अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

स्‍लेट जब रिक्‍त हो जाए तब अपनापन ही रिक्‍तता को भरता है

Written By: AjitGupta - Apr• 18•15

आपके जीवन की स्‍लेट ठसाठस भरी होती है, लगता है अब इसमें कुछ नहीं समाएंगा लेकिन कभी ऐसे क्षण आ जाते हैं जब एकदम से ही स्‍लेट खाली हो जाती है। आपके पास कुछ शेष नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे कम्‍प्‍यूटर हेंग हो गया हो। सोचने समझने की शक्ति समाप्‍त सी हो जाती है। ऐसे समय जीवन की पगडण्‍डी पर चलते हुए सावधानीपूर्वक काम करना होता है। आपके चारो तरफ शून्‍य बिखरा है, लेकिन आपको उस शून्‍य को चेतन करना है, तो मन को न जाने कितनी बार झकझोरना पड़ता है जब जाके कहीं चेतना आती है। परिवार का प्रिय तो चला जाता है लेकिन पीछे छूट जाने वालों की स्‍लेट को रिक्‍त भी कर जाता है। परिवार के अन्‍य सदस्‍य आपके पास जुट जाते हैं और आपकी चेतना को या आपकी धुंधली पड़ गयी स्‍लेट के अक्षरों को वापस से लाने का प्रयास करने लगते हैं। एक-एक रिश्‍तेदार और एक-एक परिवार के सदस्‍य की अपनी भूमिका होती है, वे ही हमारी चेतना को जागृत करने में सहयोग करते हैं।

परिवार से हटकर जब व्‍यक्ति का दायरा समाज को घेरे रहता है तब समाज का एक-एक व्‍यक्ति उन पलों को जीवित करने में सहयोगी बनने लगता है। मृत्‍यु के पल में ही पहचान होती है व्‍यक्तियों की। कौन हमारी चेतना को जागृत करने में प्राणपण से जुटा है और कौन अपनी बाँहों का सहारा देकर आपकी स्‍लेट पर कुछ लिखने का प्रयास कर रहा है। ऐसे समय ही लगता है कि परिवार कितने कीमती हैं और समाज कितना आवश्‍यक है। हमारे पास अधिकार के कुछ नम्‍बर होते हैं, रात 2 बजे भी उन्‍हीं नम्‍बरों पर हम डायल करके उनकी बाँहों को आमन्त्रित कर लेते हैं। वे भी तुरन्‍त ही बिना विलम्‍ब किए आ जाते हैं और आश्‍वस्‍त कर देते हैं कि हम अकेले नहीं है। शायद परिवार और समाज का यही आश्‍वासन हमें सम्‍बल देता रहता है। आदमी सारे ही वज्रपात को सहन कर जाता है, केवल परिवार के सहारे ही।

परिवार पर मृत्‍यु ने पासा फेंका, हतप्रभ होकर जिन्‍दगी रह गयी लेकिन कुछ लोग ऐसे आकर खड़े हो गए जैसे वे यम से भी लड़ जाएंगे, ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में अगाध आत्‍मीयता का भाव भर गया। मैंने जिधर भी निगाह घुमायी कोई न कोई आत्‍मीय दिखायी दे गया जो निष्‍ठापूर्वक कर्म सम्‍पादन में लगा था। कैसे हैं ऐसे लोग, किसने दिए हैं इन्‍हें संस्‍कार! शायद इनसे ही मानवता है, शायद इनके कारण ही सुरक्षा है, शायद इनके कारण ही सम्‍भावना है। जो लोग भी समाज को तिरस्‍कृत करते हैं या तो वे अच्‍छा समाज बना नहीं पाए या फिर वे अच्‍छे समाज को जान नहीं पाए। प्रियजन के बिछोह के समय व्‍यक्ति की कितनी आवश्‍यकता है, इस बात के मर्म को जो भी समझ लेता है बस तभी अच्‍छे समाज का निर्माण प्रारम्‍भ हो जाता है। आज लिखते समय स्‍लेट भी खाली है और शब्‍दों का भी पता नहीं कि वे किसे भेजेंगे और किसे अपने पास रख लेंगे बस जो शब्‍द आ रहे हैं, उनसे ही मेरी स्‍लेट भर रही है। मैं कृतज्ञ हूँ उन सभी लोगों के प्रति जो अपनों के प्रति संवेदना से भरे हैं। ऐसे प्रत्‍येक क्षण में कुछ सीखने का प्रयास करती हूँ, कि हम भी ऐसी विकट परिस्थिति में किसी को सहारा दे सकें। इस देश के सारे ही संस्‍कारों को नमन। इस देश के समाज को  नमन। इस देश की परिवार की भावना को  नमन।

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8 Comments

  1. ाजित जी सही कहा आपने1 आप एक साहसी महिला हैं सम्य का मरहम बहुत बडी ताकत देता है.फिर भी अपनो के बिना हमारा वजूद नही किसी न किसी कन्धे का सहारा तो छाहिये ही होता है ये समाज परिवार इसी लिये होते हैं1 शुभ्कामनायें

    • AjitGupta says:

      निर्मलाजी, सच है समय का मरहम ही घाव भरता है। आभार आपका।

  2. onkar kedia says:

    बिल्कुल सही कहा

  3. dj says:

    भावनाओं से परिपूर्ण और मार्मिक लेख।
    जब तक संवेदनाएँ हैं ये स्लेट कभी खाली नहीं हो सकती।

  4. AjitGupta says:

    dj says आभार अापका।

  5. आपकी लेखकीय भावना को नमन।

    लेखक समाज को दर्पण दिखाता है और खुद पर इतराता है कि उसने समाज की कुरूपता को जगजाहिर किया। लेकिन आपके पास आकर लेखक के वास्तविक धर्म से परिचित होता हूँ। समाज के उन पहलुओं को देखना जो उसकी नींव हैं या कहें उसको बाँधने वाले अदृश्य तंतु हैं। धन्य हुआ इतना मार्मिक निबंध पढ़कर। संवेदनाओं की झंकार है आपके इस भावुक आलेख में।

  6. AjitGupta says:

    प्रतुल जी, आभार आपका। मेरा मानना है कि अच्‍छाई देखने पर ही अच्‍छाई बढ़ती है और बुराई देखने पर बुराई बढ़ती है। मुझे तो प्रेम की छोटी-छोटी बाते प्रभावित करती है इन्‍हीं से तो आत्‍मीयता का विस्‍तार होता है।

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