अजित गुप्ता का कोना

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शोक संदेश का वाचन- कितना सार्थक और कितना निरर्थक

Written By: AjitGupta - Mar• 23•13

प्रत्‍येक शहर का अपना दस्‍तूर होता है, त्‍योहार से लेकर मृत्‍यु तक में ऊसका अपना रंग भरा होता है। सभी शहरों के अपने कर्मकाण्‍ड हैं। मृत्‍यु एक ऐसा पक्ष है जिसमें व्‍यक्ति की संवेदनाएं जुड़ी रहती हैं इसलिए इस समय होने वाले कर्मकाण्‍डों पर अक्‍सर कोई टीका-टिप्‍पणी नहीं करता है। भारत इतना विशाल देश हैं, यहाँ परम्‍पराएं और कर्मकाण्‍ड शायद हर पाँच कोस पर ही बदल जाते हैं वहाँ किसी एक परम्‍परा की बात करना बेमानी सा ही हो जाता है। लेकिन कुछ परम्‍पराएं ऐसी होती हैं जो देखा-देखी बनती हैं और हो सकता है आज मेरे शहर में हो और कल वह आपके शहर की भी बन जाए। जब भी कोई नवीन परम्‍परा प्रारम्‍भ होती है उसके पीछे अनेक तर्क होते हैं लेकिन कभी-कभी कतिपय परम्‍पराएं ऐसी प्रारम्‍भ हो जाती हैं जिसके पीछे तर्क कम और दम्‍भ ज्‍यादा दिखायी देता है। धीरे-धीरे यही दम्‍भ परम्‍परा बन जाता है। हमारे यहाँ अक्‍सर परम्‍पराएं राजा के अनुसार बनती रही हैं। राज परिवार में ऐसा होता है इसलिए उसके मंत्रीगण भी अपनी विशेषता बताने के लिए तदनुरूप ही परम्‍पराओं का निर्वहन करने लगते हैं। धीरे-धीरे यह आम जनता तक जा पहुँचती है।

लेकिन मैं उन प्रचलित परम्‍पराओं की चर्चा नहीं कर रही हूँ, जो सदियों से चली आ रही हैं। एक नवीन परम्‍परा जो अभी हाल ही के वर्षों में विकसित हुई है, उसी पर चर्चा करते हैं। हम सब जानते हैं कि मनुष्‍य सामाजिक प्राणी है, किसकी शव-यात्रा में कितने लोग थे, यह उसकी प्रतिष्‍ठा से आंका जाता है। फिर समाज के कौन-कौन प्रमुख लोग थे, यह भी समय-समय पर सुनाया जाता है। कोई किसी परिस्थितिवश नहीं आ पाए तो उसपर विशेष गौर किया जाता है। इन सबके बीच एक परम्‍परा है – शोक संदेश की। जो भी व्‍यक्ति कहीं कर्मचारी हैं या सामाजिक संगठनों एवं राजनैतिक संगठनों से जुड़ा है, उसके परिवार में किसी की भी मृत्‍यु होने पर वह संस्‍था शोकसभा आयोजित करती है और एक शोक-संदेश मृतक के परिवार में प्रेषित करती है। अक्‍सर लोग इन शोक-संदेशों को एकत्र करके एक फाइल में लगा लेते थे और परिवारजनों को पढ़ने के लिए उपलब्‍ध करा देते थे। इसमें परिवार में ऐसे व्‍यक्तियों के पत्र भी होते थे जो समय पर शोक संवेदना प्रकट करने उपस्थित नहीं हो पाते थे। परिवार में गम के माहौल में भी एक संतुष्टि का भाव रहता था कि हमारे दुख के अवसर पर सभी ने हमें स्‍मरण किया। जब लोग 12 दिन की बैठक के दौरान शोक-संवेदना प्रकट करने आते थे, उनके समक्ष भी ऐसे शोक-संदेशों को बताया जाता था।

लेकिन कुछ वर्षों से इस शोक-संदेश की परम्‍परा में बदलाव आया है। मैं अपने शहर की बात ही कर रही हूँ क्‍योंकि जैसा की मैंने पूर्व में भी कहा है कि पाँच कोस के बाद परम्‍पराओं का स्‍वरूप बदल जाता है। मृत्‍यु उपरान्‍त हमारे शहर में उठावणे की परम्‍परा है। जैसे कहीं तीए की या चौथे के बैठक होती है, ऐसे हमारे यहाँ उठावणा होता है। यह उठावणा किसी-किसी जाति में तो दाह-संस्‍कार वाले दिन ही हो जाता है और अन्‍यों में दूसरे दिन होता है। जैसा की मैंने पूर्व में कहा है कि संस्‍था, सामाजिक और राजनैतिक संगठन अपने कर्मचारी या कार्यकर्ता के लिए शोकसभा आयोजित करके शोक-संदेश प्रेषित करती है, इसकारण ये शोक-संदेश 12 दिन के शोक में कभी भी परिवार को प्रेषित कर दिए जाते हैं। लेकिन वर्तमान में उठावणे के दिन ही इन शोक-संदेशों का वाचन होने लगा है, इसकारण प्रत्‍येक संगठन या व्‍यक्ति आनन-फानन में शोक-संदेश लिखकर उठावणे के दिन पहुँचाने की व्‍यवस्‍था करता है। समाज के अन्‍य लोग जो शोक व्‍यक्‍त करने आए हैं उनके समक्ष इन शोक-संदेशों का वाचन होता है। जैसी जिसकी प्रतिष्‍ठा, उसके अनुरूप ही शोक-संदेश प्राप्‍त होते हैं। अब तो यह होने लगा है कि सभी राजनैतिक दल, राजनैतिक पूर्व और वर्तमान पदाधिकारी, सामाजिक संगठन, मोहल्‍ला समिति आदि अधिक से अधिक शोक-संदेश भेजने लगी हैं। वाचन करने वाले के हाथ में कभी भी यह संख्‍या 100 तक हो जाती है। ज्‍यादा संख्‍या देखकर एक-दो संदेश का वाचन किया जाता है शेष संगठनों एवं व्‍यक्तियों के नाम ले लिए जाते हैं। लेकिन जब संख्‍या कम होती है तब सभी को पढ़ा जाता है। इस अवसर पर जो लोग शोक-संवेदना प्रकट करने आए हैं, उनकी इनमें कोई रुचि नहीं होती है और उन्‍हें लगता है कि अनावश्‍यक उनका आधा घण्‍टा इस व्‍यर्थ कार्य में बर्बाद हो गया। क्‍योंकि उठावणे का समय अधिकतर सांयकालीन होता है और इस समय व्‍यक्ति अपने व्‍यवसाय को छोड़कर आता है। मुझे लगता है कि यह शोक-संदेश व्‍यक्तिगत मामला है और इन्‍हें परिवारजनों के मध्‍य ही पढ़ना चाहिए। एक फाइल बनाकर घर पर शोक प्रकट करने आए व्‍यक्तियों को भी पढ़ाया जा सकता है। अनावश्‍यक रूप से अपनी प्रतिष्‍ठा बताना अजीब सा लगता है। यह कृत्रितमा है, इसमें सारे ही संगठन प्रतिदिन सभी के घर ऐसे शोक-संदेश प्रेषित करते हैं। यह परम्‍परा निश्चित रूप से किसी समृद्ध व्‍यक्ति से प्रारम्‍भ हुई होगी, अब कोई समृद्ध व्‍यक्ति ही इसे बन्‍द करने की पहल करेगा तो शायद बन्‍द भी हो जाएगी। लेकिन पहल हम सभी को करनी होगी। हो सकता है मेरे इस विचार के विपरीत आपके विचार हों, मैं उन सभी विचारों का स्‍वागत करती हूँ, जिनसे समाज निर्माण में योगदान मिलता हो। मुझे यह परम्‍परा खटकती है इसलिए मैंने यहाँ उल्‍लेख किया, शेष तो आप सभी पर निर्भर है कि आप क्‍या राय रखते हैं।

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26 Comments

  1. शोक संदेश परिवार के लिए ही होना चाहिए …. दिखावे के लिए नहीं …. जो लोग शोक सभा में उपस्थित हुये हों उस समय उन्हीं के प्रति कृतज्ञता प्रेषित करनी चाहिए ।

  2. AjitGupta says:

    संगीता जी आप सही कह रही है कि जो लोग आए हैं उनके प्रति ही कृतज्ञता होनी चाहिए।

  3. कितना कुछ बस दिखावे के लिए ….. 🙁

  4. शोक-संदेश केवल एक औपचारिकता रह गया है ,जिसका निर्वाह कर दिया जाता है.वास्तविकता से उसका कोई लेना-देना नहीं.सच्ची संवेदना तो एक हृदय ही दूसरे तक पहुँचा सकता है सकता है -.व्यक्तिगत संस्पर्श से !

  5. शोक-संदेश पढ़ना और वह भी सम्वेदना में सहभागी बनने आए लोगों के सामने, दर्प के मिथ्याड़म्बर के अलावा कुछ नहीं होता।

  6. CA ARUN DAGA says:

    Bilkul thik kaha aapne.

  7. Kailas chand Goyal says:

    Doctor Ajit ji gupta, aapka lekh padha. Mein swayam bhi yahi sochta haun ki jab bhi uthawana hota hai, shok sandeshon ka padha jana kadapi uchit nahi samjhta. Yah bhi jyada kharab iss liye lagta hai ki shok sndoshon ke bhejene wale vyati bhi uss shok sabha mein hazir hote hain, phir bhi unke nam bole jate hain.yah bahut buri parampara ban chuki hai. Isske atiritka mein jeh aapka dhyan akarshit karna chahta hun ki uthawana bhi ek kanapurti hoti hai. Adhikansh upsthit hone wale manahnbhan bilkul sahi samay par kewal apni upasthiti daraj karane aate hain aur toe aur kai log uthawana ho hukta hai tab aate hain aur anta mein kewal hath jod kar vida ho jate hain. Yeh konsa shok jahir karne ka tarika hai.? Bilkul Galat……………

  8. sanjay KUMAR says:

    ANAVASHYAK SANDESH POORI TARAH BAND HONE CHAHIYE

  9. वन्दना गुप्ता says:

    kritrimta to hai hi ye

  10. Arun Sharman says:

    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-03-2013) के चर्चा मंच 1193 पर भी होगी. सूचनार्थ

  11. हमारे शहर में उठावने पर तो शोक संदेश बांचने की परंपरा नही है पर दाह कर्म मे समय श्रद्धांजलि देने के नाम पर खूब भाषणबाजी चलती है. मरने वाले की शान में कसीदाकारी की जाती है. इसके बनिस्पत मृत आत्मा की शांति के लिये मानसिक मौन रखा जाये तो बेहतर हो.

    खैर परंपराएं जैसे बनती हैं वैसे ही समय आने पर टूट भी जाती हैं, अपनी अपनी मर्जी.

    रामराम.

  12. t s daral says:

    कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें न चाहते हुए भी निभाना पड़ता है। शोक प्रकट करना भी एक ऐसा ही कार्य है। वर्ना शोक सभा में भी लोग बाहर खड़े होकर राजनीति या व्यापार की बातें करते दिखाई देते हैं।

  13. बड़ी अजीब सी बात है
    शोक में भी दिखावा …बदलनी चाहिए ये रीत

  14. शोक संवेदना यदि कार्यक्रम बन जाये तो संवेदना निकल जाती है उससे। विचारणीय विषय..

  15. आपकी राय से सहमत होना ठीक है . शोक सन्देश भेजने वाले की संवेदनाएं परिवार के प्रति है , तो उसे परिवार के बीच प्रकट करना ही अधिक उचित है !

  16. सहमत आपकी बात से … इनको पढ़ने के बजाए परिवार वालों को दे देना चाहिए …

  17. अवसर कोई भी हो, दिखावा अब प्राथमिकता प्राप्त कर चुका है।

  18. Kajal Kumar says:

    इसमें दो राय नहीं कि आज जीवन की प्रत्येक प्रक्रिया में दिखावा जुड़ने लगा है

  19. Kailash sharma says:

    आपने बिल्कुल सच कहा है..आज शोक सभा में सन्देश पढ़ना या किसी विशिष्ट व्यक्ति से लम्बा भाषण सुनना आम बात हो गयी है..सब दिखावा मात्र है…
    होली की हार्दिक शुभकामनायें!

  20. shobhana says:

    ye sab dikhva hai jise aaj logo ne parmpra bna diya hai .band hona hi chahiye

  21. आपका लेख बहुत ही प्रासंगिक है। रीतियों को देश काल के हिसाब से बदलना चाहिए। अन्यथा वह कुरीतियाँ बन जाती है।

    मैंने भी कुछ लिखा है। आपका ईमेल पता कहीं दिखा नहीं तो सोचा टिप्पणी में ही दल देता हूँ। कृपया पढ़कर मरदर्शन करने का कष्ट करें।

    मेरी अंतिम यात्रा कैसी हो?

    हमारा देश त्योहारों और रीति रिवाजों का देश है। रीति रिवाजों में देश काल के हिसाब से बदलाव आना आवश्यक होता है। यह बदलाव रीति रिवाजों को प्रासंगिक और उपयोगी रखने के लिए आवश्यक होते हैं। जब यह देश काल के हिसाब से बदलते नहीं है तो यही रीति रिवाज कुरीतियों का रूप धारण कर लेते हैं और इनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता नष्ट हो जाती है और ये सिर्फ ढकोसला बनकर रह जाते है।

    मृत्यु पर शव यात्रा में जाना एक आवश्यक कार्य था। आज भी माना जाता है कि आप चाहे किसी परिवार में विवाह में मत जाओ लेकिन मृत्यु पर जरूर जाना चाहिए। दुख: में शामिल होना अच्छी बात मानी जाती है। पहले के जमाने में अर्थी को कंधा देना एक पुण्य कार्य माना जाता था। हर किसी को अर्थी बांधना भी नहीं आता है। कुछ ही लोग इस कार्य में अनुभवी और निपुण होते हैं और वह मृत्यु की खबर मिलते ही पहुँच जाते हैं और अपना काम पूरे मनोयोग से करते हैं।

    बदले परिवेश में गाड़ी से शवयात्रा निकलती है और आए हुये लोग भी अपने अपने वाहनों में पहले घर तक और फिर श्मशान में पहुँचते हैं। कई बार तो यह एक बड़े काफिले का रूप धारण कर लेता है। कभी ट्रेफिक जाम का भी कारण बन जाता है। लोग अपने वाहन जहां तहां खड़े कर देते हैं और परिवहन में लोगों को परेशानी होती है। कई लोग तो सीधे श्मशान ही पहुँचते हैं। कम से कम तीन चार घंटे आने और जाने में लग जाते हैं। इन सब चीजों की कोई उपयोगिता नहीं है। कोई दुखी परिवार से सांत्वना की बात नहीं करता है। सब लोग आपस में बातें करते देखे जा सकते हैं। कई लोग अपने मोबाइल फोन पर बातें करते देखे जा सकते हैं।

    मैं अपनी शव यात्रा कैसी चाहता हूँ इस पर मेरे कुछ विचार यहाँ पर लिख रहा हूँ:
    मैंने अपने नेत्रदान का संकल्प किया हुआ है। मैं चाहता हूँ कि मेरे जो भी अंग किसी काम आ सके उनका दान कर दिया जाय। शरीरदान करना भी मैं पसंद करता हूँ। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। जब शरीर ही नहीं है तो शव यात्रा किस बात की?

    यदि शरीरदान संभव न हो सका तो मेरे मृत्यु की खबर कुछ करीबी रिश्तेदार और करीबी मित्रों को ही दी जाय और शवयात्रा में कम से कम लोग आयें ऐसा कुछ इंतजाम किया जाय। किसी भी हालत में 50 से ज्यादा लोग न आए।

    मृत्यु के बाद के रविवार या छुट्टी के दिन श्रमदान का आयोजन किया जाय और अधिकतम लोगों को उसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाय। श्रमदान किस चीज के लिए हो यह कोई सामाजिक संस्था ने सरकारी संस्थानों के साथ मिलकर निश्चित करना चाहिए। श्रमदान के लिए कुछ मुद्दे यह हो सकते हैं:
    बरसात के दिनों में वृक्षारोपण का कार्यक्रम हो।
    बरसात के पहले तालाबों/ नदियों को को गहरा करने का काम हो।
    बरसात के पहले शहर के नालों / नालियों और अन्य स्थानों की सफाई।
    “गूंज” के लिए पुराने वस्त्रों/ गरम कपड़ों का संग्रह; इत्यादि इत्यादि।

    हम लोग प्रायः कर यूरोप और अमेरिका का अनुकरण कर रहे हैं। उन देशों में श्रम को नीची दृष्टि से नहीं देखा जाता है। वहाँ पर “dignity of labour” में यकीन किया जाता है। कोई भी व्यक्ति काम से छोटा नहीं माना जाता है। जबकि हमारे यहाँ शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखा जाता है।
    यहाँ तक कि हमारे देश के रईसों के बच्चे भी जब विदेशों में पढ़ने जाते हैं तो वहाँ अपना खर्च निकालने के लिए waiter या अन्य काम करते देखे जाते हैं। मेरे एक वर्ष के कनाडा प्रवास के दौरान मैंने देखा था कि यहाँ से बड़े उद्योगपति भी जब प्रदर्शनियों में शामिल होने आते हैं तो अपना सामान ट्रकों से खुद ही उतारते और चढ़ाते हैं। भले ही वह अपने घर में पानी भी खुद लेकर पीने के आदि न हो।

    मृत्यु के तीसरे दिन प्रायः उठावना का कार्यक्रम होता है जिसमें शवयात्रा में आए हुये लोग और अन्य लोग शामिल होते हैं। यह कार्यक्रम आधे घंटे से लेकर दो घंटे तक चलता है। कहीं कहीं भजन का कार्यक्रम होता है तो कहीं भजन की केसेट लगा दी जाती है। आए हुये लोग बैठ कर आपस में बातें करते हैं और कुछ समय बाद दिवंगत कि फोटो पर पुष्प चढ़ा नमन कर निकाल जाते हैं।

    मैं चाहूँगा कि मेरे मृत्यु उपरांत हुये उठवना में में पेंसिल थेरेपी का कार्यक्रम किया जाय ताकि आने वालों को यदि कोई दर्द हो तो वह दर्द दूर किए जा सकें। और जो स्वस्थ हो उन्हें पेंसिल थेरेपी सीखाई जाय ताकि उनके संपर्क में जो दर्दी हों उनका वह दर्द निवारण कर सके। मेरे लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

  22. sumati prakash jain says:

    netao ke chamche jinke jimme hota hai , chhapa chhapaya aalekh naam likhkar bhej dete hai ki unke aaka ko unki mrityu bahut hi aaghat laga hai , bhale jindagi mein soorat bhi na dekhi ho .
    aise shuk sandesh samaya ki barbadi hai.

  23. arun kumar agarwal says:

    यह बंद होना चाहिए

  24. Gurmit Kaur says:

    Oh…Stop it, time wasters! Does anyone of you have any substantial option to this? If yes, then why don’t you infuse in the mainstream society?

    All the points written here shows nothing but a “criticism of something” .
    Just a typical bakwaas on any topic that proves nothing in the end. It is like chewing a gum, spit out when becomes tasteless and start on another one!

    All of you here showed a hidden burning desire of ” समाजको बदल डालो” …….
    Just a wish,….a desire. That’s all. And you’ll keep chewing and discussing on it. Nothing further. Mud slinging is the easiest way to mentally ‘feel good’

  25. सतीश हेड़ा says:

    आलेख पढ़ा कुछ बातें अच्छी लगी लेकिन शोक संदेश वाचन पर मेरा मत है कि वाचन होना चाहिए क्योंकि इससे समाज, व्यक्ति अपनी सम्वेदनाओं को शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत कर सकता है यदि यह नहीं होगा तो शोक संदेश लिखना ही आने वाली पीढ़ी भूल जाएगी,
    वैसे ही संवेदना मर रही हैं अतः इस तरह की की परिपाटी होनी चाहिए

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