अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

कहीं जीवित आवाज थम ना जाए!

Written By: AjitGupta - Jul• 10•18

अभी चार-पाँच दिन पहले एक फोन आया, अनजान नम्बर था तो सोचा कि कोई ना कोई व्यावसायिक हितों से जुड़ा फोन होगा तो अनमने मन से बात की लेकिन कुछ देर में लगा कि नहीं यह व्यावसायिक नहीं कुछ सामाजिक सरोकारों का फोन है। आवाज आयी की मैं आपको अपनी दो पुस्तकें भेजना चाहता हूँ, मैंने पूछा कि किस विधा की पुस्तके हैं। लेकिन मेरी बात कम सुनी गयी और सामने वाले को अपनी बात कहने की अधिक उत्सुकता थी, तो कहा कि मैं 92 साल का व्यक्ति हूँ, 82 वर्ष तक कुछ नहीं लिखा लेकिन उसके बाद 11 पुस्तकें लिखी। मैंने फिर कोई प्रश्न नहीं किया और कहा कि आप भेज दें। सोचा कि जहाँ इतनी पुस्तकें भेंट स्वरूप आयी हैं, वहाँ दो और सही। आखिर कल पुस्तकें भी आ गयीं और साथ में हाथ से लिखा एक पत्र भी। पत्र पढ़कर मन द्रवित हो गया, परिचय कुछ नहीं, बस कहीं से मेरा परिचय मिला और अनजान लेखक को पुस्तकें भेज दी। लिखा कि अनजान लेखक को परेशान कर रहा हूँ लेकिन हो सके तो प्राप्ति की सूचना देना। पत्र में ऐसा और भी कुछ था जो सामाजिक ढांचे की जर्जर होती अवस्था को दर्शा रहा था। खैर वह बात कभी और। पत्र हाथ में था, मैं थोड़ा सन्न सी थी तभी दो दिन पहले देखी एक बच्चों की फिल्म का ध्यान आ गया। कलकत्ता के एक गाँव के स्कूल में फुटबाल टीम बनी हुई है, एक कोच की आवश्यकता है। कोच आते हैं और नियुक्त हो जाते हैं। खेल के मैदान पर स्कूल की टीम खेल रही है तभी एक गरीब बालक वहाँ आता है और बच्चों के साथ खेलने का प्रयास करता है। लेकिन बच्चे उसे नहीं खेलने देते। कोच देख रहे हैं कि इस लड़के में प्रतिभा है और यदि वह लड़का इस टीम का हिस्सा बन जाए तो उनकी टीम को कोई नहीं हरा सकता। लेकिन स्कूल इसकी आज्ञा नहीं देता, माता-पिता भी विरोध करते हैं।
कोच उस लड़के को दूसरे कोच के पास ले जाता है और कहता है कि तुम इसे खिलाओ। कोच लड़के को अपने पास रख लेता है और अपनी टीम में जगह देता है, आखिर उनके स्कूल की टीम जीत जाती है और पहले वाली टीम हार जाती है। स्कूल के हेडमास्टर कोच से कहते हैं कि तुमने हमारे साथ दगा किया, कोच कहता है कि मैं एक कोच हूँ, मेरा काम है खिलाड़ी को खोजना और उसे खिलाड़ी बनाना। जब आपने मना किया तो मैंने दूसरे को खिलाड़ी दे दिया, इसमें गलत क्या किया? साहित्य जगत में भी देखती आयी हूँ कि लोग ऐसे ही एक-दूसरे का हाथ थामते हैं। जहाँ-जहाँ भी कोई भी कला विद्यमान है वहाँ लोग एक-दूसरे की सहायता करते ही हैं। लेकिन मेरे पास जो पत्र था, वह नये उदीयमान लेखक का नहीं था, अपितु अस्त होते हुए लेखक का था। जो व्यक्ति 82 साल तक अपने आपको व्यक्त ना कर पाया हो, अचानक मुखर होता है और अपनी पीड़ा को शब्द देता है। अब कोशिश कर रहा है कि उसको कोई जाने। वह अपनी लेखनी का जोर बताने के लिये पत्र नहीं लिख रहा है, अपितु स्वयं से स्वयं को अभिव्यक्त कर रहा है।
बचपन में देखते थे कि घर में बड़े-बूढ़ों की खूब चलती थी, घर में उनकी आवाज गूंजती रहती थी। मतलब एक बार बोलते थे लेकिन दस बार प्रतिध्वनी बनकर वापस आती थी। बच्चे भी उनके पास मंडराते रहते थे, कि दादा-दादी की पोटली खुले और थोड़ा सा उन्हें भी मिले। जितने उपदेश उनके पास थे सारे ही बेटों-बहुओं को दे दिये जाते थे, जितनी कहानियाँ थी पोते-पोतियों या दोहते-दोहितियों को सुना दी जाती थी। मन खुद को अभिव्यक्त करके निर्मल हो जाता था और जब मृत्यु की पदचाप सुनायी देती थी तब हाथ थामते देर नहीं लगती थी। लेकिन अब? बड़े-बूढ़े चुप ही नहीं अपितु खामोश हैं, अपने मन को खोलना लगभग भूल गये हैं, अन्दर ही अन्दर ज्वालामुखी धधकता रहता है लेकिन कहीं रिसाव नहीं। ऐसे दो-राहे पर खड़े होकर कुछ लोग कलम का सहारा लेते हैं और कुछ अनबोले ही दुनिया से विदा हो जाते हैं। हम भी यही कर रहे हैं और न जाने कितने लोग यही कर रहे हैं। कुछ लोग खुद का भोगा हुआ यथार्थ प्रगट कर रहे हैं और मेरे जैसे लोग जनता से संवाद कर रहे हैं। कुछ उनका और कुछ अपना मिलाकर जो शब्दों का संसार बनता है, वह हम सभी को जीने का नया आयाम देता है। मैं नित नयी कहानी को अपने शब्दों में ढालने का जतन करती हूँ, जिससे दुनिया अनबोली ना रह जाए। चौकीदार कहता है – जागते रहो। मैं कहती हूँ कि बोलते रहो, कुछ कहते रहो और शब्दों के गूंजने से दुनिया को जगाते रहो। कहीं ऐसा ना हो जाए कि जीवित आवाज थम जाए और कल-कारखानों की आवाज से सृष्टि गूंजने लग जाए।

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2 Comments

  1. Ravi says:

    हो सके तो उन्हें रचनाकार (http://rachanakar.org) की लिंक दें. उनकी रचनाएँ नेट पर आएंगी तो और भी लोग उन्हें जानेंगे.

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