अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

हमारे मन में बसा है राजतंत्र

Written By: AjitGupta - Sep• 18•18

वाह रे लोकतंत्र! तू कहने को तो जनता के मन में बसता है लेकिन आज भी जनता तुझे अपना नहीं मानती! उसके दिल में तो आज भी रह-रहकर राजतंत्र हिलोरे मारता है। मेरे सामने एक विद्वान खड़े हैं, उनके बचपन को मैंने देखा है, मेरे मुँह से तत्काल निकलेगा कि अरे तू! तू कैसे बन गया बे विद्वान! तू तो बचपन में नाक पौछता रहता था। यह है आम आदमी की कहानी। लेकिन यदि मेरे समक्ष कोई खास आदमी लकदक करता खड़ा हो तो उसे कभी नहीं कहेंगे कि तू बचपन में कैसा था। बचपन में नाक उसके भी बहती होगी लेकिन वह खास था तो खास बनने के लिये ही पैदा हुआ है। हाँ ऐसा जरूर हुआ होगा कि कोई अध-पगला सा बच्चा आपके सामने बड़ा हुआ हो और जवानी में किसी उच्च पद पर होकर जब आपके सामने आ खड़ा हो, और सब उसे स्वीकार भी कर रहे हों! यह है हमारे मन में बसा राजतंत्र। मुझसे तो यह प्रश्न न जाने कितनी बार किया गया है कि तुम भला लेखक कैसे! ना कोई अपना और ना ही कोई पराया मानने का तैयार है! क्योंकि मैं खानदानी नहीं! लेकिन इसके विपरीत जो विरासत में लेखक की संतान है वह चाहे कखग नहीं लिख सकें लेकिन उनसे कोई प्रश्न नहीं होता!
इसलिये मैं कहती हूँ कि लोकतंत्र को जड़े जमाने में बहुत समय लगेगा। अभी राजतंत्र की जड़े अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। 90 प्रतिशत आम जनता को कोई मानने को ही तैयार नहीं है, बस हमारे मन में तो 10 प्रतिशत खास लोग ही बिराजे हैं। लोकतंत्र जिनके लिये हैं वे भी राजतंत्र से ग्रसित हैं, वे भी कहते हैं कि इसका बचपन तो हम देखी रहे। इसलिये आज लोकतंत्र को भी राजतंत्र का चोला पहनना पड़ता है। जैसे ही आम आदमी खास हुआ नहीं कि वह हमारे गले उतर जाता है। लालू यादव, मुलायम सिंह, मायावती इसी लोकतंत्र का चेहरा रहे हैं लेकिन जब इनने राजतंत्र का चोला पहना तो गरीब-गुरबा को कोई आपत्ति नहीं हुई अपितु अब वे सर्वमान्य हो गये। इनका भ्रष्टाचार इनके राजतंत्र में शामिल हो गया। राजीव गांधी से लेकर राहुल तक आज सर्वमान्य बने हुए हैं क्योंकि वे राजतंत्र का चेहरा हैं। उनके किसी कृतित्व पर कोई चिन्तन या बहस नहीं होती, वे सर्वमान्य हैं लेकिन लोकतंत्र की जड़ों से उपजे मोदी पर बहस होती है। क्या मोदी राजपुरुष की तरह सर्वगुण सम्पन्न हैं? उनकी छोटी से छोटी बात पर भी प्रश्न खड़े होते हैं। आज लोग उनसे प्रश्न कर रहे हैं कि यह कैसा लोकतंत्र है आपका, जो हमें कानून के दायरे में रखता है! हम सदियों से कभी कानून के दायरे में नहीं रहे! हमारा हर शब्द ही कानून था। चारों तरफ कोलाहल है, कोई कह रहा है कि स्त्री को पैर की जूती समझना हमारा अधिकार है, आप कैसे कानून ला सकते हैं कि हम किसको रखे और किसको छोड़े! कोई कह रहा है कि हम उच्च कुलीन हैं, हम किसी को भी दुत्कारें, यह सदियों से हमारा अधिकार रहा है, हमें कानून के दायरे में कैसे रखा जा सकता है! कोई कह रहा है कि हम क्षत्रीय हैं, हमें राजकाज से कैसे दूर किया जा सकता है। लोग कह रहे हैं कि यह सारे कानून पहले से ही थे तो आज प्रश्न क्यों? पहले जब कानून बने थे तब राजतंत्र के व्यक्ति ने बनाये थे लेकिन आज इस लोकतंत्र के व्यक्ति की हिम्मत कैसे हो गयी जो हमारे खिलाफ कानून को समर्थन दे डाला।
ये है हमारे दिल और दीमाग की कहानी, जिसमें आज भी राजा और रानी ही हैं। उनका अधपगले बेटे को हम राजा मानते हैं लेकिन तैनाली राम जैसे प्रबुद्ध व्यक्ति को हमारा मन नेता मानता ही नहीं। मेरे तैनाली राम लिखने से भी प्रश्न खड़े हो जाएंगे, आपने तैनाली राम से तुलना कैसे कर दी? किसी भी लोकतंत्र से निकले व्यक्ति की तुलना नहीं, बस उदारहण के रूप में किसी महापुरुष से कर दो, फिर देखो, कैसा बवाल मचता है! उन्हें यह पता नहीं कि वह महापुरुष भी जरूरी नहीं कि किसी राजतंत्र का हिस्सा ही हों। लेकिन बेचारे साधारण परिवार से आए व्यक्ति को किसी उदाहरण में भी जगह नहीं है। इसलिये मोदीजी कह देते हैं कि वे नामदार है और हम कामदार हैं। हे! खास वर्ग के लोगों, जागो, लोकतंत्र आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, आपको भी इसी लोकतंत्र का हिस्सा बनना ही होगा अब दुनिया से राजतंत्र विदा लेने लगा है तो आपके मन से भी कर दो नहीं तो कठिनाई आपको ही होगी। लोकतंत्र में हम जैसे लोग तो लेखक भी बन जाएंगे और मोदी जैसे लोग प्रधानमंत्री भी बनेंगे, आपके घर की महिला अब पैर की जूती नहीं रहेगी और ना ही आपके घर का चाकर आपके चरणों की धूल बनकर रहेगा। जिन भी देशों ने राजतंत्र को अपने दिलों से विदा किया है, वे आज सर्वाधिक विकसित हैं। अमेरिका इसका उदाहरण है। तो आप भी विदा कर दो इस राजतंत्र को।

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