अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

लेखक वहीं क्यों खड़ा है!

Written By: AjitGupta - Jul• 24•18

रोजमर्रा की जिन्दगी को जीना ही जीवन है और रोजमर्रा की जिन्दगी को लिखना ही लेखन है। रोज नया सूरज उगता है, रोज नया जीवन खिलता है, रोज नयी कहानी बनती है और रोज नयी विपदा आती है। पहले की कहानी में छोटा सा राज्य भी खुद को राष्ट्र कहता था लेकिन आज विशाल साम्राज्य भी राष्ट्र की श्रेणी में नहीं आते। दुनिया कभी विविधताओं से भरी विशाल समुद्र दिखायी देती है तो कभी एक सी सोच को विकसित करता छोटा सा गाँव। पहले के जमाने में हम थे और साथ था हमारा भगवान लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब हम है और साथ में है हमारा नया संसार। इसलिये पहले लिखते थे खुद के बारे में और भगवान के बारे में लेकिन आज लिख रहे हैं नये संसार के बारे में। यह नया संसार अनोखा है, रोज नये पर्तों के अन्दर घुसने और समाने का अवसर मिलता है। पुरानी वर्जनाएं दम तोड़ रही है, क्योंकि अनावश्यक डर निकलता जा रहा है। दुनिया का विशाल वितान सामने ही छा गया है, सारे रंग ही एकसाथ हमारी नजरों में समा गये हैं, दोनों हाथ लूटने को तैयार हैं कि किस वितान को छूं लूं और किस रंग को अपनी मुठ्ठी में भर लूँ। पहले के जीवन में रोज मर्यादाएं गढ़ते थे लेकिन आज रोज मर्यादाओं को तोड़ते हैं। इसलिये लेखन भी बदल गया है, लेखक भी बदल गया है और जो नहीं बदला है वह बासी रोटी की तरह हो गया है जिसे कोई नहीं खाना चाहता।
परिवार में परम्परागत रिश्ते नहीं रहे, एक दूसरे का हाथ थामे कोई दिखायी नहीं देता बस अपने आप को दुनिया में फिट करने की होड़ मची है, कैसे भी हो दुनिया के सारे रंग अपनी झोली में भरने की दौड़ लगी है, इसके लिये कुछ भी मर्यादाहीन नहीं है। यदि आप प्यार में हैं तो आपके लिये सारी कायनात साथी बन रही है और दुनिया का यही सबसे बड़ा सच है। यदि आप किसी मुसीबत में हैं तो दुनिया का हर जुर्म जायज है। कैसे भी अकूत सम्पदा मेरी झोली में आनी चाहिये फिर मैं इसका उपयोग कर सकूँ या नहीं, लेकिन मेरा बस यही लक्ष्य है। परिवार में सब अकेले हैं, कोई किसी का साथी नहीं है, पूरी तरह जंगलराज की तरह है हमारा जीवन, जब शेर बूढ़ा हो जाता है तब एक गुफा में चले जाता है और वहीं अपने प्राण त्याग देता है। ऐसा ही मनुष्यों के साथ होता जा रहा है इसलिये लेखन के उद्देश्य बदल गये हैं।
लेखन में दो वर्ग बन गये हैं, एक दुनिया की रंगीनियां दिखा रहे हैं तो दूसरे अकेलापन। अब भगवान बहुत कम याद आते हैं, जीवन में जब साथ मिलता है तब भगवान भी याद आते हैं लेकिन जब अकेले हो जाते हैं तब जद्दोजेहद में कहाँ भगवान याद आते हैं! स्वर्ग और नरक जब यहीं दिखने लगें तब कहाँ भगवान का स्मरण शेष रहता है! कुछ लोग पीड़ित हो जाते हैं क्योंकि उन्हें दुनिया के चलन की खबर ही नहीं लगी क्योंकि वे पुरातन में ही खोये रहे, लेकिन कुछ लोगों के कदम सद जाते हैं क्योंकि वे नवीन की खबर रखते थे। जमाने की हवा किस ओर बह रही है, यह तो पतंग उड़ाने वाले को भी मालूम रखना होता है, हम तो जीवन को उड़ा रहे हैं! पहले आदमी को सभ्य बनाया जाता था लेकिन आज आदमी को असभ्य बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है क्योंकि उसे अकेले ही संघर्ष करना है। नजाकत दम तोड़ती दिखायी देती है और कठोरता बाजूओं सहित दिल में भी समा गयी है। दुनिया एकदम से बदल गयी है तो लेखक वहीं क्यों खड़ा है! लोगों के सर पर अचानक ही बादल फट गया है ऐसे में लेखक ने उसे सावचेत क्यों नहीं किया? क्यों लेखक ने नयी राह की ओर इशारा नहीं किया? आजकी सबसे बड़ा समस्या यही है कि हम पुरातन में खोये रहे और दुनिया आँधी के अंधड़ के साथ नये मुकाम पर आकर खड़ी हो गयी, जहाँ सबकुछ नया था। नये किशोर के सपने अलग हैं, वह सृजन से अधिक भोग करना चाहता है, उसकी दुनिया बहुत बड़ी है लेकिन उस बड़ी दुनिया में किसी भी रिश्ते को कोई जगह नहीं है। वह सैलानी बनना चाहता है, रुकना कहीं नहीं चाहता। रिश्ते रोकते हैं इसलिये अकेले ही रहना चाहता है। अकेली होती जा रही दुनिया का जानकार लेखक भी नहीं रहा, उसने भी पुरातन में ही धूनी रमा ली। इसलिये मैं कहती हूँ कि बाहर निकलो और दुनिया को बताओ कि अकेले रहकर कैसे सुखी रहा जा सकता है? इस दुनिया का चोला बदल रहा है, या तो नया धारण कर लो या फिर फटेहाल हो जाओ। लेखक ने हर युग की आहट को पहचाना है और लोगों को सावचेत किया है, वापस हमें यही करना होगा। सपनों की जगह सच्चाई को दिखाना होगा। क्रूर सच्चाई को। बताना होगा कि अब दिन का उजाला नहीं रात की रंगीनियाँ अधिक लुभाती हैं, हम एक-दूसरे के पूरक नहीं अपितु केवल जरूरत भर हैं। लेखनी उठाओ और करो सामना नयी पीढ़ी का और सावचेत करो पुरानी पीढ़ी को, दोनों के बीच पुल बनने का मिजाज तैयार करो। तभी तुम लेखक हो नहीं तो भजन गाते रहो।

You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *