अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

आखिर माँ लौट आयी

Written By: AjitGupta - May• 18•13

सूरज ढल चुका था, सारे ही पक्षी अपने बसेरों में आ चुके थे। बोगेनवेलिया से चीं-ची की आवाजें तेज होने लगी, मुझे लगा कि माँ लौट आयी है। सारा दिन बच्‍चे अकेले रहे थे। ना दाना और ना पानी। अपनी सुरक्षा भी बोगेनवेलिया के पत्तों के बीच छिपकर की थी। आज सुबह ही मेरे बगीचे में दो गौरैया के बच्‍चे अपनी माँ के साथ आए थे। माँ उनके मुँह में दाना डाल रही थी और वे खुशी से चीं-चीं कर रहे थे। दोनों बच्‍चे अपनी नन्‍हें पैरों से फुदक-फुदक कर चल रहे थे। एक कुछ बड़ा लग रहा था और वह उड़ने के लिए पंख भी फड़फड़ा रहा था। मैंने नल से पानी खोल दिया था जिससे वे अपनी प्‍यास बुझा सकें। दोनों बच्‍चों को छोड़कर माँ उनके दाने-पानी का इंतजाम करने चले गयी और मैं भी अपने कार्य में लग गयी।

शाम को बच्‍चे चीं-ची कर रहे थे, मेरे हाथ में मोबाइल था। मैंने उनकी फोटो लेने का प्रयास किया, लेकिन वे इतने छोटे थे कि फोटो में दिखायी ही नहीं दे रहे थे। मैं उनके एकदम नजदीक चले गयी, फोटो खींचा। तभी उनमें से एक शायद वह बड़का था, ने पंख फैलाए और मेरे हाथ पर आकर अपनी उड़ान भरी। अब वह उड़ सकता था। मैंने समझा कि उसने आक्रमण तो नहीं किया है लेकिन वह उड़ने के लिए अपनी जगह तलाश रहा था। वह उड़ गया। अब छुटका ही वहाँ रह गया, उसकी चीं-चीं की आवाजें तेज हो गयी। मैं इंतजार करती रही, कि उसकी माँ अब आए, अब आए। शाम धुंधलाने लगी थी, मेरी उम्‍मीद टूटती जा रही थी। छुटका अकेला था, बड़का भी पता नहीं उड़कर किस पेड़ पर जा बैठा था। आखिर माँ कहाँ चले गयी? छुटके को प्‍यास भी लगी होगी और भूख भी। लेकिन मैं क्‍या करूं? मन उहापोह में लॉन के चक्‍कर काटता रहा। मुझे एक छोटा सा दीपक मिला, जिसमें मैंने पानी भरकर उसके पास रख दिया। लेकिन वह डरा हुआ था, उसे अब अपनी सुरक्षा की चिन्‍ता ज्‍यादा थी। लॉन के किनारे पर घास कुछ लम्‍बी हो गयी थी, वह उसी घास में छिप गया। मुझे भी तसल्‍ली हुई। मैंने पानी उसी के पास रख दिया, हो सकता है उसे समझ आ जाए और वह पानी पी ले। उसे उसकी माँ कौन सा दाना खिलाती है, मुझे पता नहीं। और इतने नन्‍हें बच्‍चे को कैसे दाना खिलाऊँ, यह ही चिन्‍ता बनी रही। रात को बिल्‍ली भी आ ही जाती है और कुत्ते भी। कहीं कोई उसका शिकार ना कर ले, रातभर चिन्‍ता रही।

लेकिन माँ क्‍यों नहीं आयी? माँ तो ऐसी नहीं होती! धरती का सारा दुख अपने ऊपर ले सकती है, अपने सारे ही अरमान मिट्टी में मिला सकती है लेकिन अपने बच्‍चे को छोड़कर नहीं जा सकती। जबकि उस गौरैया को पता है कि बच्‍चे के पंख खुलते ही वह उसे छोड़कर उड़ जाने वाला है। मेरे मन में तरह-तरह के खयाल आ रहे थे। कहीं इस भीषण गर्मी में माँ झुलस तो नहीं गयी? कहीं किसी का शिकार तो नहीं बन गयी? किसी के जाल में तो नहीं फंस गयी? माँ का इसतरह छोड़कर जाना मुझे अपराध-बोध सा लग रहा था। लेकिन अब रात गहरा चुकी थी, सारी उम्‍मीदों पर पानी फिर चुका था। अब माँ नहीं आएगी, मुझे विश्‍वास हो गया था और शायद छुटके को भी विश्‍वास हो गया था। इसीलिए तो उसने घास में छिपकर अपने लिए सुरक्षित जगह तलाश ली थी। छुटके के‍ लिए तो एकसाथ दो वियोग हो गए थे, माँ भी नहीं आयी और बड़का भी कहीं चले गया था। हो सकता है कि बड़का माँ की तलाश में ही गया हो! लेकिन अभी उसके पंख इतने सशक्‍त तो नहीं हुए हैं कि वह दूर तक जाकर माँ को खोज लाए! फिर भी वह प्रयास कर रहा था और शायद रात अधिक होने पर उसने भी कहीं और आसरा ढूंढ लिया था।

मेरी रात भी कठिनाई से ही गुजरी, चिन्‍ता बनी रही कि छुटके का क्‍या हुआ? सुबह उठते ही घास में उसे खोजने को दौड़ी, लेकिन वह वहाँ नहीं था। सोचा शायद उसके पंख भी मजबूत हो गए हैं और वह भी उड़ चला होगा। मैं वहीं घास पर ही बैठकर अखबार पढ़ने लगी। कुछ ही देर में चीं-चीं की आवाजे आने लगी। अरे ये तो वही आवाज है, मैं दौड़ी। देखा कि बड़का लौट आया है और वे अब गलियारे में आ गए हैं। दोनों भाई एक-दूसरे से चिपककर बैठे थे। छुटका शायद बड़के के अन्‍दर ही अपनी माँ को तलाश रहा था। मुझे कुछ तसल्‍ली हुई कि माँ नहीं आयी तो क्‍या बड़का तो लौट आया है और उसने छुटके को अपने पास समेट लिया है। अब मैं उनके पानी की व्‍यस्‍था में लग गयी। लेकिन वह पानी से दूरी ही बनाए रहे। हो सकता है कि नजर चुराकर ही पानी पीएं। मुझे अभी भी माँ का इंतजार है, जैसे ही चीं-चीं की आवाजे तेज होती हैं, मैं दौड़कर बाहर जाती हूँ, शायद माँ आ जाए। एक गौरैया बच्‍चों के पास से उड़कर गयी, मैं खुश हो गयी, कि माँ आ गयी। लेकिन मुझे शक था कि वह उनकी माँ नहीं थी। बच्‍चे इंतजार कर रहे हैं और मैं भी। माँ तुम जल्‍दी से आ जाओ। तुम्‍हें कुछ नहीं होना चाहिए। मैं जानती हूँ कि तुम अपने बच्‍चों को छोड़कर नहीं जा सकती। एक दूसरी प्रजाति की गौरैया वहाँ चक्‍कर काट रही है, मुझे पहले तो भ्रम हुआ कि उनकी माँ ही लौट आयी है लेकिन तब मैंने गौर से देखा तो वह कोई और थी। लेकिन शायद उस अन्‍य माँ को भी चिन्‍ता सताने लगी है कि वे बच्‍चे अकेले हैं और वे वहीं मंडरा रही है। लेकिन उनके मुँह में दाना कौन डालेगा, मुझे रह-रहकर यह बात सता रही हैं। मैं बार-बार बाहर जाकर देखती हूँ कि बच्‍चे सुरक्षित तो हैं या नहीं। जीवन‍ कितना कठिन है बिना माँ के? माँ तुम किसी बच्‍चे को छोड़कर कभी मत जाना।

ब्रेकिंग न्‍यूज – अभी बाहर जाकर देखा, वह दूसरी चिड़िया जो उनकी माँ नहीं है, अपनी चोंच में एक नन्‍हा सा फल ले‍कर आयी है और बच्‍चों की चोंच में डालकर उड़ गयी है। दूसरा दाना लेने। आह सुखद है। हो सकता है वह उनकी माँ ही हो, लेकिन मुझे लग रहा है कि वह उनकी माँ नहीं है। लेकिन अब मैं निश्चिंत हो गयी हूँ। लेकिन मेरा सुख यहीं समाप्‍त नहीं हुआ, मैं फिर बाहर गयी और देखा कि अब दो गौरैया वहाँ आ गयी हैं। दोनों ही अपनी चोंच में दाना लाकर उनको खिला रही हैं। काश हम भी इन गौरैयाओं से कुछ सीख पाते? अद्भुत है मेरे लिए बहुत ही अद्भुत और सुखद है। लेकिन अभी पतिदेव ने बताया कि वह उसकी माँ ही है। चलो अच्‍छा हुआ माँ लौट आयी। मेरे मन का बोझ हलका हो गया। आखिर माँ कैसे अपने बच्‍चों को छोड़कर जा सकती है? शायद दूसरी गौरेया उनका पिता होगा। लेकिन अन्‍त भला तो सब भला।

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22 Comments

  1. माँ हर रूप में अपने दायितत्व को निभाती है …. संवेदनशील पोस्ट

  2. sanjay KUMAR says:

    Maa , tujhe pranaam

  3. उन निरीह बच्चों की स्थिति देख कर कैसा-कैसा लगा होगा -कल्पना कर सकती हूँ,पक्षी हो चाहे मानवी- माँ ,माँ है दोनों की संवेदना एक है .माँ आ गई बच्चे सकुशल हैं- निश्चिंत हो गये हम भी !

  4. अन्तर सोहिल says:

    ममता की एक ही परिभाषा है, चाहे किसी भी योनि में हो। आपके भीतर भी वही चल रहा था और गौरैया मां और दूसरी चिडियाओं के भीतर भी

    प्रणाम स्वीकार करें

  5. kavita rawat says:

    पशु हो या पक्षी इनको करीब से जानकर-समझकर मन को बहुत सुकून मिलता है …
    गौरैया के मासूम बच्चों को माँ मिल गयी यह देखकर मन को ख़ुशी हुयी …
    सिलसिलेवार सजीव प्रस्तुति बहुत सुन्दर लगी .

  6. पेज खुलने में धैर्य की परीक्षा हो जा रही है.

  7. वाह …
    आपके तो आनंद आ गए ..
    बधाई !

  8. dnaswa says:

    वो पंछी हैं इंसान नहीं … काश हम कुछ सीख सकते ऐसी बातों से …
    बखूबी लिखा है पोस्ट को … रोचकता बनी रही ..

  9. ARUN DAGA says:

    bahut sunder chitran

  10. माँ की ममता सब में सामान है…

  11. अपनों के प्रति सहदृयता देख हम सबको भी कुछ सीखना चाहिये..

  12. rashmiravija says:

    बहुत ही प्यारी सी पोस्ट . अपने बच्चों को छोड़कर माँ जा ही नहीं सकती…उसे तो लौटना ही था.

  13. t s daral says:

    सूक्षम दृष्टि से विश्लेषण कर मां और उसकी औलाद के रिश्ते का वर्णन किया है।सचमुच यह कुदरत की ही देन है कि हर मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है।

  14. AjitGupta says:

    इस लाइव एपीसोड में कल दुखद अन्‍त आ गया। शाम को माँ बड़के और छुटके को लेकर वापस लॉन में आ गयी। अभी वे लॉन ने पहुँचे भी नहीं थे कि माँ ने उड़ान भरी, उसके पीछे ही बड़का भी उड़ लिया। लेकिन अभी वो बच्‍चा ही था, उसके पंखों में इतनी जान नहीं थी कि वह ज्‍यादा ऊँचा उड़ सके। सड़क पर बड़ा टेम्‍पो जा रहा था, वह उसके टकराया और सड़क पर आ गिरा। हम कुछ सोच पाते, इतने में ही पीछे से आ रही गाड़ियों ने उसे कुचल दिया। उसकी माँ भी भागी लेकिन तब तक कई गाड़ियां गुजर चुकी थी। मैं सोच रही थी कि कल तक दोनों ही अच्‍छी तरह से उड़ना सीख लेंगे और वे अपनी उड़ान को आकाश तक ले जाएंगे लेकिन बड़के की जल्‍दबाजी ने यह दुखद अन्‍त कर दिया।

  15. ममता बस ममता ही होती है, पक्षियों को लेकर इतनी संवेदनात्मक पोस्ट लिखना बहुत अच्छा लगा.

    रामराम.

  16. अद्भुत अजित जी,

    खास तौर पर ये पंक्ति…

    उस गौरैया को पता है कि बच्‍चे के पंख खुलते ही वह उसे छोड़कर उड़ जाने वाला है।
    आज के भौतिकतावादी युग का कड़वा यथार्थ…

    जय हिंद…

  17. हित अनहित पशु पक्षी जाने
    खुबसूरत संवेदनशील

  18. Kajal Kumar says:

    इनकी भी अजब दुनि‍या होती है.
    हम अगर पक्षि‍यों के लि‍ए बाहर पानी रखना भूल जाएं तो हल्‍ला मचा मचा कर याद दि‍ला देते हैं

  19. हो सकता है मौसी हो… वो भी तो माँ जैसी होती है…

    खैर गोरैया और उसके बच्चों के बारे में पढ़ना सुखद लगा … जीवंत लेखन. और हाँ. आपका ये ब्लॉग बहुत देरी से खुलता है… कृपया इसमें ग्राफिक कम कीजिए.

  20. अपडेट बांचकर उदास हो गये।

  21. ममता के मायने हर हाल में एक से…… सुंदर पोस्ट

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