अजित गुप्ता का कोना

साहित्‍य और संस्‍कृति को समर्पित

उदयपुर का सौन्दर्य – उभयेश्वरजी के पर्वत

Written By: AjitGupta - Aug• 05•16

यहाँ जिन्दगी कभी शान्त सी दिखायी देती है तो कभी उत्सवधर्मिता से परिपूर्ण। पहाड़ की चोटी पर जितनी फुर्ति से बकरी चढ़ जाती है, उसी फुर्ति से यहाँ मनुष्य पहाड़ को लांघ लेता है। चारों तरफ पहाड़ और पहाड़ की ही सल्तनत फैली है यहाँ चारों ओर। हरे-भरे भी और मनुष्य की नासमझी को दर्शाते वीरान पहाड़ भी। पहाड़ की तलहटी में जहाँ भी समतल मिला मनुष्य ने अपनी बस्ती बसा ली। कहीं 100 घर तो कहीं 500 घर। पहाड़ों की दुर्गम चढ़ाई को पारकर ही यहाँ पहुँचा जा सकता है। उदयपुर से मात्र 15 कि.मी. दूर उभयेश्वरजी ऐसा ही स्थल है जो आजकल उदयपुर वासियों को लुभाने लगा है। जैसे ही उदयपुर के शहर की सीमा समाप्त होती है, पहाड़ों का सौन्दर्य आपके रास्ते में बिछ जाता है। बरसात के दिनों में यह सौन्दर्य पूर्ण यौवन पर होता है। एक तरफ बरसाती नदी अठखेली कर रही होती है तो दूसरी तरफ पहाड़ आपको अपनी सरहद बता रहे होते हैं। घुमावदार रास्ते, तीखी चढ़ाई, संकरे मोड़ आपको कुशल चालक बनाने में मदद करते हैं।
उभयेश्वरजी से 4 कि.मी. पहले हम हमारे परिचित किसान के अतिथि थे। छोटा सा 500 घरों का गाँव बणादिया, पक्की सड़क से जुड़ा हुआ है। आज से लगभग 15-17 वर्ष पूर्व भी मैं अपने दो साथियों के साथ इसी गाँव में ग्रामीण अध्ययन के लिये गयी थी। तब वहाँ ऐसी सड़के नहीं थी। राजस्थान सरकार के वर्तमान शिक्षा मंत्री श्री वासुदेव देवनानी ने पुरानी मारूती 800 खरीदी थी, सामाजिक अध्ययन के लिये हमने इसी गाँव को चुना और हम तीन जन निकल लिये, नयी लेकिन पुरानी गाडी और नये-नये चालक के साथ। तीसरे व्यक्ति भी जाना पहचाना नाम था – श्री परमेन्द्र दशोरा, जो वर्तमान में उपकुलपति हैं। देवनानी जी चालक थे और उस कच्चे-पक्के रास्ते पर हम दम साधे बैठे थे। लेकिन आज वो बात नहीं थी, हम 20 मिनट में ही बणादिया पहुँच गये। गाँव में घुसते ही चारों तरफ खुले में शौच मुक्त नारों की बाढ़ आ गयी। शान से सर उठाये गाँव कह रहा था कि हम खुले में शौच-मुक्त गाँव बन गये हैं। हर घर के बाहर शौचालय बना था, पानी की टंकी थी और थोड़ी-थोड़ी दूर पर पनघट योजना के तहत पानी की टंकी और हैण्डपम्प लगा था।
गाँव का विकसित स्वरूप देखकर अच्छा लगा लेकिन जब हमारे किसान मित्र के पुत्र विनोद से बात हुई तो थोड़ी निराशा भी हुई। शौचालय तो बना लिये लेकिन अभी गाँव वालों की मानसिकता जंगल जाने की ही बनी है। लेकिन मानसिकता शीघ्र ही बदलने लगेगी और लोग सुविधाओं का लाभ भी लेने लगेंगे। छोटा सा गाँव, चारों तरफ खेती, एक छोटी सी बरसाती नदी। हम गाँव के छोर तक टहल आते हैं, खेत की मुंडेर पर टिटहरी मधुर ध्वनी में अपने साथी को बुला रही थी। टिटहरी की पुकार ही वहाँ गूंज रही थी, बाकि तो सन्नाटा था। ऐसा सन्नाटा शहर में तो रात 12 बजे बाद भी नहीं होता। पता लगा कि आज उभयेश्वर जी में मेला है तो यह सन्नाटा इसी कारण होगा। लेकिन गाँव में छितराये घर शोर के आदी नहीं हैं।
कितनी कठिन जिन्दगी है एक महिला किसान की! सोचकर भी झुरझुरी होती है। 8-10 गाय भैंसों की देखरेख करना, खेती को देखना, घर के सारे ही काम करना और मेहमान-नवाजी तो वहाँ रोज का ही काम है। गायों को बार-बार गोबर करते देख मैंने पूछा कि दिन में कितनी बार ये गोबर करती हैं? मालूम पड़ा कि कम से कम 8 बार। हे भगवान! गोबर का प्रबंधन भी कितना बड़ा काम है! खेत की उपज को तोड़ना फिर मण्डी लेकर जाना भी श्रमसाध्य काम है। फिर हम जैसे अतिथि पहुँच जायें तो उन्हें गरम-गरम रोटी बनाकर खिलाना! पूरे परिवार को लगना पड़ता है तब कहीं जाकर किसान, किसान परिवार बनता है। गाँव में सारे ही आदिवासी परिवार थे, सिवाय हमारे आतिथेय के। आदिवासियों के घरों में गाय नहीं थी, कुछ बकरियाँ अवश्य थी। मुर्गे भी अपने नन्हें चूजों के साथ बड़े सुरक्षित से घूम रहे थे। चिड़िया बेखौफ घरों में घुसकर चीं-चीं कर रही थी। गाँव में भी अब केलूपोश मकानों का स्थान पक्के मकानों ने लेना शुरू कर दिया है। पहाड़ी स्थान होने के कारण खेत टुकड़ों में बंटे थे, कोई आधा बीघा तो कोई एक बीघा। छोटी-छोटी जरूरतें और पूरा करने के छोटे-छोटे साधन। पहाड़ो की ऊँचाई पर बने झोपड़े लुभाते तो बहुत हैं लेकिन उनकी अपनी दुश्वारियां हैं। लेकिन ग्रामीण जीवन सरल नहीं है। जिस प्रकार प्रकृति के साथ रहने पर संघर्ष बहुत हैं वैसे ही यहाँ का जीवन है।
बणादिया से निकलकर हम उभयेश्वरजी आ पहुँचे थे। उभयेश्वर का मार्ग दुरूह है, एकदम खड़ी चढ़ाई, फिर ढलान, गाडी को बहुत सावधानी से चलाना होता है, जानकार ही यहाँ गाडी चला पाता है। महादेव का मन्दिर, साथ में तालाब और तालाब पर बहता पानी पर्यटकों को लुभाता है। आज यहाँ मेला भरा था तो आदिवासियों की रेलमपेल लगी थी। मन्दिर से लगी पहाड़ी पर वैष्णौव देवी के मन्दिर की स्थापना की गयी है, इस कारण भक्तों का तांता वहाँ लगा रहता है। लगता है कि साक्षात वैष्णौव देवी के मन्दिर में ही जाकर आये हैं। यहाँ की ऊँचाई से सारा पहाड़ी क्षेत्र दर्शनीय हो जाता है। उभयेश्वरजी से 2 कि.मी. आगे जाने पर बेहद खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र है, यहाँ से गहराई में काफी नीचे गाँव बसे हैं, जहाँ जाना कुशल चालक के लिये ही सम्भव है। यहाँ घना जंगल है और जंगली जानवर भी। रात को यहाँ ठहरना खतरे को आमंत्रण देना है।
जंगल के कटने की बात नहीं करूंगी तो बात अधूरी ही रह जाएगी। आजादी के बाद यहाँ जंगल तेजी से कटे, लोगों ने पेड़ काटकर कोयला बना लिया। लेकिन अब जंगल वापस पनप रहे हैं। कारण बताया गया कि शहर में कोयले की मांग समाप्त हो गयी है और गाँवों में गैस के चूल्हें जलने लगे हैं इसलिये जंगल की कटायी समाप्त सी है। अब सरकार द्वारा गैस के चूल्हें देने के कारण तो जंगल की कटाई समाप्त ही हो जाएगी, यह शुभ संकेत है। वन विभाग भी सावचेत हुआ है और ग्रामवासी भी। इसलिये पहाड़ का सौन्दर्य लौटने लगा है। इस प्रकृति की अनुपम देन को जितना देखो उतना ही अपनी ओर आकर्षित करती है लेकिन दिन तेजी से ढल रहा था और अब जंगल कह रहे थे कि हमें एकांत चाहिये। किसी शहंशाह की तरह जंगल ने भी कहा एकान्त! और हम वापस चले आये, उस खूबसूरती को आँखों में संजोये, फिर आने की उम्मीद के साथ।

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