल्‍म देखी थी – उसकी रोटी। उसमें कुछ ही वाक्‍य थे – रोटी बन गयी, रोटी खाली क्‍या तूने? बस ऐसे ही। लगता है कुछ लोगों का जीवन भी इन चन्‍द वाक्‍यों के बीच ही पूरा हो जाता है। लेकिन शायद उन जैसा हमारा भाग्‍य नहीं है। हमारा मन तो अभिव्‍यक्‍त होने को मचलता रहता है।

मन जब अभिव्‍यक्‍त नहीं हो पाता तब लगता है कि दुख है जीवन में और जब बहाव हो जाता है तब लगता है कि सुख है जीवन में। हम जैसे व्‍यक्ति शिकारी की तरह बन जाते हैं, खोज जारी रखते हैं। शिकार के लिए हाका भी करते हैं जिससे कोई तो आ जाए हमारी जिन्‍दगी में जिसे हम अपने मन की बात बता सके। लाखों करोड़ों ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे जो सम्‍पन्‍न हैं, किसी भी प्रकार का अभाव नहीं है लेकिन सुखी नहीं है। सुखी क्‍यों नहीं हैं, क्‍योंकि अपने मन को किसी और मन से जुड़ाव नहीं कर पाते। वर्तमान में पति और पत्‍नी अपने मन का जुड़ाव एकदूजे में ढूंढते हैं और जब नहीं जुड़ पाते तो अलग होने के लिए तड़पने लगते हैं। पहले पति और पत्‍नी का यह रिश्‍ता नहीं था तो अलगाव की बात भी इतनी नहीं थी। पहले हमारे पास रिश्‍ते बहुतायत में हुआ करते थे, कभी भाई-भाई, कभी बहन-बहन तो कभी माँ-बेटी तो कभी पिता-पुत्र अपने मन की बात साझा कर लेते थे। लेकिन दुनिया का दस्‍तूर ही बदल गया और हमने सारे रिश्‍तों को बिसराकर केवल पति और पत्‍नी तक सीमित कर लिया। अब हमारा राजदार बस यही रिश्‍ता है। यदि इस रिश्‍तें में हमारी अभिव्‍यक्ति को सहारा नहीं दे तो सब बेकार है।

हम या तो आईने के सामने सिमट गए हैं, जिसमें अपनी अभिव्‍यक्ति का मार्ग ढूंढते हैं या फिर अभिव्‍यक्ति बिना ही जीवन जी रहे हैं। मन के सुख और दुख परिवार से ही अधिकतर मिलते हैं और इन्‍हीं को बांटने की तीव्र मंशा होती है लेकिन परिवार के रिश्‍ते इतने मधुर नहीं रह गए हैं कि हम आसानी से अपने सुख और दुख किसी से बांट लें। मित्रों को ढूंढते हैं, मित्र भी कहां मिल पाते हैं! मित्रता के सारे सम्‍बंध तो व्‍यावसायिक मात्र हैं। कहाँ मिल पाता है आपको आईना जैसा मित्र? जिससे अपने मन की गहन बातों की परतों को खोलकर समाधान ढूंढ लें? फिर यह की-बोर्ड ही हाथ लगता है जिसकी खट-खट जब पन्‍नों पर बिखरती है तब मन भी अभिव्‍यक्‍त हो जाता है और लगता है बस यही सुख है। सारी तृप्ति शब्‍दों के माध्‍यम से अपने मन को व्‍यक्‍त करने में ही है। कभी मन पंख लगाकर उड़ना चाहता है तो कभी धरती पर ही अंगड़ाई लेना चाहता है। इस उड़ान और इस अंगड़ाई का कोई हमराज मिल जाए तो बात बने। मन ढूंढता है उन पलों को जब बस मन का बहाव ही हो और निर्झर झरने की तरह अविकल हो अविराम हो। काश कभी ऐसा हो! काश कोई कह दे – मन की किवड़िया खोल।

You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

10 Comments

  1. हाँ , बहुत कुछ कहकर भी एक संवादहीनता की स्थिति दिखती है अब । सार्थक , विचारणीय लेख

  2. AjitGupta says:

    आभार मोनिका जी।

  3. एक दूसरे को सुनने, समझने और सह अनुभव करने वाले लोगों की कमी है। ऐसे मे अनेक बड़े बूढ़े बहुत खुश होते हैं जब उनके मन के भाव सुनने वाला कोई उनको पास आता है। आज सबके पास कहने को बहुत है, सुनने वाला नहीं हैं। मन की बात समझ सकने वाला नहीं है। ऐसे मे मन की बात कहने, सुनने, मानने वाला कोई भी हो अपना बन ही जाएगा।

    • AjitGupta says:

      जयप्रकाशजी स्‍वागत है आपका मेरे ब्‍लाग पर।

  4. एक हमराज सभी चाहते हैं मगर व्यावहारिकता के तकाजे में हर इंसान अकेला है!

  5. Dr Kiranmalajain says:

    सचमुच मन इतना मचलता है बातें करने को ,मन की बात ,इसकी बात ,उसकी बात ,अच्छी बात ,बुरी बात ,सब कुछ जो अंदर चल रहा है वह किसी को खुल कर बेझिझक बिना किसी टेंशन के करते जाये करते जाये किसी को पता चलेगा इसकी कौइ टेंशन नहीं ,पर—————-नहीं अच्छा नहीं लगेगा ,अच्छी बात नहीं है ,किसी की बात करना असभ्यता है ,हम सभ्यता के नाम पर आपस मे एकदूसरे से दूर होते चले जा रहे है ,सिर्फ़ चिकनी चुपड़ी बातें ,फोरमल बातें फोरमल व्यवहार ।
    फ़ेसबुक पर बात पसंद हो या नहीं ,फ़ोटो मे कैसे भी दिख रहे हो लाइक करना है ,तारीफ़ भी करनी है ।पति पत्नी के रिश्ते मे भी फोरमलटी आ गई है ,वहाँ कौनसा जो मन मैं आरहा है वो बोल पाते है ,ऐडिट करके बोलना पड़ता है ,लेखक लोग सही है कहानी क़िस्सों के माध्यम से ,मन की बात अपने द्वारा घड़े चरित्रों से कहला देते है ,पर कितना ?
    मन करता है कि सब कुछ छोड़ छाड कर कही दूर चले जाये ,पर कहाँ कब तक किसके साथ ?
    वो लड़ना झगड़ना ,फिर ऐक हो जाना ,वो कौनसी ज़िंदगी थी ,अब कहाँ है ।सब मिस कर रहै है ,कैसे मिलेगी ????????????

    • AjitGupta says:

      बतियाना भी एक कला है और यह हम दोनों को खूब आता है। इसी कारण तो परिवार में जिंदादिली बनी रहती है।

  6. मित्रता के संबंध में ही इतनी समाई होती है कि मुक्त हो कर मन की बात कही और सुनी जा सके.अन्य लगभग सारे रिश्तों में अपनी मर्यादा ,पहुँच ,उचित-अनुचित आदि की सीमाएं खड़ी दिखती हैं .

    • AjitGupta says:

      प्रतिभाजी, बहुत दिनों बाद आपसे मुलाकात हो रही है। वापस से कुछ समय निकालने का प्रयास कर रही हूं। आभार आपका।

  7. dj says:

    यथार्थता समेटे हुए एक सार्थक लेख।
    और
    “लेकिन शायद उन जैसा हमारा भाग्‍य नहीं है। हमारा मन तो अभिव्‍यक्‍त होने को मचलता रहता है।”:-)
    एकदम सही
    इसी पर मेरी लिखी लाइन्स
    “जो आजकल अनुभव कर रही हूँ शायद इसी को सुकून कहते हैं,
    न जाने कुछ लोग मनोभाव व्यक्त किये बिना कैसे रहते हैं।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *